शनिवार, 28 जुलाई 2012

कैस जौनपुरी की प्रस्तुति : कहानियां कुरआन की - हज़रत यूसुफ़

ब हज़रत यूसुफ़ ने अपने वालिद से कहा कि, “अब्बा! मैंने ख़्वाब में ग्यारह सितारे, और सूरज, और चांद देखे हैं. उनको अपने सामने सज्दा करते हुए देखा है.” तब हज़रत यूसुफ़ के वालिद हज़रत याकूब ने फ़रमाया कि, “बेटा! अपने इस ख़्वाब को अपने भाइयों के सामने बयान मत करना. नहीं तो वे तुम्हें नुकसान पहुंचाने के लिए कोई ख़ास उपाय करने लगेंगे. इसमें कोई शक नहीं कि शैतान आदमी का खुला दुश्मन है. और इसी तरह तुम्हारा रब तुमको चुनेगा और तुमको ख़्वाबों की ताबीर का इल्म देगा, और तुम पर याकूब के खानदान पर अपना इनाम पूरा करेगा जैसा कि इससे पहले तुम्हारे दादा-परदादा यानी इब्राहीम और इसहाक पर अपना इनाम पूरा कर चुका है, वाकई तुम्हारा रब बड़ा इल्म वाला है.”

यूसुफ़ के सौतेले भाई आपस में बातें करते थे कि, “यूसुफ़ और उसका भाई बिनयामीन हमारे बाप को हमसे ज्यादा प्यारे हैं, हालांकि हम दस हैं, और वो सिर्फ दो. वाकई हमारे बाप किसी खुली गलती में हैं. या तो यूसुफ़ को कत्ल कर देते हैं, या उसको किसी जमीन में गाड़ देते हैं. तब हमारे बाप का ध्यान सिर्फ हमारी तरफ हो जाएगा. और तब हमारे सब काम बन जाएंगे. उन्हीं में से एक ने कहा कि, “यूसुफ़ को कत्ल मत करो, उसको किसी अन्धेरे कुएं में डाल देते हैं, ताकि उसको कोई राह चलता निकाल ले जाए. अगर कुछ करना है तो यही सबसे सही उपाय है.

इसके बाद सब मिलकर हज़रत याकूब के पास गए और कहा, “अब्बा! ऐसी क्‍या वजह है कि यूसुफ़ के बारे में आप हमारा भरोसा नहीं करते, जबकि हम तो उसका भला चाहने वाले हैं. आप कल उसे हमारे साथ खेलने भेजिए, ताकि हम साथ में खेलें और खाएं. हम उसकी पूरी हिफ़ाज़त करेंगे.”

हज़रत याकूब ने फ़रमाया कि, “मुझे डर है इस बात का कि कहीं तुम उसे ले तो जाओ, फिर तुम सबका ध्यान उस पर न रहे और उसे कोई भेड़िया खा जाए तो क्‍या होगा?”

वे सब बोले, “हम सब के रहते हुए अगर उसे कोई भेड़िया खा जाए तो हम तो बिल्कुल ही गए गुजरे हुए!”

फिर हज़रत याकूब ने यूसुफ़ को उनके साथ जाने दिया. उन भाइयों ने पक्‍का इरादा कर लिया था कि यूसुफ़ को किसी अन्धेरे कुएं में डाल देंगे.

फिर रात को वो सब हज़रत याकूब के पास रोते हुए पहुंचे और कहने लगे, “अब्बा! हम सब तो आपस में दौड़ने में लग गये थे और हमने यूसुफ़ को अपने सामान के पास बैठा दिया था और एक भेड़िया उन्हें खा गया. लेकिन हम कितने भी सच्‍चे क्‍यूं न हों, आप हमारा यकीन तो करने वाले हैं नहीं.” वे सब यूसुफ़ के कुर्ते पर झूठ-मूठ का खून भी लगा लाए थे.

हज़रत याकूब ने फ़रमाया, “ऐसा नहीं है, बल्कि तुमने अपने मन से ये कहानी बना ली है. कुछ बातें हैं जो तुम नहीं जानते. इसलिए मैं सब्र करूंगा. कोई शिकायत नहीं करूंगा. और तुम लोग जो कहानी बना रहे हो अल्‍लाह तआला सब जानता है. और वो ही मदद करेगा.” असल में हज़रत याकूब जानते थे कि यूसुफ़ को इस तरह कुछ नहीं होगा. इसमें भी खुदा की कोई मरजी होगी. जब वो चाहेगा तो यूसुफ़ को वापस मिला देगा. मेरे खोजने से न मिलेगा.

