सोमवार, 23 जुलाई 2012

कविताएँ, ग़ज़ल और गीत

                                          
देवेन्द्र कुमार पाठक के नवगीत

 

नवगीत 1                                                                                                                                         
जनभक्षी जंगल मेँ                                          
अभी तो नहीँ सूखी          
संवेदन की नदिया पर      
बढ़ता ही जाता है            
दिन-दिन कर उथलापन.   

खूब ली खँगाल              
आश्वस्तियोँ की तलछट,   
हाथ लगीँ अपने              
हर बार शंख-सीपियाँ ;    

बिकी हुई सोच-समझ      
पीट रही तालियाँ,           
नित्य नियम-नीतियाँ       
भुगतेँ तब्दीलियाँ ;          

बेशक अब तक बेड़ा         
लग जाता पार मगर        
नाविक-पतवारोँ की          
अनसुलझी अनबन .                                          

फूलोँ की बगिया मेँ           
साँपोँ की बाँवियाँ ;   
मनमोहिनी बीन              
बजा रहे हैँ सँपेरे;              

देख-देख ऊबा मन         
ये तिकड़मबाजियाँ ;          
स्वारथ के मारे             
सब गूँगे-बहरे ,                
कौन सुने-टेरे  !                 
जनभक्षी जंगल मेँ

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नवगीत 2

स्याही भरी दवात :                           
बरसाती रात  
अंबर के आले से,     
धरती के पन्ने पर ,    
उलट गई मानो        
स्याही भरी दवात :
बरसाती रात।

                                                  
टिपिर-टिपिर मेह-झड़ी,    
घर की खपरैल पीठ पर            
ताबड़तोड़ पड़ी ;    
बिजुरी बेहया बड़ी          
दाँत फाड़ चमक-चौँध             
हँसती है खड़ी-खड़ी ; 
हहर-हहर हड़काती,        
दीए को हवा हठी,           
निंदियाती आँखोँ के         
पलक-पटोँ पर मानो        
मार रही लात :
बरसाती रात ।

दिन भर के थके-पके ,      
कथरी मेँ अँटे-सटे,           
बँधुआ- हलवाही के;        
किस्तोँ मेँ कटे-बँटे,           
दुर्दिन-से बीत रहे             
बाप की ग़ुनाही के;          
भीतर की दाह-दहन,      
बनने को बड़वानल;        
ललक मार रही लपट,     
हुए बरस-बरसोँ             
मन-अंतस धुँधुआत :
बरसाती रात।

--


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जसबीर चावला की कविताएँ

image

द्वन्द

संलिप्त होना था
निर्लिप्त रहे
निर्लिप्त होना था
संलिप्त रहे
विरत हुए
आसक्त हुए
कशमकश बनी रही
हम हुए
कि
ना हुए ?

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जिन खोजा तिन पाईया.........!
                                  
तुमने
न खोजा
न गहरे पेठे
न तैरे
बस
रहे किनारे बैठे
हम तैरे भी
डूबे भी
उतराए
गोते खाए
मोती तो क्या
कोड़ी भी
ना पाए ?

--

प्रतिप्रश्न
                       
संवेदनशील/ बेबस
क्षेत्रों में ही
क्यूं
होती है
सदा
व्यवस्था/ निगरानी
क्यों नहीं होती
गश्त/ चोकसी
वेदनाहीन/निष्ठूर  आस्थाओं
के मठों में
जाति/ धरम के
आश्रमों में
अँधेरे  /विवेकशून्य कोनों में
सहस्त्रबाहू के
महलों में/ गलियों में

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वर्तमान में - स्प्रिंग क्रीक अपार्टमेंट्स
100 बकिंघम drive
सेंटा क्लेरा
केलिफोर्निया ( यू. एस)

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   कैस जौनपुरी की कविता


मोमबत्‍ती की तरह जिन्दगी हो


मोमबत्‍ती की तरह जिन्दगी हो
जलते रहें फिर भी देते रहें
रौशनी दुनिया को
क्‍या हुआ जो जलने में
अपना वजूद मिटता रहे
जब तक रहें देते रहें
रौशनी दुनिया को
आएंगीं कई मुश्किलें
हवाएं भी आंधियां भी
लड़खड़ाएं मगर देते रहें
रौशनी दुनिया को
न घबराएं कभी कि क्‍या मिला
अपना तो कुछ बचा नहीं
मिटाएं अन्धेरे और दें
रौशनी दुनिया को
सहारा न मिले किसी का भी
मगर धागा हौसले का छूटे नहीं
राख भी काम आए देने में
रौशनी दुनिया को
मुड़के पीछे देखें क्‍या
कोई निशानी बचे नहीं
कुछ दिल भी रौशन हों देने में
रौशनी दुनिया को
मोमबत्‍ती को बदले में कुछ न मिलेगा
लोग जलाएंगे भी तो रौशनी के लिए
बचकर तो सब चलते हैं, हम जलते रहें, देते रहें
रौशनी दुनिया को

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साक्षी दीक्षित की कविता

अजब मुंबई की गजब कहानी

मुंबई की कहानी मेरी जुबानी .......................

