शनिवार, 7 जुलाई 2012

विजेंद्र शर्मा का आलेख - खुद्दारी गिरवी रहे,....... ऐसा क्या इनआम .......

खुद्दारी गिरवी रहे,.......  ऐसा क्या इनआम .......

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पिछले दिनों अख़बारों में मुख्तलिफ़ - मुखतलिफ़ साहित्य अकादमियों द्वारा घोषित पुरस्कारों की बहुत ख़बरे पढ़ने को मिली ! कुछ नाम तो वाकई ऐसे थे जिनका नाम एज़ाज़ मिलने वालों की फेहरिस्त में देख कर तना हुआ सर उनके एहतराम में झुक गया मगर कुछ नाम ऐसे भी थे जिन्हें जिस ज़ुबान की ख़िदमत के लिए एज़ाज़ दिया जा रहा था उनका उस ज़ुबान से अदबी सतह पर दूर - दूर तक कोई लेना -देना ही नहीं था ! ज़हन में सवाल उठे यार ,पुरस्कार देने की भी अकादमियों की कोई प्रक्रिया होती होगी आख़िर सरकार से जुड़ी संस्थाएं है ,इनकी भी कोई जवाबदेही है , यहाँ भी कुछ तो पारदर्शिता होती होगी इन सभी सवालों का जवाब तलाशने के लिए अकादमी से जुड़े अपने एक दोस्त को फोन किया , मित्र ने बताया कि इन सब की एक निर्धारित प्रक्रिया है ,आप चाहें तो अकादमी की वेबसाइट देख लें ! मैंने मुल्क की बहुत सी ज़ुबानों की साहित्य अकादमियों की वेबसाइट खंगाल मारी सब की तक़रीबन एक जैसी नियमावली थी और आख़िर में जब विभिन्न श्रेणी के पुरस्कार हेतु आवेदन पत्र का प्रारूप देखा तो बड़ी हैरानी हुई ! एक क़लमकार को फलां नाम के फलां राशि के पुरस्कार के लिए स्वयं आवेदन करना है कि मुझे इस श्रेणी का इनआम दिया जाए ! ये सब नियम -क़ानून पढ़कर हँसी भी आई और दुःख भी हुआ कि आज के साहित्यकार को इन अकादमियों ने कहाँ लाकर खड़ा कर दिया है और इस दौर का क़लमकार भी पुरस्कार की लालसा में ख़ुद अर्जी लगा रहा है कि उसे इस श्रेणी का इनाम दिया जाए ...उसी वक़्त दो मिसरे ज़हन में आये ----

पहले अर्ज़ी दीजिये , फिर तिकड़म के काम !

खुद्दारी गिरवी रहे , ऐसा क्या इनआम !!

पुरस्कार के लिए लेखक के चयन की ये प्रक्रिया अगर खुसरो ,कबीर ,ग़ालिब ओ मीर , दिनकर , मैथिलीशरण गुप्त, जय शंकर प्रसाद ,फिराक़ ,प्रेमचंद और महादेवी के दौर में होती तो इन अकादमियों को एक भी आवेदन नहीं मिलता क्यूंकि उस ज़माने के अदीबो की क़लम में अना की स्याही होती थी !

विभिन्न श्रेणी में साहित्यिक पुरस्कारों के चयन की ये प्रक्रिया सिर्फ़ राजस्थान में ही नहीं अन्य अकादमियों का भी तौर तरीका कुछ  ऐसा ही है ! भारत का प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थान ज्ञानपीठ भी इस रोग से अछूता नहीं है ! भारतीय ज्ञानपीठ हर वर्ष किसी युवा साहित्यकार को नवलेखन पुरस्कार देती है ! जुगाड़ कला में दक्ष एक युवा लेखक गौरव सोलंकी ने यह इनआम अपने नाम घोषित करवा लिया , पुरस्कार चयन समिति ने सिफारिश के दवाब में उस शख्स का क़लाम भी नहीं देखा और जब ज्ञानपीठ से उस युवा स्वयंभू कथाकार का कहानी संग्रह छपने लगा तब ज्ञानपीठ के सर्वे-सर्वा नींद से जागे ! उस कहानीकार का संग्रह इस दलील के साथ लौटा दिया गया कि उसकी कहानियों में अश्लीलता के अलावा कुछ नहीं है ..क्या ज्ञानपीठ को ये सब पहले नहीं दिखता था  ?  युवा कथाकार ने त्याग का अनूठा उदहारण दिया उसने भी नवलेखन पुरस्कार लौटा दिया अब गौरव सोलंकी जी को ज्ञानपीठ के करता - धरता धूर्त ,धोखेबाज़ नज़र आने लगे और जब पुरस्कार की घोषणा हुई तब ज्ञानपीठ से बेहतर उन्हें कोई संस्था लगती ही नहीं थी !