फिर उस रास्ते से एक काफिला निकला. उन्होंने अपना एक आदमी पानी लाने के लिए भेजा. उस आदमी ने जब पानी निकालने के लिए अपना डोला कुएं में डाला तो यूसुफ़ उसी डोले में बैठ कर ऊपर निकल आए. उस आदमी ने जब इस बच्‍चे को देखा तो बड़ा हैरान हुआ और कहने लगा, “अरे भाई, बड़ी खुशी की बात है. यह तो अच्‍छा लड़का निकल आया.” और उन्होंने यूसुफ़ को छिपा लिया ताकि कोई दावेदार न आ आए. उन्होंने सोचा कि, “इसे मिस्र ले जाकर किसी बड़े आदमी के हाथ बेचकर खूब मुनाफ़ा कमाएंगे.” और उन्होंने यूसुफ़ को बहुत ही कम कीमत पर, यानी गिनती के चन्द दिरहम के बदले मिस्र के बादशाह के अज़ीज़ के हाथ बेच दिया. मिस्र में बादशाह के बाद जो सबसे अहम पदवी थी उसे अज़ीज़ कहा जाता था.

अज़ीज़ ने अपनी बीवी ज़ुलेखा से कहा, “इसको अच्छे से रखो, क्‍या पता ये हमारे किसी काम आए या हम इसे अपना बेटा ही बना लें.”

फिर जब यूसुफ़ अपनी जवानी को पहुंचे तो ज़ुलेखा उनसे अपना मतलब हासिल करने को उनको फुसलाने लगी. और एक दिन तो सारे दरवाजे बन्द कर दिए और कहने लगी कि, “आ जाओ, तुम्हीं से कहती हूं.” यूसुफ़ कहने लगे, “यह तो भारी गुनाह है. अल्‍लाह बचाए. और फिर अज़ीज़ मेरा मालिक है. मुझे कितनी अच्छी तरह रखा. मेरी परवरिश की. ऐसे नमक-हराम को कामयाबी नहीं मिलती.”

ज़ुलेखा के दिल में तो यूसुफ़ का खयाल जम ही रहा था. यूसुफ़ को भी ज़ुलेखा का कुछ-कुछ खयाल होने लगा था मगर उन्हें मालूम था कि ऐसा करना ठीक नहीं होगा. और उन्होनें खुद पर काबू रखा, नहीं तो वो भी ज़ुलेखा की तरफ झुक सकते थे. मगर उन्हें खयाल आया कि, “नहीं, ऐसा नहीं करना है.” और वो खुद को बचाने के लिए दरवाजे की तरफ दौड़े. ज़ुलेखा ने पीछे से उनका कुर्ता पकड़ लिया और कुर्ता पीछे से फट गया. तभी दोनों ने दरवाजे पर अज़ीज़ को खड़ा पाया.

ज़ुलेखा अज़ीज़ को सामने देखकर घबरा गयी और फौरन बात बनाकर कहने लगी, “जो आदमी तुम्हारी बीवी के साथ गलत हरकत करने का इरादा रखे उसकी सज़ा सिवाए इसके और क्‍या है कि वह जेलख़ाने भेजा जाए या और कोई दर्दनाक सज़ा हो.”

हज़रत यूसुफ़ ने कहा, “यही मुझसे अपना मतलब निकालने को फुसलाती थी.”

फिर उस औरत के खानदान में से एक दूध पीते बच्‍चे ने गवाही दी कि, “इनका कुर्ता अगर आगे से फटा है तो औरत सच्‍ची है और ये झूठे. और अगर इनका कुर्ता पीछे से फटा है तो औरत झूठी और ये सच्‍चे.”

सो जब अज़ीज़ ने हज़रत यूसुफ़ का कुर्ता पीछे से फटा हुआ देखा तो कहने लगा, “यह तुम औरतों की चालाकी है, बेशक तुम्हारी चालाकियां ग़ज़ब की होती हैं.”

अज़ीज़ ने हज़रत यूसुफ़ से कहा, “ऐ यूसुफ़! इस बात को जाने दो.” और अज़ीज़ ने ज़ुलेखा से कहा, “ऐ औरत! तू अपने कुसूर की माफ़ी मांग, बेशक पूरी की पूरी तू ही कुसूरवार है.”

