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कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन (प्रविष्टि क्र. 2) : दीपिका रानी की कहानी - एक खोया हुआ सपना

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  कहानी एक खोया हुआ सपना दीपिका रानी पिछले कुछ दिनों से कविता कुछ बदली-बदली सी नज़र आ रही थी। “मिस मुझे ये चाहिए” “मिस मुझे वो चाहिए” क...

 

कहानी

एक खोया हुआ सपना

दीपिका रानी

पिछले कुछ दिनों से कविता कुछ बदली-बदली सी नज़र आ रही थी। “मिस मुझे ये चाहिए” “मिस मुझे वो चाहिए” की रट लगाने वाली कविता अचानक से चुप सी हो गई थी। पहले तो मैं अक्सर उसे डांटती – “कविता, ऐसे किसी के सामने मुंह फाड़कर नहीं हंसते, किसी की ओर ऊंगली नहीं दिखाते, इस तरह पैर पटक-पटक कर नहीं चलते” और वह हां में सिर हिलाकर फिर ‍फिक्‍क से हंस देती। मुझे उस पर गुस्सा भी आता, लेकिन उसे सभ्य, शिष्ट और सुशिक्षित बनाने की धुन में मैं धैर्य रखना भी सीख गई थी। जब वह अपनी कॉपी में सिर घुसाए बड़े जतन से पेंसिल घुमा रही होती, तो मैं अक्सर उसे ध्यान से देखती। काले की ओर बढ़ती हुई सांवली रंगत में भी एक लुनाई थी जो उसे दूसरी आदिवासी लड़कियों से अधिक आकर्षक बनाती थी। और ऐसी सीधी नाक तो मैंने किसी दूसरी लड़की में देखी ही नहीं, यहां तक कि उसकी सगी तीन छोटी बहनों में भी नहीं। उसकी छोटी आंखों में बड़े-बड़े सपने तैरते और जब वह हाथ घुमा-घुमाकर बातें करती, तो उसकी आंखें धूप में पड़े शीशे की तरह चमकतीं। उसे एक ही शौक था, तरह-तरह से अपने बाल संवारने का। बाल भी थे उसके रेशमी, घने और कमर तक लहराते हुए। मेरी धोबिन के बताने पर मेरा ध्यान इस ओर गया कि उसका हेयर स्टाइल रोज़ बदलता रहता था। एक दिन वह दो चोटियों में आती, तो दूसरे दिन खुले बालों में बड़ा सा लाल जंगली फूल लगाकर। किसी दिन ऊंची पोनीटेल होती तो किसी दिन पतली-पतली चोटियों को गूंथकर बनी एक मोटी चोटी। मैं यह सोचकर मुस्कुरा पड़ती कि अगर कविता शहर की कोई पढ़ी-लिखी लड़की होती तो शायद वह एक कामयाब हेयर स्टाइलिस्ट बन सकती थी।

......

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जब मैं शादी के बाद इस इलाके में रहने आई, तो लगा जैसे किसी दूसरी दुनिया में आ गई हूं। दूर-दूर तक कोई घर नहीं था। अंधेरा गहराते ही कोठी से बाहर निकलने में डर लगता। लगता कि कहीं कोई अंधेरे में घात लगाकर न खड़ा हो। वैसे भी देश के इस हिस्से में अंधेरा कुछ जल्दी ही घिर आता है। सुमित समझाते कि यह इलाका काफी सुरक्षित है और यहां पर चोर-डाकुओं का कोई खतरा नहीं है। लेकिन बचपन से भरे-पूरे मोहल्ले में रहने के बाद अचानक से असम के इस सूनसान इलाके में आकर मैं रुंआसी हो गई थी। कोई पास-पड़ोस नहीं, छोटी-मोटी चीजों के लिए भी बाजार 15 किलोमीटर दूर था। और सुमित ने पहले ही सावधान कर दिया था कि जंगली हाथी अक्सर रात के वक्‍त बस्ती की ओर निकल आते हैं और रास्ते में पड़ने पर लोगों की जान भी ले लेते हैं।

