मंगलवार, 12 जून 2012

सन्‍तोष कुमार सिंह की बाल कविता - सूरज दादा

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सूरज दादा

सूरज दादा कितनी गर्मी

तन में पलती है।

सभी दिशायें दहक रही हैं,

धरती जलती है॥

 

टप-टप, टप-टप टपक रहा है,

श्‍वेद सभी के तन।

शोले जैसे बरसाता है,

ये नीलाभ गगन॥

 

खुशियों के आँगन सूखे हैं,

तन भी झुलस रहे।

चिड़िया के बच्‍चे हैं गुमसुम,

कल तक हुलस रहे॥

 

भला-बुरा किसने कह डाला,

गुस्‍सा फूट पड़ा।

कूँए, पोखर सूखे तपता,

जल से भरा घड़ा॥

 

वसुन्‍धरा के हर प्राणी के,

मन भी कुन्‍द हुए।

छुट्‌टी में भी सारे बच्‍चे,

घर में बन्‍द हुए॥

 

गुस्‍सा थूको, जिद भी छोड़ो,

सूरज दादा जी।

धधक रही जो आग हृदय में,

कर दो अब आधी॥

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सन्‍तोष कुमार सिंह

कवि एवं बाल साहित्‍यकार

मथुरा।

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