फिर कुछ औरतें जो कि शहर में रहती थीं यह बात करने लगीं कि, “अज़ीज़ की बीवी अपने ग़ुलाम को उससे अपना मतलब हासिल करने के वास्ते फुसलाती है. उस ग़ुलाम का इश्क़ उसके दिल में जगह कर गया है. हम तो उसे खुली ग़लती में देखते हैं.”

और जब ज़ुलेखा ने उन औरतों की यह बुरी बातें सुनीं तो किसी के हाथ उनको बुलावा भेजा कि, “तुम्हारी दावत है.” और जब सब औरतें आईं तो ज़ुलेखा ने उनके वास्ते तकिया लगाया, अलग-अलग तरह की खाने की चीजें और मेवा दिया. और हर एक को एक-एक चाकू दे दिया ताकि वो छीलकर खाने वाले फल छीलकर खा सकें. यह तो सिर्फ़ बहाना था, असली ग़रज़ यह थी कि जब ये यूसुफ़ को देखें तो अपने काबू में न रहें और खुद को इस चाकू से ज़ख़्मी कर लें.

फिर ज़ुलेखा ने यूसुफ़ से कहा, “ज़रा इनके सामने तो आ जाओ.” हज़रत यूसुफ़ ने यह सोचकर कि, “कोई जायज़ और सही जरूरत होगी” उन औरतों के सामने आ गए.

सो उन औरतों ने जब उनको देखा तो उनके हुस्‍न और खूबसूरती पे हैरान रह गईं और उन सब पर ऐसी बदहवाशी छाई कि अपने हाथ काट लिए, और कहने लगीं, “खुदा की पनाह, यह शख़्स आदमी हरगिज़ नहीं, यह तो कोई फ़रिश्ता है. ऐसा हुस्‍न और जमाल आदमी में कहां होता है. फ़रिश्ते ही ऐसे नूरानी होते हैं.”

तब ज़ुलेखा ने उन औरतों से कहा, “यह शख़्स वही है जिसके बारे में तुम सब मुझको बुरा-भला कहती थीं कि मैं अपने ग़ुलाम को चाहती हूं. और वाक़ई मैंने इससे अपना मतलब हासिल करने की ख़्वाहिश की थी मगर यह पाक-साफ़ रहा, और अगर आइन्दा भी मेरा कहना नहीं करेगा तो बेशक जेलख़ाने भेजा जाएगा और बेइज़्ज़त भी होगा.”

हज़रत यूसुफ़ ने दुआ की कि, “ऐ मेरे रब! जिस काम की तरफ़ ये औरतें मुझको बुला रही हैं उससे तो जेल में जाना ही मुझको ज़्यादा पसन्द है. और अगर आप इनके दाव-पेच को मुझसे दूर न करेंगे तो मैं उनकी तरफ़ झुक जाऊंगा और नादानी का काम कर बैठूंगा.”

सो उनके रब ने उनकी दुआ कुबूल की और उन औरतों के दाव-पेच को उनसे दूर रखा.

फिर लोगों में यह बात फैल गई कि कुछ औरतों ने यूसुफ़ के लिए अपने हाथ काट लिए. लोगों में हो रही चर्चा को बन्द करने के लिए अज़ीज़ को लगा कि, “कुछ समय के लिए यूसुफ़ को जेल में डालना ही ठीक रहेगा.”

और इस तरह हज़रत यूसुफ़ को जेल में डाल दिया गया. उनके साथ और भी दो ग़ुलाम क़ैदख़ाने में डाले गए. उनमें से एक ने कहा कि, “मैं अपने को ख़्वाब में देखता हूं कि शराब निचोड़ रहा हूं.” और दूसरे ने कहा कि, “मैं अपने को इस तरह देखता हूं कि मैं अपने सर पर रोटियां लिए जाता हूं, उनमें से परिन्दे खाते हैं.”

फिर दोनों ने हज़रत यूसुफ़ से कहा, “हमको इस ख़्वाब की ताबीर बतलाइए, आप हमको नेक आदमी मालूम होते हैं.”

हज़रत यूसुफ़ ने कहा, “ऐ क़ैदख़ाने के दोनों साथियों! तुममें एक तो बरी होकर अपने आक़ा को शराब पिलाया करेगा और दूसरा सूली दिया जाएगा, और उसके सर को परिन्दे खाएंगे.”

और जिस शख़्स की रिहाई का गुमान था उससे हज़रत यूसुफ़ ने कहा कि, “अपने आक़ा के सामने मेरा भी ज़िक्र करना कि एक शख़्स बेकुसूर क़ैद है.” उसने वायदा कर लिया फिर उसको अपने आक़ा के सामने ज़िक्र करना शैतान ने भुला दिया तो क़ैदखाने में और भी कुछ साल हज़रत यूसुफ़ को रहना पड़ा.