सुमित यहां के चाय बागान में मैनेजर थे और यह लंबी-चौड़ी कोठी हमें सरकार की ओर से मिली थी। कुछ कदमों की दूरी पर चाय की फैक्टरी थी और दूसरी ओर मजदूरों के लिए खास तौर पर बनाई गई डिस्पेंसरी जहां उन्हें नि:शुल्क चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध थी। अहाते में झूलों के साथ एक खूबसूरत लॉन था। सुमित कुछ ही समय में मजदूरों से काफी घुल-मिल गए थे और मजदूर अपने इस युवा मैनेजर की बहुत इज्ज़त करते थे। शहर में शादी और फिर शिमला में हनीमून के बाद मायके में दो दिन रहने के बाद मैं अपनी शादी-शुदा गृहस्थी जमाने के लिए यहां आ गई थी। यहां आने के बाद मैं यहां के प्राकृतिक सौंदर्य और हरियाली से अभिभूत हो गई थी क्योंकि शहर में तो हरियाली बस गमलों तक सिमट कर रह गई थी। शुरू-शुरू में जैसे ही सुमित फैक्टरी से आते, हम दोनों शाम की चाय पीकर पैदल टहलने निकल जाते।

जरा सी दूरी पर एक नदी बहती थी जो बाकी के साल तो निरीह सी दिखती। उसकी पतली-पतली धाराएं पथरीली जमीन पर टकराते हुए रुक-रुक कर बहतीं। लेकिन बरसात का मौसम आते ही जैसे उसमें कोई नया जोश आ जाता। जैसे ही दूर के नीले पहाड़ काले नज़र आने लगते, कुछ घंटों में वह नदी इस तरह लबालब भर जाती कि किनारे तक जाते भी डर लगता। मुझे यह सब जादू सा लगता। थोड़ी देर पहले जिस पानी में टखने तक नहीं भीगते थे, कुछ ही देर में उसमें कंधों तक पानी आ जाता। मैं दूर खड़ी होकर मजदूरों को कमर भर पानी में तूफानी बहाव से जूझते हुए नदी पार करते देखती। सुमित ने बताया कि पहाड़ी नदियां पानी के लिए पूरी तरह बारिश पर निर्भर होती हैं और पहाड़ पर बारिश के कुछ महीनों में खतरनाक रूप ले लेती हैं।

नई जगह, नई शादी और अनगढ़ प्रकृति के आश्चर्यजनक रूप ने मुझे कुछ महीनों तक व्यस्त रखा। लेकिन, हर नया एक दिन पुराना होता है और फिर चकित करने की अपनी क्षमता खो देता है। फिर वह नए लोगों को चकित करता है और हम उसका हिस्सा बनकर और उसे अपना हिस्सा बनाकर उसकी ओर से उदासीन हो जाते हैं। इसलिए जब मेरी नई ज़िंदगी ने अपना नयापन खो दिया, तो मुझे शहर की चहल-पहल और चार भाई-बहनों के शोर से गूंजता मायके का अपना घर याद आने लगा। सुबह दस बजे सुमित निकल जाते और फिर दोपहर के खाने के लिए घर आते, उसके बाद निकलते तो शाम को ही आ पाते। फिर वह बड़ी सी कोठी मुझे खाने को दौड़ती। हर काम करने के लिए नौकर थे। मुझे अचानक लगने लगा था कि कोई काम न होने की वजह से या शायद तनाव में, मेरा वजन भी बढ़ने लगा था।

सुमित मेरी परेशानी समझ रहे थे। मुझे ऐसा लग रहा था मानो मेरी सारी पढ़ाई-लिखाई मिट्टी में मिल गई है।

.......

“कल्पना... मेरे दिमाग में एक बात आई है,” एक दिन रात के खाने के समय अचानक सुमित को कुछ सूझा।

मैंने सवालिया नजरें उठाईं।

“पड़ोस की बस्ती में बागान में काम करने वाले मजदूरों के बच्चों के लिए एक सरकारी प्राथमिक स्कूल है, जहां आस-पास के चाय बागानों के बच्चे पढ़ने जाते हैं। वह पूरी तरह सरकारी मदद पर चलता है और इन गरीब बच्चों को पढ़ाई के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें सुबह का नाश्‍ता और दोपहर का भोजन भी मुहैया कराया जाता है।”

