मंगलवार, 24 जुलाई 2012

शकुन्तला यादव का आलेख - सावन के झूले पड़े

सावन के झूले पड़े

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श्रीमती शकुन्तला यादव

वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही समूची धरती, धरती पर निवास कर रहे हर जीव-जंतु प्रसन्न्ता से झूम उठते हैं. काले कजरारे मेघॊं को देखकर, जहाँ मयूर थिरक उठता है, वहीं पपीहा टेर लगाते हुए उन्हें बरस-बरस जाने को मजबूर कर देता है. बादलों की आस में आकाश में सिर उठा-उठाकर देखता कृषक, आनन्द में सराबोर हो जाता है. चार महिने धूप में अपने को सुखाते तरुवरों के शरीर में प्राण थिरकने लगते हैं. वहीं रामगिरि पर्वत की शिखर पर बैठा यक्ष, अपनी प्रियतमा को अपना प्रेम-पत्र भिजवाने के लिए मेघॊं से विनती करता नजर आता है. विरहणी को अपने प्रिय की याद सताने लगती है है और वह उससे परदेश से लौट आने की गुहार अपने गीतों के माध्यम से व्यक्त करती है. गर्मी की तपन से सूख चुकी नदी की देह फ़िर से नूतन हो उठती है. शायद ही कोई कवि/लेखक अथवा चित्रकार होगा, जिसने अपनी कलम-कूची के माध्यम से ,मेघॊं को अपने कागज पर न उतारा हो. शायद ही कोई फ़िल्मकार ऎसा होगा, जिसने अपनी फ़िल्म में इस ऋतु को कैद न किया हो और शायद ही कोई ऎसा गीतकार होगा जिसने एक से बढकर एक नज्में न लिखी हों.

भारत शुरु से ही एक उत्सवप्रेमी देश रहा है. वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही यहाँ व्रत-पर्वों की झडी सी लग जाती है. आषाडमास के प्रारंभ होते ही जगन्नाथ रथयात्रा, गुरुपूर्णिमा,,श्रावण मास में सोमवार व्रत, मंगलागौरी व्रत, तीज, नागपंचंमी, रक्षाबंधन,भाद्रपक्ष में बहुलाचतुर्थी, श्रीकृष्णजन्माष्टमी,,सुहागिनॊं के अखण्ड सौभाग्य का रक्षक-हरतालिका व्रत,गणेश चतुर्थी, ऋषिपंचमी,श्री राधाजन्माष्टमी, वामन जयन्ती, अनन्त चतुर्दशी आदि व्रत शुरु हो जाते हैं जो अनवरत पूरे साल भर तक चलते रहते हैं समूचा आकाश बादलों से अटा पड़ा है और मेह पूरी एक सी लय-ताल और गति के साथ बरस रहा है. ठीक इसी समय रेडियो पर एक गीत प्रसारित होता है,”सावन के झूले पडे-तुम चले आओ,.... तुम चले आओ.” यह गीत स्वरसम्राज्ञी लता मंगेशकरजी ने गाया था. ऐसे एक नहीं अनेक गीत, सावन को लेकर लिखे गए हैं. यथा-“सावन के झूले.पडॆ..सैंयाजी मोहे तुम कहां भूल गए”, “पड गए झूले..सावन ऋतु आई रे”, “बरसे बदरिया सावन की...सावन की..मन भावन की”,”बरखा सुहानी आई रे” “बदरा छाए के झूले पड गए हाय” आदि-आदि जब-जब भी ये गीत रेडियो पर बजते हैं तो ऐसा लगता है कि बस सुनते ही रहो. कभी-कभी तो इन गीतों को सुनकर श्रोता भी खुद गुनगुनाने लगता है. आषाढ-सावन व भादों के वर्षामास अपने साथ उमंग-उल्लास एवं आनन्द लेकर आते हैं. बूंदॊं की रिमझिम का स्वर अमृत सा घोलता है. अपनी लय में- उमंग में, झूमता बरसता –गरजता सावन कभी रेशम की डोर और चांदी के झूले पर डोलता है तो कभी वह व्रत-पूजा-अनुष्ठानों जैसी सांस्कृतिक परम्पराओं से गुंथा रहता है. पूरे ही महिने बाग- बगीचे,घर-मन्दिरों में उल्लास सा छाया रहता है.

