गुरुवार, 26 जुलाई 2012

अनीता मिश्रा का आलेख - अपनी शर्तों पर जिया जीवन -डॉ. लक्ष्‍मी सहगल

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कानपुर के आर्य नगर स्‍थित डॉ. लक्ष्‍मी सहगल के क्‍लीनिक में 23 जुलाई की सुबह भी रोज की तरह तमाम महिलाएं एकत्र थीं। लेकिन वो आज स्‍वयं को दिखाने नहीं बल्‍कि अपनी प्रिय डाक्‍टर का हाल जानने आयी थीं। जैसे ही सूचना मिली कि डॉ. लक्ष्‍मी सहगल अब हमारे बीच नही रहीं, क्‍लीनिक में एक रूदन सा छा गया।

उनके साथ क्‍लीनिक में वर्षों से काम कर रही डॉ. शोभा विज बताती है कि उनके मरीज उनसे एक जुडाव महसूस करते थे, जबसे वो अस्‍पताल में भर्ती थी रोज हाल चाल पूछने आते रहते थे। ऐसा होना बहुत स्‍वाभाविक भी है आखिर डॉ. लक्ष्‍मी सहगल ने चिकित्‍सा को एक व्‍यवसाय की तरह नहीं सेवा भाव की तरह अपनाया था। उन्‍होनें कभी किसी गरीब से फीस नहीं ली उल्‍टे वो स्‍वंय दवा के पैसे मरीज को दिया करती थीं। गरीब बच्‍चों की फीस देना, किताबें देना, मुफ्‍त दवा देना ये सब करने में उन्‍हें सुख मिलता था।

ये उनका सेवाभाव ही है कि उन्‍होंने इच्‍छा जाहिर की थी कि मरणोपरान्‍त उनका शरीर दान कर दिया जाए। जीवन भर उन्‍होंने जरूरमंदों की सेवा की और जीवन के बाद भी उन्‍होंने दूसरों के बारे में ही सोचा।

24 अक्‍टूबर 1914 को मडास में जन्‍मी डॉ. लक्ष्‍मी सहगल ने मडास के मेडिकल कॉलेज से शिक्षा पूरी की। वकील पिता और सामाजिक कार्यकर्ता रही मां का प्रभाव उनके जीवन पर भी पड़ा। उन्‍होंने भारतीय स्‍वतत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी की तथा इडियन नेशनल आर्मी में ऑफिसर रही। 1940 में उन्‍होंने अपना क्‍लीनिक सिंगापुर में खोला जहां आप्रवासी मजदूरों और गरीबों का इलाज किया। 1943 में जब नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस सिंगापुर गए थे वहीं डाक्‍टर लक्ष्‍मी सहगल से उनकी मुलाकात हुई थी। नेता जी के विचारों से प्रभावित होकर उन्‍होंने रानी झांसी रेजीमेंट ज्‍वाइन किया। एशिया में इस तरह की यह पहली महिला रेजीमेंट थी।

डॉ. लक्ष्‍मी सहगल हमेशा से ही साहसी और निर्भीक थीं। डॉ. शोभा विज 1984 के दंगे का समय याद करते हुए बताती है कि जब आर्यनगर की एक गली में दंगाई घुसने लगे तब डॉ. सहगल ने पूरे साहस के साथ उन्‍हें रोका और कहा कि उनकी लाश से गुजर कर ही वो इस गली मे जा पाएगे। एक निर्भीक स्‍त्री के दृढ़ इरादों के समक्ष दंगाइयों की हिम्‍मत भी आगे बढ़ने की नहीं पड़ी।

वामपंथी विचार धारा से प्रभावित रही डॉ. लक्ष्‍मी सहगल ने 1971 में भारतीय कम्‍यूनिस्‍ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) ज्‍वाइन की तथा राज्‍यसभा की सदस्‍य रहीं। 1998 में उन्‍हें पद्‌म विभूषण से नवाजा गया। 2002 में वो वामपंथी पार्टियों की तरफ से राष्‍ट्रपति पद की प्रत्‍याशी बनायी गयीं।

अपना सम्‍पूर्ण जीवन जरूरतमंदों की सेवा में समर्पित कर देने वाली डॉ. सहगल का ईश्‍वर जैसी किसी सत्‍ता पर विश्‍वास नहीं था। इस संदर्भ में एक घटना का जिक्र करते हुए डॉ. शोभा विज बताती हैं कि एक बार कोई महिला उन्‍हें देवी जागरण का प्रसाद देने आई तो उन्‍होंने कहा कि “अपने अंदर की देवी और उसकी शक्‍ति को पहचानो, देवी कहीं और नहीं है स्‍वयं तुम्‍हारे अंदर है''।

डॉ. लक्ष्‍मी सहगल का विवाह 1947 में लाहौर में कर्नल प्रेम कुमार सहगल से हुआ था। इसके बाद वो कानपुर आ गयी तथा स्‍थायी रूप से यही रहने लगी उनकी पुत्री सुश्री सुभाषिनी अली प्रसिद्ध मार्क्‍सवादी नेता हैं तथा सांसद रही हैं। स्‍वास्‍थ्‍य ठीक न रहने के बाद भी वो नियमित रूप से क्‍लीनिक आती थीं, मेडिकल कैंप लगातीं, मुफ्‍त में चिकित्‍सा और दवा उपलब्‍ध कराती थी।

डॉ. सहगल की सबसे खास बात है कि वह बेहद जीवंत व्‍यक्‍तित्‍व की थीं। उम्र और स्‍वास्‍थ्‍य उनके लिए कभी भी जीवन से, लोगों से कटने का बहाना नहीं रहें। डॉ. विज बताती हैं कि वो अटैक के एक दिन पहले तक क्‍लीनिक आयीं थीं। उनकी कर्मठता हम लोगों के लिए प्रेरणास्रोत थी।

डॉ. सहगल को हमेशा सलीके से रहना पसंद था। खाने की भी बेहद शौकीन थी। उनके क्‍लीनिक के पास रहने वाले व्‍यवसायी रोहित टंडन बताते है कि उनके बनाए हुए कोल्‍ड सैंडविच उन्‍हें बेहद पसंद थे।

रानी लक्ष्‍मी बाई रेजीमेंट की वीरांगना आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन अपने शर्तों पर जिया गया उनका जीवन अपने आप में एक मिसाल है।

प्रसिद्ध लेखक रिल्‍के का कहना है कि “ऐसी लड़कियां या स्‍त्रियां होगीं जिनके होने का अर्थ पुरूषपन के सम्‍मुख मात्र दूसरा ध्रुव उपस्‍थित करना ही नहीं होगा पर आत्‍म-संपन्‍न होना होगा''।

कैप्‍टन लक्ष्‍मी सहगल ने ऐसा ही आत्‍म-संपन्‍न जीवन जिया।

अनीता मिश्रा

2 blogger-facebook:

  1. sunita12:17 pm

    डॉ. सहगल के बारे में जान कर अच्छा लगा ...वाकई उनका जीवन प्रेरणा देने वाला है.....बढिया लेख ....

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