शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

नीता सोनी, शबनम हुसैन, साधना शुक्ला, उपासना सारंग त्यागी तथा विम्मी मनोज की कलाकृतियाँ

आर्टिस्ट गिल्ड ऑफ एमपी द्वारा आयोजित समूह चित्र प्रदर्शनी स्वराज वीथि, रविन्द्र भवन परिसर में प्रदर्शित कलाकृतियाँ -

शबनम हुसैन (shabnamjuzer@gmail.com ) की कलाकृति -

शबनम हुसैन ने कला की औपचारिक शिक्षा नहीं पाई है। आप स्वतः स्फ़ूर्त कला की विशेषताएँ अपने में समेटे शबनम के चित्र आकारों की सघनता और रंगों की मोहकता से केनवास पर अनोखा संसार रचते हैं। कभी सीधी तो कभी घुमावदार रेखाएं नए-नए रूपों को तलाशती, एक दूसरे से गड्ड मड्ड होती और फ़िर अलग होकर अपने स्वतंत्र अस्तित्व से चित्रों को नए अर्थ प्रदान करती हैं। शबनम के चित्रों में रेखाएं और रंग पूर्ण सार्थकता के साथ विद्यमान होते हैं।

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नीता सोनी  की कलाकृति -

नीता अमूर्तन शैली में काम करना अधिक पसंद करती हैं। उनके केनवास पर बिखरे रंग एक दूसरे में घुलते मिलते और इस प्रकार नए-नए रंगों को जन्म देते हैं। भावना के आवेगों को पूरी शिद्दत से दर्शाते नीता के चित्रों में आप एक पल में अजब सा शोर और अगले ही पल गजब का सन्नाटा महसूस कर सकते हैं।

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साधना शुक्ला (sadhanashukla@ovi.com ) की कलाकृति -

साधना के चित्रों में सामाजिक सरोकारों को स्पष्ट देखा जा सकता है। विशेष रूप से सामाजिक न्याय और महिलाओं और बच्चों के कल्याण जैसे विषय उनके केन्द्र में होते हैं। सघन रेखाओं से आकृतियों को बुनते हुए साधना आकृतियों के बीच स्पेस का अद्भुत प्रयोग करती हैं जो चमत्कृत करता है। परंतु चमत्कृत करना इनका अभीस्ट नहीं है। गंभीर विषयों पर केंद्रित साधना के रेखांकन विषयों को पूरी ईमानदारी से समेटे रहते हैं।

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उपासना सारंग त्यागी ( upasana.sarang17@gmail.com ) की कलाकृति

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उपासना की पैलेट पर चटख रंगों की बहुतायत है। रंग संयोजन में चित्रकार की अद्भुत दक्षता दिखाते उपासना के चित्र रंगों का मोहक संसार रचते हैं। मानव आकृतियाँ में रेखाओं की सरलता से पैदा की गई भावों की सादगी वैसी ही होती है जैसी किसी  अबोध बालक के होंठों पर खिलती मुस्कान। सादगी और सरलता उपासना के चित्रों में सहज रूप से पाई जाती है बिना किसी बनावट के।

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डॉ. विम्मी मनोज (vim_manoj@rediffmail.com ) की कलाकृति

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स्व प्रशिक्षित चित्रकार डाक्टर विम्मी मनोज का जन्म पुणे महाराष्ट्र में हुआ जो कला और संस्कृति के कारण अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। पुणे के कलात्मक माहौल का ही असर रहा की विम्मी के भीतर छिपा कलाकार बिना किसी औपचारिक शिक्षा के स्वतः बाहर आया। विम्मी की कला केवल कागज या केनवास तक ही सीमित नहीं है वह कविता के रूप में भी कागज पर उतरती है और ड्रिफ़्टवुड के शिल्पों में भी मुखर होती है। उनके चित्र चेतन और अवचेतन के बीच कला के निरंतर अनुसंधान में एक सीढ़ी से प्रतीत होते हैं।

1 blogger-facebook:

  1. बहुत सुन्दर......
    अब देख कर आने को जी करने लगा.

    शुक्रिया
    अनु

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