सोमवार, 18 जून 2012

हीरालाल प्रजापति का आलेख : यौन अपराधों में दूरदर्शन कितना उत्तरदायी

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लेख

यौन अपराधों में दूरदर्शन कितना उत्तरदायी

[ डॉ. हीरालाल प्रजापति ]

कौन क्या कहता है; किस माध्यम से कहता है और किस भाव से कहता है , भाषा और संचार कि उपर्युक्त प्रक्रिया का सरल तरीके से दूरदर्शन इसका सीधा वर्णन देता है इ साधारण से साधारण बुद्धि वाला दर्शक भी टेलीविजन के यद्यपि काल्पनिक तथापि सजीव और सत्याभासित होने वाले चलचित्रीय प्रभाव के प्रति अति सुग्राही होता है। यह वैज्ञानिक सत्य है किन्तु मनुष्य का अच्छा या बुरा , उपयोगी या अनुपयोगी , सकारात्मक या नकारात्मक और सायास या अनायास मनोरंजन से युक्त सन्देश ग्रहण या ज्ञानार्जन पढ़ने अथवा सुनने की अपेक्षा देखकर ज्यादा अच्छा होता है। देखी हुई घटनाएं मनुष्य को ज्यादा सरलता से एवं दीर्घकाल तक याद रह सकती हैं अतः यह दावा गलत नहीं होगा कि वांछित या अवांछित किसी भी मनोरंजन सूचना शिक्षण हेतु पठ्य अर्थात पुस्तकें और श्रव्य अर्थात रेडिओ ,टेप रिकार्डर आदि माध्यमों की तुलना में दृश्य माध्यम अर्थात टेलीविजन ,डी वी डी ,कंप्यूटर आदि अधिक उपयोगी और प्रभावकारी है। आज फिल्म और टेलीविजन की लोकप्रियता सब से अधिक है बल्कि फिल्म माध्यम भी अब टेलीविजन के साथ साँठ गाँठ कर दुनिया का चेहरा बदलने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

टेलीविजन के माध्यम से हमें नित्य ही नई पुराणी ,देसी विदेशी फ़िल्में देखने को मिलती हैं जो निश्चय ही हमारा सामजिक और सांस्कृतिक ज्ञानवर्धन करती हैं , हमारे परंपरागत और व्यक्तिगत विचारों को चुनौती देती हुई हमें सत्य का अन्वेषण करने को विवश करती हैं। विदेशी धारावाहिकों के माध्यम से हम वहां की संस्कृति की तुलना अपनी संस्कृति से करते हुए श्रेष्ठ तत्व को आत्मसात करने और कलुष तत्व के परित्याग की चेष्टा करते हैं , फिर भी देखने में यही आ रहा है कि हम पश्चिम का अन्धानुकरण करते हुए अपसंस्कृति के शिकार हो रहे हैं।

पिछले कुछ वर्षों से मीडिया जनसंचार तथा प्रसारण माध्यमों की भूमिका को लेकर एक बहस पूरे विश्व में छिड़ी हुई है ,विशेषकर प्रसारण माध्यमों की भूमिका तथा सैटेलाईट टेलीविजन का विश्व स्तरीय प्रभाव .मीडिया कीभूमिका विश्वस्तरीय परिप्रेक्ष्य में इतनी अहम् हो गई है कि आज इसका प्रभाव दुनिया के हर कोने में दिखाई देता है।

भारत के परिप्रेक्ष्य में यहाँ के दर्शकों पर दूरदर्शन के प्रभाव का जादू महानगरों से लेकर ग्रामीण अंचलों तक लगभग एक सा परिलक्षित होता है जिसके तहत हमें एक बात उभयनिष्ठ रूप से दिखाई पड़ती है कि हमारे यहाँ के अनेकानेक दर्शक उनकी पसंद के नियमित धारावाहिकों के चलते उनके घर पधारे अतिथियों को तो अनदेखा कर सकते हैं ; टाल सकते हैं किन्तु उन धारावाहिकों को नहीं . सवाल यह उठता है कि दूरदर्शन में ऐसा क्या है कि एक वर्ग उससे चिपका ही रहना चाहता है और दूसरा वर्ग उसमें प्रसारित होने वाले अनेक कार्यक्रमों के आते ही या कुछ ख़ास किस्म के दृश्यों से नाक भौं सिकोड़कर उसे काम से काम देखना चाहता है ?

