रविवार, 22 जुलाई 2012

कैस जौनपुरी की प्रस्तुति : कहानियां कुरआन की - फलों से लदा हुआ बाग

 

फलों से लदा हुआ बाग

‘सनआ’ शहर से थोड़ी दूरी पर एक बाग था. उस बाग में ढ़ेर सारे फल लगते थे. बाग का मालिक बहुत नेक इन्सान था. अपने साल भर के गुजारे के लिए निकाल कर बाकी सारे फल वो गरीबों और जरूरतमन्दों में बांट देता था. इसका तरीका ये था कि जिस दिन फल तोड़े जाते थे उस दिन उस इलाके गरीब और जरूरतमन्द बाग के पास इकट्ठा हो जाते थे. जब तक बाग का मालिक जिन्दा था ये सिलसिला बिना किसी रूकावट के चलता रहा. इस नेक काम का बदला उस मालिक को ये मिलता था कि उसका बाग हर साल ढ़ेर सारे फलों से लदा रहता था. उस बाग से उसकी कमाई होती थी.

फिर एक दिन उस बाग का मालिक गुजर गया. उसके पांच बेटे थे. अब उस बाग के वो मालिक थे. और फल तोड़ने के दिन करीब आ रहे थे. उन भाईयों ने आपस में राय-मशविरा किया कि हम अपने बाग के फल इन गरीबों को क्‍यूं दें? अब हम अपने बाप की तरह अपने ही बाग के फल किसी और को नहीं देंगे. ये हमारे बाग के फल हैं. हमारे ही काम आने चाहिएं.

इसलिए उन्होंने एक रात पहले ये फैसला किया कि इससे पहले गरीब कल इकट्ठा हो जाएं और हमें उन्हें अपना फल देना पड़े, हम सुबह-सुबह चलके सारे फल तोड़ लेंगे ताकि जब सब गरीब आएं तो बाग में कोई फल न मिले. फिर हमें उन्हें कुछ देना न पड़ेगा.

उनके इस फैसले को खुदा सुन रहा था. उसने मुस्कुरा के अपने मन में कहा, “चलो, तुम सबसे सुबह बाग में ही मिलते हैं.”

अगली सुबह जब पांचो भाई बाग की जगह पर पहुंचे तो क्‍या देखते हैं कि वहां अब कोई बाग नहीं था. सारा बाग ऐसा लग रहा था जैसे फसल कट जाने के बाद कोई खेत हो. ऐसा लग रहा था जैसे बाग में आग लग गयी थी और सब जल कर राख हो गया था.

पांचो भाईयों को पहले लगा कि वो गलत जगह आ गए हैं. फिर गौर से देखने पर पता चला कि जगह वही है लेकिन अब वहां बाग नहीं है. उन पांचो में से जो सबसे ज्यादा समझदार था वो कहने लगा, “देखो, मैं कह रहा था न कि खुदा से डरो, इस तरह फैसला न करो. हमने तो ‘इन्शा-अल्‍लाह’ भी न कहा कि अगर खुदा चाहेगा तभी हम फल तोड़ पाएंगे. अब तौबा कर लो.”

फिर सब तौबा करने लगे और आपस में एक दूसरे को दोष देने लगे. फिर जब उन्हें लगा कि अब आपस में झगड़ने से कुछ नहीं होगा. हमारा बाग अब नहीं रहा. हमने लालच किया और ये उसी का फल है कि हमारा फलों से लदा रहने वाला बाग अब नहीं है.

फिर उन सबने खुदा से माफी मांगी और खुदा सच्‍चे दिल से की गई दुआ और माफी कुबूल करता है.

इसके बदले में उन्हें खुदा ने फिर एक बाग का मालिक बना दिया जिसमें इतने अंगूर पैदा होते थे कि ख़च्‍चर भर-भर के अंगूर बाहर भेजे जाते थे.

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