इस सारे प्रकरण को गौरव सोलंकी और उसके इंटरनेट के मित्रों ने ज्ञानपीठ को हज़ारों गालियाँ देकर बहुत उछाला मैंने भी वो कहानी पढ़कर अपना दिमाग ,वक़्त और अपने अन्दर बचे हस्सास का क़त्ल अपने हाथों किया ! जब निम्न स्तरीय रचना के लेखक को ज्ञानपीठ जैसी संस्था सिफारिश की तस्तरी में पुरस्कार दे सकती है तो सरकार से जुडी हमारी अदबी तंजीमों के पुरस्कार चयन प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगना वाज़िब  है !

कुछ तथाकथित साहित्यकार ऐसे भी है जिनके सम्बन्ध बहुत सी अकादमियों से है ! छोटा -मोटा पुरस्कार हासिल करना तो उनके लिए बाएं हाथ का खेल  है , वे सोचते है पिछले साल पंजाबी अकादमी से मिल गया था , उस से पिछले साल राजस्थानी से जुगाड़ बैठ गया अबके हिन्दी से ले लेंगे अगले साल सिन्धी अकादमी तो है ही !   दूसरों की अनुकम्पा की बैसाखियों के सहारे  साहित्य की डगर पे  चलने वाले और हर साल किसी ना किसी अकादमी की पुरस्कार सूचि में जगह हासिल करने वाले  फोटोस्टेट अदीबो का हाल तो  इन दिनों ये हो गया है ---

एकडमी साहित्य की ,चलता बड़ा जुगाड़ !

पुरस्कार इस साल भी , हमने लिया कबाड़ !!

ये विडंबना  ही है कि ऐसे किरदारों की संख्या  अदब की दुनिया में दिन ब दिन बढती जा रही है और खुद्दार क़लमकारों की तादाद के हालात् दुनिया में तेजी से घटते हुए बाघों जैसी हो गई है ! चाटुकारिता ,जोड़-तोड़ और सियासत अगर इसी तरह साहित्य को प्रदूषित करती रही तो वो दिन दूर नहीं जब सच्चे साहित्यकारों की प्रजाति ही लुप्त हो जायेगी !

एक और कडवी सच्चाई है ,जो उन लोगों को यक़ीनन नागवार गुजरेगी जो पुरस्कार पाने के लिए अपना स्वाभिमान  बेच देते है ऐसे कुछ लेखक  है जिनका काम अगर एक भाषा की अकादमी में नहीं बनता  तो अपनी रचनाओं का अनुवाद दूसरी भाषा के किसी मंझे हुए अनुवादक से करवाकर उसे अपने नाम से  दूसरी भाषा की अकादमी में गुज़ारिश नामे के साथ पुरस्कार के लिए भिजवा देते है ! इस काम के लिए दूसरी भाषा के अनुवादक महोदय भी उस लेखक से सौदा करते है कि पुरस्कार तुम्हारा और पुरस्कार में मिली राशि मेरी  कुछ अनुवादक ये कार्य मित्रता-वश भी कर देते है !

इन लोगों की ये तरक़ीब और सिफारिश दोनों मिलकर अपना रंग दिखाते है ,आख़िर में पुरस्कार उस शख्स को मिल जाता है जिसका उस  ज़ुबान  की रूह से कोई त-आर्रुफ़ तक नहीं होता ! साहित्य के मैदान में इस तरह के खेल देख कर यही लगता है ----

जिस भाषा की रूह से , वाकिफ़ नहीं हुज़ूर !