वस्तुतः हर सिक्के कि तरह दूरदर्शन के भी दो पहलू हैं जिसके एक ओर आवश्यक सूचनाएं ,सन्देश और स्वस्थ मनोरंजन के साथ ही शिक्षण भी है तो दूसरी ओर मनोरंजन के नाम पर भोंडापन ,फूहड़ हास्य ,कामोत्तेजक नृत्य ,अर्धनग्न फैशन परेडें ,भड़काऊ सौन्दर्य प्रतियोगिताएं , अश्लील दृश्यावलियाँ एवं भारतीय संस्कृति पर सीधे कुठाराघात करने वाले और अप्रत्यक्ष रूप से अप्राधोंमुख करने वाले नितांत हवाई धारावाहिक अंकित हैं।

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सैकड़ों चैनलों वाले और अरबों रुपये प्रति वर्ष के बाज़ार की जान टी आर पी नाम के तोते में बसी है। टी आर पी की सूची में प्रथम होने का अर्थ तो यही लगाया जाता है कि प्रस्तुत कार्यक्रम सर्वाधिक लोकप्रिय है भले ही सूची क्रम में यह स्थान एन कें प्रकारें प्राप्त किया गया हो, किन्तु अनेक दर्शक टी आर पी से ही प्रभावित होकर ही किसी चैनल अथवा कार्यक्रम का चुनाव करते हैं। इसी सिलसिले में कार्यक्रमों को लोकप्रिय बनाने के चक्कर में निर्माता निर्देशक मूल कहानी से छेड़छाड़ करके उसमें अनावश्यक या चलताऊ दृश्य भरते हैं जिससे कहानी का ओर छोर विलुप्त हो जाता है। एक सफल निर्माता वह होगा जो दर्शकों की नब्ज़ पहचाने , यह अच्छी तरह जानले की उन्हें क्या चाहिए और कितना चाहिए अर्थात दर्शकों की मानसिकता का सम्पूर्ण ज्ञान उसे होना चाहिए किन्तु हम देखते हैं की निर्माता अतिरेक में बाहर किसी भी घटना जो एक बार पसंद कर ली जाती है उसे ही रूप बदल बदल कर पुनरावृत्त कर कर के बोर करने लग जातें है। तभी तो श्री महेश भट्ट मुंबई उच्च न्यायलय द्वारा 21 दिसंबर 2005 के यू ए प्रमाणपत्रों वाली फिल्मों के टी वी प्रसारण पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाए जाने वाले आदेश को उचित नहीं मानते .उनका मानना है कि जिन घरों में वी सी डी या वी सी आर है ;निस्संदेह वे यू ए और ए सर्टिफिकेट वाली फिल्मों सहित हर श्रेणी की फ़िल्में खरीदते हैं। अगर एक कैसेट को औसतन चार लोग भी देखें तो साल भर में 15 करोड़ 20 लाख भारतीय पायरेटेड फिल्मों को देखते हैं जिनमें सैक्स प्रधान सामग्री ज्यादा होती है। एनी शब्दों में वे प्रत्यक्ष रूप से ही सैक्स प्रधान फिल्मों के टी वी प्रसारण को बुरा नहीं मानते और कारण दर्शकों की पसंद का ख्याल रखना बताते हैं यानी दर्शक ही उनकी दृष्टि में अश्लीलता प्रिय है।

टेलीविजन करोड़ो घरों में पहुँच रखता है और जनता के लिए मनोरंजन शिक्षा व सूचना का सबसे सस्ता साधन है . अंदरूनी इलाकों में करोड़ों लोगों के मनोरंजन का यह एकमात्र साधन है और इस पर फिल्मों की दर्शकता सर्वाधिक है . इससे यह सहज अनुमानित है की टेलीविजन का माध्यम लोगों के मानस निर्माण में कितना सहयोगी है . यदि दिन रात दूरदर्शन पर ऐसे ही सैक्स प्रधान या किसी भी रूप या प्रकार में सैक्स को उभरने वाले कार्यक्रम प्रदर्शित होते रहेंगे तो भगवान ही हमारी उस संस्कृति की रक्षा कर सकता है जिसमें सैक्स को गोपनीय ,लज्जा तथा केवल 'पति-पत्नी ' की विषय वास्तु माना गया है . जबकि फिल्मों सीरियलों में इसे सहज , स्वाभाविक ,अत्यावश्यक और गौरव की बात बतलाकर संक्रामक रोग की तरह फैलाया जा रहा है जो निश्चय ही महिलाओं के साथ बढ़ती छेडखानियों एवं यौन अपराधों का एक बहुत बड़ा कारण है .[ चूंकि इस लेख का विषय टेलीविजन है अतः इसमें मोबाइल और इंटरनेट का उल्लेख नहीं किया जा रहा वरना यह बात बड़े दावे के साथ की जाती कि अधिकांश कलर मोबाइल रखने वाले युवा इंटरनेट द्वारा मुफ्त डाऊनलोड की जाने वाली अश्लील फिल्मों के यदा कदा अथवा अक्सर देखे जाने की बात से इनकार नहीं कर पाते और जिन्हें देख देख कर निश्चय ही वे कामोत्तेजना प्राप्त करके कुविचारों में थोड़े बहुत अवश्य बह जाते हैं ]