सच है ये मुंबई अभिनेताओं का शहर है , हर इंसान का यहां डबल रोल् है |
ज़िंदगी को यहां कैसे लोगों ने एडजेस्ट किया है , अपनी समस्याओं को निदान में बादल दिया है
कुछ भी नहीं असंभव यहां है ...........
हर कोई दौड़ रहा ,जल्दबाज़ी में मर रहा है
हर कोई झट से चेहरा बदल लेता है , मगर हम भी कुछ कम नहीं हर किसी का चेहरा पढ़ लेते हैं
हर बात को झट से भाप लेते हैं , मगर लोगों... यहां के अच्छे अभिनेता जो ठहरे
होठों पर हंसी और आंखों में आँसू भर के जी लेते हैं
हर कोई अपना दुख पी लेता है हर गम सी लेता है
और गुस्सा आए तो एक वडा पाव खाकर पानी पी लेता है ,
यहां एक खोली की चाल बीस लाख में मिलती है , और दो बेडरूम के फ्लेट की कीमत करोड़ों में होती है
जो फुटपाथ पर रहता है वो भी खुद को राजा समझता है
उसके लिए तो वो घर भी महलों से कम नहीं होता है
यहां पेट की आग तो दो रुपए मे बुझती है मगर सर पर छत 10000स्क्वेयर फीट मे बिकती है
फिर भी एक साम्य मुंबई सबमे बना कर रखता है
हर किसी को एक तराजू मे तौलता है यहां कोई राजा है न कोई भिखारी है
क्यूकी लोकल के डिब्बे मे सभी चड़ते बारी बारी है ........
यहां किसी में कोई भेद नहीं होता है लोकल ट्रेन में सबका एक ही भाव होता है
यहां सब एक दूसरे को जानते हैं , जानते ही नहीं पहचानते भी है
क्यूंकि हर इंसान की कहानी एक दूसरे से मिलती है ......
हर कोई किसी न किसी चीज़ का ईएमआई भर रहा होता है
तभी तो एक एक रुपए के लिए लड़ रहा होता है
जब भी कभी दोस्तों के साथ होटलों में जाते हैं ,
हर कोई अपने हिस्से का बिल खुद ही चुकाते हैं
किसी को किसी से कोई गिला या शिकायत नहीं होती है
ये मुंबई है यहां पैसों की इज्जत होती है
हर किसी को पता है की अगले की जेब खाली है
अगली सेलरी आते तक दिन निकालना कितना भारी है
हर कोई एक दूसरे के बारे में सोचकर चलता है
हर कोई 10 तारीख के बाद हाथ ही मलता है
इस भाग दौड़ में जिंदगी कितनी छोटी हो जाती है
दिल की हर तमन्ना ईएमआई की किश्तों में घुट जाती है
यहां के लोग आज में जीते हैं आज पर ही भरोसा करते हैं
कहते हैं "कल की चिंता तो कायर किया करते हैं "
मैंने तो केवल अब तक सुनी ही थी ये कहानी
पर अब मौका मिला है तो जीती भी हूं यही ज़िंदगानी
ऐसा लगा की बाँट लूं अपने दोस्तो से ये अनुभव थोड़ा
इसीलिए मैंने लिखी है ये "अजब मुंबई की गज़ब कहानी "

साक्षी दीक्षित (प्राची )

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मोतीलाल की कविता

कविता पहले जुड़ी हो जमीन से 
फिर तुम इसमेँ फूल खिलाना
बांहेँ डाल झूलना अपने बच्चोँ के संग

जुड़ी हुई जमीन से
क्या तुम बारुद उगाना चाहोगे
या जला डालोगे पूरी झोपड़ियाँ
थामोगे बन्दूक और
भून डालोगे कलुवा को
ताकि जमीँ से जुड़ी रहने से
बची रहे कविता

जमीन से अलग कविता
क्या खुद जी पायेगी
और क्या दिला पायेगी
कलुवा को न्याय

पहले इसे जोड़ना होगा
फूलमनी के संग
चाहे फिर तंदूर मेँ
स्वाहा कर दिया जाए
या बना दिया जाए पंगु
न्याय के मशीन को
और सच का आईना
बंद कर दिया जाए
हवाला के फाईलोँ मेँ

इन सबके बावजूद
जमीन से जुड़ी कविता
कुछ भी न बोलेगी
पर मारक प्रभाव से
तुम कितनी दूर भाग पाओगे

हाँ सबसे पहले कविता
कविता होनी चाहिए
हमारी जमीन की ।

* मोतीलाल/राउरकेला
* 9931346271
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विजय पाटनी की कविता



माँ
मुझे ना दे जन्म ...
मैं यूँ मर मर के, जी ना पाउंगी
अच्छा होगा यदि कोख में ही मर जाउंगी !! :).....


माँ , जब चाहा पापा ने अपना गुस्सा तुझ पर उतारा
वजह- बेवजह तुझ को मारा !!
तू चुप कर के , जो सहती है , मैं सह ना पाउंगी
अच्छा होगा, यदि कोख में ही मर जाउंगी !! :).....


