गुरुवार, 28 जून 2012

गोवर्धन यादव का आलेख - जल प्रदूषण को रोकने के उपाय

वर्तमान युग में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का प्रादुर्भाव इस युग में मानव को आश्चर्यजनक साधन उपलब्ध कराने में सफ़ल रहा है. लेकिन मनुष्य ने प्राकृतिक संसाधनों का इस ढंग से इसका उपयोग किया है,जिससे पारिस्थितिकी संतुलन गडबडा गया,जिसके फ़लस्वरुप भौतिकवाद एवं प्रकृतिवाद के बीच समन्वय तथा सहयोग का संबंध प्रायः समाप्त हो गया है.. इस कृत्य के लिए प्रौद्योगिकी दोषी नहीं है. विज्ञान एवं टेक्नोलाजी मानव की इच्छानुसार सुविधा प्रदान करने को तैयार है. परन्तु मनुष्य ने अपने व्यक्तिगत तुच्छ स्वार्थ पूर्ति हेतु विज्ञान एवं टेक्नोलाजी द्वारा आर्थिक लाभ हेतु प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन करने का प्रयास किया है. आज की भौतिकतावादी संस्कृति के पोषक मानव ने विलासिता और व्यक्तिगत लाभ प्राप्ति हेतु इनका दुरुपयोग करते हुए पर्यावरण का विध्वंस कर दिया है. आज हम पंचमहाभूत, आकाश, पृथ्वी, जल,वायु और अग्नि को नमन करने की बजाय प्रदूषित कर अपने जीवन दर्शन एवं सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतिरोध कर रहे हैं. वेद और इतिहास साक्षी है कि हमने सदैव प्राकृतिक संसाधनों की पूजा की है. वेदों में कहा गया है कि जो अग्नि, जल, आकाश, पृथ्वी एवं वायु से आच्छादित है तथा जो औषधियों और वनस्पति में भी विद्यमान है, उस देव अर्थात पर्यावरण को नमस्कार करते हैं..

उपनिषदों और धर्मशास्त्रों में भी ऐसी शिक्षा दी गई है. महाभारत में आयुर्वेद की शिक्षा आश्रमॊं मे क्षत्रियों को देने का वर्णन है अर्थात औषधि, वनस्पति का संरक्षण क्षत्री का धर्म होता था. हमने सदैव जल-स्रोतों – गंगा, यमुना,नर्मदा, ताप्ती आदि नदियों की पूजा-अर्चना की. पीपल, नीम,,तुलसी आदि की अर्चना की. सूर्य,चन्द्र को नमन किया. पृथ्वी माता को प्रणाम किया तथा आकाश में आच्छादित वायुदेव का आह्वान किया है क्योंकि हृदय की यह भावना-वृत्ति हमें सरस, प्रकृति प्रेमी और प्राकृतिक साधनों में अधिक आस्थावान बनाते हैं. फ़िर भला आज हम प्रकृति के प्रति इतने क्रूर-इतने निर्दयी क्यों हो गए हैं?. प्रदूषण पर चर्चा करने से पहले हम यह जन लें कि पर्यावरण किसे कहते हैं. पर्यावरण:- वे समस्त भौतिक व जैविकीय तत्व जो मानव की अनुक्रियाओं के प्रभावित करते हैं पर्यावरण कहलाते हैं प्रदूषण:-पर्यावरण के घटकों में बाह्य अवांछित पदार्थों का प्रवेश जिसके कारण उनकी गुणवत्ता में अवन्नति हो जाए प्रदूषण कहलाता है. प्रदूषण मुख्य रुप से चार प्रकार के होते हैं. पांचवें श्रेणी में हम उनको शामिल कर लेते है, जो इनमें से छूट सकते हैं.

1. जल प्रदूषण ( water pollution)

2. वायु प्रदूषण( air pollution.)

3 ध्वनि प्रदूषण( noise pollution)

4.मृदा प्रदूषण( soil pollution)

5.अन्य प्रदूषण( other pollution) 