“तो?” मैं समझी नहीं कि सुमित क्या कहना चाहते हैं।

“मुफ्त भोजन के चक्कर में यहां के बच्चे थोड़ा-बहुत पढ़ ले रहे हैं। लेकिन चौथी-पांचवीं करते-करते वे स्कूल छोड़ देते हैं और बागानों में अपने मां-बाप के साथ काम करना शुरू कर देते हैं। बहुत से लड़के शहरों में मजदूरी करने भाग जाते हैं। मैं यह कह रहा था कि क्यों न तुम स्कूल से निकले बच्चों को आगे पढ़ाना शुरू कर दो। इससे तुम्हारी पढ़ाई का सदुपयोग भी हो जाएगा और इन बच्चों का कुछ भला हो जाएगा।”

और इस तरह शुरू हुआ था मेरा अनौपचारिक होम स्कूल। बच्चों को मेरे पास भेजने के लिए मां-बाप को तैयार करना सबसे मुश्किल काम था क्योंकि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि बागान में दो पैसे कमाने की जगह दो अक्षर पढ़ने से उनके बच्चों की ज़िंदगी कैसे बदल जाएगी। खैर, पांच विद्यार्थियों से शुरू हुए मेरे स्कूल की महिमा कुछ ही महीनों में इतनी फैली कि बच्चों की गिनती पच्चीस पहुंच गई। मैं लॉन में कुर्सी पर बैठती और बच्चों के लिए सामने दरियां बिछा दी जातीं। खुशी की बात यह थी कि लोग अपनी बच्चियों को भी भेजने लगे थे।

एक दिन मैं इसी तरह बच्चों को गणित के सवाल समझाने में व्यस्त थी, कि मेरी बाई रामी एक तेरह-चौदह साल की लड़की के साथ आती दिखी। आम तौर पर वह सुबह काम करके जाती थी तो फिर शाम को ही आती थी। उसे दोपहर में आते देख मुझे कुछ अजीब सा लगा। वह मुझे व्यस्त देखकर बाहर बरामदे में ही बैठ गई। मैंने बच्चों को कुछ सवाल हल करने को दिए और उठ कर रामी के पास आई। उसने अपने साथ आई लड़की को टहोका मारकर कहा – “नमस्ते कर मालकिन को।” वह नमस्ते करने की बजाय मेरी ओर देखकर हंस पड़ी। रामी शर्मिंदा सी हो गई।

“रहने दो। यह बताओ, तुम इस समय इधर कैसे,” मैंने उस लड़की से ध्यान हटाकर रामी से पूछा।

“मालकिन.. ये कल्लो है, मेरी भतीजी। कल से मेरे बदले यही आपके घर काम करने आया करेगी। इसलिए मैंने सोचा इसे आपसे मिलवा दूं।”

“लेकिन तू क्यों काम छोड़ रही है?” मुझे समझ नहीं आया कि अचानक वह उस अल्हड़ लड़की को क्यों मेरे यहां काम पर लगवाना चाहती है।

रामी मेरी बात का जवाब न देकर आंखें नीची करके पैरों के नाखून से जमीन कुरेदने लगी। उसे चुप देखकर मुझे झल्लाहट होने लगी। “जल्दी बता, मुझे बच्चों के पास जाना है।”

“मालकिन.. वो क्या है कि.. मेरा पांचवां महीना चल रहा है। कल डॉक्टर के पास गई तो उसने आराम करने को कहा। इसलिए मैंने सोचा कि मेरे बदले कल्लो आपका काम कर दिया करेगी। वैसे भी इसे दिन भर मटरगश्ती करने की जगह कोई काम नहीं है,” रामी शरमाते-शरमाते बोली। अब मेरा ध्यान उसके पेट की तरफ गया। दुबली पतली रामी का बदन देखकर कोई उसे पांच महीने की गर्भवती नहीं बता सकता था। हां पिछले दिनों से मैं नोटिस कर रही थी कि उसका चेहरा थोड़ा भरा-भरा लगने लगा है। मुझे लगा था कि मैं अक्सर उसे जो बचे हुए फल-मेवे वगैरह दे देती हूं, उसकी वजह से उसकी सेहत सुधर गई है। लेकिन यह रौनक पहली बार मां बनने के गौरव की थी।

ख़ैर, अब जाकर मैंने रामी के साथ दुबक कर खड़ी उस लड़की पर ध्यान दिया। तेरह-चौदह साल की दुबली-पतली लेकिन अपनी उम्र के हिसाब से खूब लंबी। शायद उसके सांवले रंग की वजह से उसके मां-बाप ने उसका नाम कल्लो रख दिया था। चेहरे और चाल-ढाल में अब भी अल्हड़ता थी। उसे देखकर लगा कि वह क्या मेरा काम कर पाएगी। लेकिन रामी ने कहा कि वह दो तीन दिन उसके साथ आकर उसे सब काम सिखा देगी।

