गुरुवार, 26 जुलाई 2012

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 8 : सुमित सक्सेना की कहानी : बारिश

बारिश


सुमित सक्सेना

---------------------------------------------------------------------------------------

रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन में आप भी भाग ले सकते हैं. अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012

अधिक जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

---------------------------------------------------------------------------------------

आज बस स्टॉप पर भीड़ काफी कम थी. बारिश का पानी सड़क से उठ कर बस स्टॉप के चबूतरे तक आ गया था. मनोहर बाबू चुपचाप बैठे झमाझम बारिश देख रहे थे. थोड़ा सा पानी चबूतरे को पार कर उनके पैरो तक आने लगा था. अचानक मन हुआ और चप्पल उतर का नंगे पाँव पानी में डाल दिए. मन ही मन सोचा ६० की उम्र में ये क्या बचपना कर रहे हैं, फिर मुंबई की शाम याद गयी जब आंचल के साथ "आनंद' देखी थी, और जब सिनेमा देख कर उसका रोना बंद न हुआ था तो उसे जुहू पर ले गए थे और दोनों घंटों बिना कुछ बोले समुद्र में पैर डाले बैठे रहे थे. सागर के पास बैठ कर मन कितना शांत हो जाता था, जैसे मन के सागर की लहरें विशाल सागर की लहरों को देख आत्ममुग्ध हो जाती हैं, लहरें फिर शांति फिर लहरें, बिलकुल जिंदगी की तरह, बाहर से कितनी आस्थिर मगर अन्दर से कितनी गहरी.


image

दूर से बारिश में धुंधली से छवि दिखी, बस आ रही थी. बस रुकी और पानी, छोटे बच्चे की तरह डर कर मनोहर बाबू के पैरो से चिपक गया. घुटने तक गीले हो गए. दौड़ के बस में घुसे फिर भी स्टैंड की छत से गिरती पानी की लहर ने आधा कन्धा गीला कर दिया. बस आज काफी खली थी. मनोहर बाबू खिड़की पर बैठ कर बाहर देखने लगे. शीशे से आती बूंदे कानो को गीला कर रही थी मानो कुछ कहना चाह रही हो. ऐसी ही बारिश थी जब आंचल को पहली बार देखा था. बस में बहुत भीड़ थी. उस ज़माने की बसों की खिडकियों से बहुत पानी अन्दर आता था, आधे लोग बस में खड़े थे मगर खिड़की वाली सारी सीट खाली पड़ी थी, सिवाय दो सीटों के. एक पर आंचल बैठी थी और दूसरे पर पर मनोहर बाबू. बचपन से ही खिड़की पर बैठ कर अन्दर आती बूंदों में भीगना उन्हें बहुत पसंद था, चाहे घर की खिड़कियां हो या बस की, ऐसा लगता था मानो बाहर की बारिश की कुछ बूंदे अन्दर आ रही हो और मन के अन्दर की बूंदे खिड़कियों से बाहर निकल कर हिसाब बराबर कर रही हो. इन बूंदों और इंसान की जिंदगी कितनी मिलती जुलती है. बूँद दरिया से निकल कर बादलों में जाती है, बहुत लम्बा सफ़र तय कर बादलों को अलविदा कहती है और जमीन की ओर गिरती है और अंत में जमीन में मिल कर वापस दरिया बन जाती है.

इंसान किस दरिया से आया है ये किसी को नहीं पता, मगर बिलकुल एक बूँद की तरह धूप, हवा, मिलना, बिछुड़ना उसकी जिंदगी में लगा रहता है, बस दरिया का पता नहीं होता. उस दिन पहली बार अपनी तरह किसी और को बारिश की बूंदों में भीग कर खुश होते देखा था, अचानक दोनों की आखें मिली थी और फिर अचानक ही दोनों अपने बचपने पर हंसने लगे थे. मुलाकातों का सफ़र बस स्टॉप से शुरू हुआ और सिलसिला चलता चला गया. मनोहर बाबू को आज भी वो दिन याद आ रहा था जब उनकी नौकरी लगी थी और उन्होंने आंचल से वादा किया था की अब ज्यादा दिन उसे नारी निकेतन में नहीं रहना पड़ेगा. कितनी ख़ुशी थी उस दिन आंचल की आंखों में, शायद पहली बार एक घर का सपना पूरा होने जा रहा था.

मनोहर बाबू का स्टॉप आ गया. बस से उतर के उन्होंने छाता खोला, पाजामे को ऊपर चढ़ाया और पानी से भरे गड्ढों से बचते बचाते सब्जी मंडी की ओर चल दिए. अभी भी बूंदा बंदी हो रही थी. मौसम में कुछ ठण्ड से हो गयी थी. फुटपाथ के दुकानों पर कुछ एक लोग नज़र आ रहे थे और साथ ही भुट्टे, चाय और सिगरेट की महक बारिश की सोंधी महक में मिल कर मानो ईद मना रही थी. आज सब्जियां भी रोज की तरह मुंह लटकाने की बजाय चहक रही थी. मनोहर बाबू ने सब्जियां खरीदी और पास ही खड़े रिक्शे में बैठ कर चल दिए.