उस भाषा से ही  लिए , पुरस्कार   भरपूर !!

इस तरह के लोगों को एज़ाज़ से नवाज़ने से पहले अकादमी  सोचती क्यूँ नहीं ..ऐसी अकादमी की क्या मजबूरी है ? फिलहाल राजस्थान सूबा बड़ा खुशनसीब है कि उसकी तमाम अकादमियों के सदर अनुभवी , जुझारू, ईमानदार  और बे-दाग़ छवि के है ! ईमानदार और बे-दाग़ छवि के तो हमारे प्रधानमंत्री भी है केवल मुखिया के नाम पे कोई प्रणाली सुचारू नहीं हो सकती उसके लिए पूरे निज़ाम का पाक-साफ़ होना ज़रूरी है ! तमाम साहित्य अकादमियों से कुछ ऐसे कीटाणु चिपके हुए है जो इस जुगाड़ की संस्कृति को बढ़ावा दे रहे है !  सबसे पहले  अकादमियों को सच्चे ,पारदर्शी और ईमानदार  साहित्यकारों के अनुभवी कीटनाशक से इन कीटाणुओं का नाश करना होगा और फिर इस विषय पर गंभीरता से सोचना होगा कि एक  रचनाकार इनआम के लिए ख़ुद गुज़ारिश  क्यूँ करे ? पुरस्कार के लिए भीख क्यूँ मांगे ?    

मैं जानता हूँ  इस मज़मून   से उन सच्चे अदीबों की भावनाओं को  भी ठेस पहुंचेगी  जो सही मायने में इनआम के हक़दार है और एज़ाज़  के लिए चुने गये है मैं उनसे इसके लिए मुआफी चाहता हूँ !  इनआम के सही हक़दार  लेखकों का  ये फ़र्ज़  है कि वे भी इस प्रक्रिया का विरोध करें जहाँ  उनका  एहतराम  किया जा रहा है  और  उसी मंच पे वे लोग भी सम्मानित हो रहे  हैं  जो  उस स्थान पे बैठने की काबिलियत से कोसों दूर  है ! मेरा ये मानना है कि अभिनय के लिए अगर किसी मंच से शबाना आज़मी और राखीं सावंत एक साथ सम्मानित हो रही है तो उस सम्मान की गरीमा को बनाए रखने के लिए शबाना आज़मी को उस एहतराम को ठुकरा देना चाहिये !

ऐसा नहीं है कि हमारे युवा साहित्यकारों में प्रतिभा की कोई कमी है मगर बिना मेहनत , बिना साधना के सुर्ख़ियों और पुरस्कार की चाह ने उन्हें जोड़- तोड़  के इस खेल का खिलाड़ी बना दिया है !एक मिसाल अपनी बात की दलील में दे रहा हूँ -- मेरे एक युवा शाइर दोस्त ने अपनी किताब छपवाने के सिलसिले में एक -दिन  फोन किया कहने लगे कि भाई  ज़िल्द वाली किताब का खर्चा थोड़ा ज़ियादा पड़ रहा है आप ज़रा कम करवाएं   फलां ..प्रकाशन वाले आपके मित्र है ..मैंने कहा भाई पेपर बैक ही छपवा लो हमे तो किताब छपने से मतलब होना चाहिए इस पर उन साहब का जवाब सुनकर मुझे  बड़ी हैरानी हुई उसने   कहा कि भाई जान   "क्या है कि मुझे किताब इनआम के लिए मुख्तलिफ़ - मुख्तलिफ़ अकादमियों में भेजनी है और  अकादमियां सिर्फ ज़िल्द वाली किताब ही स्वीकार करती है "  उस युवा शाइर   ने सही कहा था मगर मुझे दुःख इस बात का है कि लोग सिर्फ इस लिए लिख रहे हैं कि उन्हें  इनआम मिले ... आज के साहित्यकारों में पुरस्कार की ये लालसा उनके  लेखन के आत्मिक सौन्दर्य की ह्त्या कर रही है ! हमारी अकादमियों को भी इस बारे में सोचना चाहिये उन्हें पेपरबैक किताबें भी स्वीकार करनी चाहिये ताकि जो रचनाकार अकादमी से आंशिक आर्थिक  सहयोग प्राप्त नहीं कर सकता कम से कम  कम पैसों में अपनी किताब तो छपवा ले और उसके मन में ये भय भी ना रहे कि इसे अकादमी स्वीकार नहीं करेगी !