मुझे उम्मीद नहीं थी, पर कल्लो ने बड़े अच्छे से सारा काम संभाल लिया। बल्कि वह रामी से कहीं अधिक फुर्ती से और सफाई से काम करती। सुबह फटाफट सारा काम निपटाकर वह पढ़ रहे बच्चों से थोड़ी दूर आकर बैठ जाती। कई बार मैंने उसे दूसरों की किताबों में झांकते देखा तो एक दिन उसे बुलाकर पूछ ही बैठी – “पढ़ना चाहती हो?” अचानक उसका चेहरा खिल गया लेकिन दूसरे ही पल जैसे गहरे बादलों की छाया आ गई। मैंने बहुत पूछा तो बोली – “मां नहीं पढ़ने देगी।”

“मगर क्यों? अगर तू काम करने के साथ पढ़ाई भी कर लेगी तो तेरी मां को क्या ऐतराज होगा” मैंने पूछा।

“मां चाहती है कि मैं काम करने के बाद खाली समय में अपने छोटे भाई-बहनों को संभालूं। मेरा सबसे छोटा भाई अभी एक साल का है और मां चाय बागान में पत्तियां तोड़ने जाती है तो मैं उसका ख्याल रखती हूं।,” वह सिर झुकाए हुए बोली।

मैंने तय किया कि मैं उसकी मां से इस बारे में बात करूंगी।

.....

जिस दिन मैं बस्ती में पहुंची, मुझे देखकर जैसे अफरा-तफरी मच गई। कोई कुर्सी लाने भागा तो कोई सामने पसरे गेहूं को समेटने में। मुझे उनकी हड़बड़ाहट देखकर हंसी आ गई। मैंने उन्हें समझाया कि उन्हें घबराने की कोई जरूरत नहीं है। मैं बस कल्लो की मां से बात करना चाहती हूं। उस छोटी सी कच्ची झोंपड़ी में दो परिवार रहते थे। बीच में टाट लगाकर उसे दो हिस्सों में बांट दिया गया था। अलग-अलग उम्र की तीन-चार महिलाएं और कुछ महीने से लेकर बारह-तेरह वर्ष के दस बारह बच्चे दिख रहे थे। एक बच्चा दौड़कर अंदर गया तो तकरीबन पैंतीस साल की एक इकहरे बदन की महिला बाहर आई। मैं समझ गई कि यह कल्लो की मां है। कम उम्र में शादी और ढेर सारे बच्चे किसी स्त्री की उम्र दस साल कैसे बढ़ा देते हैं, उसे देखकर मुझे पता चला।

उसने मुझे नमस्ते की तो मैंने उसका नाम पूछा। वह सकुचा सी गई। शायद यहां औरतों से नाम पूछने का रिवाज़ नहीं है। लोग बच्चों के नाम पर ही किसी महिला को बुलाते हैं जैसे कि यह कल्लो की मां थी। उसने थोड़ा लजाते हुए अपना नाम बताया – दीसा। मैंने अनुमान लगाया कि यह दिशा का अपभ्रंश होगा। मैंने जब उसे बताया कि मैं चाहती हूं कि कल्लो और उसके बाकी बच्चे भी पढ़ाई करें, तो वह अनमनी सी हो गई। वह मेरे सामने कुछ बोल नहीं पा रही थी लेकिन उसके चेहरे से साफ लग रहा था कि वह अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए ज्यादा उत्सुक नहीं है। लेकिन मैं भी ठान कर आई थी। मैंने उससे कहा कि कल्लो दिन भर काम करने के बाद शाम को एक-आध घंटे के लिए मेरे घर आकर पढ़ सकती है। चाहे तो रात को मेरे घर पर ही रुक भी सकती है। किताबें-कॉपियां उसे मैं दूंगी और अगर वह पढ़ाई में दिलचस्पी दिखाए तो मैं एक-आध महीने में उसकी तनख्वाह भी बढ़ा दूंगी। मैंने ध्यान दिया कि तनख्वाह के नाम पर कल्लो की मां के चेहरे पर एक चमक आ गई थी। उसने तुरंत अपनी गोद में चढ़े साल भर के बच्चे को दुलार दिया।

