सोमवार, 16 जुलाई 2012

शिवा सरगम, विजय वर्मा, मालिनी गौतम, शशांक मिश्र व मोतीलाल की कविताएँ

 
कविता

आसमान की गहराई

शिवा सरगम

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मासूम उम्र में
पगली सी थोड़ी झल्लाई सी
मैं चली खोजने
ज्ञान का भंडार
दुनिया का व्यवहार
नाजुक कांधे पर लिए
एक झोला
रह में हर फूल, पत्र से पूछती
उनका सूख – दुःख
कभी उड़ेलती उन पर प्यार
कभी प्रश्नों की बोछार
अक्सर रुक जाया करती
देखकर राह में ठहरा पानी
पानी में झांक कर
ढूंढती अपने अनगिनत प्रश्नों के उत्तर
देखती अपनी ही मटमैली तस्वीर
ठहरे पानी में
जब देखती ध्यान से
अरे ये क्या !
आसमान मेरे कदमों तले !
सोचती गहरा कितना होगा ये आसमान
सोचकर थोड़ा फिर
इतराती ,मुस्कुराती
भ्रमित हो कहती ये आसमान
तू मेरे कदमों तले है !
मगर ये मासूम उम्र का
भ्रम ही था कि आसमान गहरा नहीं
ऊँचा होता है पगली शिवा !
जिसे न जान पाई हूँ आजतक
मैं, न ही मेरे ज्ञान कि सीमा |
--
 
शिवा सरगम, शिक्षा एम ए अंग्रीजी , एम फिल
अध्यापिका
ग्राम छछेती, सिरमौर, हिमाचल प्रदेश
Emai : shivasargm@gmail.com
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विजय वर्मा के हाइकु

         
हाइकु 
   बाद आंधी के  
गिरते पत्ते
पेड़ों से ,जैसे तन 
बिना प्राण के.
उड़े परिंदे 
भयग्रस्त हो जैसे 
जनता प्यारी.
बाद आंधी के 
जमीं पे पेड़, जैसे
मृत मानुष .
झोपड़ी उडी.
गरीब के ,ताकता
असहाय-सा.
आँखों में आँसू 
हिलोरे मारता हो 
जैसे सागर.
डूबता सूर्य 
अन्धकार भविष्य 
जैसे देश का.
है पूरी आशा 
फिर होगी सुबह 
जन-जन की . 
-- एक तूफ़ान 
दिल के अंदर भी 
रहा जारी-सा.
टूटे बंधन
मखमली रिश्तों की 
सब्र-बाँध भी.
एक रौशनी 
बाद मुद्दत के ही 
दिखी तो सही. 
--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS
BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com
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मालिनी गौतम की कविता


कटी पतंग
वह उड़ती रही दूर-दूर
तुम्हारी पतंग बनकर
जब कभी तुम ढील देते
वह जा पहुँचती
ऊँचे खुले आसमान में
खुलकर हँसती
घूम आती
खेत-खलिहान, पर्वत, नदियाँ...
जैसे ही तुम
मंजा लपेटते
वह अनमनी सी
खिंची चली आती
धीरे-धीरे तुम्हारी ओर...
कभी-कभी
अपने शौक के लिये
तुम लगाते पेंच
और काटते रहते
दूसरों की पतंगें...
पर दूसरों की पतंग काटते-काटते
एक दिन कट गई
तुम्हारी ही पतंग...
तुम कुछ पल देखते रहे
उसे आसमान में
विलीन होते
फिर जुट गये एक और
नई पतंग को जोत बाँधने में
कटी हुई पतंग के
हश्र से बेखबर
शायद वह गिरेगी
खेत में खड़े किसी बच्चे के
नन्हें हाथों में,
या हो जायेगी चिथड़े-चिथड़े
किसी ऊँचे दरख्त
या बिजली के तारों में फंसकर
अय खुदा.....
काश पतंग को भी
उसकी मरजी दी होती..
क्या जरूरी है
उसकी डोर
किसी और के हाथों में देना...?
डॉ मालिनी गौतम
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शशांक मिश्र भारती के बीस हाइकु

