शनिवार, 2 जून 2012

कविताएँ

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता – चुनने की दास्तां


चुनने की दास्‍तां .............
मेरी कम उम्री ने
मुझे पगलाने दिया
उस मुस्‍सली से
प्‍यार करा दिया
एक दुविधा लिए
पहली नजर का प्‍यार था
हम नाचने लगे थे
जब छुआ सिर्फ हाथ था
अधीरता में एक-दूसरे में
डूब जाने का मन में सपना था
मसाई मारा के सूर्यास्‍त की तरह
मन कुलांचे मार रहा था
तभी स्‍तब्‍ध करने बाला फरमान
तुम हिन्‍दू और वह मुस्‍लमान
नहीं पूरे हो सकते हैं अरमान
नंगी तलवार और म्‍यान
क्‍या सोच सकते हो
एक को चुनने की दास्‍तां!
जिसने धर्म की दीवार तोडकर
किया था पहला प्‍यार
वास्‍तव में यह कोई
नहीं था पहली नजर का प्‍यार
उस मुस्‍सली ने पूरे होशो हवास
देखा था मन की आखें से खास
जो दूरियों को लांघ कर
दो दिलों को लाया था पास
नफरत की दीवारों के बीच
पनपा था  नया विश्‍वास
खुरदरे कैनवास पर
रंगों का सुरमई प्रकाश।


-सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री
‘राजसदन' 120/132
बेलदारी लेन, लालबाग,
लखनऊ
मो0ः 9415508695


----.
मोतीलाल की दो कविताएँ –

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जिन्दगी की राह पर
शूल की चिँता
अभी कहाँ छुटी है
बूढ़े बरगद की उस छाँव मेँ
जहाँ मातम की हवा
सरसराते पत्तोँ को छेदकर
मेरी खिड़की से आ टकराती है

अभी जीवन के सपने
टूटे तारोँ मेँ कहीँ अटके है
और वसंत की पंखुड़ियोँ ने
नदी के पुल से झाँककर
लहरोँ मेँ अपना चेहरा कहाँ ढूँढा है
अभी-अभी के छलावे ने
उलझा दिये हैँ सारे गणित

अभी शेष का अंतिम प्रहर
नहीँ उतर सका है जीवन मेँ
मिट्टी के खिलौने से मुन्ना
कहाँ खेल पाया है ठीक से
और तुम कहते हो
छेद हो गया है मेरे वसंत मेँ ।
--


मेरी इच्छा होती है
देह के सुस्वाद अंधकार से
हरे मद की तरह
किसी नरम मूंगिया रोशनी को
अपनी बाँहोँ मेँ भर लूँ

मेरी इच्छा होती है
रात के अँधकार मेँ
शिशिर से भीँगे आँख की तरह
झिलमिला रहे तारोँ को
अपने सीने मेँ टाँक लूँ

जँगल के भीतर से
मृतकोँ के धुँधले चेहरे लेकर
किसी श्मसान के सफेद बगुले मेँ पिरामिड बन जाने की इच्छा
कभी भी नहीँ रही है
और नक्षत्रोँ के पार
स्वाति तारे की गोद से
समुद्र के पेट की तरह
मैँ नहीँ चाहती थी आँगन को फाँदना

आखिर आकाश के विस्तृत डैनोँ के भीतर
मैँ कोई फूल सूंघना चाहती थी तो
तीखी धूप की गंध से
मेरा ह्रदय पृथ्वी को छोड़
सुदूर दिगन्त पर कोहरे से लिपटे
जंगल के भीतर
कोड़ों की भीतर से थकहार कर
क्योँ नहीँ बंद हो जाती है
इच्छाओँ की वे सारी धड़कनेँ
जहाँ पौष की चांदनी मेँ
देह की गंध
तुम्हारे बिस्तर पर भूला चुकी हूँ

मेरी इच्छा
गहरे नीले अत्याचार से
तुम्हारे पृथ्वी को छोड़
गुब्बारे की तरह उड़ चुकी है
जहाँ नरम मूंगिया रोशनी
मेरी ओर बढ़ती चली आ रही है ।

 


* मोतीलाल/राउरकेला
* 9931346271
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शंकरलाल की कविता - किसान

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किसान
खून से सींचा है मैंने
अनाज का दाना दाना
मगर
बेचने में आ रहा है पसीना
क्योंकि भरने के लिए
सरकार के पास नहीं है बारदाना |

राज्य केन्द्र को, केन्द्र राज्य को
बता रहा है गैर जिम्मेदाराना
मगर
बारदाने के इस खेल में
खुले आसमान के नीचे
मेरी आँखों के सामने
बारिश में भीग रहा है
अनाज का दाना दाना |

कहने को तो मैं हूँ अन्न दाता
मगर ये नाम अब मुझे रास नहीं आता
यो तो पेट देश का भरने के लिए
धरती पर हल चलाता हूँ
खून पसीने से फसल भी बहुत उगाता हूँ 
मगर,
राज की अति के आगे
अपना ही पेट नहीं भर पता हूँ
इसलिए मज़बूरी में फंदे पर झूल जाता हूँ |
 