तो पहली जीत मैं हासिल कर चुकी थी। शाम को चहकते हुए जब कल्लो मेरे घर आई तो सबसे पहले मैंने उसका नया नामकरण किया – कविता। वह भी अपने नए नाम से खुश नज़र आई। मैंने उसे एक नोटबुक और पेंसिल पकड़ाई तो वह झिझकते हुए बोली – “मैं आपको “मिस” बोलूं?” दरअसल जो बच्चे मुझसे पढ़ने आते थे, वे मुझे मिस कहते थे। मैंने मुस्कुराकर हां में सिर हिला दिया। फिर तो वह शुरू ही हो गई। “आप मुझे अंग्रेजी भी पढ़ाएंगी ना? हिन्दी में तो मुझे क ख ग आता है और गिनती भी पूरी आती है। मैं एक साल तक गांव के स्कूल में गई थी। फिर मां ने मना कर दिया जाने से।”

“मैं तुझे सब कुछ पढ़ाऊंगी। बस तुझे मन लगाकर पढ़ना होगा,” मैं खुश थी कि कम से कम पढ़ाई में उसकी दिलचस्पी तो है।

मैंने कविता को सुबह काम खत्म होने के बाद बाकी बच्चों के साथ भी बिठाना शुरू कर दिया। फिर वह शाम को एक घंटे के करीब पढ़ती थी। अच्छी बात यह थी कि वह बहुत तेज़ दिमाग निकली। एक बार पढ़ाया पाठ मुझे शायद ही दुहराना पड़ता था। उसने इतनी तेजी से सीखना शुरू किया कि बाकी के बच्चों से आगे निकल गई। बस एक चीज उसकी मुझे पसंद नहीं थी। पढ़ाई के वक्त भी वह थोड़ी-थोड़ी देर पर कुछ न कुछ बोलती रहती। मैं उसे डपटती कि तू एकाग्र होकर पढ़ाई किया कर लेकिन गणित के सवाल हल करते समय उसे अचानक याद आ जाता कि कल कैसे छोटे भाई को चारपाई से गिरा देने पर उसकी बहन को मां ने छड़ी से पीटा था, तो कभी अ से अनार पढ़ते हुए वह बताने लगती कि सात-आठ साल पहले जब वह अपने मामा के घर गई थी, तब पहली और आखिरी बार उसने अनार खाया था और वह स्वाद उसे अब भी याद है। कभी तो रंगों की पहचान और उनके नाम पढ़ते हुए अचानक कहती – “मिस, आप मुझे लाल रंग के रबड़ बैंड ला देंगी? मुझे लाल रंग बहुत अच्छा लगता है।”

कभी उसकी बातों पर हंसी आती, तो कभी उसकी मासूमियत पर स्‍नेह। सिर्फ वही थी, जो पढ़ाई के बीच में भी बिना डरे मुझे टोक सकती थी। कुछ ही महीनों में वह मुझसे ऐसे घुल-मिल गई, जैसे परिवार की ही सदस्य हो। सुमित भी अब मुझे व्यस्त और खुश देखकर चिंतामुक्त हो गए थे।

इस बीच रामी एक बेटे की मां बन गई थी। उसका पति सुमित को मिठाई दे गया। सुमित ने एक मजदूर के हाथों उसके घर कुछ उपहार भिजवा दिए। कविता का काम और पढ़ाई, दोनों ठीक-ठाक चल रहे थे और उसने हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी में भी छोटे-छोटे वाक्य बनाने शुरू कर दिए थे कि अचानक वह अनमनी सी दिखने लगी। कुछ समझाओ तो भूल जाती और कभी-कभार जब मैं उसे कुछ लिखने के लिए देती तो वह कॉपी पर पेंसिल से यूं ही गोल-गोल घेरे बनाती रहती। मैं देख रही थी कि उसका ध्यान अब कहीं और रहता है, वह खोई-खोई सी रहती। पहले तो मुझे लगा कि उसके घर में कोई समस्या है या उसकी मां फिर उसे उस पर पढ़ाई छोड़ने का दबाव बना रही है। वह सीखी हुई चीजें भूलने लगी थी और कई दिन गायब भी रहती। जिस दिन वह नहीं आती, उसकी छोटी बहन काम करने के लिए आ जाती, जो इतनी छोटी थी कि मुझे उससे काम कराने में बुरा लगता और मैं उसे वापस भेज देती।

