रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

July 2012
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

       (गोवर्धन यादव)

सन 1920 का दौर. गांधीजी के रुप में देश ने एक ऐसा नेतृत्व पा लिया था,जो सत्य के आग्रह पर स्वतंत्रता हासिल करना चाहता था. ऐसे समय में गोरखपुर में एक अंग्रेज इंस्पेक्टर जब अपनी जीप से गुजर रहा था तो अकस्मात एक घर के सामने आरामकुर्सी पर लेटॆ अखबार पढ रहे एक अध्यापक को देखकर जीप रुकवाली और बडॆ रौब से अर्दली से उस अध्यापक को बुलवाने को कहा. पास आने पर उसने उसी रौब से पूछा;-“तुम बडॆ मगरुर हो. तुम्हारा अफ़सर तुम्हारे दरवाजे के सामने से निकल जाता है और तुम उसे सलाम नहीं करते.” उस अध्यापक ने जवाब दिया;-“जब मैं स्कूल में रहता हूँ, तब नौकर हूँ, बाद में अपने घर का बादशाह. अपने घर का बादशाह यह सख्सियत और कोई नहीं वरन उपन्यास सम्राट प्रेम्चन्द थे,जो उस समय गोरखपुर में सरकारी नार्मल स्कूल में सहायकमास्टर के पद पर कार्यरत थे.

image

    (प्रेमचंद)

सन 1880 में बनारस के पास लम्ही में जन्में प्रेमचन्द का असली नाम धनपतराय था. बचपन से ही उन्होंने संघर्ष की जो दास्तां देखी,वो कालान्तर में साहित्य में प्रतिबिम्बित हुई. मात्र 8 वर्ष की अल्पायु मे मातृ-वियोग एवं पश्चात पिता द्वारा दूसरा विवाह अव चौदह वर्ष की आयु तक आते-आते पितृ-वियोग ने प्रेमचन्द कॊ जीवन के मझधार में अकेला छोड दिया. ऐसे में सौतेली मां एवं उसके दो बच्चों का भार भी उन्हीं के कंधो पर आ पडा.. पत्नि-पक्ष से भी उन्हें कोई सुखद अनुभूति नहीं हुई. पिताजी अपनी मृत्यु के पूर्व ही उनकी शादी उनसे उम्र में बडी लडकी से कर गए थे,जो बदसूरत होने के साथ ही जुबान की कडवी थी. अंततः प्रेमचन्द ने गृह-कलह से तंग आकर पत्नि को उसके मायके में छॊड दिया. घरवालों ने उन्हें दूसरी शादी करने हेतु जोर दिया. ना-ना करते वह शादी को तैयार हुए, पर एक शर्त के साथ कि विवाह वह किसी विधवा के साथ ही करेंगे. घरवालों कि नापसंदगी के बावजूद उन्होंने समाज के बंधे बंधाए नियमों को ठुकराकर व बिना घरवालों को बतलाए शिवरानी नामक एक महिला से शादी कर ली, जो कि विवाह के मात्र तीन-चार माह बाद ही विधवा हो गई थी.

इसमें कोई शक नहीं कि प्रेमचंद का जीवन दुखॊं व संघर्षों से भरा रहा. अपने जीवन में भोगे गए यथार्थ को ही पन्ने पर विविध रुपों में ढालकर अभिव्यक्त करते रहे.” उपन्यास सम्राट” की उपाधि से प्रसिद्ध प्रेमचंद का जीवन खुद एक जीता-जागता उपन्यास था, जिसमें जिन्दगी के अन्तरद्वन्दों के बीच एक कृष्काय व्यक्ति मजबूती के साथ खडा नजर आता है. वह स्वभाव से ही अन्तर्मुखी थे. सभा- सम्मेलनों में वे मुश्किल से जाते थे. यह वह दौर था जब लोग स्वतंत्रता आंदोलन में खुलकर भाग ले रहे थे. वहीं प्रेमचंद की कलम समाज की आंतरिक विसंगतियों व बुराई पर चला रहे थे. माता-पिता की असमय मृत्यु के कारण शिक्षा पाने के लिए काफ़ी संघर्ष करना पडा. पिता की मृत्यु के समय वे बनारास में नवीं कक्षा में अध्ययनरत थे. ट्यूशन पढाकर व रात में कुप्पी के सामने बैठकर प्रेमचंद ने किसी तरह बी.ए. तक की शिक्षा ग्रहण की. सन 1900 के दौर में जीवकोपार्जन की खातिर उन्होंने स्कूल मास्टर की नौकरी ज्वाइन की, एवं 1901 से उपन्यास लिखना शुरु किया. कालान्तर में 1907 के दौर में वे कहानी भी लिखने लगे.

उर्दू में वे नवाबराय के नाम सेलिखते रहे,पर 1910 में अपनी कहानी “ सोजेवतन” की जब्ती के बाद उन्होंने प्रेमचंद के नाम से लिखना प्रारंभ किया. प्रेमचंद लंबे समय तक नौकरी नहीं कर सके. फ़रवरी 1921 में उन्होंने इस्तिफ़ा दे दिया. यह वह दौर था जब गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था. उनके आव्हान पर लोगों ने सरकारी नौकरियां- उपाधियां त्याग दी थी. 12 फ़रवरी 1921 को गोरखपुर में घटित चौरी-चौरा काण्ड जिसमें आंदोलानकारियों ने उत्तेजित होकर 21 पुलिसवालों सहित समूचे थाने को जला दिया था. प्रतिक्रियास्वरुप गांधीजी ने हिंसा की निंदा करते हुए असहयोग आंदोलन वापिस लेने की घोषणा कर दी. उस समय प्रेमचंद गोरखपुर में गवरमेंट नार्मल स्कूल में सहायक मास्टर के पद पर कार्यरत थे.

चौरी-चौरा काण्ड के ठीक चार दिन बाद 16 फ़रवरी1921 को प्रेमचंद ने सरकारी नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया .तब उन्होंने अपना पूरा ध्यान साहित्य-रचना पर केन्द्रीत किया. सन 1923 में सरस्वतीप्रेस की स्थापना व सन 1930 में हंस पत्रिका के प्रकाशन एवं कालान्तर में वे “प्रगतिशील लेखक संघ” के अध्यक्ष बने. अपनी लेखनी के माध्यम से विभिन्न सामाजिक संस्थानों व विसंगतियों पर उपन्यास –नाटकों व कहानियों के माध्यम से प्रकाश डाला. उनके उपन्यासों में गोदान, गबन, निर्मला, सेवासदन, रंगभूमि, प्रेमाश्रय, प्रतिज्ञा, कायाकल्प, कर्मभूमि, अहंकार इत्यादि प्रमुख हैं. उपन्यास व कहानियों के अलावा उन्होंने कर्बला, संग्राम, प्रेम की वेदी इत्यादि नाटक भी लिखे.

प्रेमचंद ने 19 वीं सदी के अंतिम दशक से लेकर 20 वीं सदी के लगभग तीसरे दशक तक भारत में फ़ैली तमाम सामाजिक बुराइयों, समस्याओं पर कलम चलाई. चाहे वह किसानों –मजदूरों एवं जमीदारों की समस्या हो, चाहे छुआछूत अथवा नारी-मुक्ति का सवाल हो, चाहे नमक का दरोगा के माध्यम से फ़ैले इंस्पेक्टर राज का जिक्र हो, कोई भी अध्याय उनकी नजरों से बच नहीं सका. यही कारण है कि प्रेमचंद को हर शख्स अपने करीब पाता है और अलग-अलग रुपों में व्याख्या करता है. असहयोग आंदोलन के दौरान गंधीजी से प्रभावित होकर नौकरी से इस्तीफ़ा देने के कारण उन्हें गांधीवादी कहा, साम्यवादी अथवा वामपंथी कहा गया, तो समाज में व्याप्त छुआछूत व दलित की स्थिति पर लेखनी, चलाने के कारण उन्हें दलित समर्थक कहा गया, तो नारी-मुक्ति को प्रशय देने के कारण नारी समर्थक कहा गया. लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड रहा है कि उनके उपन्यास “रंगभूमि” की प्रतियों को जलाकर व “कफ़न” जैसी रचना को आरोपित कर उन्हें मानुवादी अथवा दलित विरोधी कहा गया. आज प्रेमचंद की प्रासंगिकता इसलिए भी कायम होती है कि आधुनिक साहित्य के स्थापित मठाधीशों के नारी=विमर्श एवं दलित-विमर्श जैसे तकिया-कलामों के बाद भी अंततः लोग इनके सूत्र, किसी न किसी रुप में प्रेमचंद की रचनाओं में ढूंढते नजर आ रहे हैं.

यद्दपि यह शख्स 18 अकटूबर 1936 को ही शारीरिक रुप से इस संसार को अलविदा कर गया- पर अभी भी साहित्यिक मंडलियों की चर्चा का केन्द्र बिन्दु है. वह आज भी साहित्य का केन्द्र-बिंदु बना” साहित्य-सम्राट” है. ऐसे साहित्य-सम्राट को हमारा शत-शत नमन—विनम्र श्रद्धांजलि

--

गोवर्धन यादव

103,कावेरी नगर,छिन्दवाडा (म.प्र.) 480001

07162-246651,9424356400

वैचारिक कहानी -
एक नास्तिक की तीर्थ यात्रा
[ डॉ. हीरालाल प्रजापति ]

---------------------------------------------------------------------------------------

रु. 12,000 के 'रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन' में आप भी भाग ले सकते हैं.  अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012

अधिक जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

---------------------------------------------------------------------------------------


मुझे हमेशा ही अनकामन और इनक्रेडिबल बातों ने ही प्रभावित किया है। सामान्य तौर पर घटने वाली घटनाएँ मुझे चर्चा का विषय नहीं लगतीं। यानि आप सहज अनुमान लगा सकते हैं कि क्या मेरी चर्चाओं में सदैव गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स की ही घटनाएँ स्थान रखती हैं ?यह मेरी प्रकृति सी है कि मानवेत्तर घटनाएँ ही मुझे चौंका पाती हैं , अजीबोगरीब बातों में मुझे कविता की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है , विरोधाभासी बयानों में मुझे वक्ता की शक्तिशाली दुश्मन से लड़ते हुए कमजोर नायक की जद्दोजहद दिखाई पड़ती है इनटू यह सब मेरा सनकीपन नहीं वरन सीमाओं से परे देखने की जन्मजात अनुसंधित्सु प्रवृत्ति का बाह्याचार है। मुझे चीजों को खोल खोल कर देखने की आदत है। शारीरिक सौन्दर्य अथवा कुरूपता से असरहीन मैं सीधे आत्मा में  ज़रा सी ताकत से तरबूज में घुस जाने वाली छुरी की तरह नहीं बल्कि मीठा जल निकलने के लिए चट्टानों को छेद डालने वाली दानवी यांत्रिक बोरवेल ड्रिल सा पैवस्त हो जाने का असीम धैर्य और ज़बरदस्त माद्दा रखता हूँ। कोई जल्दबाजी नहीं। मुझे रोटी की गोलाई से कोई मतलब नहीं ; उसके पके होने से ताल्लुक है। समय की कोई सीमा नहीं।

मैं चौंकना चाहता हूँ बिलकुल फिल्मों में अचानक प्रकट हो जाने वाले किसी देवी देवता अथवा पलक झपकते ही अंतर्ध्यान हो जाने नारद जी के कारण से किन्तु चील गिद्ध सी नज़रों के बाद भी कहीं ऐसी घटनाएँ मुझे देखने नहीं मिलतीं कि लगे कि ये तो चमत्कार है - जादू है - ईश्वरीय है .....सुनने ज़रूर मिलता है कि कहीं गणेश जी दूध पी रहे हैं ,तस्वीरों में माँ जगदम्बे दिखाई दे रही हैं , किसी को उसका पिछला जन्म याद आ गया है ....किन्तु जब देखने पहुँचो तब तक मैदान साफ़ हो चुका होता है और मैं एक महान आश्चर्य से विस्मित होने से वंचित रह जाता हूँ अथवा वैज्ञानिक उस घटना को वैज्ञानिक बताकर मेरे आश्चर्य की धज्जियां उड़ा देते हैं और फिर-फिर मैं ' ईश्वर है अथवा नहीं ' की विचार श्रंखलाओं में जकड जाता हूँ कि आखिर क्यों लोग मेरी तरह ऐसी ही घटनाओं के प्रतीक्षार्थी हैं कि जिनसे वे अभिभूत होकर जब कुछ समझ न आये तो उसे दैवीय चमत्कार मानकर अपनी ढुल -मुल ईश्वरीय आस्था को पुख्तगी प्रदान कर सकें। मानना चाहें तो यहाँ भी चमत्कार देख सकते हैं -कोई दस मंजिल से गिर कर भी बच गया ,भले ही वह फोम के गद्दों पर गिरा हो , फूलों अथवा नायलोन जाल पर -क्या यह संयोग कम चमत्कारिक है ? किसी के फेफड़ों में चार इंची लोहे का चौदह फुट लम्बा एंगल आर पार हो गया फिर भी वह न केवल बच गया बल्कि पूर्ण स्वस्थ भी है , एक भूख से  मरणासन्न भिखमंगे को करोड़ों का जैकपाट लग गया , एक पुछल्ला बैट्समेन जिसे बल्ला पकड़ना भी नहीं आता ; सेंचुरी लगाकर टीम को जिता  गया ....तार्किकों अथवा संशय वादियों को छोड़कर अथवा नास्तिकों या अनास्थावादियों के अलावा सभी उक्त घटनाओं से मत्कृत होकर  विस्मित  होकर रहते ही हैं। यह संयोग मात्र ही तो दैवीय है , परावैज्ञानिक है किन्तु मेरा मन माने तब न। खैर।

वह भी कुछ-कुछ  मेरा ही प्रतिरूप था - सब कुछ मानवीय और प्रयत्नों का परिणाम अथवा परिस्थितियों की परिणति मानने वाला अतः मेरी और उसकी तो जमनी ही थी बल्कि यह संयोग यानि हमारा मिलना भी यदि देखें तो किसी आश्चर्य अथवा चमत्कार से कम कहाँ था ? कारण -मिलन स्थल। हम दोनों एक तीर्थ यात्रा के दौरान मिले . मेरे बारे में तो आप अब तक अनुमान लगा ही चुके होंगे कि मैं एक नास्तिक टाइप का व्यक्ति हूँ। उसे भी आपसे परिचित कराता हूँ।


उसका नाम था - तीर्थेश्वर प्रसाद किन्तु घर में उसे सब ईश्वर अथवा ईशू-ईशू कहकर पुकारते थे और इस यात्रा में वही एक मात्र मेरे आश्चर्य का केंद्र था क्योंकि जिस खानदान से वह सम्बद्ध था परम ईश्वर भक्त उच्चकोटि ब्राह्मन का था किन्तु इसके ठीक विपरीत कम से कम बाह्य रूप से ईशू मुझे कट्टर नास्तिक लगा जो मेरी कहानी का हीरो बन सकता था -बिलकुल चिराग तले अन्धेरा ....पुलिस कमिश्नर का बेटा डाकू अथवा परम सूदखोर साहूकार के कर्ण - सम दानवीर बेटे की तरह।


जैसा उसने बताया अथवा मैंने महसूस किया। वह जन्म से ही ऐसा था। नास्तिकता के बाह्याचार तो अपनी नासमझी में अथवा बचपन में सभी बच्चे करते हैं - मसलन शंकर जी की गोल पिंडी को पत्थर का अंडा अथवा लोहे की गेंद समझकर उछालना फेंकना या ठुकरा देना , बिना नहाए धोये किसी भी देवी देवता की मूर्ती को छू या उठा लेना , भोग या प्रसाद को खा जाना ....इन सब से कोई नास्तिक नहीं हो जाता। समझ के विकसित होते ही हम सभी प्रोफेशनल पुजारियों का सा अनुकरण करने लगते हैं किन्तु जो नहीं  करता वह नासमझ नहीं  होता। ईशू भी नासमझ नहीं था।

प्रारंभ में उसकी नास्तिकता पूर्ण हरकतों पर बच्चा समझकर उसे छोड़ दिया जाता किन्तु बाद को उसे नोटिस किया जाने लगा और उस पर पूजा आरती का दबाव डाला जाने लगा और वह भी प्रारंभ में झुंझलाते हुए सर्वथा बेमन से - बाद को घर वालों का मन रखने के लिए धार्मिक कृत्य करने लगा .उसका उस कम उम्र में भी दावा हुआ करता था कि यह सब ढोंग है , बकवास है , व्यर्थ है। गंगा के स्नान मात्र से कैसे पाप मुक्त हो  सकते हैं ? नर्मदा दर्शन मात्र से अनंत फल मिल जाता है ? सत्यनारायण कथा प्रसाद ग्रहण न करने मात्र से विनाश और तरह तरह के अजीबो गरीब आकार प्रकार के देवी देवताओं के व्रत उपवासों से समस्त कष्टों का निवारण कैसे हो सकता है ? वह गहराई से सोचता था . उसके सारे तर्क वैज्ञानिक होते थे किन्तु यों ? ईश्वर की अवधारणा के औचित्य से उसे कोई  इनकार नहीं था किन्तु सांसारिक व्यक्ति के लिए कर्म छोड़कर उसकी पूजा मात्र को जीवनोद्देश्य-लक्ष्य  बनाने की बातें अथवा उपरोक्त प्रकार के पूजा फल उसे पूर्णतः अवैज्ञानिक और मनगढ़ंत एवं मूर्खतापूर्ण लगते थे। कोई जन्म से ईश्वर वादी कैसे हो सकता है ? यदि संस्कार वश वह हो भी गया हो तो उसे ऐसी क्या ठेस लगी कि वह समझदार होते ही अनीश्वरवादी हो गया ? मैं यह सब जानना चाहता था और ज़रूर ज़रूर जानना चाहता था। बाह्याचारों और आडम्बरों को मैं भी नहीं मानता किन्तु कोई सचमुच में अन्दर से कैसे यह मान सकता है कि ईश्वर है ही अथवा नहीं ही ? तर्क से परे कोई कैसे हो सकता है ? कार्य कारण का सिद्धांत यूं ही तो नहीं गढ़ा गया ?