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1-
पिचके गाल
पेट पीठ एक है
जो गरीब है।
2-
काम न धाम
बन्‍द-हड़ताल
सच्‍चे सेवक।
3-
वाणी-औषधि
गुड़ से जो गुण
न लगें तीर।
4 -
न जमघट
न ही अश्रुनेत्रों में,
मृत मानव।
5 -
दुर-घटना
श्‍वानों का है समूह
शून्‍य के नीचे।
6 -
पद-प्रतिष्‍ठा
प्रयास हैं किसके,
शोषित आज।
7 -
बहे निरत
न श्रान्‍ति-अकुलाना,
व्‍यथित रोध।
8 -
दरिद्रता हो
कतिपय कंचन से
न कि प्रियता।
9 -
आवश्‍यकता
पतोन्‍मुखता की,
व्‍याप्‍त अहं।
10 -
संरक्षण हो
पर्यावरण का,
सुविधाओं का नहीं।
11 -
समान सभी
तृष्‍णा की पूर्ति हिंसा,
अहिंसाव्रत।
12 -
समीक्षा रोज
पूंछ हनुमान की,
आज की रिपोटें।
13 -
स्‍वभाषा गिरा
आंग्‍ल को प्रतिष्‍ठा दी,
अपनों ने ही।
14 -
नियम बने
बांधे गए परायें,
अपने नहीं।
15 -
सिंह का गात
वसन गीदड़ के
जो दहाड़ते।
16 -
रंग अलग
पुष्‍पों से माला बने
धागा जो एक।
17 -
पृथ्‍वी कांपी
बम विस्‍फोट से नहीं
प्रकृति-कोप।
18 -
अक्षुण्‍य तो है
गैरों से सदैव ही
पर अपने।
19 -
दीमक चाटे
श्रम-निष्‍ठा-विश्‍वास
सेंध स्‍वार्थ की।
20 -
पीड़ित जन
सुधरे जर्नादन,
आज का सच।
--
शशांक मिश्र भारती हिन्‍दी सदन, बड़ागांव, शाहजहांपुर, 242401 उ.प्र.
ईमेलः-shashank.misra73@rediffmail.com
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मोतीलाल की कविता

एक रात जब आकाश 
बगैर तारोँ के सूना था 
और बिना चाँद के सन्नाटा पसरा था 
बहुत चुपके से वह आयी थी 
खेत खलिहान को लांघते-हांफते हुए 
और काँप रहे थे उसकी कुछ आप्त स्वर 
और मैँ खोज रहा था चेहरे की वे रेखाएँ
जहाँ जख्म होने की संभावनाएँ थी 
हाथ मेँ गिलास थामे हुए 

उसी रात जब भोर आकाश 
वैगर सूर्य के कसमसा रहा था 
और बिना चहचहाट के 
अंगड़ाई तोड़ रहा था 
वह सोयी हुई थी 
पलंग की नरम विछावन पर 
बगैर उतवाली के 
सपनोँ की चादर ओढ़े हुए 

उसी सुबह जब मैँ खड़ा था 
आईने के सामने बगैर कमीज के 
वह चाय लेकर आयी थी 
चेहरा खिला था या नहीँ 
मैँ भूल गया था मेरे हाथ पर्स मेँ चले गये 
और वह दरवाजे को ताक रही थी 

उसी समय मुझे लगा 
इस डाक बँगले के पीछे से 
सूर्य हँस रहा है 
मुझे ठीक से नहीँ मालुम 
कि मेरे घृणत ह्रदय पर 
या उस बेचारी की लाचारी पर 

उस रात के बाद 
आईने के सामने 
मैँ कभी भी खड़ा नहीँ हो सका ।

* मोतीलाल/राउरकेला 
* 9931346271

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1 blogger-facebook:

  1. मैडम शिव सरगम जी आपकी ये रचना पहले स्थान पर प्रकाशित हुई है और बहुत सुंदर रचना है | मुझे हार्दिक खुशी है , आप यूँ ही आगे बढते रहो यही हमारी हार्दिक इच्छा है |
    बधाई |

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