रिक्शे वाला थोड़ा बातूनी था. "बाबू जी आज तो बहुत पानी गिरा, हमारी तो ग्राहकी चौपट हो गयी"....
"अरे भाई तुम्हारा नुक्सान हुआ तो बहुतों का फायदा भी तो हुआ, किसानों का भी तो सोचो.." मनोहर बाबू ने सिगरेट का कश लगते हुए कहा.
"ये तो सही कहा आपने बाबूजी, लेकिन हम रिक्शे वालों का बहुत नुकसान होता है इस बारिश में, न तो सवारी मिलती है, ऊपर से पानी में फंस कर रिक्शा भी बिगड़ जाता है"
"हाँ भाई ये तो है, तुम लोंगों को जरूर मुश्किल होती है'
"बाऊ जी वैसे हम तो रिक्शा अपनी मर्जी से चलाते है, हमारा बेटा बैंक में अफसर है, बहुत मेहनत से पढ़ाया, कितनी दफा उसने और बहू ने कहा की हम रिक्शा चलाना छोड़ दें मगर हम हमेशा डाट देते हैं. अब आप ही बताओ बाबूजी, इसी रिक्शे ने हमारी जिंदगी पार लगायी, अब इसे कैसे छोड़ दे, और वैसे भी हम अभी भी अपनी मेहरारू के साथ रहते है पुराने कमरे में, लड़के बहु की जिंदगी में हम दखल नहीं डालना चाहते, वो खुश रहे तो हम भी खुश रहेंगे"


रिक्शे वाले की बात सुनकर मनोहर बाबू अचानक शांत हो गए. उन्हें आज भी याद था जब बाबू जी को उनके और आंचल के बारे में पता चला था, कितनी बहस हुई थी. रात में बाबू जी को दौरा पड़ा और जाते जाते कसम खिला गए की शादी वो उनके मित्र हरिदास की बेटी से ही करे, जैसे की उन्होंने वायदा किया था. यही उनकी आखिरी इच्छा थी. मजबूर हो कर मनोहर बाबू को गीता से शादी करनी पड़ी और तबादला दिल्ली हो गया. आंचल को ये सब सामने बताने की हिम्मत न हुई तो चिट्ठी लिख कर भेज दी थी. उस बात की ग्लानि आज भी मनोहर बाबू के मन की काट रही थी. बाद में कितनी बार पता लगाने की कोशिश की मगर आंचल का कुछ पता न चला.

अपनी गली के पास आकर मनोहर बाबू रिक्शे से उतर गए. पैसे दे कर वो धीरे धीरे आगे बढ़ने लगे. बगल वाले घर में एक पिता s भीगे हुए बच्चे को तौलिये से सुखा रहा था और बारिश में भीगने के लिए डांट भी रहा था. अचानक मनोहर बाबू की आंखें गीली हो गयी. कितनी मुश्किल और प्यार से पला था उन्होंने अपने बच्चों को. गीता के गुजरने के बाद, कितने अकेले पड़ गए थे वो. रोज के तानो की आदत से हो गयी थी. कभी खाने को लेकर तो कभी किसी और बात को लेकर. अचानक अपना घर भी काटने को दौड़ने लगा था.


न जाने कब ये सोचते सोचते, मनोहर बाबू घर पहुंच गए. छाता बंद कर सर के बाल झाडे, पैर धोए और फिर दरवाजे पर दस्तक दी. अन्दर से दाल की महक चहलकदमी करते हुए बाहर आ पहुंची थी.
दरवाजा एक अधेड़ उम्र की औरत ने खोला. मनोहर बाबू उन्हें देख मुस्कुरा दिए. इस उम्र में भी आंचल के चेहरे पर वही बच्चों जैसी हंसी थी.
"इतनी देर सो क्यों आये हो, कहा था न कल मुझे जल्दी लाइब्रेरी जाना है."
'अब इस उम्र में क्यों नौकरी करती हो, आती तो है मेरी पेंशन.'..मनोहर बाबू ने तौलिये से सर पोंछते हुए कहा.
"इस लाइब्रेरी ने ही तुमसे मिलवाया था ३५ सालों बाद, याद है कैसे चौक गए थे मुझे देख कर"...
"वो तो लाजिमी था, एक तो तुम्हारे साथ जो नाइंसाफी की थी उसका मलाल था, फिर तुम भी गायब हो गयी थी, और जब मिली तो पता चला शादी ही नहीं की."
"अब भूल जाओ उन सब बातों को'..


मनोहर बाबू अपनी कुर्सी पर जा कर बैठ गए, उन्हें आज भी याद था की कितनी मिन्नतें की थी उन्होंने आंचल से इस उम्र में शादी करने के लिए, बच्चों ने कितने ताने मारे थे, लोगों ने भी बड़ा मजाक उड़ाया था उनका. लेकिन मनोहर बाबू को कोई मलाल नहीं था, उन्होंने हमेशा दूसरों की जिंदगी जी थी, मलाल केवल इस बात का था जिस जिंदगी के लिए इंसान इतने त्याग करता है, भाग दौड़ और पसीना बहता है, उस जिंदगी से वो रिश्तों के सिवाय कुछ नहीं कमाता और वो रिश्ते भी अक्सर स्वार्थ पर टिके होते हैं, इसलिए उन्होंने फैसला किया था कि वो अपनी गलती को सुधारेंगे और कम से कम कुछ साल ही वो जिंदगी जिएंगे जिसकी उन्होंने हमेशा आस की थी. ये प्रायश्चित था या कुछ और उन्हें नहीं पता था.


बाहर अभी भी बारिश हो रही थी. कुछ बूंदें खिडकियों से अन्दर आ रही थी और कुछ बूंदें बाहर जा रही थी.

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------