कुछ दिन बाद मिस्र के बादशाह ने कहा, “मैं ख़्वाब देखता हूं कि सात गायें मोटी-ताज़ी हैं जिनको सात कमजोर और दुबली गायें खा गईं, और सात बालें हरी हैं और उनके अलावा सात बालें और हैं जो कि सूखी हैं. ऐ दरबार वालों! अगर तुम ताबीर दे सकते हो तो मेरे इस ख़्वाब के बारे में मुझको जवाब दो.” सारे दरबारी कहने लगे कि, “यूं ही परेशान ख़्यालात हैं, और हम लोग ख़्वाबों की ताबीर का इल्म भी नहीं रखते.”

उन दो क़ैदियों में से जो रिहा हो गया था, उसे अब हज़रत यूसुफ़ का ख़्याल आया और तब उसने कहा, “मैं इस ख़्वाब की ताबीर की ख़बर लाए देता हूं, आपलोग मुझको ज़रा जाने की इजाज़त दीजिए.”

वह क़ैदख़ाने में पहुंचा और कहा, “ऐ यूसुफ़! ऐ सच्‍चाई के जानने वाले, आप हमलोगों को इस ख़्वाब का जवाब यानी ताबीर दीजिए कि सात गायें मोटी हैं, उनको सात दुबली गायें खा गईं, और सात बालें हरी हैं और उसके अलावा सात बालें सूखी हैं. आप बता दीजिए ताकि मैं बादशाह के पास लौटकर जाऊं, ताकि उनको भी मालूम हो जाए.

हज़रत यूसुफ़ ने फ़रमाया कि, “तुम सात साल लगातार अनाज बोना, फिर जो फल काटो उसको बालों में ही रहने देना, ताकि घुन न लग जाए, हां मगर थोड़ा सा जो तुम्हारे खाने में आए, निकाल लेना. फिर उसके बाद सात साल ऐसे सख़्त आएंगे जो कि उस जमा किए हुए अनाज को खा जाएंगे जिसको तुमने उन सालों के वास्ते जमा कर रखा है. फिर उसके बाद एक साल ऐसा आएगा जिसमें लोगों के लिए ख़ूब बारिश होगी और लोग अंगूर का रस निचोड़ कर पिएंगे.”

जब बादशाह को अपने ख़्वाब का मतलब पता चला तो उसने हुक्‍म दिया कि, “यूसुफ़ को मेरे पास लाओ.” फिर जब दूत हज़रत यूसुफ़ के पास पहुंचा तो उन्होंने कहा, “तू अपनी सरकार के पास लौट जा. फिर उनसे पूछ कि उन औरतों का क्‍या हाल है जिन्होंने अपने हाथ काट लिए थे.”

फिर बादशाह ने उन औरतों को बुलवाया और पूछा, “तुम्हारा क्‍या कहना है, जब तुमने यूसुफ़ से अपने मतलब की ख़्वाहिश की.” उन औरतों ने कहा, “अल्‍लाह की पनाह, हमको यूसुफ़ में ज़रा भी बुराई की बात मालूम नहीं हुई.” अज़ीज़ की बीवी कहने लगी कि, “अब तो सच बात ज़ाहिर हो ही गई. मैंने ही यूसुफ़ से अपने मतलब की ख़्वाहिश की थी, और बेशक यूसुफ़ सच्‍चे हैं.”

हज़रत यूसुफ़ ने फ़रमाया, “ये सब मैंने सिर्फ़ इस वजह से किया ताकि अज़ीज़ को यकीन के साथ मालूम हो जाए कि मैंने उसकी ग़ैर-मौजूदगी में उसकी आबरू पर हाथ नहीं डाला.”

यह सब सुनकर बादशाह ने कहा, “यूसुफ़ को मेरे पास लाओ, मैं उनको ख़ास अपने काम के लिए रखूंगा.”

फिर जब बादशाह ने हज़रत यूसुफ़ से बातचीत की तो उनसे कहा, “आज से हम तुम्हें अपने करीब एक ख़ास ओहदा देते हैं. तुम हमारे लिए इज़्ज़त वालों में से एक हो.”

हज़रत यूसुफ़ ने कहा, “मुझे मुल्क के ख़ज़ाने की जिम्मेदारी दीजिए, मैं उनकी हिफ़ाज़त भी रखूंगा और मैं इन बातों से खूब वाक़िफ़ भी हूं.”