वनों में बांस सहित पूरा जंगल हरियाली की चादर ओढ़कर थिरकता सा लगता है. ढंडी-ठंडी बयार बह निकलती है. बेलों की कोमल-कोमल पत्तियां अकुरित हो ,पेडॊं की शाखॊं पर चढकर ,नन्हें-नहें सुकोमल फ़ूलॊं से लदी-फ़दी हवा में झूलती-इठलाती जाती है. केतकी-कुटज,कदम्ब,चम्पा,चमेली की मादक गंध,तन-मन को सुवासित कर जाती है. पानी की रिमझिम में सराबोर ठंडी-ठंडी हवा के झोंके तन-मन में एक प्रकार की सनसनी सी दौड़ा देते हैं. बादलॊं से अटे-पडॆ आकाश के श्यामपट पर सफ़ेद बगुलों की उडती हुई पक्तियां देखते ही बनती है. वनों में हरी-हरी तथा कोमल पत्तियों को चरते हुए हिरण कुलांचे भरते दिखलाई देते हैं. तो कहीं मोर मस्ती के साथ थिरक उठता है. यह पावस ऋतु धरा के सभी प्राणियों में नवजीवन का संचार करते हुए आनन्द से भर देती है. पति-पत्नि, प्रेमी-प्रेमिका के आपसी संबंधों मे यह ऋतु एक उन्माद भर देती है और वे गा उठतीं हैं:- “नन्हीं-नन्हीं बुंदिया रे.....” सावन में झूला झूलना या फ़िर बागॊं में नीम की निबोंरियों की मिठास चखते स्वर-कंठ से फ़ूट पड़ते हैं:-“कच्ची नीम की निबोरी....सावन जल्दी आयो रे” निगोड़ा सावन बरसता भी है और आग भी लगा देता है. ऐसे में परदेश गए प्रियतम की याद अकुलाती है, तो बिरही-बिरहनियों का मन व्याकुल हो उठता है. मिलन की आशा और विरह की दारुण पीड़ा वाली अवधि के साथ जुड़ा होने से दोनों ही अपनी इस वियोग की स्थिति को संगीत-गीत के सहारे व्यक्त करते हैं और यहीं से शुरु होती है बारहमास गाने की परम्परा. बारहमासा वियोग के गीत हैं,जिसमें प्रकृति के उदगार हैं.

सावन उन्माद का मौसम है. चारों ओर छाई हरियाली, उमडते-उफ़नते नदी-नाले, विरही-विरहिन की प्रतीक्षा, यही सन लोक-गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त होते हैं. कलात्मक मेंहदी को हाथ मे काढे, रंग-बिरंगी लाल-पीली-हरी चूडियां पहने , सुन्दर वेषभूषा धारण किए-घुंघरु-झालर और पायल की रुनझुन के साथ सोलह शृंगार किए युवतियां बाग के वृक्षों पर झूले मे एक दूसरे को झुलाती-झूलती, कजरी-मल्हार –बारहमासा गाती अपनी पीड़ा और अपनी वेदना सब कुछ भूलकर परस्पर सौहार्द भाव में मगन हो जाती हैं और तब उनके कंठों से मघुर स्वर फ़ूट पड़ता है. “ गाओ न गीत मल्हार-महिना सावन को “ विरह की असह्य वेदना में तड़पते हुए यक्ष ने अपनी प्रियतमा को प्यार भरी पाती, इन्हीं मेघों के माध्यम से भिजवाई थी. महाकवि कालीदास की कृति” मेघदूतम” विरह-वेदना की एक ऐसी अजर-अमर कृति है,जिसे युगों-युगों तक दिल की गहराइयों से पढी-समझी जायेगी. सावन् के पूरे माह तीज-त्योहार, व्रत-पूजा-अनुष्ठान चलते ही रहते हैं. राखी-भुजलिया-हरछट-जनमाष्टमी-पोला-तीज,गणेशोत्सव-शिवोपासना क्रमबद्ध चलते ही रहते हैं. जन कल्यान के लिए इन्द्र की पूजा-यज्ञ आदि होते हैं. सावन के हर सोमवार को स्त्रियां व्रत-उपवास करके शिवजी से अपने पति-पुत्र और भाइयों के लिए मंगल कामनाएं करती हैं. संपूर्ण भारत में सावन के शुक्ल-पक्ष की तृतीया में तीज मनाई जाती है. यह तीज झूले से जुडी है.और यह लडकियों- और सुहागिनॊं का पर्व है. इस दिन उपवास रखकर गौरी की पूजा-अर्चना करतीं हैं और अच्छे वर की प्राप्ति और पति की मंगल-कामना करती है.