जल प्रदूषण:-

हम जानते हैं कि जल के बगैर जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती. मनुष्य के शरीर में लगभग 70% जल का होता है. इसी तरह सभी जीवधारियों ,पेडॊं, पौधों की भौगोलिक एवं नैसर्गिक आवश्यकता है, जो जल के बिना संभव नहीं है. इसीलिए तो कहा जाता है कि” जल ही जीवन है”. जल जीवधारियों के जैव कार्यों को प्रभावित करता है. जल भूमि में उपस्थित खनिज पदार्थों को घुलनशील बनाकर उन्हें पौधों को उपलब्ध कराता है. जल के स्रोतों को मुख्य रुप से दो भागों में बांटा जा सकता है. 1. धरातलीय स्रोत 2. भूमिगत स्रोत. 1.धरातलीय स्रोत:- पानी के स्रोत जो जमीन के ऊपर होते हैं,वह धरातलीय स्रोत कहलाते हैं. जैसे:- समुद्र, नदी, तालाब, झील आदि का जल. 2. भूमिगत स्रोत:- पानी के वे स्रोत जहां जल की प्राप्ति भूमि के धरातल से न होकर भूमि के गर्भ से होती है,उन्हें भूमिगत स्रोत माना जाता है. जैसे:- कुंए, ट्यूबवेल आदि भूमिगत जल प्राप्ति के प्रमुख स्रोत हैं. उपरोक्त दोनों प्रकार के स्रोतों से अत्यधिक मात्रा में जल प्राप्त तो होता है लेकिन सभी जल पीने योग्य नहीं होता. इनमें अनेक प्रदूषक मिले रहते है. भारत में लगभग 20% लोगों को शुद्ध जल प्राप्त होता है, शेष 80% लोग आज भी प्रदूषित जल का उपयोग कर रहे हैं.

जल प्रदूषण को मुख्य दो भागों में बांटा जा सकता है. पहला:- भौतिक जल प्रदूषण (दूसरा) रासायनिक प्रदूषण .भौतिक जलप्रदूषण को भी हम पांच केटेगरी में रख सकते है. इसी तरह रासायनिक जल प्रदूषण को भी तीन मुख्य केटेगरी में रख सकते हैं. आइये इन पर क्रम से अध्ययन करते चलें. 1. भौतिक जल प्रदूषण:- भौतिक जल प्रदूषण में जल में भौतिक क्रियायों के द्वारा प्रदूषण होता है जो निम्नानुसार है.

(i) तापीय प्रदूषण:- औद्योगिक संयंत्रों एवं एवं बिजली घरों को ठंडा करने के पानी का उपयोग किया जाता है,जो गरम जल बाहर आता है उसमें आक्सीजन कि कमी हो जाती है,जिसके कारण वन मछली और अन्य जन्तुओं के लिए उपयोगी नहीं होता.

(ii) स्वाद एवं गंध प्रदूषण;-जिस पानी में बदबू आ रही हो अथव जिसका स्वाद ठीक न हो ऐसे प्रदूषित जल उपयोग में नहीं आता है.

(iii)रंग प्रदूषण;- शुद्ध पेय जल का प्राकृतिक रंग हल्का भूरा होता है किन्तु उद्योगों, कारखानों से निकलने वाला रंगीन जल, दूषित होता है.

(iv) घरेलू बहिस्राव-प्रदूषण:-घरेलू उपयोग में जैसे नहाना, घोना, आदि में जो जल प्रयोग में लाया जाता है, नालियों के माध्यम से नदियों तालाब आदि में चला जाता है जो अपने साथ अन्य खतरनाक पदार्थों को साथ बहा ले जाता है, अनियंत्रित जनसंख्या के दबाव के कारण भी स्थिति गंभीर बनी है. कल कारखानों से निकलने वाले जहरीले तत्व समूची नदी/तालाब आदि को प्रदूषित कर देता है.

2., रासायनिक प्रदूषण:-

जल के विभिन्न स्रोतों में अनेक प्रकार के रासायनिक पदार्थ मिल जाते हैं, जो जल को प्रदूषित करते है. प्रदूषित जल पेड-पौधों,जीव-जंतुओं के साथ मनुष्य पर भी गहरा प्रभाव छोड़ता है. इसके प्रयोग से हैजा, तपेदिक्, पीलिया, टायफ़ाइड, पक्षाघात, पोलियो आदि घातक बीमारियाँ घेर लेती है. अतः हमें प्रदूषित जल को भूलकर भी उपयोग में नहीं लाना चाहिए. और प्रदूषित जल की रोकथाम के लिए उचित उपाय करने चाहिए.

जल प्रदूषण की रोकथाम के कुछ उपाय.

1/- घरों, उद्योगों आदि से निकलने वाले अपमार्जक पदार्थों तथा विषैले पदार्थों को नदियों, तालाबों, आदि में डालने से पूर्व उसे शुद्ध करना चाहिए.

(2) जल में पेट्रोलियम पदार्थों को नहीं मिलाना चाहिए.

(3)शैवाल तथा जल के पौधे ऐसे भी हैं जो कि जल को शुद्ध रखने में सहायक होते हैं, उन्हें जल में बढ़ने देना चाहिए.

(3-1) नगरों एवं शहरों से निकलने वाला मल-कूडा- करकट आदि जल में नहीं डालना चाहिए. इन्हें शहर के बाहर गड्ढॊं में डालना चाहिए. जो बाद में कम्पोस्ट खाद में बदल जाते हैं, जिसका उपयोग खेतों में किया जा सकता है.