इस तरह बजाय इसके कि बादशाह उन्हें कोई ख़ास ओहदा देता, एक तरह से अपनी पूरी जिम्मेदारियां हज़रत यूसुफ़ को दे दीं. अब एक तरह से बादशाह हज़रत यूसुफ़ ही हो गए थे, जबकि असली बादशाह सिर्फ़ नाम का बादशाह रहा. और हज़रत यूसुफ़ अब अज़ीज़ के ओहदे से मश्हूर हुए.

फिर जब अकाल पड़ा तब क़िनआन में भी अकाल पड़ा तो यूसुफ़ के सौतेले भाई अनाज लेने के लिए मिस्र शहर में आए और हज़रत यूसुफ़ के पास पहुंचे, तो उन्होंने उन सबको पहचान लिया मगर वे सब भाई यूसूफ़ को नहीं पहचान सके.

और जब हज़रत यूसुफ़ ने उनके राशन का सामान तैयार करवा दिया तो चलते वक़्‍त कह दिया कि, “अगली बार अपने सौतेले भाई को भी साथ लाना ताकि उसका हिस्सा भी दिया जा सके. और अगर तुम दुबारा आए और उसे साथ न लाए तो न मेरे पास तुम्हारे नाम का राशन होगा और न तुम मेरे पास आना.” वे सब बोले, “देखिए, हम अपनी कोशिश भर तो उसके बाप से उसको मांगेंगे और हम इस काम को ज़रूर करेंगे.”

फिर हज़रत यूसुफ़ ने अपने नौकरों से कहा, “इन्होंने अनाज के लिए जो पैसे दिए हैं उन्हीं के सामान में छुपाकर रख दो, ताकि जब घर जाएं तो उसे पहचान लें, शायद ये अहसान देखकर फिर दोबारा आएं.”

फिर जब सब भाई लौटकर अपने बाप हज़रत याकूब के पास पहुंचे तो कहने लगे, “ऐ अब्बा! हमारे लिए पूरी तरह से अनाज पर पाबन्दी लगा दी गई है. इसलिए आप हमारे भाई बिनयामीन को हमारे साथ भेज दीजिए ताकि हम फिर से अनाज ला सकें, और हम उसकी पूरी हिफ़ाज़त करेंगें.”

हज़रत याकूब ने फ़रमाया कि, “बस रहने दो, मैं इस बार भी तुम्हारा वैसा ही यकीन करता हूं जैसा इससे पहले इसके भाई यूसुफ़ के बारे में तुम पर यकीन कर चुका हूं. सो, इसे भी अल्‍लाह के हवाले करता हूं, वही सबसे बड़ा रखवाला है, और वह सब मेहरबानों में सबसे बड़ा मेहरबान है.”

और इस बातचीत के बाद, जब उन्होंने अपना सामान खोला तो उसमें उनको उनकी जमा-पूंजी भी मिल गई जिसे उन्हें वापस कर दी गई थी. वे कहने लगे, “ऐ अब्बा! लीजिए, और हमको क्‍या चाहिए. हमारे रुपए-पैसे भी तो हमको लौटा दिए गए हैं. हम अपने घरवालों के वास्ते और राशन और अनाज लाएंगे, और अपने भाई की ख़ूब हिफ़ाज़त करेंगे. और एक ऊंट के बोझ का राशन और लाएंगे. यह थोड़ा सा राशन है.”

हज़रत याकूब ने फ़रमाया कि, “मैं उस वक्‍त तक हरगिज़ इसको तुम्हारे साथ न भेजूंगा जब तक कि तुम सब अल्‍लाह की कसम खाकर मुझसे पक्‍का वादा न करोगे, तब तुम इसे जरूर ले जा सकोगे, हां एकदम से फंस ही जाओ तो मजबूरी है.”

फिर सबने क़सम खाई और जब वे क़सम खाकर वादा कर चुके तब उन्होंने कहा कि, “हम लोग जो कुछ बात-चीत कर रहे हैं ये सब अल्‍लाह ही के हवाले है.”

फिर चलते वक़्त हज़रत याकूब ने कहा कि, “ऐ मेरे बेटों! सब के सब एक ही दरवाजे से मत जाना, बल्कि अलग-अलग दरवाजों से जाना.”