मैं पहले ही कह चुका हूँ कि उसमें मुझे अपना प्रतिबिम्ब दिखाई देता है किन्तु हालात के बदलाव ने मुझमें भी ज़मीन आसमान से बाह्य और अंदरूनी परिवर्तन कर डाले हैं और मैं भी लगभग - लगभग कामन हूँ  अर्थात मैं अब हीरो नहीं अतः जब तक वह अपरिवर्तित रहता है मैं उसे अपनी स्टोरी का संभाव्य हीरो माँ कर चलूँगा और यदि वह मेरी तरह बदल गया तो फिर कल्पना से अपनी कहानी पूर्ण करूंगा किन्तु मैं चाहूँगा कि वह हर हाल में नास्तिक रहे - यानी सुख में भी , दुःख में भी।


मैंने उससे पूछा भी कि कई लोग हटकर दिखने के लिए भी ऐसी जीवन शैली अपनाते हैं जो लोगों का ध्यानाकर्षित करे ,कहीं तुम भी तो........? बिलकुल नहीं - उसने कहा . मुझे कभी लगता ही नहींम कि यह सब होता है . आपका शक भी बेजा नहीं है क्योंकि जिस राह जाना नहीं उसका पता क्या पूछना ?मैं भी न सोचूँ ईश्वर के बारे में किन्तु करोड़ों लोगों की ढर्रानुमा  परम्परा परंपरा मुझे भी डिगाती है कि सब तो मूर्ख नहीं होंगे जो बिना तर्क के आस्तिक हैं या तर्क करके हो गए ? मैं तो अपना सच कहता हूँ जो बिना किसी भय के मैं भरी सभा में उजागर कर सकता हूँ कि पूजा आरती से मैं बोर हो जाता हूँ। हर देवी देवता योनिज अयोनिज अवतार अथवा ईश्वर की आरती प्रार्थना का एक ही भाव - जो ध्यावे फल पावे .....तेरा तुझको अर्पण ......अरे भाई क्या ज़रुरत है इस स्तुति गान की ? यदि ईश्वर एक है तो उसके तैंतीस करोड़ रूप और प्रत्येक की अलग पूजा विधि ...........कहीं श्री गणेश , कहीं शंकर महादेव ......कहीं पिता पहले तो कहीं पुत्र पहले  ...........राम - कृष्ण - साँई ........किसको पूजें ? किसको छोड़ें ? एक मनुष्य ,एक अवतार , एक देवता , एक भगवान् ........किसका ध्यान लगाएं ? और सभी की आरतियाँ - चाहे सरस्वती- लक्ष्मी -गणेश की हो या ब्रह्मा -विष्णु - महेश की हो या शिर्डी के साँई बाबा की ..........सबका एक और एक ही मकसद एक ही अर्थ कि जो ध्यावे फल पावे .....तेरा तुझको अर्पण . तो फिर एक ही रूप क्यों नहीं ?

अलग अलग देवी देवता की अलग अलग पूजा क्यों ? ईश्वर यदि निराकार नहीं तो जब वह एक है तो उस साकार का भी सिर्फो सिर्फ एक ही सर्वमान्य निर्धारित स्वरुप क्यों नहीं ? ऐसे में भक्त के लिए मनोनुकूल  देवी देवता  का चुनाव करना बड़ा कठिन हो जाता है ? विद्यार्थी को सरस्वती तो व्यापारी को लक्ष्मी .....फिर वही ....फल सभी एक ही प्रदान करते हैं -सर्वथा मनोवांछित .....तो फिर इतने रूपों का स्रजन क्यों ......और रूप सदैव चाक्षुष होने के नाते मन में वासना भी उत्पन्न करता है ,भय भी। एक ही देवी देवता की भिन्न भिन्न मूर्तियों में तुलना भी। यह बड़ा ही सुनियोजित षड्यंत्र सा लगता है। व्यापार लगता है। दुर्गोत्सव ,गणेशोत्सव .....सब टाइम पास है। हर जगह भीड़ भाड़ शोर शराबा। जब वह यह भाषण कर रहा होता तो कुछ कुछ उन्मत्त सा हो जाता और उसके इस बहकाव में मेरे भी मन की तमाम बातें जो मैं अनिष्ट शंका वश मुँह से नहीं निकालता था ,कह जाता था . मैं उसे रोकता -तुम ऐसा कैसे कह सकते हो ?तुम्हे डर नहीं लगता कि कहीं कोई दैवी शक्ति  तुम्हारा अनिष्ट न कर डाले ?

वह बड़े ही दार्शनिक अंदाज़ में अपना तर्क देता – मान लो , जिसका अस्तित्व मैंने नहीं माना , जिससे मैनें कोई रिश्ता नहीं बनाया उससे दुआ सलाम का क्या अर्थ ? इसके अलावा भी मेरा मानना है कि जिसे हम प्यार करते हैं और भक्ति तो उससे भी ऊंची चीज़ है -तब हम उससे अपना स्वार्थ सिद्ध नहीं करते बल्कि उस पर अपना सर्वस्व अर्पित करने को तत्पर रहते हैं जबकि मेरे सामान्य अध्ययन और अनुभव के मुताबिक मैनें यही और सिर्फ यही पाया कि जिसे देखो वही ईश्वर को दाता मानकर भिखारी बना हुआ है , क्या यह शोभनीय है ? क्या यह स्वाभिमान के अनुकूल है कि किसी से सिर्फ स्वार्थ के लिए जुड़ें  और उसे इतना बेवक़ूफ़ जाने कि वह हमारे स्वार्थ को पहचानकर भी हमारी प्रार्थना कबूल ले ? क्या उसने हमसे कोई क़र्ज़ लिया है ,क्या वह हमारे मातहत है ?यदि हमारी मांग पूरी न करे तो दोस्ती, प्यार , भक्ति सब ख़त्म ?नहीं , यह सब मनगढ़ंत है . ईश्वर यदि है तो उसका न तो ऐसा जैसा कि प्रचलित स्वरुप है , है और न ही ऐसा जैसा कि हमारे पोथी पुराण कर्ताओं ने  फैला  रखा है कि सब कुछ छोड़ छाड़कर उसकी माला जपते रहो तो वह सबकी सुनता है , है या हो सकता है जबकि हमारा दिमाग खुद यही कहता है कि एक पुलिस कमिश्नर और एक डाकू को ईश्वर कैसे समभाव से देख सकता है ?

जब भारत में भारत पाकिस्तान का मैच होता है और भारत हार जाता है अथवा पाकिस्तान में भारत हार जाता है अथवा हमारे ही देश में विदेशी टीमें हमें हराकर चल देती हैं अथवा विदेशों में जाकर हम हारकर चले आते हैं तो क्या इसका यह मतलब है कि उनकी प्रार्थनाओं में ज्यादा दम है अथवा उनका ईश्वर ज्यादा पावरफुल है अथवा हम अच्छा खेलना नहीं जानते ? और जब हमारा कर्म ही हमारा फल प्रदाता है तब ईश्वर से ये माँगा - तूँगी व्यर्थ है। मन बहलाव है ? मैं निरुत्तर हो रहा था , वह बके जा रहा था किन्तु  मैं कैसे कहूं कि वह सच कह रहा था क्योंकि मैं खुद एक बड़ी भारी मांग की पूर्ति की आशा में इस तीर्थ को आया हूँ - ये अलग बात है कि मुझे भी मांग पूर्ति का भरोसा कुछ नहीं किन्तु ज़माने की सुन सुन कर अंतिम उपाय रूप में यही रास्ता सूझा . मैनें चिढ़कर कहा - यह तो मैं जान गया कि तुम नास्तिक हो फिर यह यात्रा किसलिए ? बोलो बोलो ? उसने हंसकर कहा -मुझे मालूम था किन्तु यह प्रश्न तो पहले ही उठ जाना था . देर से ही सही . बहुत मासूम सवाल है किन्तु उसके उत्तर पर यकीं करना , यदि आप बुद्धिवादी नहीं हैं अथवा तर्कशास्त्री अथवा संशयवादी नहीं हैं तो तो नामुमकिन होगा अतः अपने जवाब के पहले मैं आप से यह क्लियर करना चाहूँगा कि आप खुद क्या हैं -आस्तिक या नास्तिक ?

मगर जैसे कि एक नंगे के सामने अपनी गंजी या बनियान उतारने जैसा यह काम नहीं था . अपनी नास्तिकता को मैं भरपूर छुपाये रखना चाहता था जबकि वह जान चुका था कि मैं सिर्फ़ कच्छा धारी था किन्तु खुद को सूटेड बूटेड दिखा रहा था और मैं भी यह जानता था कि मैं खुद नंगा हूँ और इसलिए मैं अपने आप को ढांपने का प्रयत्न कर रहा था किन्तु आखिरकार उसने कह ही दिया . यदि आप बुरा न माने तो .....मैंने कहा -हाँ हाँ खुल के कहो . वह ध्रुवीय ग्लेशियर से टपकते विशुद्ध पानी  की तरह राजा हरिश्चंद्र लग रहा था। बोला - आप मुझे क्या समझ रहे हैं मुझे नहीं मालूम किन्तु मैं क्या हूँ आपको सच सच बताऊंगा लेकिन उससे पहले मैं कहके रहूँगा कि आख़िर मैं भी उसी समाज का अंग हूँ जिसके आप हैं फिर आपमें और मुझमें समझ का यह अंतर क्यों ? मैं एक घोर परंपरा वादी खानदानी पुजारी पुत्र होकर भी ,जिस बाह्याचार को आप मेरी नास्तिकता कहते हैं जबकि नास्तिकता किसी व्यवहार का नाम नहीं , के छुपाव को उचित नहीं मानता फिर आप क्यों न चाहकर भी सिर्फ़ बह्याचरण से आस्तिकता का प्रदर्शन कर रहे हैं ? बताइये।

हाँ नास्तिकता का प्रदर्शन टुच्चापन है -यह घातक भी है खासकर आर्थोडाक्स टाइप की भीड़  या व्यक्ति में जो जाने बगैर मान लेने की कूबत रखते हैं  , और यह भी कि नास्तिकता का अलग ही अर्थ है। आप मुझे सिर्फ़ इसलिए नास्तिक समझ रहे हैं कि मैं उन विधि विधानों का अनुपालन नहीं करता जो ज्यादातर समाज , समाज को दिखने मात्र को अनिवार्यतः करता ही है , मैं भी कर रहा हूँ किन्तु यहाँ प्रश्न सामाजिकता का नहीं वरण वैचारिकता का है - व्यवहार का नहीं चरित्र का है। मैं किसी व्यक्ति अथवा समाज को ठेस न लगे इसलिए मंदिर  में जूते उतारकर घुसता हूँ और पारिवारिक सदस्यों को दुःख न पहुंचे इसलिए मंदिर चला जाता हूँ वरना वास्तव में ईश्वर क्या है ,है अथवा नहीं हम सामान्य जनों को जानकर करना क्या है फिर भी मैं आपसे पूछता हूँ कि यदि मैं आपसे कहूं कि यदि वह नहीं है तो आप कहेंगे उसका होना अनिवार्य है , यदि नहीं भी है तो उसे होना चाहिए अतः उसकी अवधारणा एक अनिवार्यता है तो मेरा भी वही उत्तर होगा तो आप कैसे कह पाएंगे कि मैं नास्तिक

हूँ ? नास्तिक एक गाली है जिससे बचने के लिए हम आस्तिकता का ढोंग रचाते हैं किन्तु मैं प्रदर्शन अथवा दिखावे में विश्वास नहीं करता  क्योंकि संसार में लिफाफा देखकर ख़त का मजमून जानने वालों की कहीं कोई कमी नहीं है किन्तु सभ्यता , संस्कृति , संस्कार वश कोई किसी से कुछ नहीं कहता क्योंकि ज्यादातर एक ही थैली के चट्ठे बट्टे हैं। मेरी इस यात्रा ...सारी तीर्थ यात्रा का मतलब यह यह नहीं कि मैं इस सबमें विश्वास रखता हूँ , चाहें तो आप इसे मेरे पर्यटन के तौर  पर ले सकते हैं किन्तु मैनें पाया है कि जिसे देखो खाना न खाने को उपवास का नाम दिए जा रहा है , तमाम तीर्थ नगरों के पर्यटन को तीर्थ यात्रा की संज्ञा दे रहा है - अपनी कार्य सिद्धि हेतु भगवान के दफ्तर में अर्जी लगाने को भक्ति कह रहा है - यह गलत है। न तो भगवान किसी स्थान विशेष तक सीमित है और न ही उसका निश्चित पता ठिकाना है। वह सर्वत्र है या कहीं नहीं है ,वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म और विशालातिविशाल है अनंत है। उसकी उपलब्धि निमिष मात्र में खुद में हो सकती है किन्तु हमें सच्चाई स्वीकारने में डर लगता है , हम लकीर के फकीर हैं।

तमाम पुराण कथाओं में हास्यास्पद ,ऊहात्मक , सर्वथा अविश्वसनीय बातों का जहाँ तहां वर्णन है किन्तु अनिष्ठाशंका हमारे विरोध के स्वर को उठने ही नहीं देती और न हमें करना ही चाहिए क्योंकि स्तुति गान हमारे श्रद्धेय ,प्रेमास्पद , अथवा पूज्य के प्रति हमारे  विश्वास और सम्मान का अनिवार्य मानव स्वभाविक दिखावा है। मैं फिर कहूँगा यह सब वैचारिक स्तर की बातें हैं। यदि मेरे पूजा -पाठ , होम- हवन ,आरती- भजन आदि नियमित कर्मकांड न करने को आप मेरी नास्तिकता मानते हैं तो बेशक सौ फीसदी नास्तिक हूँ किन्तु मैं फिर और बार बार कहूँगा कि नास्तिकता यह नहीं है। नास्तिकता है सर्वप्रथम  स्वयं में अविश्वास और फिर जब हम खुद पर भरोसा नहीं रखते तो दूसरों पर वह मुश्किल होता है। मेरी इस तीर्थ यात्रा को भले  ही आप पर्यटन कह लें किन्तु मैं आप जैसे भक्तों के भीड़ भड़क्के में उसी नदारद भक्ति अथवा विश्वास की तलाश में आया हूँ जो अभी भी अपूर्ण है। जिसे देखो वह सिर्फ़ और सिर्फ़ दूसरों से महिमा गान सुनकर अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए तत्पर लगता है और बड़े भाई मुझे तहे दिल से माफ़ करना - मैं बार बार माफी  चाहूंगा  यदि आपके  भक्त  ह्रदय  को , आपकी प्रबल आस्था को रंच  मात्र भी ठेस लगी  हो तो क्योंकि आदमी  जरा जरा सी बात को अपने ही ऊपर ले लेता है।

यह सब मेरा संलाप कहो , एकालाप कहो या बडबडाहट  या बिना जाने मान लेने वालों के प्रति खीझ कहो - सिर्फ़ उनके लिए है जो सिर्फ़ स्वयं को नास्तिक न दिखाने के लिए करते हैं। तीर्थ यात्रा तो करते हैं , मन्नत भी मानते हैं किन्तु मन में ईश्वर की परीक्षा सी लेते हैं अथवा चुनौती सी देते हैं कि देखते हैं - नाम तो खूब सुना है कि तेरे दर्शन से ये होता है , वो होता है - हमारी मुराद भी पूरी होती है या नहीं ? क्या यह सभ्यता पूर्ण है ? क्या ईश्वर ने हमारी परवरिश का ठेका ले रखा है। अब तक मैं भी उसके सुर में सुर मिलाने लगा था और उसने मुझे जब नंगा कर ही दिया तो फिर थोड़ी ही देर में मेरी शर्मो हया भी जाती रही और मैं भी खुलकर अपनी भड़ास निकलने लगा और वह इतना शांत और मनोवेत्ता था कि उसने मेरे अन्दर उबलते ज्वालामुखी को फूट जाने का पूरा पूरा मौका दिया फिर तो मेरी ज़बान कैंची कतरनी की तरह खच खच ,खच खच चलने लगी और सच पूछा जाए तो उसने मेरा कैथार्सिस कर दिया और जिसे मैं नास्तिक समझ रहा था उसने मुझे ज्वार भाटे की शांति के उपरांत आस्तिकता का वो पाठ पढाया जिसे मैं हर तीर्थ यात्री , हर एक तथाकथित भक्त के साथ शेयर करना चाहूँगा कि तीर्थेश्वर कोई और नहीं अपनी आत्मा की आवाज़ है - सच है जिसे हम नहीं सुनते नहीं मानते हम वही करते है जिसका हमें सिला मिलता है जबकि भक्ति में अंजाम की कोई परवाह नहीं की जाती।

प्यार और पूजा-भक्ति दोनों समर्पण और सिर्फ़ समर्पण का नाम है न कि याचना ,प्रार्थना या मांग का।

तीर्थ-यात्रा , तीर्थ-यात्रा है और पर्यटन ,पर्यटन।

image

पर मज़हब के बाट से , भाषा को मत तोल ..........

बीते साल राजस्थान की साहित्यिक राजधानी बीकानेर में कवियत्री सुमन गौड़ के पहले काव्य - संग्रह "माँ कहती थी " का लोकार्पण हुआ ! किताब के विमोचन के साथ एक मुख़्तसर सा मुशायरा भी रखा गया ! काव्य -संग्रह का इजरा (विमोचन ) प्रख्यात शाइर वसीम बरेलवी के कर - कमलो द्वारा समपन्न हुआ ! ये आयोजन हमारे मुल्क की सबसे बड़ी ताक़त हमारी गंगा - जमुनी तहज़ीब का एक अनूठा उदाहरण था कि हिन्दी की एक कवयित्री के "काव्य -संग्रह " का इजरा उर्दू के किसी शाइर के हाथों हुआ हो मगर अगले ही दिन जब साहित्य के कुछ स्वयंभू कर्णधारों की टिप्पणियाँ मुख्तलिफ़ - मुख्तलिफ़ जगह पढ़ने और सुनने को मिली तो मन बड़ा आहत हुआ !

अपने आप को शब्द का उपासक कहने वाले ,अपने नाम के आगे साहित्यकार लिखने वाले इन अदीबों की मानसिकता देखकर मुझे लगा कि साहित्य के मोहल्ले की गलियाँ इतनी संकरी तो नहीं होती , साहित्य तो विशाल सागर की तरह होता है जो तमाम छोटी - बड़ी भाषाओं की नदियों को अपने अन्दर समो लेता है ! एक महोदय ने लिखा कि हिन्दी की कवियत्री के काव्य -संग्रह का लोकार्पण और उर्दू का मंच , किसी ने कार्यक्रम में अपनी ग़ैर-हाज़िरी की वजह ये बताई कि क्यों जाए ऐसे समारोह में क्या इन्हें हिन्दी का कोई साहित्यकार नहीं मिला विमोचन के लिए वगैरा - वगैरा ! इस आयोजन से मुत-अल्लिक़ और भी बहुत सी भद्र - अभद्र बातें कही गयी ! क़लम के इन पुजारियों द्वारा किये गये इस तरह के तब्सरे को सुन बड़ा अजीब लगा और तब मेरे दिल से बस यही दुआ निकली कि हे ईश्वर इन लोगों के ह्रदय और मस्तिषक की धमनियों को थोड़ा बड़ा कर दे ताकि छोटी सोच का जो लहू इनमें जम चुका है वो मुहब्बत के दरिया की तरह खुलकर बड़ी सोच में तब्दील हो रवानी के साथ बहने लगे ! भाषा को धर्म की तुला ,मज़हब की मीज़ान से तोलने वाले ऐसे लोग हमारे मुल्क के हर हिस्से में पाये जाते हैं ! इस तरह के लोग के शब्द साधकनहीं है हाँ शब्द के सौदागर ज़रूर है अगर शब्द के सही मायनों से ये लोग वाकिफ़ होते तो इस तरह की बातें इनके ज़हन में आती ही नहीं !