(4) कुछ इस प्रकार के वैज्ञानिक प्रयोग होने चाहिए जो प्रदूषकों को उपयोगी वस्तुओं में प्ररिवर्तित किया जा सके. उदाहरण के लिए- केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान रुडकी ने तापीय बिजली घरों से प्राप्त राख की ईंट में परिवर्तित करने का सफ़ल प्रयास किया है.

(5) मृत जीव-जंतुओं को नदी में नहीं बहाना चाहिए.

(6) घरों में जल को कीटाणु रहित करने के लिए क्लोरीन टेबलेट, आयोडीन आदि का प्रयोग होना चाहिए. आजकल अच्छे प्रकार के फ़िल्टर बाजार में उपलब्ध हैं ,को प्रयोग में लाना चाहिए.

(7) सभी शहरों एवं कस्बों में सीवर की सुबिधा होनी चाहिए.

(8) जल का न तो दुरुपयोग करना चाहिए और न ही उसे लापरवाही से व्यर्थ बहाना चाहिए.

सार्वजनिक उपयोग हेतु जाल का शुद्धिकरण:-

नगर तथा कस्बॊं की जल आपूर्ति बनाए रखने के लिए जल का शुद्धिकरण किया जाता है. यह प्रक्रिया अनेकों चरणॊं में की जाती है.

(i) निस्यंदन- जल को छानने के लिए निचली सतह पर पत्थर के टुकडे, उसके ऊपर कंकड़ और सबसे ऊपर रेत बिछायी जाती है. जब जल उपरोक्त सतहों से छन कर आता है तो वह स्वच्छ जल होता है.

(ii) वातन:-स्वाद एवं गंध को दूर करने के लिए इस पद्धति को प्रयोग में लाया जाता है. इस प्रक्रम में जल को फ़व्वारे के रुप में कोक के ऊपर से गुजारते हैं या जल को सक्रिय चारकोल से भरी ट्रे के ऊपर गिराया जाता है. ऐसा किया जाकर जल में घुली हुई कार्बन डाइआक्साइड एवं हाइड्रोजन सल्फ़ाइड गैसें वायु से मुक्त हो जाती है एवं कुछ पदार्थों का अवक्षेपण हो जाता है,जिन्हें छानकर पृथक कर दिया जाता है.

(3) शैवाल का पृथक्करण:- जल में नीला थोथा मिलाने से शैवाल नष्ट हो जाते हैं. सूर्य के प्रकाश किरणॊं के अभाव में भी शैवाल की वृद्धि रुक जाती है. अतः छोटे जलाशयों को ढांककर रखा जाता है.

(4) सूक्षमजीवी राहित जल बनाना:-

इस विधि में टैंकों में क्लोरीन गैस या ब्लीचिंग पाउडर का चूर्ण मिलाया जाता है.

(i) ओजोनीकरण_ इस पद्धति से जल में सूक्ष्म जीवी समाप्त हो जाते हैं.

(ii) परावैंगनी किरणॊं का प्रयोग- यदै जल पर प्रावैंगनी किरणें डाली जाएं तो भी जल जीवाणु राहित हो जाता है.

(iii) काक दवा( पोटेशियम परमैंगनेट)- इसे कुओं,ट्युब्चेल;ओं आदि मे डालकर कीटाणु नष्ट किए जा सकते है.

(5.) स्क्न्दन-

जल को स्कन्दन टैंक में ले जाते है,जिसमे फ़िटकरी, फ़ैरिक सल्फ़ेट, फ़ैरिक क्लोराइड या चूना आदि रहता है, जिससे शुद्ध जल प्राप्त किया जा सकता है.

(6) पूर्व निथारन जलाशय में जल का एकत्रीकरण- जल से शैवाल को अलग करने के बाद जल को पूर्व निथारन जलाशय में डाला जाता है. जलाशय में जल को उसके गंदलेपन के अनुसार 4-24 घंटॊं तक रखा जाता है,जिससे रेत तथा सिल्ट नीचे बैठ जाता है, फ़िर जल को एक महीन जाली में से प्रवाहित किया जाता है. इस तरह स्वच्छ जल की प्राप्ति होती है.

(7) जल का एकत्रीकरण-नदी,तालाब आदि से जल को पंपों के माध्यम से बडॆ-बडे जलाशयों में भरा जाता है, कुछ दिन बाद प्रदूषक नीचे बैठ जाते है, इस तरह जल को शुद्ध किया जा सकता है.

(8) क्लोरिकरण जलाशय में उपस्थित कीटाणुओं तथा कार्बन पदार्थों जैसे मृत पत्तियों,शैवाल कोशिकाएं,वाहित मल आदि को नष्ट करने के लिए जल में क्लोरीन गैस प्रवाहित की जाती है.

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103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१

07162-246651,9424356400

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  1. जी, बहुत अच्छा । आपने जल के ऊपर बहुत ही अच्छा लेख लिखा है ।

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