फिर मिस्र पहुंचकर जैसा उनके बाप ने कहा था, उसी तरह शहर में दाख़िल हुए. फिर जब ये लोग हज़रत यूसुफ़ के पास पहुंचे तो उन्होंने अपने भाई बिनयामीन को पहचान लिया और अकेले में चुपके से कहा कि, “मैं तेरा भाई यूसुफ़ हूं. ये लोग जो कुछ तेरे साथ बुरा सुलूक करते रहे हैं उसका बुरा मत मानना.” बिनयामीन ने कहा, “भाई, क्‍या कोई ऐसी तरकीब है जिससे मैं यहीं आपके पास रह जाऊं?” ये लोग अब्बा से कसम खाकर वादा करके आए हैं कि मुझे सही-सलामत वापस ले जाएंगे. अगर बिना किसी वजह से मैं यहां रूका तो उन्हें परेशानी होगी और दुख भी होगा. फिर ये लोग भी न मानेंगे.”

हज़रत यूसुफ़ ने कहा, “एक रास्ता है लेकिन उसमें तुम्हारी ज़रा सी बदनामी होगी.” बिनयामीन ने कहा, “कोई फिकर नहीं.”

फिर जब उन सबका राशन का सामान तैयार हो गया तब हज़रत यूसुफ़ ने पानी पीने का बरतन जिससे नापकर अनाज भी दिया जाता था, बिनयामीन के सामान में रख दिया. फिर एक पुकारने वाले ने आवाज़ दी, “ऐ क़ाफ़िले वालों! तुम जरूर चोर हो.” फिर सबने कहा, “क्‍या तुम्हारी कोई चीज़ खो गई है?” पुकारने वाले ने कहा, “हमको बादशाही पैमाना नहीं मिलता, वह ग़ायब है और जो शख़्स उसको लाकर हाजिर करे उसको एक ऊंट के बोझ के बराबर अनाज मिलेगा. और मैं उसको दिलवाने का जिम्मेदार हूं.” ये लोग कहने लगे, “ख़ुदा की कसम, तुमको खूब मालूम है कि हमलोग मुल्क में फ़साद फैलाने नहीं आए, और हमलोग चोरी करने वाले नहीं.” उन ढ़ूंढ़ने वालों ने कहा, “अच्छा! अगर तुम झूठे निकले तो उस चोर की सज़ा क्‍या?” उन लोगों ने जवाब दिया, “जिस शख़्स के सामान में आपका बरतन मिले, वही शख़्स अपनी सज़ा है, आप उसे अपना ग़ुलाम बना लें. हम चोरों को ऐसी ही सज़ा दिया करते हैं.”

फिर हज़रत यूसुफ़ ने अपने भाई बिनयामीन के थैले से पहले दूसरे लोगों के सामान की तलाशी शुरू की. और आख़िर में उस बरतन को अपने भाई के थैले से बरामद कर लिया. यही एक रास्ता था बिनयामीन को अपने पास रोकने का, क्‍योंकि मिस्र बादशाह के कानून के मुताबिक वो बिना किसी बात के एक मुसाफ़िर को अपने पास नहीं रोक सकते थे. मगर एक चोर को ग़ुलाम बनाकर आसानी से रख सकते थे. और दोनों भाईयों को ये तरकीब अपनानी पड़ी.

फिर दूसरे दस भाई कहने लगे, “साहिब, अगर बिनयामीन ने चोरी की तो ताज्‍जुब नहीं, क्‍योंकि इसका एक भाई था वह भी इसी तरह पहले चोरी कर चुका है.”

हज़रत यूसुफ़ ने उनकी इस बात को चुपचाप सुन लिया और इस राज़ को उनके सामने ज़ाहिर नहीं किया. लेकिन अपने मन में कहा, “हम दोनों भाइयों से तो चोरी का जुर्म नहीं हुआ और तुमने तो इतना बड़ा काम किया कि कोई माल ग़ायब करता है, तुमने तो आदमी ग़ायब कर दिया और मुझको मेरे बाप से बिछड़ा दिया. और ज़ाहिर है कि आदमी की चोरी माल की चोरी से ज़्यादा बुरी है.”

इन भाइयों ने जो कहा कि यूसुफ़ ने भी चोरी की थी उसका किस्सा कुछ यूं है कि बचपन में यूसुफ़ की परवरिश उनकी फूफी करती थीं. जब होशियार हुए तब हज़रत याकूब ने उन्हें वापस लेना चाहा, लेकिन उनकी फूफी उन्हें अपने पास रखना चाहती थीं इसलिए उनकी कमर में एक पटका कपड़ों के अन्दर बांधकर मश्हूर कर दिया कि पटका गुम हो गया, और जब तलाशी ली तो उनकी कमर में निकला. और शरीअत के कानून के मुताबिक यूसुफ़ को फूफी के कब्ज़े में रहना पड़ा. यहां तक कि जब फूफी इस दुनिया से चल बसीं तब यूसुफ़ हज़रत याकूब के पास आए.

