मंगलवार, 3 जुलाई 2012

कविताएँ और गीत

देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम' का नवगीत / जनभक्षी जंगल मेँ

अभी तो नहीँ सूखी

संवेदन की नदिया पर

बढ़ता ही जाता है

दिन-दिन कर उथलापन.

 

खूब ली खँगाल

आश्वस्तियोँ की तलछट,

हाथ लगीँ अपने

हर बार शंख-सीपियाँ ;

 

बिकी हुई सोच-समझ

पीट रही तालियाँ,

नित्य नियम-नीतियाँ

भुगतेँ तब्दीलियाँ ;

 

बेशक अब तक बेड़ा

लग जाता पार मगर

नाविक-पतवारोँ की

अनसुलझी अनबन .

फूलोँ की बगिया मेँ

साँपोँ की बाँवियाँ ;

 

मनमोहिनी बीन

बजा रहे हैँ सँपेरे;

देख-देख ऊबा मन

ये तिकड़मबाजियाँ ;

 

स्वारथ के मारे

सब गूँगे-बहरे ,

कौन सुने-टेरे !

जनभक्षी जंगल मेँ

--

देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम' की सावनी ग़जल

बारिश,बादल और झूलोँ के मौसम होँगे सावन मेँ।

लेकिन एक तुम्हारे बिन कितने ग़म होँगे सावन मेँ॥

 

खेत मका का,घाट नदी का, अमराई की छाँव घनी;

ये सब साथ तेरे माज़ी के एल्बम होँगे सावन मेँ ॥

 

आँखोँ के बादल बरसेँगे, ज्वार उठेंगे सीने मेँ ;

पीरपगी साँसोँ के दामन पुरनम होँगे सावन मेँ॥

 

तनहा दिल-देहरी,मन-आँगन, तनहा दिन-शब, शामो-सहर;

तनहा -बस-तनहा जीवन भर ,अब हम होँगे सावन मेँ॥

 

साध सुहागन हुई न मेरी, आस-धरा न हरियाई ;

ताहयात ये रंज़ो-सितम के आलम होँगे सावन मेँ॥

 

दर्दे-दिल मेरा समझा 'महरूम' पपीहे ने लेकिन ;

सुन-सुन उसकी पीर मेरे ग़म कुछ कम होँगे सावन मेँ॥

---

संपर्क- प्रेमनगर,खिरहनी.

साइन्स कालेज डाकघर,कटनी 483501 म.प्र.

ई मेल -devendra.mahroom@gmail.com

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एस. के. पाण्डेय के दोहे (8)

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धरती पे है देश यक भारत जिसका नाम ।
बहती है गंगा जहाँ प्रगटे जहँ श्रीराम ।।


करम भूमि भारत कहे ग्रन्थ संत सुर लोग ।
यसकेपी बाकी सभी भूमि बनी हित भोग ।।


पूजा जप तप व्रत नियम यहाँ साधना योग ।
यसकेपी नहि कहुँ मिलै नियम नीति बिनु भोग ।।


राम प्रभू आये यहाँ धन भारत को भाग ।
मनुज बने मानव जथा चरित कियो बिनु राग ।।


कर दिखलाये रामजी जदपि जगत को भूप ।
यसकेपी सुभ करम सब जो मानव अनुरूप ।।


नियम नीति अरु त्याग पुनि जन से जन को प्रीति ।
यसकेपी निबाहि सभी दियो जगत को रीति ।।


मानस पढ़ते लोग बहु कथा सुनै बहु जाय ।
लीला करि देखैं सुनैं चरित राम को गाय ।।


यसकेपी देखा सुना अचरज कहाँ समाय ।
नहि अनुहरते लोग को दूजें देंय बताय ।।


मानस में जो भी कहे करम मनुज के योग ।
यसकेपी माने वही बनते मानव लोग ।।


मनुज देंह धरि जो भये भारत देश महान ।
मानस सो है ग्रंथ जहँ राम सरिस भगवान ।।


मानव बनि नहि रहि सके तदपि यहाँ के लोग ।
यसकेपी मानव वही माने मानव योग ।।


मानव बनने योग जो नियम नीति लो मान ।
यसकेपी याते सुखी यहाँ-वहाँ अरु आन ।।


भेज दियो लोगन जगत मनुज बना भगवान ।
मानव बनने से रहा किमि होए कल्यान ।।


मानव बनि रहिये यही इस जीवन को मूल ।
यसकेपी नाही बने जीवन में बहु सूल ।।


मानव जो न बन सके तो जीवन बेकार ।
यसकेपी साची कहौं जग जीवन को सार ।। 



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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.) ।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो


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रघुविन्द्र यादव के दोहे

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दानव से बदतर हुई, अब मानव की सोच /
कलियों जैसी बच्चियां, रहा दरिन्दा नोच //

कुचले सदा समाज ने, कलियों के अरमान/
लेकिन भंवरों को मिला, हर गुलशन में मान//

सहकर जिसने वेदना, बांटा केवल प्यार/
हिस्से अब उस मात के, बच्चों की फटकार//

औरों के हित वह हुई, बार-बार कुरबान/
जीवन नारी का रहा, तपता रेगिस्तान//

हद से नीचे गिर गया, कलयुग का इंसान /
घर में देकर आसरा, लूट रहा सम्मान//

जब तक माँ जिन्दा रही, पूछा कभी न दर्द/
फूट-फूट कर रो रहे, आज वही बेदर्द//

जब से उसको मिल गयी, 'देवी' जैसी सास/
बेटा फिर आया नहीं, अपनी माँ के पास //

नदिया अब कैसे करे, सागर पर विश्वास /
कतरा-कतरा पी गया, बुझी न फिर भी प्यास //

आसाँ है यारो बहुत, बनना यहाँ फकीर /
लेकिन मुश्किल है बहुत, बनना संत कबीर//

फूलों-कलियों में नहीं, मिलता अब मकरंद/
बागों से भी आ रही, है बारूदी गंध//

होते थे हर दौर में, यूँ तो कुछ गद्दार/
गद्दारों की भीड़ अब, कैसे पायें पार//

खुद जो चरित्रहीन हैं, वो भी देते सीख/
लगे भिखारी बांटने, अब औरों को भीख//

हंस चाकरी कर रहे, काग बने सरदार/
करने लगे गंवार भी, शिक्षा का व्यापार//

घर की खातिर चाहिए, त्याग, समर्पण, प्यार /
बिना प्यार के घर कहाँ, पत्थर की दीवार//

दर्जा रब से भी बड़ा, देता रहा समाज /
गुर्दा चोरी में उसे, आई तनिक न लाज//

कफ़न शहीदों के बिके, जन-गण था लाचार/
संविधान की आड़ ले, खूब पले गद्दार//

सूरत बदली गाँव की, बस इतनी सरकार/
आँगन-आँगन खिंच गई, नफ़रत की दीवार//

मानव खुद को मानता, चतुर और विद्वान्/
फिर भी जोड़े मौत का, रोज नया सामान//

मठाधीश हैं मंच के, आज चुटकुलेबाज़ /
'दिनकर' के वंशज हुए, भांडों के सरताज//


रघुविन्द्र यादव
संपादक, बाबूजी का भारतमित्र

raghuvinderyadav@gmail.com
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 जसबीर चावला की कविता

संध्या की बेला

image

ता उम्र

बोल कर भी

रहे अबोले

संध्या की बेला में

आ गले लग

कुछ बोलें

कुछ रो ले



2 blogger-facebook:

  1. रघुवीन्द्र यादव जी आपके दोहे बड़े ही संवेदनशील, यथार्थ, व्यंग की पैनी धार लिए हुए हैं । आत्मा पर प्रहार करते हैं । बहुत सुंदर अभिव्यक्ति !
    डॉ. मोहसिन ख़ान
    अलीबाग (महाराष्ट्र)मो-09860657979

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बेनामी10:21 pm

      आदरणीय, आपको दोहे पसंद आये मेरा सौभाग्य है, आपका आभार/रघुविन्द्र यादव

      हटाएं

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