इतिहास में ये तो साफ़ - साफ़ लिखा है कि सिन्धु नदी के पार रहने वाले हिन्दू हो गये ,यहाँ का नाम हिन्दुस्तान पड़ गया ! उस पार से आने वाले लोगों का उच्चारण इस तरह का था जिसमें में स को ह कहा जाता था ! अमीर खुसरो के ज़माने में (13 वीं सदी ) हमारे देश में बोले जाने वाली ज़ुबान का नाम हिन्दवी था जो कि हमारी देसज भाषाओं और अरबी फारसी का मिश्रण था ! मध्य काल तक हमारी ज़ुबान का नाम हिन्दवी रहा फिर वक़्त के साथ -साथ इसे ज़बान ए हिंद , हिंदी , ज़बान -ए- दिल्ली , रेख्ता , गुजरी , दखनी , ज़बान -ए -उर्दू- ए -मुअल्ला कहा जाने लगा ! 18 वीं सदी तक हमारे मुल्क में बोले जाने वाली ज़ुबान का नाम हिन्दवी ही था ! उर्दू तो तुर्की ज़ुबान का लफ़्ज़ है जिसका लफ्ज़ी मायने लश्कर है ,यानी वो ज़ुबान जो सैनिक छावनियों में बोली जाए !

अंग्रेज़ों ने हम पर तक़रीबन दो सौ साल राज किया उस वक़्त तक हमारे यहाँ ज़ुबानो का आपस में कोई झगड़ा नहीं था हमारी रोज़मर्रा की ज़ुबान हिन्दुस्तानी ही थी उसका नाम हिंदी - उर्दू नहीं था ! उस वक़्त हिन्दी और उर्दू दोनों ज़बानों में सगी बहनों का सा रिश्ता था और अंग्रेज़ों को बाहर का रास्ता दिखाने में हमारी इस साझा तहज़ीब ने अहम् रोल अदा किया पर जाते - जाते अंग्रेज़ इन्तेकामन मुल्क को बांटने के साथ- साथ ज़ुबानों को भी अलग करने में कामयाब हो गये और फिर दोनों ज़ुबानें मज़हबों में तब्दील हो गई! आज़ादी के बाद हिन्दी को हिन्दुस्तान की राष्ट्र भाषा का दर्जा मिल गया उधर पाकिस्तान में उर्दू कौमी ज़ुबान हो गई ! धीरे- धीरेदोनों बहनों को फिरकापरस्तों की ऐसी नज़र लगी कि आज तक लाख शक्कर ख़ाने के बावज़ूद दिल की कड़वाहटें दूर नहीं हो पायी है !

वक़्त ने अगर कड़वाहट के ये ज़ख्म धीरे - धीरे भरे तो हमारे मुल्क की बदचलन सियासत ने फिर से इसे हरे कर दिये और हिन्दी को हिन्दू,उर्दू को मुसलमान कर दिया ! हमारा साहित्य , हमारा अदब मुद्दतों सेइसी कोशिश में लगा है कि ज़बानें मज़हबी आकाओं की ज़ाती जागीर ना बने पर इस सच्चाई से इन्कार भी नहीं किया जा सकता कि इस इलाके में इमानदाराना कोशिशें ज़रा कम हुई ! हमारी गौरवशाली गंगा-जमुनी तहज़ीब अगर एक बहता हुआ दरिया है तो हिन्दी - उर्दू उसके दो ख़ूबसूरत किनारे है!बचपन में अपनी माँ को स्वेटर बुनते हुए देखता था वो ऊन के दो अलग - अलग रंग के गोलों को सलाइयों की मदद और अपने हाथों के हुनर से ऐसे बुनती थी कि फिर वो रंग आपस में गुँथ जाते थे ! उर्दू और हिंदी का मुआमला भी ठीक ऐसा ही है ये दोनों ज़ुबाने हमारे लहू में इस तरह से घुली हुई है कि आप लाख कोशिश करें इन्हें अलग कर ही नहीं सकते! मिसाल के तौर पे उर्दू के मशहूर शाइर अनवारे इस्लाम का ये मतला देखें :--

सगे भाई हैं उनमें प्यार भी है

मगर आँगन में इक दीवार भी है

इस शे'र में से हिन्दी और उर्दू को कोई कैसे अलग कर सकता है एक और उदाहरण देता हूँ मुनव्वर राना का एक मतला है: --

न जाने कैसा मौसम हो दुशाला ले लिया जाए

उजाला मिल रहा है तो उजाला ले लिया जाए

दोनों ज़ुबानों के महारथी चाहें कितना भी मश्क़ करते रहे वे तय नहीं कर सकते कि ये शे'र कौनसी ज़ुबान का है और हक़ीक़त यही है कि ये शे'र हमारी गंगा - जमनी तहज़ीब वाली हिन्दुस्तानी ज़ुबान का है अगर हम इसी पे गौर करने लगें कि इसमे किस ज़ुबान के कितने लफ्ज़ हैं तो शाइरी का मज़ा किरकिरा हो जाता है ! पिछले दिनों महाराष्ट्र के बैतूल में दो जिस्म से जुडी हुई बहनों को ऑपरेशन से अलग किया गया मगर कुछ दिनों के बाद उनमे से एक ज़िन्दा नहीं रही उर्दू - हिन्दी जुबानें भी एक जिस्म और दो धड़ों वाली बहने है अदब के बड़े-बड़े चारागारों ने अपना ज़ोर लगा लिया और सियासी भेडियों ने भी अपनी कोई कसर नहीं छोड़ी इन्हें अलग करने की मगर ये इस तरह गुंथी हुई है कि अल्हेदा हो ही नहीं सकती! हमारे राष्ट्र कवि जिन्होंने हिन्दी का परचम पूरे विश्व में फहराया उनकी एक कविता के कुछ अंश मैं यहाँ रख रहा हूँ :---

कलम, आज उनकी जय बोल !

जो अगणित लघु दीप हमारे ..तूफ़ानों में एक किनारे,

जल-जलकर बुझ गए किसी दिन-

माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल !

क़लम ,आज उनकी जय बोल!

पीकर जिनकी लाल शिखाएँ,..उगल रही लपट दिशाएँ,

जिनके सिंहनाद से सहमी-

धरती रही अभी तक डोल!

क़लम , आज उनकी जय बोल !

दिनकर जी ने भी अपने काव्य को रचते हुए किसी भाषा विशेष से परहेज़ नहीं किया इसी तरह उनकी बहुत सी कविताओं में हिन्दी के साथ उर्दू अल्फ़ाज़ का मिश्रण है ! हिन्दी के एक और सशक्त हस्ताक्षर सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन "अज्ञेय " की कविताओं पे भी अगर हम
नज़र डालें तो वे भी इस मिली -जुली हिन्दुस्तानी ज़ुबान के मोह से बाहर नहीं निकल पाये मगर उनके बहुत से अनुयायी हिन्दुस्तानी भाषा को दो हिस्सों में करने की कोशिश में आज तक लगे हुए हैं ! उनकी एक कविता की कुछ पंक्तियाँ अपनी बात के पक्ष में बतौर साक्ष्य रख रहा
हूँ :---

मेरी छाती पर ..हवाएं लिख जाती है ....महीन रेखाओं में ...अपनी वसीयत .....और फिर हवाओं के झोंके ही ...वसीयतनामा उडा कर ...कहीं और ले जाते है --------
क्या हम कर सकते हैं इसमें से हिन्दी और उर्दू को अलग ...नहीं कभी नहीं ऐसे हज़ारों उदाहरण हैं फिर भी हम क्यूँ नहीं एक ऐसा माहौल तैयार कर पाते जिसमें दोनों ज़ुबाने खुलकर सांस ले सकें ! उर्दू के शाइरों के यहाँ भी हिन्दी के प्रयोग की हज़ारों मिसालें हैं ! मशहूर शाइर वसीम बरेलवी के गीतों पर नज़र डालें तो ये सोचने पे मजबूर होना पड़ता है कि उर्दू का शाइर किस ख़ूबी से गीत को हिन्दी - उर्दू के महलों से हिन्दुस्तानी ज़ुबान के खुले आसमान में ले जाता है :--

तुझको सारे मन से चाहा ,चाहा सारे तन से

अपने पूरे पन से चाहा और अधूरेपन से

पानी की इक बूँद कहाँ और कहाँ भरी बरसात
सजन मैं भूल गयी ये बात .......
वसीम बरेलवी का एक और गीत बतौर ए ख़ास :--

आँख कहे है दिन निकला है , दिल ये कहे है रात
भला मैं मानूं किसकी बात ...

औरत के सम्मान से बढ़कर औरत की मजबूरी

मर्द को पूरा करने ही में औरत हुई अधूरी

जन्म - जन्म उसकी हो जाए जिसको थमा दो हाथ ...भला मैं मानूं किसकी बात ..

पाकिस्तान की मशहूर शाइरा परवीन शाकिर ने भी हिन्दवी में शे'र कहे :--

खुली आँखों में सपना झांकता है

वो सोया है के कुछ -कुछ जागता है

तेरी चाहत के भीगे जंगल में

मेरा तन मोर बन के नाचता है

कहने को तो ये दोनों शे'र उर्दू के और उर्दू की शाइरा के है मगर इसमे से हिन्दी को कैसे अलग किया जा सकता है

पदमश्री बेकल उत्साही के ये मिसरे एक और मिसाल है हमारी इस गंगा-जमुनी भाषा की :-

रूप तुम्हारामैं बन जाऊं तुम मेरे दरपन बन जाओ

आज की रात मैं टूट के बरसूँ झूम के तुम सावन बन जाओ

धर्म का ऐसा पैराहन हो, दो हो जान तो एक ही तन हो

नेह की मैं चोली बन जाऊं प्यार का तुम दामन बन जाओ

क्या इन दोनों ज़ुबानों में फ़र्क समझने वाले इस शाइरी में से हिन्दी -उर्दू को अलग कर सकते है !

मशहूर शाइर शकील बदायूनवी की शौहरत में हिन्दी का उर्दू से कहीं ज़ियादा हाथ है मगर इस तरह के तो सवाल ही नहीं उठने चाहिए ! इसी तरह अगर हम हिन्दी फिल्मों से अगर उर्दू को अलग करके देखें तो पीछे कुछ बचता ही नहीं है ! हम किसी सियासी या अदबी तक़रीर ( भाषण ) को भी देखें तो बिना दोनों ज़ुबानों के कोई तक़रीर मुकम्मल ही नहीं होती ! जब सब - कुछ शीशे की तरह साफ़ है तो फिर भी कुछ लोग अपनी अलग पहचान बनाने के चक्कर में भाषाओं का नुक्सान क्यूँ कर रहें हैं !

हिन्दी और उर्दू में जो आंतरिक रसायन है वो हम हिन्दुस्तानियों की रगों में लहू के साथ दौड़ता है ! ना तो तथाकथित हिन्दी वाले उर्दू के इस्तेमाल से बच सकते है और ना ही उर्दू को अपनी अचकन की अन्दर वाली जेब में चूने की डिबिया में बन्द रखने वाले कभी हिन्दी का प्रयोग किये बिना रह सकते हैं ! मुनव्वर राना ने सच ही कहा है :--

सगी बहनों का रिश्ता है जो उर्दू और हिन्दी में

कहीं दुनिया की दो ज़िन्दा ज़बानों में नहीं मिलता

हर ज़ुबान का अपना - अपना कलेवर होता है ! भाषा चाहें कोई भी हो उसकी लिपि भी कम महत्वपूर्ण नहीं होती ! फिराक़ गोरखपुरी ,अली सरदार जाफरी जैस अदीबों ने एक बार ये मशविरा दिया था क्यूँ ना हिन्दी -उर्दू की लिपि यानी रस्मुल ख़त को एक ही देवनागरी कर दिया जाए ताकि इसका प्रचार - प्रसार और ज़ियादा हो सके मगर ये मशविरा धरातल पे अपने पाँव भी ना रख सका ! ज़ुबान और रस्मुल- ख़त (लिपि) में जिस्म और रूह का सा सम्बन्ध होता है ! उर्दू ज़ुबान की अगर सबसे ख़ूबसूरत कोई बात है तो वो है इसकी नज़ाकत और नफ़ासत ! ये दोनों चीज़ें ही उर्दू की रस्मुल - ख़त में लिपटी हुई हैं ! उर्दू में अगर तल्फफुज़ को दरकनार कर दिया जाए तो ज़ुबान का सारा हुस्न ख़त्म हो जाता है इसलिए भाषा की लिपि में बदलाव को कोई भी बर्दाशत नहीं करेगा ! इस मरज़ का एक इलाज़ ये भी है कि क्यूँ ना हम दोनों हिदुस्तानी ज़ुबानों को सीखें और अपने बच्चों को भी सिखाएं ! क्यूँ नहीं हमारे सूबों की हुकूमतें इस तरफ़ संजीदा होती है ! जब नई नस्ल अंग्रेज़ी, फ्रेंच , जर्मन सीख सकती है तो उसे अपने मुल्क की ज़ुबान सीखने में परहेज़ क्यूँ ? इन दोनों ज़ुबानों की नाज़ुक हालत के लिए उर्दू और हिन्दी के ही बड़े- बड़े मठाधीश भी जिम्मेवार है ! दोनों ही ज़ुबानों की साहित्य अकादमियों ने भी सिवाय अपने चंद लोगों को ख़ुश करने और अपनी जेबों की सेहत संवारने के अलावा कोई ख़ास रचनात्मक काम नहीं किया ! दोनों भाषाओं के स्वयम्भू हितेषियों का भाषा के प्रति लगाव मैंने बड़े क़रीब से देखा और फिर मुझे मजबूर होना पड़ा ये कहने को :--

उर्दू - हिन्दी को मिले , ऐसे ठेकेदार !

जिनके घर की आबरू ,अंगरेज़ी अख़बार !!

अमीर खुसरो और कबीर से लेकर आज की हमारी इन दोनों ज़ुबानों के हिन्दी - उर्दू नाम ही बस अलग -अलग हुए है बाकी इनकी रूह तो वही है जिसे कभी हिन्दवी कहा जाता था ! निदा फ़ाज़ली यूँ तो उर्दू के शाइर माने जाते है मगर उन्हें इस बात पे भी फ़ख्र है कि वे हिन्दुस्तानी ज़ुबान के शाइर है ! निदा फ़ाज़ली ने आज भी खुसरो और कबीर की रिवायत नहीं छोड़ी है वे अरबी ,फारसी के कठीन लफ़्ज़ों की बजाय हमारे गली मोहल्ले में बोले जाने वाले आम बोल-चाल के लफ़्ज़ों को अपनी शाइरी में इस्तेमाल करते है ! अमीर खुसरो की ज़मीन पे कहा उनका ये मतला :--

मंदिर भी था उसका पता मस्जिद भी थी उसकी ख़बर

भटके इधर ,उठके उधर खोला नहीं अपना ही घर

कबीर की ज़मीन पे कहे उनके ये मिसरे भी हमे फिर से उर्दू - हिन्दी के फासले को मिटा कर हिन्दुस्तानी ज़ुबान के पुराने ज़ायके से रु-ब-रु करवाते हैं :--

ये काटे से नहीं कटते ये बाँटे से नहीं बँटते

नदी के पानियों के सामने आरी कटारी क्या

काश निदा साहब की ये बात मेरे उन मित्रों को समझ आ जाए जो इन दोनों सगी बहनों ( हिन्दी-उर्दू ) के रिश्ते के बीच में मज़हब की दिवार बनाना चाहते हैं !

नस्ले -नौ की नुमाइंदगी करने वाले युवा शाइर बुनियाद हुसैन "ज़हीन " के दो मिसरे मुझे यहाँ याद आ रहें हैं :--

तहज़ीबों की बात है , लफ़्ज़ों को मत तोल !

उर्दू - हिन्दी छोड़ दे , हिन्दुस्तानीबोल !!

ज़हीन भाई का ये मशविरा हमारेअहद के तमाम अदीबों / साहित्यकारों को समझ में आ जाए तो वो दिन दूर नहीं जब इस मुल्क में भाषाएँ सबसे पहले मुहब्बत का पुल बनाएंगी जो कि आज अलगाव की एक बड़ी वजह बनी हुई है !

हमारे हिन्दुस्तानी अदब / साहित्य की एक अजीब सी ख़ूबी है कि इसमे कोई भी अदीब या साहित्यकार अकेला एक ज़ुबान के मुगालते में अदब की पटरी पे अपना सफ़र नहीं कर सकता अगर उसे सच में साहित्य - सेवा करनी है /अदब की सच्ची ख़िदमत करनी है तो उसे इन दोनों ज़ुबानों को गले लगाना होगा और ये स्वीकार करना होगा कि हिन्दुस्तान में बिना हिन्दवी के अदब का भला नहीं है !

मेरे एक तथाकथित हिन्दी के अदीब दोस्त ने मुझसे कहा कि यार ! तुम हिन्दी के आदमी होकर चौबीसों घण्टे उर्दू के गुणगान करते रहते हो ,तब मेरा उस मित्र से एक ही सवाल था कि सिर्फ़ पांच मिनट तक मुझसे हिन्दी में बात कर के दिखा दो और अगर इस दौरान तुम एक भी लफ़्ज़ उर्दू का नहीं बोले तो कबीर की कसम उर्दू बोलना और उर्दू की बात करना छोड़ दूंगा ! वही हुआ मित्र हर दूसरे जुमले में उर्दू बोलते रहे और बाद में शर्मिन्दा भी बहुत हुए ख़ैर अच्छी बात ये हुई कि उनको मेरी ये बात समझ में आ गई ..कि हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उर्दू और हिन्दी का मिश्रण हिन्दुस्तानी बोलते है पर पता नहीं कौनसा हमारा अहम् आड़े आ जाता है कि हम इस बात को स्वीकार नहीं कर पाते इसी लिए मुझे लिखना पड़ा :---

घर से ले बाज़ार तक , बोलो हो दिन -रात !

उर्दू उसका नाम तो , अचरज की क्या बात !