आखिर एक दिन जब वह नहीं आई तो मुझसे रहा नहीं गया तो मैं उसके घर पहुंच गई। उसकी मां अपने बेटे को खाना खिला रही थी और पास में उसकी तीन छोटी लड़कियां मिट्टी पर लकीरें खींच कर कित-कित खेल रही थीं। बस कविता कहीं नज़र नहीं आ रही थी।

“कविता नहीं दिख रही, आज आई नहीं तो मैंने सोचा पूछ लूं कि कहीं तबियत तो खराब नहीं,” आखिर मैंने पूछ ही लिया।

मैंने देखा कि उसकी मां शर्मिंदा सी हो गई। “जी.. आजकल पता नहीं लड़की का दिमाग कहां रहता है। उसकी एक सहेली है यहीं पास की बस्ती में... सुनीता नाम है। उसका भाई दिल्‍ली में कोई काम करता है। तो सुनीता भी दिल्ली गई हुई थी। पिछले दिनों वहां से आई ... तब से दोनों का बहनापा ही नहीं छूट रहा। वो इसे शहर के किस्से सुनाती रहती है और पता नहीं क्या क्या.. किलिप, रिबन वगैरह ले कर आई है वहां से। यही सब देखने में मगन रहती है कल्लो। मैंने कितना डांटा कि मालकिन क्या कहेंगी.. तू पढ़ाई के लिए नहीं जाकर जब देखो सुनीता के पास भाग जाती है।”

“आए तो मेरे पास भेजना,” मैं बोलकर चली आई। करती भी क्या। जबरदस्ती तो मैं किसी के पीछे नहीं पड़ सकती थी, पढ़ाई के लिए भी नहीं।

लेकिन अब तो कविता ने आना ही छोड़ दिया। मुझे लगा था कि कम से कम वो अपनी कॉपी-किताबें तो लेने आएगी। लेकिन शायद वह डर गई थी कि मैं उसे डांटूंगी।

.....

घर पर रामी ने फिर से मेरा काम संभाल लिया था। वह अपने छह महीने के बच्चे को भी साथ ले आती। एक दिन वह पोंछा लगाकर सुस्ताने बैठी, तो आदत न होने पर भी मैंने उससे पूछ ही लिया “कविता अब पढ़ना नहीं चाहती?”

“अरे, किसकी बात कर रही हो मालकिन। वह लड़की तो हमारे हाथ से गई... मैंने अपनी भाभी को कितना समझाया कि अब भी लड़की को कूट-पीट कर रास्ते पर ले आओ... लेकिन वो भी क्या करे। मेरा भाई तो पी-पाकर पड़ा रहता है। न उसे बीवी से मतलब है, न बच्चों से। और ये बेचारी पांच-पांच बच्चों में किसे देखे और किसे न देखे।”

“लेकिन अचानक कविता को हुआ क्या? उसका तो खूब मन लगता था पढ़ाई में।”

“अरे मालकिन हम आपको क्या बताएं... बताते हुए भी सरम आ रही है। पूरी बस्ती में बात फैल रही है कि कविता का उस छोरे जगन से चक्कर चल रहा है... इसीलिए अक्सर गायब रहती है महारानी” रामी फुसफुसाती आवाज में बोली।

“लेकिन ये जगन है कौन.. और कविता तो अभी बच्ची है, वो क्या चक्कर चलाएगी..” मुझे हैरत हुई थी सुनकर।

“ये जगन वही मुई सुनीता का भाई है मालकिन जो दिल्ली में रहता है। वह कविता को बहका रहा है कि दिल्ली जाने पर उसे किसी बड़ी कोठी में ऐश की नौकरी मिल सकती है। 4-5 हजार तनख्वाह पर। बस फिर क्यों करनी है मरी को पढ़ाई-लिखाई। अब तो भाभी को भी रुपये दिखने लगे हैं..... कल ही मेरे से कह रही थी कि सहर में अगर खाना-कपड़ा के साथ इतने रुपये भी देंगे तो यहां बाकी बच्चे आराम से पल जाएंगे। लेकिन मालकिन सच कहूं तो मुझे तो उस लड़के की नीयत पर भरोसा नहीं... बाकी कल्लो के मां बाप उसे घर मे रखें या कुएं में धकेलें... मेरी बला से,” एक सांस में सब कह रामी हांफने लगी थी। पास में चटाई पर सोया उसका बच्चा भी चिहुंक कर जाग गया। उसने जल्दी से उसे गोदी में उठा लिया और दूध पिलाने लगी।