फिर वो सब कहने लगे, “ऐ अज़ीज़! इस बिनयामीन का एक बहुत बूढ़ा बाप है, सो आप ऐसा कीजिए कि इसकी जगह हम में से एक को रख लीजिए और अपना ग़ुलाम बना लीजिए.”

हज़रत यूसुफ़ ने कहा, “ऐसी बेइन्साफ़ी की बात से ख़ुदा बचाए कि जिसके पास हमने अपनी चीज़ पाई है उसके सिवा किसी दूसरे शख़्स को पकड़ कर रख लें, इस हालत में तो हम बड़े बेइन्साफ़ समझे जाएंगे.”

फिर जब उन सबको बिल्कुल उम्मीद न रही कि बिनयामीन को वापस किया जाएगा तब उस जगह से अलग होकर आपस में मश्‍विरा करने लगे. उन सबमें जो सबसे बड़ा था उसने कहा, “क्‍या तुमको मालूम नहीं कि अब्बा तुम सबसे ख़ुदा की क़सम खिलाकर पक्‍का वादा ले चुके हैं. और इससे पहले भी यूसुफ़ के बारे में तुम सब बहुत बड़ी लापरवाही कर ही चुके हो. सो मैं तो इस ज़मीन से हिलूंगा नहीं जब तक अब्बा मुझको वापस आने की इजाज़त न दें. तुम सब वापस अब्बा के पास जाओ और जाकर उनसे कहो कि अब्बा! आपके बेटे बिनयामीन ने चोरी की इसलिए गिरफ़्तार हुआ”

हज़रत याकूब ने जब ये बात सुनी तो कहा, “तुम सबने फिर से कोई कहानी गढ़ ली है. सो सब्र ही करूंगा. मुझको अल्‍लाह से उम्मीद है कि उन दोनों को मेरे पास पहुंचा देगा.” फिर दूसरी तरफ़ मुंह करके रोने लगे, “हाय यूसुफ़, अफ़सोस!” और दुख से रोत-रोते उनकी आंखें सफ़ेद पड़ गईं और वह इस दुख से दिल ही दिल में घुटने लगे. बेटे कहने लगे, “ख़ुदा की क़सम, मालूम होता है तुम हमेशा यूसुफ़ की याद में ही लगे रहोगे. यहां तक कि घुल-घुल कर जान होंठों पर आ जाएगी या यह कि बिलकुल मर ही जाओगे.”

हज़रत याकूब कहने लगे, “मैं तो अपने दुख की सिर्फ़ अल्‍लाह से शिकायत करता हूं और अल्‍लाह की बातों को जितना मैं जानता हूं, तुम नहीं जानते. ऐ मेरे बेटों! जाओ यूसुफ़ और उसके भाई को तलाश करो.”

फिर जब वे सब हज़रत यूसुफ़ के पास पहुंचे तो कहने लगे, “ऐ अज़ीज़! हमको और हमारे घरवालों को अकाल की वजह से बड़ी तकलीफ़ पहुंच रही है. और हम ये कुछ बेकार सी और मामूली चीज़ें लाए हैं, सो आप पूरा राशन दे दीजिए. और हमको ख़ैरात समझकर दे दीजिए, बेशक अल्‍लाह तआला ख़ैरात देने वालों को बेहतरीन बदला देता है.”

अब हज़रत यूसुफ़ ने कहा, “कहो, वह भी तुमको याद है जो कुछ तुमने यूसुफ़ और उसके भाई के साथ बर्ताव किया था, जब तुम्हारी बेवकूफियों का जमाना था.”

यह सुनकर दसों भाई चकराए कि मिस्र के अज़ीज़ को यूसुफ़ की बात से क्‍या सरोकार? फिर उन्हें याद आया कि यूसुफ़ के बचपन के ख़्वाब की वजह से वो सब किस तरह डरते थे कि एक दिन उन्हें यूसुफ़ के सामने गरदन झुकानी पड़ेगी. इस बात से उन्हें शक हुआ. फिर गौर से देखा तो यूसुफ़ का चेहरा कुछ-कुछ जाना-पहचाना सा लगा. तो उन सबने पूछा, “क्‍या सचमुच तुम ही यूसुफ़ हो?”