हल्ला तो हर कोई करता है
मेरे दुःख में दुखी हो कर
आँखों में घडियाली आंसू भी है भरता
मेरे दुःख में दुखी हो कर
हालत मगर ऐसे है यहाँ
की कोई भी, मेरी लाश पर
राजनैतिक रोटियाँ सकने से
परहेज नहीं करता है यहाँ |

यह सब देखकर
मैंने भी अब ठाना है
बहुत बहा दिया खून-पसीना
अब हल नहीं चलाना है
धरती को बेचकर अब
जिंदगी ऐश से बिताना है |

शंकर लाल , इंदौर , मध्यप्रदेश
  shankar_kumawat@rediffmail.com

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हिमकर श्याम की ग़ज़लें

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अपना ही अक्स देखकर हैरान आदमी


कितना बदल गया है नादान आदमी
अपना ही अक्स देखकर हैरान आदमी

हर तरफ उठी है नफरत ही सरहदें
रंजिशों में खो गया मेहरबान आदमी

हंगापा बरपा है मजहब के नाम से
दैरो हरम के नाम पर हैवान आदमी

रिश्तों की तलाश में भटकती निगाहें
हो गया अब हिन्दू-मुसलमान आदमी

बातों-बातों में जल गयीं ये बस्तियां
ढ़ूंढ़ता फिर रहा अपना मकान आदमी

लिपटी हुई है शाम खामोशियों तले
हादसों की भीड़ में परीशान आदमी

लब खोलने की इजाजत नहीं यहां
सियासत के खेल में, बेजुबान आदमी
--


परिंदों से सीखी है जीने की अदा 

उम्मीदों के संग जोड़ते रिश्ता नया
परिंदों से सीखी है जीने की अदा 

जिधर देखिए, वहीं ग़म के मारे
ढूंढते फिर रहे खुशियों का पता

कौन लिखे बगावत की तहरीर यहां
चंद सिक्कों पे बिक जाते हैं रहनुमा

जिस तरफ देखा नजर आया ख़ला
नजर आता नहीं कहीं कोई रास्ता

न समझा है कोई और न समझेगा
अलग है सियासत का फ़लसफ़ा

अच्छा हुआ जो सबकुछ भूला दिया
इस अहद में फ़ुर्सत किसे जो रखे वास्ता

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परिचय 

वाणिज्य एवं : पत्रकारिता में स्नातक। प्रभात खबर और दैनिक जागरण में उपसंपादक के रूप में काम। विभिन्न विधाओं में लेख वगैरह प्रकाशित। कुछ वर्षों से कैंसर से जंग। फिलहाल इलाज (कीमोथेरेपी) के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से रचना कर्म। विभिन्न वेब पत्रिकाओं में नियमित लेखन। मैथिली का पहला ई पेपर समाद से संबद्ध भी।
पत्र-व्यहार का पता :  हिमकर श्याम
                  5, टैगोर हिल रोड, निकट रिलायंस फ्रेश,
                  मोराबादी, रांची. (झारखण्ड)
                  पिन कोड : 834008.             

ई-मेल पता :  himkarshyam@gmail.com

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प्रमोद कुमार ‘‘सतीश’’ की कविता – माँ मेरी माँ                                           

माँ मेरी माँ
ममता के सरोवर में खिलता हुआ कमल है
जननी है, वसुन्धरा है, स्वभाव से निर्मल है


पलको पे तेरी सृजन के स्वप्न विराजते हैं
करूणामयी, श्रद्धामयी, माँ तेरा आँचल है


वात्सल्य, प्रेम की गाथा तेरी अनन्त है
सृष्टि का अन्त हो, तेरी ममता का न अन्त है


बालपन तेरे आँचल की छांव में गुजारा है
मेरी हर भूल को तूने ही सुधारा है


लोरियों की धुन कानों में गूंजती है
रखती है हाथ सर पर, माथे को चूंमती है


लेती है बलाएं,  देती है दुआएं
मेरी हर कामयाबी पर तू खूब झूंमती है


किस्मत के फेर ने तुझसे दूर कर दिया
जिन्दगी की जरूरतों ने मजबूर कर दिया


माँ मुझे फिर से आँचल में छुपा ले
लोरी सुना दे फिर से गोदी में सुला ले


अब नहीं रहना दूर मुझे तुझसे
माँ मुझे अपनी पलकों में बिठा ले


                  प्रमोद कुमार ‘‘ सतीश ’’
मो0 ---  09795497804
Email----- kumar.pramod547@gmail.com
पता --- 109/1 तालपुरा झाँसी (उ0प्र0)
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मीनाक्षी भालेराव की 4 कविताएँ


लड़की
खुली खिड़कियों से
आज, फिर सुबह
झाँक रही थी !
पर्दे की झिरियों से
देख मेरी
हथेली की रेखाएं,
मुझे कोस रही थीं !
क्यों मैं
दरवाजा बंद कर,
घर  की
चार दीवारी
में कैद हूँ,
उठ कर क्यों
स्वागत नहीं
कर रही !
आने वाली
सुबह का
पर सुबह को
कहाँ मालूम था ,
जब लड़की
पराई हो जाती है ! 
तो उस की सारी 
सुबह उसकी ,
कहाँ रह जाती है !
खोकर उजाले की
सारी किरण,
अपने लिए दायित्व की
बोरी अपने ललाट
पर लटका लेती है ! 
 
