सोमवार, 9 जुलाई 2012

सुरेश कुमार सौरभ और रामवृक्ष सिंह की गरजती बरसती कविताएँ

रामवृक्ष सिंह की कविता:

छनकी बूंदों की छागल बहुत दिनों के बाद

आसमान ने आंजा काजल बहुत दिनों के बाद।

बजा इन्द्र देव का मादल बहुत दिनों के बाद।

 

छनक उठी बूँदों की छागल बहुत दिनों के बाद।

गरज-गरज कर बरसे बादल बहुत दिनों के बाद।

 

सोंधी-सोंधी माटी महकी बहुत दिनों के बाद।

मेघों ने सब धरा फतह की बहुत दिनों के बाद।

 

पीपल पर गौरैया चहकी बहुत दिनों के बाद।

शीतल प्रभु ने आज सुबह की बहुत दिनों के बाद।

 

पृथ्वी ने भी पिया है पानी बहुत दिनों के बाद।

घास, लता, तरु दिखते धानी बहुत दिनों के बाद।

 

हवा हृदय को लगे सुहानी बहुत दिनों के बाद।

मन में भाव जगे रूमानी बहुत दिनों के बाद।

 

धरती माँ की कोख जुड़ाई बहुत दिनों के बाद।

खग-मृग से गूँजी अमराई बहुत दिनों के बाद।

 

जीव-जगत ने खुशी मनाई बहुत दिनों के बाद।

सूझी हमको भी कविताई बहुत दिनों के बाद।

 

आर.वी.सिंह/R.V. Singh
उप महाप्रबन्धक (हिन्दी)/ Dy. G.M. (Hindi)
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक/ Small Inds. Dev. Bank of India
प्रधान कार्यालय/Head Office
लखनऊ/Lucknow- 226 001

ईमेल/email-rvsingh@sidbi.in

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सुरेश कुमार 'सौरभ' की कविताएँ

~~~~~~~~~~ सूखा ~~~~~~~~~~
उमड़-घुमड़ गरजी हैं घटाएँ बरखा तो घनघोर हुई.
मेरे गाँव को छोड़के बस बूँदा-बाँदी हर ओर हुई.

ऐसा नहीं कि नभ में कोई मेघ नहीं आता है.
लेकिन बिन बरसे ही हमसे दूर चला जाता है.

फसलें जलकर राख हुईं ये खेत जला खलिहान जला.
सूखे की इस आग में मेरा हर ग्रामीण किसान जला.

गुड़िया, रानो, शबनम, राधा, रेखा, सरला, रानी.
सूख गया वो कूआँ जिस पर भरती थी ये पानी.

है ईश्वर क्या पाप हमारा सजा सुनाते कैसी?
त्राहि-त्राहि इस जल के लिए देखी न पहले ऐसी.

इस तालाब से हम लोगों की जुड़ी बहुत हैं यादें.
क्षण भर में हम लोग भला यादें कैसे बिसरा दें.

बगुले धूनि रमाने नित मछली धरने आते थे.
बिरजू काका इसमें अपनी भैंसे नहलाते थे.

कपड़ा धोने बुढ़िया काकी रोज सुबह आती थी.
चरकर बकरी, गाये, भैंसे जल पीकर जाती थी.

पिछले साल तो पानी से पूरा तालाब भरा था.
बहुत पुराने इस तालाब की आयी मरणावस्था.

मुरझायी इस बगिया की सारी विस्तृत हरियाली.
कोयल जिस पर गाती थी वो सूख चुकी है डाली.

गौरैयों, कौवों की जिस पर बीत रही थी रैना.
आपस में बतियाते थे जिस पेड़ पे तोता-मैना.

सूखे इस पीपल के नीचे होती थी पंचायत.
इसकी छाया में राही पाते थे आकर राहत.

दिखती है चहु ओर यहाँ मरघट जैसी वीरानी.
ये वीरानी सूखे की कहती है आज कहानी.

****************************
गीत-
~~~~~~~ निर्मोही बादल से ~~~~~~
क्या कहें सुनता ही नहीं अब मतवाले इस पागल को।
जीये या मर जाये मानव चिन्ता क्या इस बादल को।

सूखे पौधे बाग-बगीचे फसलों का संसार मरा.
सूखेगें जब सर-सरिता तब जन्म न होगा फिर तेरा.
मत अपना अस्तित्व मिटा रे दे दे अपने तूँ जल को।
क्या कहें सुनता ही नहीं अब मतवाले इस पागल को।

कर लिया झगड़ा सावन से लगता है मुझको तो यही.
अन्यथा तूँ मौन कभी भी सावन में होता ही नहीं.
आ रे आ अब छोड़ क्रोध को भर दे धरती आँचल को।
क्या कहें सुनता ही नहीं अब मतवाले इस पागल को।