मुनव्वर राना ने भी भाषा में भेद करने वालों को अपने एक शे'र से जवाब दिया था :--

अपनी ज़बान समझ कर अगर तूं न बोलता

मैं कुछ भी बोलता मगर उर्दू न बोलता

एक बहुत अच्छा संकेत इन दिनों ये है कि ग़ज़ल ने आगे आकर दोनों ज़ुबानों के बीच खड़े अवरोध ख़ुद हटायें है ! दोनों ज़ुबानों में लोग ग़ज़ल कह रहें हैं ! पिछले दिनों वसीम बरेलवी साहब ने अपनी एक तक़रीर में इलाहाबाद में कहा था कि ग़ज़ल की सतह पर ये दोनों भाषाएँ बहुत क़रीब आयी हैं मगर नस्र (गद्य ) में अभी फासला बना हुआ है ! नस्र लिखने वाले साहित्यकारों /अदीबों को इस फासले को मिटाना होगा ! ज़ुबान वही फलती -फूलती है जो अपने दरवाज़े दूसरी ज़ुबान के लिए खोल दे ! जब अंग्रेज़ी का लफ़्ज़ हॉस्पिटल अस्पताल हो सकता है ,ग्लास अगर गिलास हो सकता है तो और भी बहुत से शब्द एक दूसरे की भाषा में समाहित होने के लिए बैचेन है बस देरी है तो हम लफ़्ज़ों को बरतने वालों की ! क्यूँ नहीं हम अतीत की दिवार को मुहब्बत के रंगों से एक बार फिर रंगीन कर दे और मुनव्वर राना की तरह कहें :--

लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है

मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है

ईश्वर करे वो दिन जल्द आये जब हम सब ये कहना बन्द कर दे कि वो हिन्दी वाला है, वो उर्दू वाला है और हम सब मंसूर उस्मानी के लहजे में एक साथ बोले :--

हिन्दी रानी देश की ,उर्दू जिसका ताज !

खुसरो जी की शाइरी ,इन दोनों की लाज !!

आख़िर में इसी दुआ के साथ कि हिन्दवी के दिन फिर से लौट आयें, दोनों ज़ुबानों के रिश्ते और भी पुख्ता हो ,दोनों भाषाओं के आकाओं के अहम् कांच के बर्तन की तरहचकना-चूर हो जायेँ और मुझे फिर से अपने एक दोस्त को ये ना कहना पड़े :--


तुझको तो है बोलना , तूं जो चाहे बोल !

पर मज़हब के बाट से ,भाषा को मत तोल !!
--

विजेंद्र शर्मा

vijendra.vijen@gmail.com

सीमा सुरक्षा बल परिसर

बीकानेर --9414094122

-

image

शीर्षक पढ़ कर आप सोच रहें होंगे की यह भी कोई बात है ‘आम आदमी की नाक'। नाक तो क्‍या आम और क्‍या खास सभी के पास होती है। श्‍वाँस लेने के काम आती है। सभी को गंध सुगंध दुर्गंध का अनुभव इसी से होता है। जुकाम लगने पर यह बंद हो जाती है या फिर बहने लगती है। यानि सभी के लिए यह एक ही तरीके से काम करती है। यह दीगर बात है कि इसकी आकार और आकृति हर किसी की अलग होती है। इस आकार और आकृति में कहीं किसी खास आदमी की नाक बेढंगी या अच्‍छी हो सकती, यही व्‍यवस्‍था आम आदमी के लिए भी लागू होती है। अब आप यह तो पूछ ही सकते हैं कि फिर इस आदमी की नाक के आगे ‘आम' फंसाने की क्‍या आवश्‍यकता है?

आवश्‍यकता है जनाब। आम आदमी भले ही आम हो पर उसकी नाक बड़ी खास होती है। मिडिल क्‍लास यानी तथाकथित कैटल क्‍लास का आदमी अपनी सारी जिंदगी इस इकलौती नाक को बचाने में ही गुजार देता है। यानी आम आदमी की नाक खास डेलिकेट किस्‍म की होती है। उसे यह कभी भी कटी हुई महसुस हो सकती है। इसके लिए न तो किसी अस्‍पताल में जाना पड़ता है और नहीं किसी सर्जन की आवश्‍यकता नहीं होती। यानी यह एक बड़ी ही अमूर्त किस्‍म की घटना होती है।

हमारे एक मित्र हैं डील डोल में लंबे-चौड़े कुछ दबंग सी छवि वाले। एक बार महानुभाव अपने साले की शादी में गए। अब साले की शादी में तो जीजा खास होता ही है सो वे खास बने बारात में बड़े जोर से ता ता थैया कर रहे थे। रस्‍म अदायगी सा लिया गया सोमरस उनकी नसों में उत्‍तेजना भर रहा था। वे बेहिसाब नाच रहे थे। बारात उनके नाच के कारण प्रति इंच के हिसाब से रास्‍ता तय कर रही थी। बड़े बुजुर्गों ने समझाया मुहूर्त का हवाला भी दिया पर जनाब कहाँ मानने वाले थे। सो उनके बड़े साले साहब ने बैण्‍ड वालों को आगे बढ़ावा दिया। बस फिर क्‍या था मित्र की नाक कट गई। लोगों ने बहुत समझाया पर बैण्‍ड वालों के सामने कटी नाक वापस नहीं जुड़ी। शादी का सारा मजा किरकिरा हो गया। वे नाराज होकर वहीं से वापस क्‍या लौट आए। आज तक ससुराल की चौखट में पांव नहीं रखा। उनकी इस नाक के सवाल में बेचारी भाभी जी भी ऐसी उलझी की उनका पीहर जाना ही बंद हो गया।

तो भैया यह नाक बड़ी अजीब चीज है। यह तो छोटी सी बात पर ही कट जाए नहीं कटे तो कभी भी न कटे। अब आप ही देखो न घोटाले करो, जेल जाओ पर नाक कहाँ कटती हैं। दो नंबर का पैसा है आप इन्‍कम टैक्‍स का छापा पड़ा नाक कटती नहीं वरन और ऊंची हो जाती है। हमने शोध करके यह ही पाया है कि नाक आम आदमी की ही कटती है। खास आदमी की नाक कुछ मजबूत किस्‍म की होती है।

एक बार की बात है जब हम कॉलेज में पढ़ा करते थे। हमारे एक प्रोफेसर साहब ने एक दादा किस्‍म के लड़के को पढ़ाई में ध्‍यान नहीं देने पर फटकार लगा दी। बस फिर क्‍या था दादा भाई को तो कुछ महसूस नहीं हुआ पर उनके चमचों की नाक कट गई। हंगामा हो गया। मामला तूल पकड़ गया लड़कों ने हड़ताल कर दी। लड़कों की हड़ताल के विरोध में कॉलेज स्‍टाफ भी हड़ताल में चला गया। यानि कभी कभी यह नाक का कटना बड़ा लफड़ा भी करवा देता है।

अब नाक क्‍या आजकल तो यह कुछ ज्‍यादा ही कटने लगी है। अस्‍पताल में डॉक्‍टर ने थोड़ा कम भाव दिया तो नाक कट जाती है या फिर मरीज होकर डॉक्‍टर से कुछ सवाल जबाब कर लिए तो नाक कट जाती हैं। लाईन में लगकर टिकट लेना पड़े तो नाक कट सकती है। सरकारी दफ्तर में काम करने से नाक कट जाती है। अगर किसी काम के लिए प्रक्रियावश समय लग जाए तो नाक कट जाती है। बौद्धिक कहे जाने वाले लोग भी इसी नाक की जद्‌दोंजहद में ही लगे रहते हैं। अगर वे मुख्‍य अतिथि या अध्‍यक्ष किस्‍म के बुद्धिजीवी हैं तो किसी कार्यक्रम में बतौर सामान्‍य आदमी निंमत्रण मिल जाए तो नाक कट सकती है। आपकी बात को कोई काट दे तो भी नाक कट सकती है।

नाक का कटना एक सामाजिक प्रक्रिया भी है। अपनी नाक को बचाने के लिए बेचारे आम आदमी को पैसे वालों की देखा देखी करनी जरूरी है। हमारे एक मित्र की लड़की की शादी थी। उन्‍होंने अपनी नाक कटने से बचाने के लिए बढ़ चढ़ कर खर्चा किया। उनकी नाक एक बारगी तो बच गई। पर इस नाक कटने को बचाने के चक्‍कर में भारी कर्ज के बोझ तले दबे छटपटा रहे हैं। आम आदमी नाक कटने की जद्‌दोजहद की कहानी बड़ी लंबी है। उसकी लड़की काम से देर से घर आए तो नाक कट जाती है। उसकी लड़की जींस टॉप पहन ले तो नाक कट जाती है। और हाँ अगर उसके बच्‍चे पसंद की शादी यानी लवमैरिज कर ले तो नाक कट जाती है। अब बताइए वह बिना नाक के बिरादरी के सामने कैसे जाए।

एक बार तो मित्रों हद हो गई। हम अपने एक मित्र के घर गए तो उनका मुँह लटका हुआ था। हमने कारण जाना तो ज्ञात हुआ कि आज उनके बच्‍चे का पहली कक्षा का रिजल्‍ट आया है और वह कक्षा में प्रथम नहीं द्वितिय आया है। हमने कहा भाई यह तो खुशी की बात है आप लोग मुहँ लटकाए क्‍यों बैठे हैं। इस पर उन्‍होंने कहा कि पड़ोसी का बच्‍चा प्रथम आया है इसलिए उनकी नाक कट गई। उनका बच्‍चा इस नाक कटने के दुख से दूर खेल रहा था। हमें तो इस नाक की लड़ाई को देख कर ऐसा लगता है कि कितना अच्‍छा होता यदि उपर वाला आदमी की नाक ही नहीं बनाता न तो बांस होता नहीं बांसुरी बजती ।

लम्बी कविता :  प्रेम की परखनली में ईश्वर का संश्लेषण

image
आपके मुँह में छाले हैं तो क्या हरी मिर्च को मीठा हो जाना चाहिए

अगर राहु और केतु कल्पनाएँ हैं
तो जिन कहानियों से राहु और केतु जन्मे हैं वो?
हर देश में, हर धर्म में
झूठ इतनी आसानी से अमर क्यों हो जाते हैं?

धर्मग्रंथों में अच्छी कहानियाँ और नीतिपरक उपदेश होते हैं ईश्वर नहीं

खूबसूरत कल्पनाएँ सच मानी जाने के लिए अभिशप्त हैं

‘सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है’ से बड़ा सच ‘सुंदर ही शिव है, शिव ही सत्य है’ होता है

तीव्रता में, प्रसार में, नुकसान में
धर्म दुनिया का सबसे बड़ा नशा है
नशा करने की खुली छूट मदहोशी पर खत्म होती है
जिसे धर्म का डॉक्टर स्वास्थ्य का उच्चतम बिंदु कहता है

आस्तिकों से उनका विश्वास छीनने की कोशिश करने वालों को राक्षस कहा गया
क्या नास्तिकों से उनका अविश्वास छीनने की कोशिश राक्षसत्व नहीं है?

आस्तिकता पैतृक संपत्ति है
नास्तिकता स्वयं के खून पसीने की कमाई

पूर्ण आस्तिक या पूर्ण नास्तिक होना लगभग असंभव है
लोग अपनी सुविधानुसार इन दोनों के बीच का कोई रास्ता चुनते है

हम कुछ नया करने से ज्यादा महत्वपूर्ण पुराने कूड़े को सुरक्षित रखना समझते हैं

प्रशंसा सत्तालोभी और अप्सराभोगी देवताओं को प्रसन्न कर सकती है ईश्वर को नहीं
देवता का विलोम राक्षस नहीं होता

ऐसा क्यूँ है?
इस प्रश्न का उत्तर दुर्धर और अविश्वसनीय है
क्या होना चाहिए?
सब इसका उत्तर जानते हैं
काश! कि सच इससे उल्टा होता

जटिल सिद्धान्तों का सरलीकरण उन्हें विकृत कर देता है
सिद्धान्तों की सही समझ अपवादों को समझे बिना असंभव है

धार्मिक साहित्यकारों ने अपने समय का सच लिखा होता
तो वो कब का मिटा दिया गया होता
किंतु मीठा मधुमेह के रोगी हेतु जहर है

जिनके घर शीशे के होते हैं
वो सबको हमेशा यही उपदेश देते हैं
कि पत्थर मारना बुरी बात है

क्वांटम सिद्धांत के अनुसार
अँधेरे बंद कमरे में इंसान न जिंदा होता है न मुर्दा
लेकिन रोशनी की एक किरण भी उसे जीवित कर सकती है

कितने लोग स्वप्न देखते समय आँखें खुली रखते हैं?

दुनिया के सबसे ताकतवर शब्दों का सबसे ज्यादा दुरुपयोग होता आया है
जैसे प्यार, धर्म, ईश्वर, सत्ता.....
शक्ति समय के आरंभ से ही अभिशप्त है

जाति, धर्म, प्रदेश, देश.....
हर पंक्षी अपना पिंजरा खुद चुनता है

आसमान केवल एक भ्रम है
जहाँ पहुँचने पर चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा दिखाई पड़ता है
दूर से देखने पर जमीन आसमान से भी खूबसूरत दिखाई पड़ती है

गर्व अहंकार का पिता है
वीररस की सारी रचनाएँ मृत्यु की आरती हैं

स्वयं के साथ बलात्कार करने पर
हर बार दर्द से मर जाता हूँ
मेरा एक पाँव बर्फ़ में है दूसरा आग में

चेतना एक भ्रम है जिसके बिना सारी वास्तविकताएँ अर्थहीन हैं

तुलसी को मैं तबसे सुनता आया हूँ
जब मुझे शब्दों के सामान्य अर्थ भी नहीं पता थे

कितने लोग अपने जीवन में तुलसी जैसों से मुक्ति पाते हैं?

तुलसी महान प्रेमी थे
प्रेम का घनत्व बढ़ने के साथ साथ उसकी कोमलता भी बढ़ती जाती है
प्रेम में घातक चोट खाई थी तुलसी ने और भीतर तक टूटे थे
इसलिए वो न कभी अपना सच लिख सके
न अपने राम का

अच्छे साहित्यकार चेचक की तरह होते हैं
बीमारी समय खत्म कर देता है लेकिन निशान हमेशा रहते हैं

शब्द मेरे चेहरे पर उगते हैं
नियमित शेव न करूँ तो असभ्य लगने लगता हूँ

क्या लिखा जाय
आज का बदसूरत सच या आने वाले कल के लिए एक खूबसूरत झूठ

मूर्तियों ने हमेशा इंसानों से ज्यादा बेहतर जीवन जिया है
देवताओं ने यूँ ही मूर्तियों में अपना घर नहीं बनाया

बिग बैंग के समय पल भर के लिए सिर्फ़ रोशनी थी
अँधेरा रोशनी का बेटा है

सृजन जन्म की प्रक्रिया है
जल्दी जन्म होने पर बच्चे की जान जा सकती है
देर होने पर माँ की

क्वांटम सिद्धांत और क्रमिक विकास के सिद्धांत के अनुसार
अनिश्चितताएँ न होतीं तो प्रकृति सारे कमजोरों का नामोनिशान मिटा देती
प्रकाश की सीमा उसकी तरंगदैर्ध्य है
प्रकाश जो नहीं दिखा पाता उसे अनिश्चितताएँ दिखा देती हैं
धर्म का सबसे घातक हथियार अनिश्चितताएँ हैं
धर्म को सबसे ज्यादा डर भी अनिश्चितताओं से लगता है

मीठापन सड़कर कड़वी शराब बन जाता है
कड़वाहट वक्त के साथ कम होती जाती है और नशा बढ़ता जाता है
मिठास समय के साथ नशा बन जाने के लिए अभिशप्त है

सिर्फ पानी ही बिना बहके शराब को पूरी तरह पी सकता है
बाकी सब नशा पीते हैं
पानी सृष्टि के प्रारंभ से अब तक वैसे का वैसा है
बड़ा कठिन है पानी होना

विज्ञान नशे का एंटीडोट है

हम जो करने जा रहे हैं वो पाप है
यह जानने से ज्यादा जरूरी है पाप शब्द पर विश्वास करना

जिंदगी के लिए जितना जरूरी है ये सच जानना
कि सूरज आग का एक दहकता हुआ गोला है
जिसके भीतर लगातार हाइड्रोजन परमाणु के नाभिक संलयन करके हीलियम का नाभिक बनाते रहते हैं
उतनी ही जरूरी है ये कल्पना कि सूरज एक देवता है
जो अपने सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर दिनभर चलता रहता है
और जरूरी ये भी है कि समझा जाए
कल्पना और सच के बीच का स्पष्ट अंतर
क्योंकि सच और कल्पना जब एक दूसरे की कुर्सी पर बैठते हैं तो सिर्फ़ विनाश होता है

ईश्वर कोई कवि या लेखक या मूर्तिकार या चित्रकार होगा
वह अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति बना चुका है या नहीं
इसमें उसे स्वयं संदेह है

ईश्वर का भविष्य पर नियंत्रण होता
तो वो अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति सबसे पहले बनाता

ब्रह्मांड की उत्पत्ति का महासिद्धांत खोजे जाने के बाद
मानव शायद देख सके अपना सबसे संभावित भविष्य
क्या इसीलिए ईश्वर जब तब मानव की मदद करने आता है
क्या ईश्वर भी भविष्यलोभी है?