तब हज़रत यूसुफ़ ने कहा, “हां, मैं यूसुफ़ हूं, और यह बिनयामीन मेरा सगा भाई है.”

अब उन दस भाइयों को बड़ी शर्मिन्दगी हुई. वे कहने लगे, “ख़ुदा की क़सम, कुछ शक नहीं कि तुमको अल्‍लाह तआला ने हमसे अच्छा बनाया, अच्छी जिन्दगी दी, माल और दौलत दी, रुतबा दिया. और बेशक हम गलत थे.”

हज़रत यूसुफ़ ने कहा, “तुम पर आज कोई इल्ज़ाम नहीं. अल्‍लाह तआला तुम्हारा कुसूर माफ़ करे. अब तुम मेरा यह कुर्ता भी लेते जाओ और इसको मेरे बाप के चेहरे पे डाल देना. इससे उनकी आंखों की रोशनी फिर से वापस आ जएगी. और अपने बाक़ी घरवालों को भी, सबको मेरे पास लाओ.”

और जब क़ाफ़िला चला तब इधर क़िनआन में हज़रत याकूब ने कहा, “अगर तुम मुझको बुढ़ापे में बहकी बातें करने वाला न समझो तो एक बात कहूं कि मुझको तो यूसुफ़ की ख़ुश्बू आ रही है. तब जो लोग उनके पास थे कहने लगे, “ख़ुदा की क़सम, आप तो अपने उसी पुराने ग़लत ख़्याल में फंसे हुए हैं.”

फिर जब खुशखबरी लाने वाले आ पहुंचे तो उन्होंने सबसे पहले हज़रत यूसुफ़ का कुर्ता हज़रत याकूब के मुंह पर लाकर डाल दिया. फिर फ़ौरन ही उनकी आंखें खुल गईं, और अपने बेटों से कहा, “क्‍यों, मैंने तुमसे कहा नहीं था कि अल्‍लाह तआला की बातों को जितना मैं जानता हूं, तुम नहीं जानते.”

सब बेटों ने कहा, “ऐ हमारे अब्बा! हमारे लिए ख़ुदा से हमारे गुनाहों की माफ़ी के लिए दुआ कीजिए, हम बेशक गुनहगार थे.”

हज़रत याकूब ने कहा, “जल्द ही तुम्हारे लिए अपने रब से माफ़ी की दुआ करूंगा, बेशक वह बख़्शने वाला, रहम करने वाला है.”

फिर जब ये सब के सब हज़रत यूसुफ़ से मिलने मिस्र की ओर रवाना हुए तब यह ख़बर सुनकर हज़रत यूसुफ़ उनके स्वागत के लिए खुद मिस्र से बाहर आए और मिस्र से बाहर ही मुलाकात का बन्दोबस्त किया गया. हज़रत यूसुफ़ ने अपने मां-बाप को अदब के तौर पर अपने पास जगह दी. और कहा कि, “अब सब मिस्र में चलिए. और ख़ुदा को मन्जूर है तो वहां अमन-चैन से रहिए.”

फिर मिस्र में आकर हज़रत यूसुफ़ ने अपने मां-बाप को शाही तख़्त पर ऊंचा बिठाया. और सब के सब हज़रत यूसुफ़ के आगे सज़्दे में गिर गए. फिर हज़रत यूसुफ़ ने कहा, “ऐ मेरे अब्बा! यह है मेरे ख़्वाब की ताबीर जो मैंने बचपन में देखा था. जिसको मेरे रब ने सच्‍चा कर दिया. और उसने मेरे साथ एहसान किया कि एक तो उसने मुझे क़ैद से निकाला और दूसरा यह कि आप सबको गांव से यहां शहर में लाया. यह सब कुछ इसके बाद हुआ कि शैतान ने मेरे और मेरे भाइयों के बीच फ़साद डलवा दिया था. बेशक मेरा रब जो चाहता है उसका अच्छा उपाय करता है. बेशक वह बड़ा इल्म वाला है. ऐ मेरे परवरदिगार! तूने मुझको हुकूमत का बड़ा हिस्सा दिया और मुझको ख़्वाबों की ताबीर देना तालीम फ़रमाया जो कि एक बड़ा इल्म है. ऐ आसमानों और ज़मीन के पैदा करने वाले! तू मेरा कारसाज़ है, दुनिया में भी और आख़िरत में भी. मुझको पूरी फ़रमांबरदारी की हालत में दुनिया से उठा ले और मुझको ख़ास नेक बन्दों में शामिल कर ले.”

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