क्या करती
रात थी अँधियारा था
खमोशी की बरात थी
सन्नाटे में भी शोर था
चीख रहे थे कब्रिस्तान
मैं क्या करती डर के मारे
मैं चाँद पकड़ कर सो गयी
ना कोई अपना था
ना कोई पराया था
मुश्किलों में घिरी
जीवन की शामें थी
मैं क्या करती डर के मारे
मैं अँधियारा ओढ़ कर सो गयी
पत्थरों को पूजा
पेड़ों को पूजा
नदियों को पूजा
फिर भी राह  नहीं मिली
मैं क्या करती डर के मारे
मैं मौत से लिपट कर सो गयी
 
घर
एक सुंदर घरौंदा
बन सकता है
मट्टी,घास-पूस
ईंट,पत्थर,चुने से
उसे रंगा जा सकता है
रगंबिरंगे रंगों से
उसे सजाया जा सकता है
फूलों, बेलों और
ना जाने किस-किस से
पर क्या बिना
आपसी मधुर
रिश्तों के घरौंदा  
घर बन सकता है
 
मजबूर वक्त  
मैं जूझ रही थी
अपने भविष्य की
और जाने वाले
मार्ग की तलाश में
मैं घिस रही थी
अपने हाथों की
लकीरों को अपनी
तकदीर की लकीरों
को खोदने के लिए
मैं नाराज थी खुद से
क्यों वक्त को रोक
नहीं पा रहीं हूं
अपने साथ चलने को
पर मैंने देखा कि
वक्त तो खुद ही
बहुत मजबूर है
अपनी बदली हुई
चाल पर चलने को
---.


शशांक मिश्र भारती की तीन कविताएं-           

दहेज
वह-
विवाह करके लाये
दो माह पश्‍चात ही
दहेज के दौरे पड़ने लगे,
पत्‍नी का सिर पीटने लगे
विवश-
पत्‍नी के मां-बाप
दहेज रूपी दानव के द्वारा
अपनी-
बेटी निगलना देखते रहे।


दहेज प्रथा
दहेज प्रथा जरूरी है
जिसका निदान जरूरी है,
बिना साक्षरता के इसका
निदान नहीं हो सकता है
वादों से क्‍या कोई कार्य
पूर्ण कभी हो सकता है,
दहेज प्रथा का होना नाश
राष्‍ट्र के लिए जरूरी है
बिन दबावों के विवाह
समाज में आज जरूरी हैं
समाज के दुर्गुण हटने से
प्रेमभाव के स्‍वर उठेंगे
तरह-तरह के दबावों से
वर-वधु पक्ष उभरेंगे।

दहेज विरोधी
वे-
पहले दहेज विरोधी थे
लेकिन, आज-
जब अपने बेटे के विवाह के समय
दहेज का प्रश्‍न आया
तो सिर चकराया
तुरन्‍त ही दिमाग में
एक नया विचार आ गया
और-
बेटी के बाप को समझाया
मैं-
दहेज का सख्‍त विरोधी हूं
आज तक किसी को कुछ न दिया है
न ही दहेज में कुछ लिया है,
लेकिन हां-
इतना समझिए-
जहां-
आज हिमालय विराजमान है
वहां-
कभी समुद्र था।


सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-242401 उ0प्र0 09410985048
ईमेल:-shashank.misra73@rediffmail.com
 
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प्रेमनारायण ‘‘प्रेमानुज'' की कविता - बेटी

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ना कुल का दीपक है ?
ना ही है आशाओं का अंबार
बेटी है अमानत पराई
मां बाप है केवल पहरेदार ?
दहेज से जुड़ने संस्‍कारों से बंधने
मर्यादाओं में जकडनें
विपरीत बहाव में सँभलने
पग
पग
क्‍या बेटी ही है जिम्‍मेदार ?
बेटी का श्रृँगार है
क्‍या
मर्यादाओं का पानी
पल
पल
जुल्‍म सहें लिखी जाऐ कहानी ।
स्‍नान करे आग से

क्‍या सीता जैसी
आज नहीं हैरानी।
बेटी तो
फूलों सी सुंदरता है
अधिकार, शिक्षा, जागृति
उसके श्रृंगार है
महकाये जो कुल दोनों
रिश्‍तों की बहार है।
समझ, सांमजस्‍य
श्रेष्‍ठता की पहचान है।
गीता, कुरान, बाईबल का पैगाम है
बेटी ममतामयी लेखों का इतिहास है
बेटी भी
बेटे से बढ़कर
जीवन की आस है
बेटी भी जीवन में हर्षोल्‍लास है
प्रेमनारायण ‘‘प्रेमानुज''
छतरपुर म.प्र.
09425815470

 


-प्रेमनारायण
बीएसएनएल में सहायक निदेषक राजभाषा के रूप में छतरपुर म.प्र. में कार्यरत।


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