फूल पेड़ के स्वप्न हैं
कच्चे फल महत्वाकांक्षाएँ
फलों का पक कर गिरना वास्तविकता

पेड़ हर साल वो दुख झेलता है
जो इंसान जीवन में एक बार भी झेल नहीं पाता

पत्थर खाकर फल देना
पेड़ की उदारता नहीं उसकी लाचारी है
अपने हत्यारे को आक्सीजन देकर जिंदा रखना उसकी आदत है

पकने के बाद भी जो फल पेड़ से चिपके रहते हैं
वो सड़ जाते हैं
गुरुओ! चेलों को अपने गुरुत्व से मुक्त कर दो

पेड़ हँसता है
काटने वाले की मूर्खता पर

सुख
बेफ़िक्री से प्यार करता है
सुविधा से शारीरिक संबंध रखता है
दुख का पति है

हम इंसान का मुखौटा लगाए जानवर हैं

प्रेम की परखनली बिना ईश्वर का संश्लेषण असंभव है
हटा दो बाकी सारे यंत्र, पात्र, मर्तबान, समीकरणें, किताबें, पुस्तिकाएँ
जो केवल इसलिए बनाए गए हैं
ताकि ईश्वर के सभी अवयवों की सही मात्रा तक कभी इंसान पहुँच ही न सके

प्रेम की परखनली अपने अभिकर्मक स्वयं खोज लेती है

नफ़रत की अभिव्यक्ति में शब्द कम पड़ते हैं
प्रेम की अभिव्यक्ति शब्दहीन होती है

कुछ मुझ से प्रेम करते हैं
कुछ से मैं प्रेम करता हूँ
दुनिया शब्दों से प्रेम करती है

कामी शब्द ढूँढते हैं
प्रेमी शब्दों से मुक्ति

दिल सिर्फ़ तुम्हें चाहता है
दिमाग तुम्हारा सबसे अच्छा विकल्प ढूँढता है

वो लोग जिनके दिल और दिमाग समान रूप से कार्यशील थे
प्रकृति ने उन्हें विकास क्रम में लुप्तप्राय बना दिया
घरेलू झगड़ों से फ़ायदा हमेशा बाहरी लोगों को होता है

सतह पर पृष्ठ तनाव रहता है
गहराई में अँधेरा
पानी थोड़ी ही गहराई तक पारदर्शी होता है
उसके बाद वो प्रकाश को वापस घुमा देता है या सोख लेता है

मेरी उँगलियाँ जब तुम्हारे गालों का स्पर्श करती हैं
उँगलियों के इलेक्ट्रॉन तुम्हारे गालों के इलेक्ट्रॉनों को धक्का भर देते हैं
छूना नहीं कहते इसे

घर्षण से कुछ इलेक्ट्रॉनों का आदान प्रदान होता है
छूना नहीं कहते इसे भी

तुम्हारा प्यार मेरे होंठ हैं
खाते समय कभी कभी होंठ कट ही जाते हैं
शुक्र है कि लार में जीवित नहीं रह पाते सड़न पैदा करने वाले जीवाणु
इसलिए होंठों के घाव जल्दी भर जाते हैं
क्रमिक विकास में हमने होंठों को बचा कर रखना सीख लिया है

बादल आँसू बहाते हैं और रेगिस्तान रोता है
रोने वालों की आँखें अक्सर सूखी रहती हैं
आँसू बहाने वाले अक्सर रोते नहीं

सच कड़वा नहीं होता
बस इसका स्वाद अलग होता है, कॉफ़ी की तरह

कितनी सारी ग़ज़लें जबरन कहे गए मत्ले के साथ जीती हैं
कितने सारे मत्ले भर्ती के अश’आर संग निबाहते हैं
मुकम्मल ग़ज़लें दुनियाँ में होती ही कितनी हैं

तुम भूलभुलैया हो
हर बार तुम्हारी आत्मा तक पहुँचते पहुँचते मैं राह भटक जाता हूँ

तुम्हारे हाथों पर किसी और की लगाई मेरे नाम की मेंहदी नहीं हूँ मैं
जिसे चार कपड़े और चार बर्तन, चार दिन में हमेशा के लिए मिटा देंगे

मैं तुम्हारी आत्मा की तलाश में निकला वो मुसाफिर हूँ
जो कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच पाएगा
लेकिन ये जानते हुए भी तुम्हारी आत्मा हमेशा जिसका इंतजार करेगी

हर चाँद का एक हिस्सा ऐसा होता है जिसे धरती कभी नहीं देख पाती

प्रेम पर लिखी कोई कविता कभी पूर्ण नहीं होती

प्रकाश सूरज का प्यार है
आवेशित कण प्यार का बाईप्रोडक्ट हैं
हर धरती के सीने में खौलते हुए लावे से बना चुंबकीय क्षेत्र सूरज से उसकी रक्षा करता है

छोटे और आसान रास्ते से मंजिल तक पहुँचने वाला भगोड़ा होता है
जीवन के सारे आनंद लंबे और कठिन रास्ते पर होते हैं
मंजिल कुछ नहीं जानती आनंद और रास्तों के बारे में
मंजिल पर सिर्फ़ नशा मिलता है

तुमको छू कर आता हुआ प्रकाश
मेरी आँख का पानी है

तुमको सोते हुए देखना
तुममें घुलना है

कपड़े तुम्हारे जिस्म से उतरते ही मर जाते हैं
साँस तुम्हारे जिस्म से निकलते ही भभक उठती है
चूड़ियाँ तुम्हारे हाथों से निकलकर गूँगी हो जाती हैं
तुम गहने पहनना छोड़ दो तो क्या इस्तेमाल रह जाएगा अनमोल पत्थरों का
तुम न होती तो पुरुष अपने झूठे अहंकार के लिए लड़ भिड़ कर कब का खत्म हो गए होते

तुम्हारे छूने भर से बेजुबान चीजें गुनगुनाने लगती हैं
जीवन तुम्हारी छुवन में है
मौत पुरुषों की भुजाओं में

पहचानो अपनी जीवनदायिनी शक्ति
मृत्यु देने वाली भुजाओं को छूकर उन्हें जीवन से भर दो
एक बार फिर जानवरों को इंसान बना दो

ईश्वर तक पहुँचने के रास्ते का एकमात्र द्वार नारी के दिल में होता है

नारी के दिल तक पहुँचने के रास्ते में ढेर सारे मंदिर, मस्जिद, धर्मग्रंथ, धर्मगुरु.....
ठेला लगाकर “ईश्वर ले लो, ईश्वर ले लो, सस्ता सुंदर और टिकाऊ ईश्वर ले लो” की आवाज लगाते रहते हैं

“नारी नरक का द्वार है” आज तक का सबसे भयानक झूठ है।

प्रेम को सदियों से दिए जा रहे ज़हर के बावजूद भी
प्रेम अपने हर रूप में इसीलिए फल फूल रहा है
क्योंकि ईश्वर मरा नहीं करता

सपना बहुत खूबसूरत है
मगर मैं मौत से पहले एक बार जागना चाहता हूँ

कितनी भी रेखाएँ खींच लो
दो रेखाओं के बीच एक और रेखा खींचने की जगह हमेशा बची रहती है

अनंततम सूक्ष्म हिस्सों में तोड़ने के बाद ही
समाकलन शत प्रतिशत शुद्ध योगफल दे पाता है
उन आकारों के लिए भी जो सामान्य प्रक्रियाओं से जोड़े जाने असंभव हैं

सबसे विनाशकारी है ये मानना कि जो हम जानते हैं वही सही है बाकी सब गलत

नास्तिकों ने मानवता को कितना नुकसान पहुँचाया है?
तुलना कीजिए उस नुकसान से जो उन परम धार्मिक लोगों ने इंसानियत को पहुँचाया
जो ये मानते हैं कि घोर पाप भी माफ़ी माँगने और कुछ कर्मकांडों से धुल जाएँगें

हर शिव ये जानता है कि कामदेव के बिना सृष्टि का चलना असंभव है
किंतु हर शिव कामदेव को भस्म करने का नाटक रचता है
परिणाम?
कामदेव अजेय हो कर वापस आता है

जरूरत से ज्यादा घनत्व कृष्ण विवर का निर्माण करता है
कृष्ण विवर किसी के किसी काम नहीं आता
कृष्ण विवर शक्ति की कभी न मिटने वाली भूख का रोगी है
आवश्यकता से अधिक शक्ति कृष्ण विवर बनने के लिए अभिशप्त है
कृष्ण विवर सबकुछ अपने जैसा बना देना चाहता है

बहुत कम सूरज ऐसे होते हैं जिनकी पृथ्वी पर जीवन होता है

13.7 अरब साल लगे हैं मूल कणों को सूचनाएँ का वो सही क्रम जानने में
जिसमें एक दूसरे से जुड़कर वो एक इंसानी दिमाग बना देते हैं

ईश्वर हमारे ब्रह्मांड के बाहर खड़ा तमाशाई है
जो अपना दिल बहलाने के लिए रोज नए धमाके करता है

कितनी बार ईश्वर ने ऐसे ब्रह्मांड बनाने की कोशिश की जहाँ भविष्य निश्चित था
पर निश्चित भविष्य आत्मघाती होता है

फिर ईश्वर ने रचीं अनिश्चितताएँ
और जी उठे ब्रह्मांड

ईश्वर जिस ब्रह्मांड में जाता है उसके नियमों का पालन करता है

अनिश्चितताओं के कारण
ईश्वर न हर पाप का दंड दे सकता है, न हर पुण्य का फल
इसीलिए हार कर उसे कहना पड़ता है कि कर्म करो फल की चिंता मत करो

हर ब्रह्मांड ये समझता है कि ईश्वर ने उसका निर्माण किसी खास उद्देश्य से किया है

सभी संख्याओं का योग शून्य होता है

--

धर्मेन्द्र कुमार सिंह
उप प्रबंधक (जनपद निर्माण विभाग - मुख्य बाँध)
बरमाना, बिलासपुर
हिमाचल प्रदेश
भारत

डॉ0 ज्योति सिन्हा का आलेख : रिमझिम बरसेला सवनवा.

(कजरी गीतों में विषय वैविध्‍य- एक दृष्‍टि)

डॉ0 ज्‍योति सिनहा

प्रवक्‍ता-संगीत

भारती महिला पी0जी0 कालेज, जौनपुर एवं रिसर्च एसोसियेट

भारतीय उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थान

राष्‍ट्रपति निवास शिमला, हिमांचल प्रदेश

clip_image002

डॉ0 ज्‍योति सिन्‍हा लेखन के क्षेत्र में एक जाना पहचाना नाम है। सांस्‍कृतिक एवं सामाजिक सरोकारों की प्रगतिवादी लेखिका साहित्‍यिक क्षेत्र में भी अपने निरन्‍तर लेखन के माध्‍यम से राष्‍ट्रीय एवं अन्‍तर्राष्‍ट्रीय पत्रा-पत्रिाकाओं में अपनी सशक्‍त उपस्‍थिति दर्ज करवाती रही हैं। संगीत विषयक आपने पॉच पुस्‍तकों का सृजन किया है। आपके लेखन में मौलिकता, वैज्ञानिकता के साथ-साथ मानव मूल्‍य तथा मनुष्‍यता की बात देखने को मिलती है। अपने वैयक्‍तिक जीवन में एक सपफल समाज सेवी होने के साथ महाविद्यालय में संगीत की प्राघ्‍यापिका भी हैं ! आपको जौनपुर के भजन सम्राट कायस्‍थ कल्‍याण समिति की ओर से संगीत सम्‍मान, जौनपुर महोत्‍सव में जौनपुर के कला और संस्‍कृति के क्षेत्रा में उत्‍कृष्‍ट योगदान के लिए सम्‍मानित किया गया। संस्‍कार भारती, सद्‌भावना क्‍लब, राष्‍ट्रीय सेवा योजना एवं अन्‍य साहित्‍यिक, राजनीतिक एवं इन अनेक संस्‍थाओं से सम्‍मानित हो चुकी डॉ0 ज्‍योति सिन्‍हा के कार्यक्रम आकाशवाणी पर देखें एवं सुने जा सकते हैं। आप वर्तमान में अनेक सामाजिक एवं साहित्‍यिक संस्‍थाओं से सम्‍बद्व होने के साथ अनेक पत्रिाकाओं के सम्‍पादक मण्‍डल में शोभायमान है। वर्तमान में आप भारतीय उच्‍च शिक्षा अध्‍ययन संस्‍थान राष्‍ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में संगीत चिकित्‍सा (2010-12) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।

रिमझिम बरसेला सवनवा......

(कजरी गीतों में विषय वैविध्‍य- एक दृष्‍टि)

कुछ लिखना है, पर क्‍या लिखूं ? यह तय कर पाना मुश्‍किल लग रहा था। किस विषय का चुनाव करूँ? किस मुद्‌दे को उजागर करूँ अथवा किस अज्ञात तथ्‍य से परीचित कराऊँ। समझ नहीं पा रही थी। वर्तमान मुद्‌दों पर बात नहीं करना चाह रही थी क्‍योंकि गर्मी से बेहाल मन, मस्‍तिष्‍क किसी तनावपूर्ण बात को कहने, लिखने का साहस नहीं कर पा रहा था। उसे कुछ सुकून व शीतलता की आकांक्षा थी और इस लिए इन सबसे दूर कुछ शान्‍त भाव का विषय जो नयापन लिये हो और जिसे लिखते-पढ़ते समय मन उल्‍लास व उत्‍साह से भर सके। ऐसे में सहसा यह ख्‍याल आया कि सावन आने वाला है जो इस भीषण तपिश से राहत ही नहीं प्रदान करेगा बल्‍कि अपनी मखमली हरियाली से मन मयूर को नाचने के लिए विवश कर देगा और फिर सावन नाम आते ही ‘कजरी‘ गीतों का उनसे जुड़ जाना स्‍वाभाविक ही है। अतः यही विचार दृढ़ हुआ कि ‘कजरी‘ गीत के विषय में कुछ लिखा जाये जिसे पढ़कर सुधी पाठकों का मन उमंग से भर उठे। इस लेख में कजरी गीतों की विषय विविधता पर अपना ध्‍यान केन्‍द्रित किया है। गाँवों में जब युवतियाँ सावन में पेड़ों पर झूला झूलते समय समवेत स्‍वर में कजरी गाती है तो ऐसा लगता है कि सारी धरती गा रही हैं, आकाश गा रहा है, प्रकृति गा रही है। न केवल मानव प्रभावित है बल्‍कि समस्‍त जीव-जन्‍तु भी सावन की हरियाली व घुमड़-घुमड़ कर घेर रहे बादलों की उमंग से मदमस्‍त हो जाते हैं।

लोक साहित्‍य की एक सशक्‍त विधा है- लोकगीत। संवेदनशील हृदय की अनुभूतियों की संगीतात्‍मक-भावाभिव्‍यक्‍ति ही लोकगीत है, जिसका उद्‌भव लोक जीवन के सामूहिक क्रिया-कलापों, सामाजिक उत्‍सवों, रीतिरिवाजों, तीज-त्‍यौहारों इत्‍यादि से हुआ। लोकगीतों की परम्‍परा मौखिक है तथा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती जाती है। इन लोक गीतों में जहाँ अपने अपने युग का सच छुपा है, वहीं उसमें मानव जाति की स्‍मृतियां, जीवन-शैली, सुख-दुःख, संघर्षों की गाथायें और जीवन के प्रेरक तत्‍व छुपे हुए हैं।

इन लोकगीतों को विभिन्‍न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है जैसे धार्मिक गीत, संस्‍कार गीत, ऋतु गीत, जातिगीत, श्रमगीत आदि।

इनमें ऋतुगीत के अर्न्‍तगत भी प्रायः दो ऋतुओं के गीतों का उल्‍लेख मिलता है। वर्षा ऋतु के गीत एवं बसन्‍त ऋतु के गीत। बसन्‍त ऋतु के समय गाये जाने वाले गीतों में मुख्‍य रूप से बसन्‍त के उल्‍लास व प्राकृतिक दृश्‍य का चित्रण मिलता है। कोयल की कूक, वृक्षों में नये पुष्‍पों का आना, होली पर्व का उल्‍लास आदि का वर्णन रहता है। फाग, फगुआ, होली, धमार, चैती इत्‍यादि बसन्‍त ऋतु के गीत है। वहीं वर्षा ऋतु के गीतों के अन्‍तर्गत बारहमासा, छहमासा, चौमासा, सावन, झूला, मल्‍हार, चांचर, आल्‍हा एवं कजरी इत्‍यादि गीत गाये जाते हैं। इन गीतों में ‘कजरी‘ का महत्‍व सर्वोपरि है तथा इसकी लोकप्रियता इसी से है कि इसे ऋतुगीतों की ‘रानी‘ भी कहा जाता है। पावस ऋतु में काले बादलों का उमड़-घुमड़ कर आना, बिजुरी का चमकना, दादुर-मोर-पपीहे की पुकार, मानव मन को ही नहीं, समस्‍त जीव-जन्‍तु को प्रभावित करती है। शस्‍य श्‍यामला धरती की हरियाली को देखकर मन मयूर नाच उठता है और हमारे भाव गेय रूप में अभिव्‍यक्‍त होकर ऋतुगीतों के रूप में आकार लेते हैं।

देखा जाये तो अधिकांश लोकगीत किसी न किसी ऋतु या त्‍योहार के होते हैं। वर्षा ऋतु के आने पर लोगों के मन में जिस नये उल्‍लास व उमंग का संचार होता है, उस भाव की अभिव्‍यक्‍ति करती है-कजरी। ऋतुगीतों की श्रेणी में वर्षागीत के अन्‍तर्गत सावन में गाया जाने वाला यह गीत प्रकार विशेष लोकप्रिय है। इसका सम्‍बन्‍ध झूला से है। सावन में पेड़ों पर झूले पड़ जाते हैं पेड़ों की डालियों पर मजबूत डोर के सहारे पटरा लगाकर झूला तैयार किया जाता है। कुछ युवतियां पटरे पर बीच में बैठती हैं और कुछ युवतियों पटरे के दोनों किनारों पर खड़े होकर झूले को ‘पेंग‘ मारती हैं और झूले को गति देती हैं। झूला झूलते समय स्‍त्रियाँ समवेत स्‍वर में उन्‍मुक्‍त भाव से कजरी गाती हैं। जब काले-कजरारे बादल घिरे हो, बरखा की भीनी-भीनी फुहार पड़ रही हो, पेड़ो पर झूले पड़े हों, मन उमंग से मदमस्‍त हो, ऐसे में भला मन की अभिव्‍यक्‍ति गीतों में कैसे नहीं उतरेगी ? इन गीतों से व पावस की हरियाली से सम्‍पूर्ण वातावरण रोमांच से पूरित रहता है।

‘कजरी‘ नाम के विषय पर दृष्‍टि डाले तो वस्‍तुतः सावन में काले कजरारे बादलों के कारण इसका नाम ‘कजरी ‘ पड़ा। परन्‍तु इसके नामकरण के संदर्भ में अनेक मत पाये जाते हैं। श्री लक्ष्‍मी नारायण गर्ग की पुस्‍तक ‘निबन्‍ध संगीत‘ में पृष्‍ठ सं0 97 पर शंभुनाथ मिश्र जी ने कजरी के नामकरण के संदर्भ में लिखा है कि ‘‘कहा जाता है कि कजरी का नामकरण सावन के काले बादलों के कारण पड़ा है। ‘भारतेन्‍दु के अनुसार मध्‍य प्रदेश के दादुराय नामक लोकप्रिय राजा की मृत्‍यु के बाद वहां की स्‍त्रियों ने एक नये गीत की तर्ज का आविष्‍कार किया जिसका नाम ‘कजरी‘ पड़ा। कुछ लोग कजरी-वन से भी इसका सम्‍बन्‍ध जोड़ते हैं। डा0 बलदेव उपाध्‍याय के विचार में आजकल की कजरी प्राचीन लावनी की ही प्रतिनिधि है। कजरी का सम्‍बन्‍ध एक धार्मिक तथा सामाजिक पर्व के साथ जुड़ा हुआ है। भादों के कृष्‍णपक्ष की तृतीया को कज्‍जली व्रत-पर्व मनाया जाता है। ये स्‍त्रियों का मुख्‍य त्‍यौहार है। स्‍त्रियाँ इस दिन नये वस्‍त्र-आभूषण पहनती हैं, कज्‍जली देवी की पूजा करती और अपने भाइयों को जई बांधने के लिए देती है। उस दिन वे रातभर जागती हैं एवं कजरी गाती हैं। इसे रतजगा भी कहते हैं।‘‘