माँ, जब तू ऑफिस से आने में दो घंटे लेट हो जाती है
घर पर सब का पारा गर्म हो जाता है
हजारों अनचाहे सवालों का जन्म हो जाता है
तू जिन सवालों को सुलझाती है , मै सुलझा ना पाउंगी
अच्छा होगा , यदि कोख में ही मर जाउंगी !! :).....


माँ , गैर मर्दों की आँखों में , तेरा वहशियत को पढना
रात में, सडक पर तेरा, तेज क़दमों से चलना
तू जितना डर कर चली है , मैं चल ना पाउंगी
अच्छा होगा, यदि कोख में ही मर जाउंगी !! :).....


माँ कहने को तो सांस लेने का अधिकार है तुझे
पर किसे पता है , कितना कर्ज दिल पर रख कर, तू मुस्कराती है ?
अपनों का भविष्य बनाते बनाते, खुद मिट जाती है !!
तुने खोया अपना वजूद , मै खुद को खो ना पाउंगी !
अच्छा होगा, यदि कोख में ही मर जाउंगी !! :).....


माँ, मैंने देखा है, हर बार तुझे ...अपने मन को मारते हुए
अपनों के हाथों ही हारतें हुए !!
हर कदम पर समाज-घर वालों का.. तुझे टोकते हुए !
अपनी हर इच्छाओं को, खुद से रोकतें हुए !!
मैंने देखा है तुझे ...
अपने सपनों को खोते हुए , अक्सर छुप छुप कर रोते हुए,
"स्त्री होने का एक अनचाहा बोझ ढोतें हुए"


तू जितना डर कर जी ली है, मै जी ना पाउंगी
अच्छा होगा , यदि कोख में ही मर जाउंगी !! :).....


 


विजय पाटनी


नसीराबाद राजस्थान


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मीनाक्षी भालेराव की कविताएं और गीत



राखी का उपहार

मैं पेड़ों को बांधूंगी राखी ,
पर्यावरण की रक्षा हेतु !
हरियाली का लूँ उपहार ,
मैं सूरज को बांधूंगी राखी !
उसका तेज बढाने हेतु ,
रौशनी का लूँ उपहार !
मैं बादलों को बांधूंगी राखी ,
सब जगह बरसे बरखा रानी !
पानी का लूँ उपहार ,
मैं धरती को बांधूंगी राखी !
उसकी उपज बढ़ाने हेतु ,
अन्न-धन का लूँ उपहार !


मिलकर

आओ मिलकर हम रंगें
धागे कुछ ऐसे !
बांधें भारत माता के सपूतों को ,
वचन ले देश की रक्षा का !
आओ कुछ रंगें धागे ऐसे
रोक सके हम भ्रूण हत्या को !
आओ कुछ रंगें धागे ऐसे
महंगाई के रावण को हम
सब मिल कर मार भगाएं
आओ रंगें कुछ धागे ऐसे
भ्रष्टाचार को नष्ट कर दें
आओ रंगें कुछ धागे ऐसे
माँ-बहनों की रक्षा कर पाएं


गलियाँ

हम गुजरे उन गलियों से ,
जिन से पहचान पुरानी है !
दिल में हजारों यादें लेकर ,
तकते रहे उन जगहों को !
अजीब सी ख्वाहिश जाग उठी ,
जो पल गुजरे उन गलियों में !
वापस मुझ को मिल जाये ,
वो इतराकर चलना ,
वो मनचलों को झेलना !
फिकरे कसते आशिकों को ,
दबी-दबी जुबान से !
कुछ खोटी-खरी कहना ,
हर रोज बन संवरकर !
मोहल्ले से गुजरना ,
गली के नुक्कड़ पर !
ठंडी-ठंडी आहें सुनना ,
ठिठक-ठिठक कर चलना !
कभी दुपट्टा अंगुलियों से ,
मसल कर घबराहट छुपना !
धीरे से नजरों का गिरना ,
फिर नजरों का उठाना !
इकरार किसी से नहीं था ,
पर इंतजार हुआ करता था तब !


मैं
मैं बगिया का फुल बनकर ,
हर तरफ खुशबू फैला दूँ !
मैं सावन का गीत बन कर ,
फिजा में बजती रहूँ !
मैं सीप का मोती बनकर ,
हर दिल अजीज रहूँ !
मैं बरखा की बूँदे बनकर ,
हर दिल सावन कर दूँ !
मैं शहनाई का स्वर बनकर ,
हर आंगन मंडप कर दूँ !

चाहती हूँ

मैं प्यास बढ़ाना नहीं चाहती ,
मैं प्यास बुझना चाहती हूँ !
हर अँधेरी कोठरी ,
मैं दीप जलना चाहती हूँ !
हर बुझती सांसों को ,
जीवन देना चाहती हूँ !
हर मुरझाये चेहरे पर ,
मुस्कान खिलाना चाहती हूँ !
ना थकूंगीं ना थमूंगी ,
बस इसी राह पर चलना चाहती हूँ !


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1 blogger-facebook:

  1. सभी रचनाएँ बहुत अच्छी लगीं.
    खासकर पाठक जी का नवगीत और चावला जी की रचनाएँ काफी प्रभावी लगीं .

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