मैं सोच में पड़ गई। कहां तो मैं कविता को ऐसा बनाना चाहती थी कि बाकी आदिवासी लड़कियां उससे प्रेरणा लेतीं और पढ़ाई-लिखाई का महत्व समझतीं लेकिन वह तो पता नहीं किन रंगीन सपनों में खो गई थी।

अगले दिन कमरे को व्यवस्थित करते हुए मेरी नज़र मेज पर रखी कविता की कॉपी-किताबों पर पड़ी। मैं उसकी कॉपी पलटने लगी तो उसमें से एक कार्ड सा गिरा। मैंने उठाया तो देखा कि वह कॉपी के दो पन्ने फाड़कर और उसे गत्ते पर चिपकाकर हाथ से बनाया हुआ कार्ड था, उस पर टेढ़े-मेढ़े दो फूल बने थे.. पत्तियों के साथ और नीचे जो लिखा था, वो देखकर मेरी आंखें फैल गईं। तो इसलिए अंग्रेजी सिखाई थी मैंने उसे.. उस पर लिखा था .. आई लव यू जगन। हां उसमें आई को छोड़कर किसी भी शब्द की स्पेलिंग सही नहीं थी। लेकिन मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि यह उस छोटी सी लड़की ने लिखे थे, जो पिछले दस महीनों से पूरी मेहनत से पढ़ना-लिखना और बाकी सलीके सीख रही थी। क्या उसे लव का मतलब भी पता है?

सही कह रही थी रामी। वह लड़का बहुत धूर्त होगा। उसने ही कविता को बहकाया होगा वरना यह तो सीधी-सादी लड़की थी जो तरह-तरह से अपने बालों की सज्जा करके ही खुश हो जाती थी। यह प्यार-व्यार का कीड़ा कहां से उसके दिमाग में घुस गया। अब मुझे ध्यान आया कि पिछले दिनों वह टीवी देखने में खूब दिलचस्पी लेती और कई बार दोपहर को आकर भी टीवी देखने की ज़िद करती। मुझे क्या ऐतराज होता भला... लेकिन मैं उसे कहती कि कुछ अच्छे कार्यक्रम देखा कर। लेकिन उसे अच्छे लगते टीन एजर्स की प्रेम कहानियों पर बने अटपटे से डेली सोप। अक्सर इन धारावाहिकों में कॉलेज के बच्चों की कहानी होती है जिनमें सिर्फ कैंटीन और पार्क में रोमांस दिखाते हैं... मुझे समझ नहीं आता कि इन धारावाहिकों के बच्चे कभी क्लासरूम में क्यों नहीं दिखते। अगर गलती से दिखते भी हैं तो एक-दूसरे की ओर इशारेबाजी करते हुए या पुरजों का आदान-प्रदान करते हुए। लेकिन कविता इन्हें देखते हुए इस तरह खो जाती कि कई बार तो मैं आवाज दे देकर थक जाती।

मुझे उस पर गुस्से की बजाय उसकी चिंता हो रही थी। पता नहीं वो लड़का क्या है, कैसा है और कैसी पट्टियां पढ़ा रहा है बच्ची को। लेकिन मैं क्या कर सकती थी। उनके घरेलू मामलों में बोलना ठीक नहीं लग रहा था मुझे। मैं हमेशा की तरह बाकी बच्चों को पढ़ाने में मस्त हो गई। कुछ दिनों बाद रामी ने बताया कि कविता जगन और सुनीता के साथ दिल्ली चली गई। जगन ने उसे एक नौकरीपेशा पति-पत्‍नी के घर पर आया का काम दिला दिया है, जिनके आठ माह के बच्चे को संभालना उसका काम होगा और इसके लिए उसे पांच हजार तनख्वाह मिलेगी। मैंने अब कविता के बारे में सोचना छोड़ दिया था लेकिन गाहे-बगाहे वह अपनी कॉपी के पन्नों से बाहर निकल कर आ जाती.. कभी ठहाके मारकर हंसते हुए, तो कभी तल्लीनता से सबक याद करते हुए.. तो कभी तस्वीरों की किताब में रंग भरते हुए। वह चाह कर भी मेरे दिमाग से नहीं निकल पा रही थी।