वास्‍तव में कजरी या कजली शब्‍द संस्‍कृत के कज्‍जल से निष्‍पन्‍न है। सम्‍बन्‍ध भेद से इसका अर्थ कज्‍जली देवी, काले बादल तथा उमड़ती-घुमड़ती घटाओं से है जबकि विषय वस्‍तु की दृष्‍टि से कजरी वर्षा ऋतु में गाया जाने वाला एक लोकगीत का प्रकार है जिसमें श्रंगार रस के संयोग-वियोग दोनों पक्षों का विराट तत्‍व निहित हैं। यद्यपि कजरी हर क्षेत्र में गाई जाती है परन्‍तु काशी (बनारस) व मिर्जापुर की कजरी विशेष प्रसिद्ध है। मिर्जापुर की कजरी तो सर्वप्रिय हैं इस सम्‍बन्‍ध में एक कहावत प्रसिद्ध है कि ‘‘लीला रामनगर की भारी, कजरी मिर्जापुर सरनाम‘‘।

यहाँ कजरी तीज को कजरहवा ताल पर रातभर कजरी उत्‍सव होता है जिसे सुनने के लिए काफी संख्‍या में लोग एकत्रित होते हैं। मिर्जापुर की कजरी का अपना एक अलग रंग है। अनेक शायरो ने कजरी गीतो की रचना की जिसमें वफ्‍फत, सूरा, हरीराम, लक्ष्‍मण, मोती आदि के नाम पुराने शायरों में लिए जाते रहे हैं जिन्‍होंने अपनी रचनाओं से इस विधा को समृद्ध किया। कजरी के दंगल अथवा अखाड़े भी होते हैं जिनमें प्रतियोगिता होती है। विरहागीतों के दंगल के समान ही इन दंगलों में भी विशाल जन समुदाय के समक्ष प्रश्‍नोत्तर रूप में पूरी रात कजरी गीतों का गायन किया जाता है।

काशी अथवा बनारस की कजरी परम्‍परा का अपना अनूठा ढंग है, कजरी का अलग रंग है। यहां भी स्‍त्रियां झूले के साथ कजरी गीत गाती हैं तथा व्‍यापक स्‍तर पर कजरी के दंगल होते हैं। स्‍त्री पुरूष दोनों ही इसमें भाग लेते हैं। गाने वालियों को गौनिहारिन कहते हैं। कजली के दंगल में पेशेवर शायरों व गौनिहारिन के बीच बड़े मोहक सवाल-जवाब होते हैं। किसी जमाने में, कजली दंगल में शायर मारकण्‍डे श्‍यामलाल, भैरो, खुदाबख्‍श, पलटु रहमान तथा सुनीरिया गौनिहारिन का नाम विशेष उल्‍लेखनीय रहा है। इन दंगलों में दोनों पक्षों के बीच नोंक-झोंक भी चलता है।

आज आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमारी सभ्‍यता व संस्‍कृति पर भी इसका गहरा असर पड़ता है। इन गीतों पर फिल्‍मी धुनों व तर्जों का भी प्रभाव पड़ा है। टी0वी0 व सिनेमा के साथ-साथ कम्‍प्‍यूटर के बढ़ते प्रभाव ने इन दंगलों में जन समूह की संख्‍या भी सीमित कर दिया है। सम्‍पूर्ण पूर्वी उत्तर प्रदेश तो सावन में इन कजरी गीतों से गुंजायमान रहता ही है। भोजपुरी क्षेत्रों में भी कजरी गाने की विशेष प्रथा है। विशेष रूप से स्‍त्रियां सावन में झूला लगाती है और झूलते हुए कजरी गाती हैं। दोपहर अथवा रात्रि में अपने दैनिक कार्यों से खाली होकर युवतियां जब झूले के साथ टीप के स्‍वरों में कजरी की तान छेड़ती है तो खेत खलिहान, घर-बगीचा सब ओर इन गीतों का स्‍वर फैल जाता है और वातावरण को रागमय रसमय बना देता है। उत्‍साह-उमंग की हिलोरे इन गीतों में स्‍पष्‍टतः दिखती है। कजरी के कई अखाड़े होते हैं। ज्‍येष्‍ठ शुक्‍ल दशमी (गंगा दशहरा) को अखाड़ों में ढ़ोलक का पूजन करके कजरी शुरू होती हैं और अनन्‍त चतुर्दंशी को समाप्‍त होती है। कजरी गीतों को विशेष लोकप्रियता प्राप्‍त है और इस कारण अधिक गाये जाने के कारण इसमें विषय विविधता की अपार सम्‍भावना है। शायद ही जीवन का कोई ऐसा पक्ष होगा जिसका उल्‍लेख इन गीतों में नहीं हुआ है।

भोजपुरी लोकगीतों के अन्‍तर्गत कजरी गीतों का विषय वैविध्‍य देखते ही बनता है। जीवन के कितना निकट है। इसका भी प्रमाण हमें मिलता है। सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक स्‍थिति का चित्रण, प्रकृति-चित्रण, राष्‍ट्रप्रेम, पर्यावरणीय चेतना, मंहगाई, नशाखोरी, सामाजिक बुराइयों के साथ ही स्‍त्री की स्‍थिति-परिधि, संयोग वियोग का पक्ष, पीहर के प्रति प्रेम, परदेश गये पति की वेदना, हास परिहास, झूला लगाने से झूलने तक की बात, सखियों से ससुराल की चर्चा, गवना न कराये जाने का खेद भी प्रगट है। प्रेम का विशद्‌ चित्रण के साथ-साथ नकारा, अवारा पति के कार्य व्‍यवहार के प्रति स्‍त्रियों के प्रतिरोधी स्‍वर भी इन गीतों में दिखाई देता है। इन सभी बातों का वर्णन कजरी गीतों को हृदयस्‍पर्शी बना देता है।

सर्वप्रथम धार्मिक स्‍थिति पर गौर करें तो पाते हैं कि लोकजीवन में राम-सीता, राधा-कृष्‍ण, शिव-पार्वती, हनुमान-गणेश, दुर्गा मईया, शीतला मईया आदि की आराधना सर्वोपरि रही है। अतः यह धार्मिक अभिव्‍यक्‍ति कजरी गीतों में भी दिखाई देती है। वृन्‍दावन में राधा-कृष्‍ण के साथ गोप-गापिकाओं के झूला-झूलने व कजरी गाने का उल्‍लेख मिलता है। उदाहरण के लिए यह कजरी देखिए जिसमें कृष्‍ण के गाय चराने व बांसुरी बजाने का सुन्‍दर वर्णन है-

‘‘हरे रामा गउवा चरावे घनश्‍याम

बजावे बंसुड़िया रे हरी.........

सोने की थारी में जेवना परोसो

हरे रामा जेवे कुंज के बनवा

बजावे बंसुड़िया रे हरी...............''

इसी प्रकार एक गीत में गोपिकायें माता यशोदा से कृष्‍ण की शिकायत करती हैं और कहती हैं कि-

‘‘बरिजो बरिजो यसोदा मईया

आपन कृष्‍ण कन्‍हईया ना......

सोने की थारी में जेवना परोसो

जेवना ना जेवे ना कि,

बरिजो बरिजो यसोदा मईया

आपन कृष्‍न कन्‍हईया ना...............''

राधा-कृष्‍ण के झूला-झूलने का वर्णन तो प्रायः कई गीतों में मिलता है-

‘‘झूला परे कदम की डारी

झूले कृष्‍ण मुरारी ना...''

तथा-

‘‘हरि-हरि वृन्‍दावन में झूले

कृष्‍णमुरारी रे हरि..''

तथा-

‘‘हरे रामा हरी डाल पर बोले

कोईलिया कारी रे हरी....

सोने की थारी में जेवना परोसली हो रामा

हरे रामा जेवे कृष्‍ण मुरारी'

जेवावे राधा प्‍यारी रे हरी...''

इसी प्रकार राम-सीता के जीवन के विविध पक्षों का वर्णन कजरी गीतों में मिलता है। झूला झूलने का वर्णन तो है ही साथ ही राम जनम, विवाह, वन-गमन इत्‍यादि रोचक प्रसंगों का भी उल्‍लेख इनमें हैं। भगवान राम लोक जीवन में इतने व्‍याप्‍त है कि उनके जीवन के प्रत्‍येक पक्ष की अभिव्‍यक्‍ति इनमें भरी है-

एक गीत में सीताजी के झूला-झूलने का उल्‍लेख देखिए-

‘‘झूला झूले मोरी प्‍यारी बारी जनकदुलारी ना,

सुही सुकुमारी, रूप उजारी, राज दुलारी ना

कि झूला झूले मोरी प्‍यारी....... ''

एवं

‘‘सिया संग झुले बगिया में राम ललना‘'

एक गीत में सीता के फुलवारी में नहीं आने पर राम की व्‍याकुलता का उल्‍लेख है-

‘‘सीता भूल गई फुलवरिया

राम जी व्‍याकुल भईले ना.....''

एक गीत में कैकई के कोप भवन में जाने व राम को वनवास दिये जाने का भी उल्‍लेख है-

‘‘केकई पड़ी रे कूप भवन में

राम के बनवा देई द ना.....

सोने के थारी में जेवना परोसो

जेवना ना जेवे ना कि

केकई पड़ी रे कूप भवन में

राम के बनवा देई द ना.....''

और बनवास मिलने के बाद माता कौशिल्‍या के दुख का उल्‍लेख भी है। वो सोनार से रामजी के लिए सोने का खड़ाऊं बनाने को कहती है क्‍योंकि राम बन जाने वाले हैं-

‘‘सोनरा गढ़ि दे सोने के खड़ऊवा

राम मोरा बन में जईहें ना......

सोने के थारी में जेवना परोसो

जेवे राम लखन दुनो भईया

सीता चंवर डोलइंहे ना...........''

रामभक्‍त हनुमान जो लोगों के आराध्‍य है, की महिमा का बखान भी इन गीतों में है-

‘‘हरि हरि राम भगत हनुमान

जगत में न्‍यारा रे हरी...........

ओही हनुमान से सीता खोजि लाये रामा

हरि हरि ओही हनुमान लंका जारे रे हरी

हरि हरि राम भगत हनुमान.........''

और फिर बन से आने के बाद तक का वर्णन भी इन गीतों में हैं। राम-सीता के मोहक रूप का वर्णन इस गीत में देखिए-

‘‘सखि हो आये राम ललनवा

झूले जनक पलनवा ना.............

सिर पर सोभे मोर मुकुटवा

कान में कुंडल ना, कि

सखि हो सीता के मन भावेे

सुन्‍दर राम ललनवा ना.......

एक ओर राम दुसर ओर लक्षुमन

बीचवा में सीता ना कि सखी होई

लागे झांकी जइसे, सुरूज चनरमा ना.....

सखि हो..............''

भगवान शंकर का वर्णन भी कई गीतों में मिलता है, जैसे-

‘‘बंसिया बाज रही रे कदम तर

ठाढ़े सिव संकर भगवान.......

केहर से आवे सिव संकर जी

केहर से आवे भगवान..........

पश्‍चिम से आवे सिव संकर जी

पुरूब से आवे भगवान कि

बंसिया बाज रही रे कदम तर

ठाढ़े सिव संकर भगवान...........''

इस प्रकार लोक जीवन में सभी के आराध्‍य राम-सीता, शिव पार्वती राधा-कृष्‍ण इत्‍यादि का उल्‍लेख इन गीतों में मिलता है।

सामाजिक दृष्‍टिकोण से देखे तो परिवार के रिश्‍तों की खट्‌टी-मीठी नोकझोंक, पति-पत्‍नी का प्रेम, ननद-भौजाई व देवर का हास-परिहास, सब कुछ इन गीतों में देखने को मिलता है। प्रायः स्‍त्रियां सावन में अपने ‘नईहर‘ आती है, झूला झूलती हैं, सखियों के साथ कजरी गाती हैं। भाई भी अपनी बहन को लेने के लिए बहन के घर जाता है। परन्‍तु एक नवविवाहिता ‘नईहर‘ जाने के लिए तैयार नहीं है क्‍योंकि वह सावन में अपने पति के संग रहना चाहती है, इसी भाव की अभिव्‍यक्‍ति इस कजरी में है-

‘‘मोरे भईया अइले अनवईया हो,

सवनवा में ना जईबों ननदी।

सोने के थारी में जेवना परोसो

चाहे भईया जेवे चाहे जाये..........'

सवनवा में ना जईबो ननदी

सजना के संग हम झुलबो झुलनवा

हंसि-हंसि गईबो कजरिया

सवनवा मे ना जईबो ननदी.....''

सावन में जहाँ सभी स्‍त्रियां अपने नईहर जाती है ऐसे में भाई को वापस भेज देना, पति-पत्‍नी के प्रेम का उत्‍कृष्‍ट उदाहरण है।

जहां प्रेम है वहीं दुःख भी है। पति के बिना सावन का महीना पत्‍नी के लिए असह्‌य पीड़ा भी देता है। इस कजरी में पत्‍नी का दुःख कैसे चित्रित है, देखिये-

‘‘चढ़त सवनवा अईले मोरा ना सजनवा रामा

हरि हरि दारून दुःख देला दुनो जोबनवा रे हरि........

सोरहो सिंगार करिके पहिरो सब गहनवा रामा

हरि हरि चितवत चितवत धुमिल भईल नयनवा रे हरि...

साजी सुनी सेज तड़फत बीतल रयनवा रामा

हरि हरि बैरी नाही निकले मोर परनवा रे हरि''

तथा-

‘‘रिमझिम बरसेला सवनवा, सईया बिना

सूना अंगनवा ना.....

सूनी अटरिया, सूनी सेजरिया

सूना भवनवा ना कि

रिमिझिम बरसेला.............''

तथा-

‘‘हरि हरि सईया गईले परदेस

पड़ल दुःख भारी रे हरी.....

एह पार बाग कि ओह पार बगईचा रामा

हरे रामा बीचे कोईलिया तड़पे....

पड़ल दुःख भारी रे हरि.......''

वही पत्‍नी के मायके अर्थात नईहर जाने पर पति के दुःख का उल्‍लेख भी कजरी गीतों में मिलता है-

‘‘मोरी रनिया अकेला हमें छोड़ गयी

मोसे मुख मोड़ गयी ना.......

रहे हरदम उदास, लगे भूख ना पियास

मोरा नन्‍हा करेजा अब तोड़ गयी

मोसे मुख मोड़ गयी ना......‘'

वह न केवल दुःखी है बल्‍कि पत्‍नी के नईहर जाने पर उलाहना भी देता है। सावन के महीने में भला कौन पत्‍नी अपने पति को छोड़कर नईहर जायेगी ? वह विवशता की अभिव्‍यक्‍ति इस गीत में देखिए-

‘‘हरे रामा सावन में संवरिया नईहर

जाले रे हरी.......

जउ तुहु गोरिया हो जईबु नईहरवा हो रामा

हरे रामा केई मोरा जेवना बनईहे रे हरी......''

पत्‍नी भी पति से अपने नईहर आने को कहती हैं। अपने ‘नईहर‘ का बखान भला कौन स्‍त्री नहीं करेगी। इस गीत में पति को आने के जिस भाव से वह कहती है निश्‍चय ही उसमें गर्वोक्‍ति का भाव भी निहित है। देखिए-

‘‘राजा एक दिन अईत अपने ससुरार में...

सावन के बहार में ना.....

जेवना भाभी से बनवईती,

अपने हाथ से जेवइति,

झूला डाल देती नेबुला अनार में

सावन के बहार में ना......''

सावन में रिमझिम फुहार, काली घनघोर घटा, सर्वत्र हरियाली, सुहाना मौसम, पति-पत्‍नी के प्रेम को अभिसिंचित कर देता है। पत्‍नी चाहती है कि पति उसके पास रहे परन्‍तु नौकरी करने वाले पति का भला नसीब कहा! उसे तो बारिश में भी नौकरी की चिन्‍ता है। एक गीत में नौकरी के लिए जाते पति को रोकने का प्रयास पत्‍नी कुछ इस प्रकार से करती है-

‘‘रतिया बड़ा कड़ा जल बरसे

कईसे नोकरिया जईब ना......

एक हाथे लेबो रेशम के छतवा,

एक हांथे लाली रूमाल कि,

गोरी हो धीरे-धीरे चली जईबो

हमरो जुलुम नोकरिया ना.......''

तथा रूठी पत्‍नी को मनाने का प्रयास पति करता है-

‘‘रूनझुन खोल ना केवडिया

हम बिदेसवा जईबो ना......

जब मोरे सईया तुहु जईब बिदेसवा

तु एतना करि द ना,

मोरे भईया के बोला द

हम नईहरवा जईबो ना.....''

और फिर पति के जाने के बाद घनघोर बारिश होने पर वह चिंतित हो उठती है-

‘‘सखि हो काली घटा घेरि आई

पिया घर नाहीं आये ना......

बदरा बरसे, बिजुरी चमके

घन घहराये ना......''

तथा-

‘‘ऐसो सावन में सखी रे, मोरे पिया

चले परदेस

जबसे गये मोर सुधियो ना लिन्‍ही

मन में होत कलेस.....

ऐसो सावन में.........''

और फिर उसकी व्‍याकुलता बढ़ जाती है। वह पति के बिना सावन के सुख से वंचित है। उसकी भावाभिव्‍यक्‍ति इस रूप में इस कजरी में उभर कर आई है-

‘‘रिमझिम बरसेला हो सवनवा

जियरा तरसेला हमार......

सब सखियन मिली कजरी खेले

हम बईठे मन मार....

एहि सावन में पिया घर रहिते

करती खूब बहार

रिमझिम बरसेला हो सवनवा

जियरा तरसेला हमार.......''

कुछ गीतों में पत्‍नी द्वारा पति से अपने लिये कुछ विशेष उपहार लाने की भी चर्चा मिलती है। एक गीत में वह मेंहदी लाने को पति से कहती है-

‘‘हमके मेंहदी मंगा द मोतीझील से

जाके साईकिल से ना.....

जबसे मेंहदी ना मंगईब

तोहके जेवना ना जेबईबो

तोहसे बात करबो पंच में बइठाई के

बबरी नवाई के ना........''

तथा-

‘‘हमके सोने के मंगा द मटरमाला पिया

झुमका बिजली वाला पिया ना.......''

तथा-

‘'राजा मोरे जोग नथिया गढ़ा द

हरे सांवलिया........

मचिया बइठल मोरी अम्‍मा बढ़इतीन

तनी एक धनी समझा द,

हरे सांवलिया.........