विवाह के प्रथम तीज पर वह अपने भाई को बुलाती हुई कहती हैं:-“भैया मेरे तीजो पर आइयो जी, मेरे लिए लहरिया-चुनरिया लाइयो जी” नागपंचमी श्रावणमास का एक ऐसा त्योहार है, जिसमें सांपों की पूजा होती है. ऐसा माना जाता है कि श्रावणमास के शुक्ल-पक्ष की पंचमी के दिन इनकी उतपत्ति हुई थी. अतः संपूर्ण भारतवर्ष में सांपों की पूजा-अर्चना विधिवत की जाती है. इस दिन सपेरे को अन्न-कपडा- चने की दाल-मिठाइयां आदि देने की परम्परा है. इस दिन शिव मन्दिर मे श्रद्धा-भक्ति के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. मध्यप्रदेश के पचमढी क्षेत्र मे नागद्वारी का प्रसिद्ध मेला भरता है. लाखों की संख्या मे अलग-अलग प्रांतों से भक्तगण यहां आते हैं और शेषनाग की पूजा-अर्चना करते हैं. पचमढी के प्रसिद्ध धूपगढ जहां से आप सूर्योदय और सूर्यास्त का अद्भुत नजारा देख सकते हैं. धूपगढ के चोटी से जहां आप इस अद्भुत नजारे का आनन्द उठाते हैं,उसी मार्ग से ठीक नीचे हजारों मीटर गहरी तलहटी में स्थित नागद्वारी है. बरसते पानी मे भक्तगण जैकारा लगाते हुए आगे बढते हैं. काफ़ी लम्बी दूरी तय करने के बाद एक गुफ़ा दिखलायी देती है. ऐसी मान्यता है कि यहीं से नागपुरी पाताल का रास्ता जाता है. अत्यंत संकरी होने के साथ अन्दर प्रवेश नहीं किया जा सकता. इसे दूर से देखे तो लगता है कि कोई शेषनाग फ़न काढे खडा है. यह गुफ़ा इतनी लम्बी-चौडी है कि यहां सैकडॊं की संख्या मे भक्तगण रात्रि विश्राम कर अपनी थकान मिटा सकते है. ऎसा भी सुनने में आता है कि किसी समय यहां सर्पों की इतनी अधिक तादात होती थी कि भक्तगण इन्हें अपने हाथों से, रास्ते से हटाकर आगे बढते थे. यहां की यात्रा काफ़ी कठिन और श्रमसाध्य है. विशेषकर महाराष्ट्र से काफ़ी बडी संख्या में यहां भक्तों को देखा जा सकता है.

अलग-अलग प्रांतों में सावन मास कुछ इस तरह मनाया जाता है.