आखिर हुआ वही जिसका अंदेशा मुझे रह-रह कर डरा रहा था। करीब छह महीने बाद एक दिन रामी को बहुत परेशान देखकर मैंने वजह पूछी, तो वह माथे पर हाथ रख कर बैठ गई।

“क्या बताऊं मालकिन। जगन के साथ इतनी बदनामी होने के बाद भी मेरे भाई-भाभी ने पैसे के लालच में कल्लो को उसके साथ अनजान शहर भेज दिया। उसने कहा था कि कल्लो हर सप्ताह यहां फोन किया करेगी। अपने पड़ोसी रामऔतार ने घर में टेलीफोन लगाया है ना... उसका नंबर ले कर गई थी। पहुंचने के अगले दिन कल्लो ने फोन किया था कि वह ठीक से पहुंच गई है..”

“फिर क्या हुआ... उसे काम मिल गया था?” मैं कविता की ख़ैरियत जानने के लिए बेचैन थी।

“पता नहीं मालकिन। उसके बाद न तो कल्लो का कोई फोन आया और न ही जगन का। जगन अपना जो नंबर देकर गया था, वह तब से बंद पड़ा है। पता चला है कि पड़ोस की बस्ती की भी आठ-दस लड़कियों को जगन काम दिलाने के लालच में ले गया था। कल ही वहां की एक लड़की किसी तरह दिल्‍ली से भाग कर आई है। उसका मामा हमारी बस्ती में रहता है। लड़की की मामी ने बताया कि जगन ने दिल्ली जाते ही उस लड़की को किसी के हाथों बेच दिया था और वह आदमी उसे जान से मारने की धमकी देकर हरियाणा ले जा रहा था। बस अड्डे से वह उस आदमी की आंख बचाकर भाग निकली और किसी ने तरस खाकर उसका यहां का रेल टिकट कटवा दिया। बेचारी इतने सदमे में है कि जिस दिन से आई है, घर से बाहर तक नहीं निकल रही।”

“जगन के खिलाफ तो रिपोर्ट लिखवानी चाहिए। न जाने कितनी मासूम लड़कियों को बरबाद कर रहा होगा वो,” गुस्से और नफरत से मेरे जबड़े तन गए।

“अब रिपोर्ट क्या लिखवानी मालकिन... उस लड़की ने बताया कि जिसके हाथों जगन उसे बेच गया था, वह फोन पर किसी से बात कर रहा था कि जगन पिछले हफ्ते ही पुलिस की छापेमारी में एक नाबालिग लड़की को कोठे पर बेचते हुए पकड़ा गया और पुलिस अब उससे बाकी की चीजें उगलवा रही है। लेकिन मालकिन हमारी कल्लो का कोई पता नहीं चला। मैंने अपने भाई को कहा है कि वह दिल्ली जाकर पुलिस से मिले। लेकिन लोग कह रहे हैं कि वहां के पुलिस वालों को सब पता रहता है। उन्हें भी इन पैसों में हिस्सा मिलता है और वो किसी को तभी पकड़ते हैं जब वह पैसा देने में आनाकानी करता है।”

रामी तो चली गई। रोज कुआं खोदकर पानी पीने वाले ये लोग शायद कुछ दिनों बाद अपनी लड़की का ग़म भी भूल जाएंगे क्योंकि उनके पास किसी के लिए रोने का भी समय नहीं। लेकिन मेरे सामने कविता की कॉपी का वह पन्‍ना ही फड़फड़ाता रहा –आई लव यू जगन। उसकी उम्मीद भरी आंखों में जगमगाते सपने ने जब दम तोड़ा होगा, तो उसकी किरचें उसकी आत्मा तक में चुभ गई होंगी। आज भी हर सुबह मैं रामी के साथ एक उम्मीद का इंतजार करती हूं.... शायद कोई नई सुबह हो और कविता स्लेट की पुरानी इबारत मिटाकर उस पर एक नई ज़िन्दगी की इबारत लिखे... काश.. काश..

-समाप्त-

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रचनाकार: कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन (प्रविष्टि क्र. 2) : दीपिका रानी की कहानी - एक खोया हुआ सपना
कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन (प्रविष्टि क्र. 2) : दीपिका रानी की कहानी - एक खोया हुआ सपना
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