रो देगा जब देख धरा को आँसू जब बिखरायेगा.
धरती का जो फटा है सीना धागा बन सिल जायेगा.
तड़पाता है क्यों निर्मोही पहले से ही घायल को।
क्या कहें सुनता ही नहीं अब मतवाले इस पागल को।

नहीं यदि बरसेगा नीरद नभ में क्यों इठलाता है.
जलते कृषकों और सकल को आ आ मुँह दिखलाता है.
धरा को तँकना छोड़ बेदर्दी खोल दे अपने जल-नल को।
क्या कहें सुनता ही नहीं अब मतवाले इस पागल को।
.
जीव-जगत पर कृपा तुँ कर दे हरियाली चहु ओर दिखे.
झूमें हम प्राकृति सँग-सँग प्रशंसा बस तेरी लिखें.
छन-छन-छन-छन छनका दे रे बूँदों की अब पायल को।
क्या कहें सुनता ही नहीं अब मतवाले इस पागल को।
जीये या मर जाये मानव चिन्ता क्या इस बादल को।
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~~~ सावन में (अच्छा नहीं लगता) ~~~

सावन में ये नीला आकाश, अच्छा नहीं लगता।
धूप में जलने का एहसास, अच्छा नहीं लगता।

दिवाकर से कह दो- जाये जाकर विश्राम करे.
इस ऋतु में अग्नि बरसाने का न काम करे.
सूर्य का जलना बारहो मास, अच्छा नहीं लगता।
सावन में ये नीला आकाश, अच्छा नहीं लगता।

मेघों से कह दो - कहीं सोये हैं तो जग जायें.
बरसना इनका धन्धा है, धन्धे पर लग जायें.
जब बुझती नहीं धरती की प्यास, अच्छा नहीं लगता।
सावन में ये नीला आकाश, अच्छा नहीं लगता।

घमंडी बादल अब घमंड में चूर रहते हैं.
विनती करने पर भी आते नहीं, दूर रहते हैं.
बार-बार करना अरदास, अच्छा नहीं लगता।
सावन में ये नीला आकाश, अच्छा नहीं लगता।

मानसून झमा-झम बरसेगा ऐसी आशा थी.
बरखा में भींगने की बहुत अभिलाषा थी.
जब इस तरह कोई करे निराश, अच्छा नहीं लगता।
सावन में ये नीला आकाश, अच्छा नहीं लगता।

केवल इन बादलों को गाली देना बेकार है.
मानव भी इस असंतुलन का जिम्मेदार है.
अंधाधुन वनों का विनाश, अच्छा नहीं लगता।
सावन में ये नीला आकाश, अच्छा नहीं लगता।
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~~ सावन में (बहुत अच्छा लगता है) ~~

मेघों से आच्छादित आकाश, बहुत अच्छा लगता है।
फुहारों में भींगने का एहसास, बहुत अच्छा लगता है।

घन-घोर घटाएँ बरसात करें नित सावन में.
निकल पड़े जब सजनी कोई आँगन में.
भींगने अपने साजन के पास, बहुत अच्छा लगता है।
मेघों से आच्छादित आकाश, बहुत अच्छा लगता है।

खोजे जब कोई प्रेमी अपने किसी हमदम को.
तलाशे कोई प्रिया जो अपने प्रियतम को.
पूरी हो जाए जब तलाश, बहुत अच्छा लगता है।
मेघों से आच्छादित आकाश, बहुत अच्छा लगता है।

कन्याओं का झूला-झूलना, रिम-झिम बरसातें.
कोयल की कूक, सखियों की रसभरी बातें.
हँसी-ठिठोली व उपहास, बहुत अच्छा लगता है।
मेघों से आच्छादित आकाश, बहुत अच्छा लगता है।

गली आँगन में बच्चों का चहकना-चिल्लाना.
बरसात के पानी में कागज की नाव चलाना.
उनकी मस्ती, हर्षोल्लास, बहुत अच्छा लगता है।
मेघों से आच्छादित आकाश, बहुत अच्छा लगता है।

किसानों का खेतों में निरीक्षण के लिए जाना.
पगडंडियों पर बैठकर मन ही मन मुस्काना.
करना अच्छी फसल का आभास, बहुत अच्छा लगता है।
मेघों से आच्छादित आकाश, बहुत अच्छा लगता है।
फुहारों में भींगने का एहसास, बहुत अच्छा लगता है।
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रचनाकार :- सुरेश कुमार 'सौरभ'
पता:- जमानियॉ कस्बा, जिला गाजीपुर, उत्तर-प्रदेश

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