मेरठ जिले मे विशेष चहल-पहल देखी जा सकती है. मेरठ-बागपत मार्ग पर बालेनी कसबे के पुरेश्वर महादेव मंदिर में हजारों की संख्या में भक्तगण हरिद्वार से लाए पवित्र गंगाजल से शिवजी का अभिषेक करते हैं. ये शिव भक्त कांवडॊं से गंगाजल भरकर लाते हैं. केरल में ओणम त्योहार बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. धान की फ़सल कटने के बाद श्रावण नक्षत्र के दिन यह त्योहार मनाया जाता है. वर्षा के बादलॊं के हटते ही केरल का प्राकृतिक सौंदर्य निखर उठता है. लाल-हरे-पीले-नीले रंग के फ़ूलों से बाग-बगीचे खिल उठते हैं. ऐसे समय में केरल के प्राचीन शासक महाबली के अभिनन्दन में यह त्योहार मनाया जाता है. सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं. जिसमें कथकली, तम्बितल्लन, कोकोट्टिकिल, झूला झूलना, नृत्य संगीत, नौका-प्रतियोगिताएं, कबड्डी आदि खेलों का आयोजन बडॆ उत्साह के साथ मनाया जाता है. उडीसा में आषाढ मास में भगवान जगन्नाथ कि रथयात्रा का आयोजन होता है. भगवान के रथ को खींचने के लिए भारत के सुदूर प्रांतों से भक्तगण यहां इकठ्ठा होते हैं.

महाराष्ट्र में प्रसिद्ध गणेशोत्सव के आयोजन भी इसी मास में शुरु हो जाते हैं. गणेश चतुर्थी का मुख्य पर्व भादों के शुक्लपक्ष में होता है.

जैन धर्मावलम्बियों के लिए वर्षा ऋतु में ही चतुर्मास का समय आता है. इसी माह में श्रवणबेलगोला( कर्नाटक ) में भगवान बाहुबली का महामस्ताभिषेक बडी श्रद्धा-भक्ति के साथ सम्पन्न होता है

.सावन के माह में ही भक्तगण कश्मीर के अमरनाथ की यात्रा पर जाते हैं.तथा श्रावण पूर्णिमा के दिन गुफ़ा में बर्फ़ से बने शिवलिंग के दर्शन करते हैं. पुराणॊं के अनुसार इस प्राकृतिक रुप से बने शिवलिंग के बारे में विस्तार से पढा जा सकता है.

सावन की पूर्णिमा के दिन भाई-बहन के पुनीत प्रेम का प्रतीक “रक्षाबन्धन” आता है. इसीलिए भाई अपनी बहन से रक्षासूत्र बांधकर उसकी रक्षा का संकल्प लेता है. पौराणिक कथा के अनुसार इन्द्र ,असुरों से हार गए थे. विजयश्री की उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी. गुरु ब्रहस्पति के कहने पर इन्द्राणी ने इन्द्र के लिए एक रक्षासूत्र मंत्रों द्वारा तैयार किया और उसे सावन की पूर्णिमा के दिन बांध दिया. फ़लतः इन्द्र की विजय हुई. तभी से यह पर्व “रक्षा-पर्व” के रुप में मनाया जाता है.

सावन की पूर्णिमा को गोवा और महाराष्ट्र में “नारिकेल-पूर्णिमा” के रुप में मनाया जाता है इस दिन समुद्र की पूजा नारियलों से की जाती है और कामना की जाती है कि नारियल की सम्पन्न-समृद्ध फ़सल हो.

सावन की पूर्णिमा के आठ दिन बाद कृष्णजन्माष्टमी का पावन-पर्व आता है. भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति को खूब सजाया-संवारा जाता है. मन्दिरों मे लता-पताकाएं फ़हराई जाती है और कीर्तन-भजन का भी आयोजन होता है. ब्रज भूमि भक्तिरस मे नहा उठती है. आगरा-मथुरा-वृन्दावन-बरसाने-गोकुलस्धाम में विशेष आयोजन होते हैं, जो कई दिनों तक चलते रहते हैं .देश-परदेश से कई श्रद्धालु वहां आकर इस महोत्सव में शामिल होते हैं और अपने जीवन को धन्य मानते हैं.

2 blogger-facebook:

  1. बेनामी8:29 pm

    सावन के झूले पड़े मन को छूने वाला आलॆख सटीक चित्रण वर्षा का मेघों की अठखेलियाँ मोर पपीहा यक्ष सबको समेटने का प्रयास अति उत्तम रचना
    प्रभुदयाल‌

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी6:35 am

    sunder aalekh badhaaee

    उत्तर देंहटाएं

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