किसी भी देशी अथवा विदेशी चैनल को ले लीजिए .....चाहे वह स्टार हो ;जी टी वी हो ;जूम हो; सोनी हो या एनी कोई चैनल ; मेट्रो हो ; कलर हो; व्ही चैनल हो या अन्य कोई भी चैनल हो प्रायः सभी में प्रसारित होने वाले गीत संगीत और नृत्य कार्यक्रम चिकनी चमेली , जलेबी बाई ,ढिंक चिका आदि आदि टाइप के नृत्य कला के नाम पर भीड़ बटोरू ;सेक्स उभारू भर होते हैं . एम् टी वी ने हमारे फ़िल्मी गीतों को साहित्य संगीत से मुक्त करके कोरियोग्राफी में बदल दिया है ,प्रेम निवेदन को चूमा चाटी और नंगे शब्दों में कहा जाये तो मैथुनेच्छा में बदल दिया है ; देह को परत दर परत उघाड़कर रख दिया है और एक ऐसी पीढ़ी का दृश्य सत्य बना दिया है जो सिर्फ़ थिरकती ,देह तोडती है,रोटी है या कपडे उतारती है।

सस्ती लोकप्रियता अथवा त्वरित लाभ के चक्कर में अभिनेत्रियाँ तन का एक एक कपडा उतारने को तैयार ही खड़ी हैं . वहीँ फिल्म निर्माता उनकी इस कमजोरी का फायदा उठाकर अश्लीलता की हदें तोड़ते दृश्य पे दृश्य शूट किये जा रहे है और अभिनय की तथाकथित महानता के प्रदर्शन के नाम पर ''द डर्टी पिक्चर '' जैसी वयस्क फिल्म को टेलीविजन पर प्रसारित करने में कोई कोर क़सर नहीं उठा रख रहे ,जिसके अश्लील द्रश्यांकित गानों पर ,मासूम बच्चे ऊ ला ला, ऊ ला ला करते झूम रहे हैं। ये है दूरदर्शन का जादू।

परम्परागत हेतुओं से अलग शुद्ध बाजारू लोकप्रियतावाद ने यहाँ जन्म ले लिया है जहाँ वही सफल है जो सर्वाधिक लोकप्रिय हो यानी सबसे ज्यादा बिकता हो . इसलिए निर्माता भी धड़ा धड़ अपनी फिल्मों में सैक्स का छौंक पे छौंक लगा रहे हैं।

फिल्म अथवा सीरियल के प्रसारण के दौरान दिखाए जाने वाले अनेक विज्ञापन मसलन परफ्यूम स्प्रे या शेविंग ब्लेड आदि तो कंडोम से भी ज्यादा अश्लील और कामुकता फैलाऊ विज्ञापन होते हैं।

पुनः धारावाहिक की बात की जाए तो यहाँ का पूरा संसार स्वप्निल है। यहाँ चरित्रों में देवत्व या राक्षसत्व तो मिलता है किन्तु मनुष्यत्व कहीं नहीं। निर्माताओं के पास केवल करोडपति -अरबपति परिवारों की ही कहानियाँ हैं जिनके पात्र बंगलों ,कोठियों अथवा महलों में रहते हैं। षड्यंत्रकारी महिलाएं सदैव सजी धजी और चालें चलती हुई शोभायमान रहती हैं। ये वैभव और विलासिता से परिपूर्ण चकाचौंधमयी वातावरण देख कर अनेक गरीब व मध्य वर्गीय दर्शकों में हीनता और दीनता का बोध जन्म लेता है और ऐसी ग्लैमरस ज़िन्दगी को पाने के लिए वे मचल उठते हैं। फलस्वरूप मौका मिलने पर पैसों के लिए कोई भी वारदात कर बैठते हैं। इस प्रकार दूरदर्शन किसी न किसी को अनचाहे ही सही किन्तु

ऐसे अपराधों के लिए अवश्य ही दुष्प्रेरित करता रहता है जो समाज के लिए अत्यंत विघटनकारी और भयावह है।

इस कहावत में कोई दो मत नहीं कि ''चन्दन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग '' किन्तु चूंकि प्रत्येक दर्शक चन्दन अर्थात परिपक्व (मैच्योर्ड) नहीं होता अतः उसे ऐसे कार्यक्रमों ,फिल्मों , धारावाहिकों आदि को आँखों और ह्रदय पर एक सुरक्षा कवच लगाकर देखना चाहिए ताकि वह उनकी दुशप्रेरनाओं से बचा रहे क्योंकि व्यावहारिक दृष्टि से यह कटु सत्य है कि न आप दूरदर्शन देखना बंद कर सकते हैं और न ही ऐसे कार्यक्रमों का बनना और प्रसारित होना रुक सकता है।

सन्दर्भ : १. दूरदर्शन : हिंदी के प्रयोजनमूलक विविध प्रयोग _कृष्ण कुमार रत्तू २.आधुनिक जन संचार और हिंदी _प्रो. हरिमोहन ३. मीडिया और साहित्य _सुधीश पचौरी

४. दै.भा.मधुरिमा प्लस (१६.२.२००६) , ५ . दै.भा. रसरंग( १४.९.२००४) , ६ . दै.भा.नवरंग (११.२.२००६)

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