हमरो कहनवा बबुआ, बहुआ ना मनिहें

बहु जोगे नथिया गढ़ा द, हरे सांवलिया....‘'

इस प्रकार कजरी गीतो में पति पत्‍नी के प्रेम, वियोग, नोकझोक का सुन्‍दर चित्रण मिलता है। परिवार के अनेक सदस्‍यों के बीच ये गीत एक सूत्र में पिरो कर रखते हैं।

ननद-भौजाई के रिश्‍ते में नोक-झोंक होना एक स्‍वाभाविक रीत है। परन्‍तु यही नोक-झोक, हास-परिहास के रूप में रिश्‍ते को मधुर व मजबूत बनाये रखता है।

अपने साथ कजरी खेलने, झूला झुलने जा रही ननद को भाभी किस तरह रोकती है, देखिए-

‘‘कईसे खेलन जइबो सावन में कजरिया

बदरिया घेरि आई ननदी,

तु तो जात हो अकेली

संग सखी ना सहेली

गुंडा छेक लीहे तोहरो डगरिया

बदरिया घेरि आई ननदी......''

फैशन के दौर में आधुनिकता के पीछे भागते हुए स्‍त्री-पुरूषों की मानसिकता का भी उल्‍लेख हुआ है। एक स्‍त्री के श्रृंगार का बड़ा रोचक उल्‍लेख इस कजरी गीत में है-

‘‘गोरी गहना पहिन के इतरात बा

बड़ा इठलात बा ना...........

बाल ककही से बनाये

सुरमा आंख में लगाये

मोरा देख-देख जिया पियरात बा......

चले अकड़ के कमरिया

मारे तिरछी नजरिया

बड़े नाज से कमर बलखात बा.......

लाली ओंठ प लगाये

माथे टीकुली सटाये

पान खाय के बहुत मुसकात बा

बड़ी ईठलात बा ना.........''

तथा-

‘‘गोरी गाना सुने रेडियो लगाय के

सखिन के बोलाय के ना......

देस-देस के खबर सुने घर में बइठकर

बड़ नाज से टेसनिया मिलाय के

सखिन के बोलाय के ना........''

वही आज स्‍त्रियों ने पुरूषों के प्रतिकूल व्‍यवहार के प्रतिरोध में भी आज अपनी आवाज मजबूत की है। अनेक गीतों में इस प्रकार के प्रतिरोध का स्‍वर सुनाई पड़ता है-

‘‘जांगरचोर बलमुवा जियरा के जवाल बा

पईसा बिना लचार बा ना........

अपने बाबा के कमाई, सारी दिहले लुटाई

अब त थरिया लोटा बेचे प तैयार बा

पईसा बिना लचार बा ना........''

तथा नसेड़ी पति के विरूद्ध उसकी भावाभिव्‍यक्‍ति इस प्रकार हुई है-

‘‘सखि हो मोरा करम जरि गईले

पियवा मिलल गजेड़ी ना......''

तथा-

‘‘सुन ननदी के भाई भांग हमसे ना पिसाई

हमरा दरद होला नरमी कलाई में

भांग के पिसाई में ना.........''

कजरी गीतों में देश प्रेम व राष्‍ट्र प्रेम से भरे भावों की भी अभिव्‍यक्‍ति हुई है। महात्‍मा गांधी की मृत्‍यु से जहां सम्‍पूर्ण देश मर्माहत था, कजरी शायरो ने भी कजरी के माध्‍यम से जन-जन तक बापू के बलिदान की कहानी को प्रसारित किया-

‘‘हरि हरि बाबु जी की हो गई

अमर कहनिया रे हरी........

नाथु दुसमनवा मरलस, बाबुजी के जनवा रामा

हरे रामा मार दिया गोली से

दरद न जाने रे हरी..........

हरे रामा गये जहां से करके

नाम निसानी रे हरी.......''

इस प्रकार प्रायः सभी भावों से भरी कजरी गीतों की एक लम्‍बी श्रृंखला है। शायद ही ऐसा कोई विषय बचा होगा, जिस पर कजरी न लिखि गई हो। वस्‍तुत कजरी गीतों का वर्ण्‍य विषय प्रेम है। इन गीतों में श्रृंगार रस की अजस्रधारा प्रवाहित है।

कजरी गीतों का महत्‍व लोकगीतों में ऋतुगीतो के अन्‍तर्गत अतिविशिष्‍ट है। कारे कजरारे मेघो का वर्णन, कुंओ पनघट पर पानी भरती गोरिया, बाग-बगीचा में झूला झूलती नवयौवनायें, साथ ही कमाने अथवा चाकरी को गये परदेस पति के दुःख व वियोग से पीड़ित प्रोषित पतिका स्‍त्री के आंसुओं से गीतों में वेदना की धारा भी प्रवाहित है। इसी भाव का ब्रज का ‘निबरिया‘ लोकगीत एक ऐसा गीत है जिसमें परदेस जाने को लेकर पति-पत्‍नी के बीच संवाद है। पावस ऋतु में विशेष रूप से यह गीत गाया जाता है जिसमें पत्‍नी का वियोग, पति के बिना जीवन की निरर्थकता का चित्रण परिलक्षित होता है।

वास्‍तव में कजरी में लोकजीवन की अभूतपूर्व झांकी मुखरित हो उठी है। प्रायः भारत के प्रत्‍येक क्षेत्र में ऋतुगीतों का प्रचलन है परन्‍तु कजरी जैसी मनभावन, सोहावन गीत शैली पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार की सर्वप्रमुख शैली है जिसे सावन के महीने में गाया जाता है। यद्यपि यह मुख्‍यतः स्‍त्रियों का गीत है परन्‍तु पुरूष भी कजरी गाते हैं, आनन्‍द उठाते हैं। शास्‍त्रीय संगीत की श्रेणी उपशास्‍त्रीय संगीत के अन्‍तर्गत कजरी को विशेष स्‍थान प्राप्‍त है तथा ऋतु विशेष के कार्यक्रमों के अन्‍तर्गत अधिकांश उच्‍च श्रेणी की गायिकाये कजरी गीतों का गायन करती है। इनमें सुश्री पद्‌मश्री गिरिजा देवी, शुभा मुद्‌गल, सविता देवी आदि का नाम प्रमुख है।

भोजपुरी प्रदेश में नागपंचमी को पचईया भी कहते हैं जो युवतियों के लिए भी विशेष त्‍यौहार रहता है, झूले पड़ जाते हैं। इस दिन अनेक स्‍थानों पर कजरी की प्रतियोगिता होती है। समाज में सौहार्द व प्रेम बनाये रखने में कजरी गायको का भी विशेष महत्‍व रहा है। उन्‍होंने समाज की हर बुराई की ओर लोगो का ध्‍यान आकर्षित किया व उनमें जागरूकता उत्‍पन्‍न की। अन्‍य विषयों के अतिरिक्‍त भजन, कजरी व निरगुनिया कजरी गाने का भी प्रचार है।

एक विशेष प्रकार की ककहरा कजरी का गायन भी प्रचार में है जिसमें ‘क‘ से ‘ज्ञ‘ तक प्रत्‍येक अक्षर पर पंक्‍तिया लिखि जाती है। उदाहरण के लिए ककहरा कजरी की कुछ पंक्‍तियां इस प्रकार है, जो गांधी जी की मृत्‍यु पर लिखी गई-

‘‘क से कृष्‍णचंद के छंईया,

दुखवा हमहन के हरवइया।

स्‍वतन्‍त्र भारत के करवईया,

सो दिखलाते आज नहीं

से खादी को अपनाये

से गांधी शान्‍ति पढ़ाये।

से घूमघूम देश जगाये

से चक्र सुदर्शन लाये।

रघुपति राघव के रखईया

सो दिखलाते आज नहीं।''2

स्‍पष्‍ट है कि कजरी गीत वैविध्‍यपूर्ण है। विषय वैविध्‍य, शिल्‍पगत वैशिष्‍ट्‌य के कारण यह गीत प्रकार अत्‍यन्‍त लोकप्रिय है तथा मुख्‍यतः स्‍त्री कंठों में विद्यमान इस ऋतुगीत शैली की एक सुदीर्घ परम्‍परा है। आज इसे सुरक्षित व संरक्षित करने की महती आवश्‍यकता है क्‍योंकि इनमें समाज का समूचा सांस्‍कृतिक, सामाजिक वातावरण जीता है।

संदर्भ ग्रंथ सूची-

1. समस्‍त गीत स्‍व0 सीतारानी, ग्राम-भरखर, पोस्‍ट-मोहनियां, जिला-भभुआ द्वारा संग्रहित है।

2. निबन्‍ध संगीत-श्री लक्ष्‍मी नारायण गर्ग, 2 सं0 100।

महामुक्ति

अनुलता राज नायर

image

भटक रही थी वो रूह, उस भव्य शामियाने के ऊपर,जहाँ सभी के चेहरे गमज़दा थे और सबने उजले कपडे पहन रखे थे. एक शानदार मंच सजा था जिस पर उसकी एक बड़ी सी तस्वीर, और तस्वीर पर ताज़े गुलाबों की माला थी और उसके आगे दीपक जल रहा था .

अनायास हंस पड़ी ललिता की रूह.... . जीते जी वो कभी एक फूल या गजरा न सजा पायी अपने बालों में. जाने कितने तीज-त्यौहार यूँ ही निकल गए,कोरे.... बिना साज सिंगार किये. शायद ये सब उसे मौत के बाद ही नसीब होना था.

आज ललिता की आत्मा की शांति के लिए पूजा-पाठ का आयोजन किया गया है,जिसमे उसके परिवार- जनों के अलावा साहित्य मण्डली के लोग भी शरीक हैं. सभी बारी बारी मंच पर आकर उसके गुणों का बखान कर रहे हैं और उसका असमय जाना साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व  क्षति बता रहे हैं.

हैरान है वो अपनी ही उपलब्धियां सुन कर. जिसने सारी उम्र  नर्म स्वर में कहा गया एक वाक्य न सुना हो उसके लिए तो ये अजूबा ही है. उसकी प्रशंसा में कसीदे पढ़े जाने वालों की होड़ सी लगी  है.... . जाने कहाँ थे ये लोग जब वो जिंदा थी. हमारे समाज की यही तो खासियत है,ढकोसलों से ऊपर आज तक नहीं उठ पाया. अपने दुखों का सार्वजनिक प्रदर्शन करना आदमी को आत्मसंतोष देता है. या शायद कभी-कभी किसी ग्लानि भाव से मुक्ति भी दिलाता है.

ललिता की रूह बेचैन हो गयी.... . तन तजने के बाद भी भारीपन अब तक नहीं गया था.... क्यूँ मुक्त नहीं हुई वो???? किसी-किसी को शायद मौत के बाद भी मुक्ति नहीं मिलती. जीते जी कुछ भी उसकी इच्छा के अनुरूप नहीं हुआ. . . अपना पूरा जीवन उसने दूसरों के इशारे पर जिया. अब मौत के बात तो उसे मुक्ति का अधिकार मिलना चाहिए था.

तभी मंच पर उसका पति मदन आया.... ललिता का जी मिचलाने लगा.... जिंदा होती तो शायद धड़कनें भी लगता ज़ोरों से. मदन ने भी ललिता को सरस्वती का अवतार बता डाला.... . उसके मुख से अपनी प्रसंशा सुन कर भी ललिता को घृणा हो आई. . . पति का दोगला व्यवहार उस सहृदया को नागवार गुज़रा, मगर जब जीवित होते हुए उसने कभी किसी बात का विरोध नहीं किया तो अब क्या करती. सिसक के रह गयी उसकी रूह....

ललिता जब ब्याह कर आई थी तो हर नवयौवना की तरह अपने आँचल में ढेरो ख्वाब टांक कर लायी थी.... . . दहेज के साथ अरमानों की पोटलियां भी थी.... . . और उसके पिता ने सौंप दिया उसको एक ऐसे पुरुष के हाथों जिसने उसका आँचल तार-तार कर दिया.... दहेज की पोटली तो सम्हाल ली गयी मगर अरमानों को कुचल कर फेंक दिया गया.

---------------------------------------------------------------------------------------

रु. 12,000 के 'रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन' में आप भी भाग ले सकते हैं.  अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012

अधिक जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

---------------------------------------------------------------------------------------

ललिता एक मध्यमवर्गीय सुसंस्कृत परवार की बेटी थी. वो दो बहने थीं, जिन्हें शिक्षक माता-पिता ने बड़े स्नेह से पाला था. उनकी हर उपलब्धि पर माँ उन्हें एक पुस्तक उपहार में दिया करतीं जो उनके लिए किसी स्वर्णाभूषण से कम न थीं. दोनों बहने सुन्दर सुघड़ और संस्कारी थीं.

और ससुराल में माहौल एकदम उलट.... . यहाँ अखबार में चटपटी खबर  पढ़ने के सिवा किसी को उसने पढते नहीं देखा,और तो और उसके पठन-पाठन पर भी उन्हें ऐतराज़ होता,ताना मारते हुए कहते -माँ शारदा,पहले काम तो निपटा लो. . . आहत मन से वो जुट जाती अपने काम में. घर में ससुर और पति के सिवा कोई था नहीं सो ज्यादा काम भी नहीं रहता था. अशिक्षित होने भर से क्या आदमी को पशुवत व्यवहार करने का अधिकार मिल जाता है ? ऐसे प्रश्न ललिता के मन में अकसर उठते रहते.... . मगर किससे मांगती उत्तर ??

आरम्भ में वो अपने अपमान को गटक नहीं पाती थी और मदन से जिरह करती. . . मगर मदन उसे "कुतर्क न कर" कह कर चुप करा देता.... .... जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला हिसाब था यहाँ. सो धीरे धीरे उसने शिकायत करना भी छोड़ दिया. . . और खुद में मगन रहने लगी. मोहन एक ऐसा पति था जो उसको न कभी हंसाता,न रिझाता न प्रेम जताता.... .... . बस इस्तेमाल करता.... ललिता हांड-मांस की बनी गुडिया सी हो गयी थी. . .... वक्त बेवक्त गुस्सा करना और उसके काम में मीन मेख निकालना बाप बेटा के स्वभाव में शामिल था.... . मगर जो भी तमाशा होता वो आमतौर पर घर की चारदीवारी के अंदर ही होता सो आस पड़ोस में उसकी इज्ज़त अभी बनी हुई थी. मध्यमवर्गीय लोग ही तो ख़याल करते हैं समाज का,पास-पड़ोस का.... वरना निम्न और उच्चवर्गीय लोगों में कहाँ कोई लिहाज या पर्दा रहता हैं.... . . ललिता लोगों से मेलजोल कम ही रखती थी,फिर भी जाने कैसे वो शांत और संतुष्ट दिखाई पड़ती थी. शायद भगवान ने उसको तरस खाकर ये वरदान दिया हो....

स्नेह का अभाव और वक्त-बेवत के ताने उसको तोड़ रहे थे भीतर ही भीतर ,अकेले में वो अपने तार तार हुए मन को सीती रहती. . और किसी तरह जीती रहती.... कभी कभी सोचती, कौन जाने,इनके ऐसे व्यवहार की वजह सी ही शायद उसकी सास असमय दुनिया छोड़ गयीं हों ?? काश वो जीवित होतीं तो एक स्त्री के होने से उसको कुछ सहारा मिलता शायद.... शायद उनका नारी मन उसकी पीड़ा को समझता. मगर जो चला गया उसको वापस तो लाया नहीं जा सकता.... जीवन के पन्ने कभी पीछे पलटे जा सकते हैं भला??

ऐसे ही माहौल में ललिता गर्भवती हुई. उसको लगा शायद अब दिन फिर जायेंगे,पितृत्व बदलाव अवश्य लाएगा मदन में. मगर उसके हाथों की लकीरें इतनी अच्छी न थीं.... .... लिंग जांच के बाद उसका गर्भ गिरवा दिया गया.... . . और ऐसा ३ सालों में २ बार हुआ. . . उनका कहना था कि उन्हें एक और ललिता नहीं जाहिए. . . कितना बोझा ढोयेंगे हम आखिर,उसके ससुर ने बुदबुदाया था उस रोज. ललिता का आहत मन चीख पड़ा था. . . मगर नक्कारखाने में तूती की तरह उसकी आवाज़ भी दीवारों से टकरा कर गुम हो गयी.... . . वो कहना चाहती थी मुझे भी नहीं चाहिए बेटा. . . नहीं चाहिए एक और मदन. मगर उसका चाहना न चाहना मायने कहाँ रखता था.... . आखिर उसने एक बेटे को जन्म दिया. सूखी छाती निचोड़ कर ललिता बेटे को बड़ा करने लगी, इस आस में कि उसके अँधेरे जीवन में दिया बन टिमटिमायेगा उसका बेटा. वो अपना पूरा वक्त बेटे को देती,उसे अच्छी कहानियाँ सुनाती, दुनियादारी की सीख देती, मगर वो अकसर उसके हाथ ही न आता. भाग कर अपने दादा या बाप के पास चला जाता और वे उसको ही खदेड़ देते कि बच्चे को क्या प्रवचन देती रहती हो. . . सन्यासी बनाना है क्या?

बबूल के बीज से कभी आम का पेड़ उगा है क्या???? नीम से निम्बोली ही झरेगी, हरसिंगार नहीं....

पूत के पाँव पालने में दिखने लगते हैं सो इस कपूत के लक्षण भी १०-१२ साल से ही दिखने लगे. माँ को वो अपने पाँव की जूती समझता. . . पढ़ना लिखना छोड़ बारहवीं के बाद से ही बाप दादा के धंधे में लग गया. अब तीन तीन मर्दों के बीच ललिता स्वयं को बेहद असहाय महसूस करती.... . अपना दोष खोजती रहती मगर सिवा उसके नसीब के उसमें कुछ खोट न था. बेटी का दुःख उसके माता-पिता की मृत्यु का कारण भी बना. अब इस दुनिया में एक बहन के सिवा उसका अपना कहने को कोई न था. वो अकसर उसको ढाढस बंधाती, और प्रेरित करती लिखते रहने को. . सबसे पहले ललिता ने एक छोटी सी कविता लिखी, जो उसके अपने मन के उद्गार थे.

आज मैं
तुमसे
अपना हक मांग रही हूँ. .
इतने वर्षों
समर्पित रही. . . बिना किसी अपेक्षा के. .
बिना किसी आशा के. .
कभी कुछ माँगा नहीं
और तुमने
बिना मांगे
दिया भी नहीं. . .
अब जाकर
ना जाने क्यूँ
मेरा स्त्री मन
विद्रोही हो चला है
बेटी/बहिन/बहु/पत्नी/माँ
इन सभी अधिकारों को
तुम्हें सौंप कर
एक स्त्री होने का हक
मांगती हूँ तुमसे. . .
कहो
क्या मंज़ूर है ये सौदा तुम्हें ???