मेरा ये भी मानना है कि अगर आपके क़लाम में दम है तो आप किसी अकादमी का मुंह मत ताकिये आम आदमी की अकादमी में रखिये अपनी तखलीक और फिर सुनिए सही फैसला क्यूंकि आम आदमी की अकादमी चाटुकारों और सिफारिशी लोगों के चुंगल से अभी तक अछूती है ! बकौल मुनव्वर राना :---

तक़रीर ऐसी हो के मुखालिफ़ भी दाद दे ,

तहरीर ऐसी हो के इज़ाफा कहें जिसे

अदब से जुड़े  इनआमात  देने के इस  विषय को लेकर मेरा किसी से कोई ज़ाती मुआमला नहीं है और  ना  ही किसी से मन-भेद है पर ये मन की पीड़ा है जिससे इतेफाक़ तो ज़यादातर अदीब रखते है मगर सामने खुलकर  बहुत कमलोग कह्ते है !

एक बुनियादी सवाल  तमाम अदीबों की आदालत में रख रहा हूँ  "क्या शब्द के साधक को, तखलीक को जन्म देने वाले को, अपने तसव्वुर से कहानी की इमारत बनाने वाले को ,तहरीर की तामीर करने वाले को पुरस्कार के लिए किसी अकादमी के आगे गिडगिडाना चाहिये ?  क्या उसे अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने के लिए किसी अकादमी को गुज़ारिशनामा  भेजना चाहिये ?

मुझे पूरा यकीन है कि  जुगाड़ प्रक्रिया में एतबार रखने वाले ,अपने आप को शब्द का सौदागर समझने वाले दिल से तो मेरी बात से इतेफाक रखेंगे , ख़ुदा करे उन्हें एहसासात ,ख़यालात   और अल्फ़ाज़  की सेहत का ख़याल रखना आ जाए !  इसी उम्मीद के साथ कि अदब के पहरेदार संजीदगी से  मेरे इन सवालों को हर धरातल से उठाएंगे और अकादमियों को विवश करेंगे कि वे पुरस्कार चयन प्रक्रिया पे पुनः विचार करें जिससे पुरस्कारों का सम्मान बना रहे  और जिन क़लमकारों को सिर्फ़ इनआम  की चाह रहती है उनकी क़लम से  खुद्दारी की सियाही कभी ख़त्म ना हो ...आमीन !

आख़िर में अपने इस दोहे के साथ ....

पुरस्कार की लालसा ,भीख मंगाए यार !

लिख तू स्वाभिमान से, होगा फिर सत्कार !!

ख़ुदा हाफ़िज़ ...

 

विजेंद्र शर्मा

vijendra.vijen@gmail.com

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  1. बहुत बड़िया आपने इन टुच्ची अकादेमियों को आड़ेहाथों लिया | यह सारे साहित्य के बड़े नाम औरों के नामों को छोटा करके बने हैं | पुरस्कार की अंधी दौड़ में क्या-क्या नहीं होता ? इन्होंने तो अपने ईमान बेच दिये हैं । पुरस्कार की प्रतियोगिता में यदि शामिल हों तो तटस्थ रूप से हों, किसी के माध्यम से नहीं ।

    डॉ. मोहसीन खान
    अलीबाग (महाराष्ट्र) मो. 09860657970

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  2. सही कहा विजेंदर जी

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  3. ये सुखद संयोग है की उधर मैंने सम्मान -माफिया पर कुछ लिखा तो इधर यह लेख पढ़ाने को मिल गया. अच्छा लगा. यह लेख विस्तार के साथ इस समय के कटु सत्य को बेहतर ढंग से पकड़ता है.

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  4. सच से रूबरू कराता यह लेख बहुत कीमती है,सही कहा आपने की आज अगर हमरे पूर्वज महाकवि भी जिंदा होते तो अपनी पहचान को तरस रहे होते-जय जुगाड की!

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