कविता उसकी बहन को इतनी पसंद आई कि उसने एक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशन हेतु भेजने की बात की. ललिता सरल स्वभाव की थी सो उसने अपने पति से इजाज़त मांगी. मगर मदन तो सरल नहीं था न. . . वो भड़क गया और चेतावनी दे डाली कि खबरदार जो रचना भेजी. . . बहुत उड़ रही हो. . . तुम्हारे पर क़तर दूंगा . . जाने क्या क्या अनर्गल बक डाला उसने.
मगर इस दफा ललिता की बहन ने उसने लिए एक उपनाम चुना "गौरी" और रचना भेज दी. ललिता को उस रचना के लिए ढेरों बधाई पत्र और मानदेय भी मिला,जो उसकी बहन के पते पर आया. अब तो ललिता के मानों सचमुच पंख निकल आये. . वो अकसर अपना लिखा भिन्न-भिन्न पत्रिकाओं में भेजती और प्रशंसा,मानदेय के साथ अभूतपूर्व संतुष्टि पाती. . . बरसों से सोयी उसके भीतर की कला और आत्मविश्वास अब जाग गया था.

एक बहुत बड़े प्रकाशक ने उसको उपन्यास लिखने का सुझाव दिया. रचनात्मकता की कोई कमी तो थी नहीं और उत्साह भी उबाल पर था. कुछ ही दिनो में उसने उपन्यास पूरा कर डाला और पुस्तक प्रकाशित होकर बाजार में भी आ गयी. ललिता ने एक बार फिर प्रयास किया कि मदन को बता कर विमोचन में जा सके मगर उसने साफ़ मना कर दिया. खूब लताड़ा भी . . . साथ ही धमका भी दिया कि यहाँ अगर एक प्रति भी दिखी तो जला डालूँगा. ललिता कभी समझ नहीं पायी कि आखिर उसका गुनाह क्या था और उसकी इस प्रतिभा से मदन को क्या कष्ट था. शायद उसके अंदर की हीनभावना उससे ये सब करवा रही थी. ललिता सदा मौन का कवच पहने रहती. और उसका मौन मुखर होता सिर्फ उसकी डायरी के पन्नों पर....

ललिता का उपन्यास बहुत ज्यादा पसंद किया गया. प्रकाशक तो मानो बावला सा हो गया था. दूसरे उपन्यास के लिए उतावला हुआ जा रहा था. . . ललिता भी बहुत खुश थी मगर परिवार का असहयोग उसको खाए जा रहा था. मन बीमार हो तो तन भी कब तक साथ देता. . . ललिता अकसर बीमार रहने लगी. और जब भी वो अस्वस्थ महसूस करती या असमय लेट जाती तो पति या ससुर ताना मार देते कि सारी ऊर्जा पन्ने काले करने में क्यूँ गवां देती हो! पति चीखता,एक घर का काम ही तो करने के लायक थीं वो नहीं कर सकती तो तुम्हें पालें क्यूँ???? ललिता को एहसास हो चला था कि इनके लिए मेरा कोई मोल नहीं.

सो एक दिन उसने सम्बंधित संस्थानों से संपर्क करके अपने नेत्र दान किये और अपनी देह भी मेडिकल कॉलेज को दान कर दी. उसको बड़ा संतोष मिला, संभवतः ऐसा करने से उसके आहत स्वाभिमान को थोड़ा सुकून मिला होगा . शायद मौत भी उसके इसी कदम का इन्तेज़ार कर रही थी. एक सुबह उसने इस नर्क से विदाई ले ली.... . . . मुक्त हो ली वो पल-पल की घुटन से.

सुबह आठ बजे तक ललिता उठी नहीं तो पति ,ससुर, बेटा सभी चीखने लगे,मगर अब ललिता किसी की चीख पुकार सुनने वाली न थी.... वो बहुत दूर चली गयी थी इन निर्मोहियों से....

अखबारों के माध्यम से ललिता का बहुत नाम हो गया था,सो खबर शहर भर में आग की तरह फ़ैल गयी. लोगों का तांता लग गया मदन के घर. अंतिम संस्कार की तैयारियाँ होने लगी.

तभी ललिता के तकिये के नीचे से एक कागज का पुर्जा निकला . मदन ने पढ़ा तो उसे पता लगा कि उसकी स्वाभिमानी पत्नि ने अपने नेत्र के साथ देह भी दान कर दी है. मुखाग्नि का अधिकार भी छीन लिया था उसने. मदन ने दो पल को  सोचा फिर कागज फाड़ के फेंक दिया और शवयात्रा निकालने की तैयारी में जुट गया. मौत के बाद भी वो ललिता को मनमर्जी करने कैसे दे सकता था.

पूरे साजो श्रृंगार के साथ ललिता की शवयात्रा निकली,और उसकी सुन्दर सी मासूम काया पंचतत्व में विलीन हो गयी.... . जाने कितने ग़मगीन चेहरे उसकी चिता को घेरे थे. मौत के बाद ही सही उसको कुछ सम्मान तो मिला.
आज उसकी तेरहवीं है. . . और उसकी रूह देख रही है अपने परिजनों को,अपने लिए दुखी होते. ललिता की रूह परेशान सी यहाँ वहाँ भटकती रही.... . . पूरे कर्मकांड किये गए उसकी आत्मा की शान्ति के लिए. मदन और उसका बेटा हरिद्वार हो आये ,उसकी अस्थियाँ गंगा जी में विसर्जित करने. पूजापाठ,प्रार्थना सभा क्या नहीं हुआ. मगर ललिता की रूह को मुक्ति नहीं मिली.... भटकती फिर रही थी वो.... न जीते जी चैन था न मर कर चैन पाया उस बेचारी ने.

उसकी मौत को आज पूरा एक माह हो गया था. उसने देखा मदन सुबह सुबह उठ कर नहा धोकर कहीं निकल गया. ललिता की रूह उसका पीछा करने लगी. . .

मदन चलता चलता शहर के बाहर एक पुराने मंदिर की ड्योढ़ी पर बैठ गया. उसके हाथ में ललिता का लिखा हुआ उपन्यास था "महामुक्ति". वो अपलक उसे देखता रहा फिर पढ़ने लगा वह आखिरी पन्ना जहाँ ललिता ने चंद पंक्तियों में अपने उपन्यास का सार लिखा था. . मदन के बुदबुदाते स्वर को सुन सकती थी ललिता की रूह.... . फिर रूह तो मन की आवाज़ भी सुन लेती हैं.

हे प्रभु!
मुक्ति दो मुझे
जीवन की आपधापी से
बावला कर दो मुझे
बिसरा दूँ सबको. . .
सूझे ना कुछ मुझे. .
सिवा तेरे. .

डाल दो बेडियाँ
मेरे पांव में. .
कुछ अवरोध  लगे
इस  द्रुतगामी जीवन पर. .
और दे दो मुझे तुम पंख. . .
कि मैं उड़ कर
पहुँच सकूँ तुम तक. . .
शांत करो ये अनबुझ क्षुधा
ये लालसा,मोह माया. .
हे प्रभु!
मन चैतन्य कर दो. .
मुझे अपने होने का
बोध करा दो. .
मुझे मुक्त करा दो....

मदन की आँखों से आंसू झरने लगे. . . पुस्तक के भीतर मुँह छुपाकर वो रोने लगा....
हैरान थी ललिता की रूह.... . . मदन की आँख में आंसू !! वो भी ललिता के लिए ? मदन बहुत देर तक सिसकियाँ लेता रहा और फिर किताब को सीने से लगाये चला गया.... .

ललिता की रूह को एक अजीब सा हल्कापन महसूस हुआ. . . उसको लगा उसे कोई खींच रहा है ऊपर.... . .
गुरुत्वाकर्षण से परे वो चली जा रही थी ऊपर. . . बहुत ऊपर.... . . पा गयी थी वो "महामुक्ति" . . आज देह के साथ उसकी आत्मा भी मुक्त हो गयी थी.

ढेरों कर्म-कांड,हवन कुंड की आहुतियाँ और गंगा जी का पानी उसकी आत्मा को मुक्त न कर सके थे, मगर मदन की आँख से गिरी दो बूंदों ने ललिता की आत्मा को शांत कर दिया. . . उसकी भटकन को राह दे दी. उसका जीवन भले व्यर्थ चला गया हो किन्तु उसकी मौत सार्थक हुई.

-अनुलता

--

अनुलता राज नायर

http://allexpression.blogspot.in/

असम में बड़े पैमाने पर हुए दंगों की वजह साफ हो रही है। बांग्‍लादेशी घुसपैठियों ने सीमावर्ती जिलों में आबादी के घनत्‍व का स्‍वरुप तो बदला ही, उनकी बढ़ती आबादी अब मूल निवासी, बोडो आदिवासियों को अपने मूल निवास स्‍थलों से बेदखल करने पर भी आमादा हो गई है। लिहाजा दंगों की पृष्‍ठभूमि में बोडो के जमीनी हक छिन जाने और घुसपैठियों द्वारा बेजा कब्‍जा जमा लेना समस्‍या के मूल कारण हैं। इसलिए इस समस्‍या को सांप्रदायिक या जातीय हिंसा कहकर नजरअंदाज करने के बजाय, इससे सख्‍ती से निपटने की जरुरत है। अन्‍यथा बोडो आदिवासियों और अन्‍य गैर मुस्‍लिमों का इस सीमावर्ती क्षेत्र में वही हश्र होगा, जो कश्‍मीर में कश्‍मीरी पंडितों का हुआ है। वे अपने ही देश के मूल निवासी होने के बावजूद बतौर शरणार्थी शिविरों में अभिशापित जीवनयापन के लिए मजबूर कर दिए जाएंगें।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने असम दंगों को ‘कलंक' कहा है और बोडो व अल्‍पसंख्‍यक दोनों ही समुदाय के लोगों को दोषी माना है। लेकिन हकीकत में यह कलंक केंद्र और असम राज्‍य की उन सरकारों के माथे पर चस्‍पा है, जो घुसपैठ रोकने में तो नाकाम रही ही हैं, वोट की राजनीति के चलते घुसपैठियों को भी भारतीय नागरिक बनाने में अग्रणी रही हैं। लिहाजा असम में बोडो और मुस्‍लिम समुदाय के बीच करीब दो दशक से रह - रहकर विवाद और हिंसा सामने आते रहे है। बावजूद केंद्र और राज्‍य सरकारें इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को नहीं समझ रही हैं। क्‍या यह हैरानी में डालने वाली बात नहीं है कि सूचना और परिवहन क्रांति के दौर में भी दंगाग्रस्‍त इलाकों में पर्याप्‍त सेना के पहुंचने में पांच दिन से भी ज्‍यादा का समय लगा ? और केंद्र व राज्‍य सरकार एक-दूसरे पर गैर-जिम्‍मेदाराना आरोप लगाती रही। जबकि केंद्र में जहां कांग्रेस नेतृत्‍व वाली मनमोहन सरकार है, वहीं असम में कांग्रेस के बहुमत वाली तरुण गोगोई सरकार है। तरुण गोगोई केंद्र पर अपनी गलतियों व लापरवाहीं का ठींकरा इसलिए आसानी से फोड़ सके, क्‍योंकि उनकी जीत की पृष्‍ठभूमि में सोनिया और राहुल के तथाकथित चमत्‍कारी योगदान की कोई भागीदारी नहीं रही है।

बहरहाल, असम सरकार की विफलता और केंद्र की उदासीनता के चलते करीब 60 निर्दोषों की मौत हो गई और करीब तीन लाख लोग बेघर हो गए। इस भीषण त्रासदी के लिए जितने मनमोहन दोषी है, उतने ही तरुण गोगोई भी। मनमोहन सिंह पिछले 20 साल से असम से राज्‍यसभा के सांसद हैं। वह भी उस शपथ-पत्र के आधार पर जिसके जरिए वे असम के पूर्व मुख्‍यमंत्री की पत्‍नी के भवन में किराएदार हैं ? अब यह तो पूरा देश जानता है कि प्रधानमंत्री मूल निवासी कहां के हैं और उनका स्‍थायी निवास कहां है ? एक ईमानदार प्रधानमंत्री की क्‍या यही नैतिकता हैं ? खैर, सांसद के नाते उनकी जिम्‍मेबारी बनती थी कि वे खबर मिलते ही दंगों पर नियंत्रण के लिए जरुरी उपाय करते, जिससे इतनी बड़ी तादात में लोगों को उजाड़ना नहीं पड़ता ?

दूसरी तरफ गोगोई का दायित्‍व बनता था कि वे दंगों से निजात के लिए लड़त़े, किंतु वे केंद्र सरकार से लड़ रहे थे। उन्‍होंने साफ शब्‍दों में कहा कि मांगने के बावजूद न तो केंद्र ने उन्‍हें पुलिस बल की टुकडि़यां भेजीं और न ही सेना। उन्‍हें ऐसी कोई खुफिया सूचनाएं भी नहीं मिलीं, जिनमें दंगों की आशंका जताई गई हो ? जाहिर है राज्‍य और केंद्र की एजेंसियों में कोई तालमेल नहीं हैं ? यहां एक सवाल यह भी उठता है कि असम से बांग्‍लादेश की सीमा लगती है और अवैध घुसपैठ यहां रोजमर्रा की समस्‍या है। इसलिए इन नाजुक समस्‍याओं से निपटने के लिए सीमा सुरक्षा बल की टुकडि़या हमेशा मौजूद रहती हैं। केंद्र यदि उदासीनता नही बरतता और तत्‍परता से काम लेता तो वह बीएसएफ को दिशा-निर्देश देकर हिंसक वारदातों पर नियंत्रण के लिए तत्‍काल पहल कर सकता था ? किंतु ऐसा नहीं हुआ। क्‍योंकि हमारे प्रधानमंत्री की चेतना में सीमाई व आंतरिक समस्‍याओं की बजाय प्राथमिकता में अमेरिकी दबाव और बहुराष्‍टीय कंपनियों के हित रहते हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री अपने आठ साल के कार्यकाल में एक भी आंतरिक समस्‍या का हल नहीं खोज पाए। बल्‍कि नई जानकारियों के मुताबिक कश्‍मीर की वादियों में भी फिर से आतंकवादियों की नई नस्‍ल की फसल उभरने लगी है।

तय है असम दंगों पर तत्‍काल काबू पा लेने से समस्‍या का स्‍थायी हल निकलने वाला नहीं है। दंगों की शुरुआत कोकराझार जिले में घुसपैठी मुस्‍लिम समुदाय के दो छात्र नेताओं से बोडो आदिवासियों की झड़प से हुई और इन छात्रों द्वारा की गई गोलीबारी से बोडो लिबरेशन टाइगर्स संगठन के चार लोग मारे गए। इस हिंसा से जो प्रतिहिंसा उपजी उसने असम के चार जिलों को अपनी चपेट में ले लिया। जब इस भीषण भयावहता को समसचार चैनलों ने असम जल रहा है शीर्षक से प्रसारित किया तो गोगोई ने इस बड़ी ़त्रासदी पर पर्दा डालने की दृष्‍टि से कहा कि असम में 28 जिले हैं, किंतु दंगाग्रस्‍त केवल चार जिले हैं। लिहाजा देश का मीडिया उन्‍हें बदनाम करने की साजिश में लगा है।

यहां खास बात है कि हिंसा के मूल में हिंदू, ईसाई, बोडो आदिवासी और आजादी के पहले से रह रहे पुश्‍तैनी मुसलमान नहीं हैं, बल्‍कि विवाद स्‍थानीय आदिवासियों और घुसपैठी मुसलमानों के बीच है। दरअसल बोडोलैंड स्‍वायत्‍तता परिषद्‌ क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गैर-बोडो समुदायों ने बीते कुछ समय से बोडो समुदाय की अलग राज्‍य बनाने की दशकों पुरानी मांग का मुखर विरोध शुरु कर दिया है। इस पिरोध में गैर-बोडो सुरक्षा मंच और अखिल बोडोलैंड मुस्‍लिम छात्र संघ की भूमिका रही है। जाहिर है यह बात हिंदू, ईसाई और बोडो आदिवासियों के गले नहीं उतरी। इन मूल निवासियों की शिकायत यह भी है कि सीमा पार से आए घुसपैठी मुसलमान उनके जीवनयापन के संसाधनों को लगातार कब्‍जा रहे हैं और यह सिलसिला 1950 के दशक से जारी है। अब तो आबादी के घनत्‍व का स्‍वरुप इस हद तक बदल गया है कि इस क्षेत्र की कुल आबादी में मुस्‍लिमों का प्रतिशत 40 हो गया है। कुछ जिलों में वे बहुसंख्‍यक भी हो गए हैं। यही नहीं पाकिस्‍तानी गुप्‍तचर संस्‍था आईएसआई इन्‍हें प्रोत्‍साहित कर रही है और साउदी अरब से धन की आमद इन्‍हें कट्‌टरपंथ का पाठ पढ़ाकर आत्‍मघाती जिहादियों की नस्‍ल बनाने में लगी है। इन घुसपैठियों को बांग्‍लादेश हथियारों का जखीरा उपलब्‍ध करा रहा है। इनसे पूछा जाए कि इनके पास गैर लायसेंसी हथियार आए कहां से ?

बावजूद दुर्भाग्‍यपूर्ण स्‍थिति यह है कि असम विधानसभा में मुख्‍य विपक्षी दल एआईयूडीएफ के अध्‍यक्ष बदरुद्‌दीन अजमल ने प्रधानमंत्री से मांग की है कि बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद्‌ ;बीटीएडीद्ध को को भंग किया जाए। दूसरी तरफ वाशिंगटन स्‍थित ह्‌यूमन राइट्‌स वाच ने भारत सरकार को हिदायत दी है कि असम की जातीय हिंसा पर नियंत्रण के लिए संयुक्‍त राष्‍ट के सिद्धांतो के अनुसार सेना को घातक बल प्रयोग की अनुमति नहीं दी सकती। लिहाजा उपद्रवियों पर देखते ही गोली मारने के आदेश को वापिस लिया जाए। जबकि ह्‌यूमन राइट्‌स को जरुरत थी कि वह समस्‍या के स्‍थायी हल के लिए भारत को नसीहत देता कि जो घुसपैठिए भारत के नागरिक नहीं हैं, उनकी पहचान की जाए और शरणार्थियों के लिए निश्‍चित अंतरराष्‍टीय मानदण्‍डों और मूलभूत मानवाधिकारों का पालन करते हुए अन्‍हें उनके देश वापिस भेजा जाए। लेकिन कमजोर केंद्र सरकार और बाजारवादी नजरिये को प्राथमिकता देने वाले प्रधानमंत्री प्रवासी मुसलमानों को वापिसी की राह दिखाने का कठोर निर्णय ले पाएंगे ? उत्‍तर है नहीं। महज भड़की चिंगारी को राख में दबाने के प्रयत्‍न किए जाएंगे, जो कालांतर में फिर भड़क उठेगी।

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी मप्र

मो 09425488224

फोन 07492-232007, 233882

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है ।

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget