रविवार, 22 जुलाई 2012

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य : बेचारा गरीब मध्‍य वर्ग

एक बार फिर सरकार ने गरीब मध्‍य वर्ग का मजाक उड़ाया है। सरकार की मान्‍यता है कि मध्‍य वर्ग मंहगा पानी खरीद कर पीता है, मंहगी आइसक्रीम खाता है, मगर गेहूं या चावल महंगा नहीं खरीदना चाहता। अब सरकार को कौन समझाये कि कभी कभार यात्रा में महंगा पानी पीने से बीमारियों से बचा जा सकता है, डाक्‍टरों के भारी बिल से जान छुड़ाई जा सकती है, कभी कभार खुशी के मौके पर आइसक्रीम खाने का अधिकार क्‍या केवल केबिनठ मंत्री के लिए ही सुरक्षित हैं। सरकार बार बार गरीब और मध्‍यम वर्ग को ही निशाना क्‍यो बना रही है जब कि यही तबका वोट देकर सरकार को बना और बिगाड़ सकता है। पिछली सरकार को फील गुड हुआ था और सरकार चुनाव में हार गई थी। यह सरकार भी शायद फील गुड के भंवर में फंस गई है।

जब से पवन वर्मा ने दी ग्रेट इण्‍डियन मिडिल क्‍लास पर किताब लिखी है तब से ही भारतीय फलक पर मध्‍यम वर्ग छा गया है। गरीब की जेारु सब की भाभी की तर्ज पर हर समस्‍या का कारण मध्‍यम वर्ग को मान लिया गया है। वे ज्‍यादा खाते है तो महंगाई बढ़ती है, वे पानी पीते है तो सरकार को तकलीफ होती है। सरकार बताये कि क्‍या इतने सालों में भी पीने का शुद्ध पानी उपलब्‍ध हो गया है अरबों रुपये खर्च करने के बाद भी आज महिलाओं को दस-बीस किलो मीटर दूर से पीने का पानी लाना पड़ता है, यदि कभी बच्‍चों को बीमारी से बचाने के लिए बोतल खरीद कर पानी पिला दिया तो सरकारी मंत्री, अफसर, सब के सब बेचारे मध्‍यम वर्ग पर टूट कर पड़ गये। अरे यही तबका है जो सरकार को बरदाश्‍त कर रहा है। जिस दिन मध्‍यम वर्ग उठ खड़ा होगा उसी दिन शायद सरकार की नींद टूट जायेगी। महंगी कारे, शानदार कोठियां, हवाई यात्राए, डीनर, लंच, एसी, महंगे शौचालय सब तो इन गरीब मध्‍यम वर्ग की बदौलत ही है।

वास्‍तव सत्‍ता में बैठे लोगों के लिए गरीबी की परिभापा ही अलग हो जाती है वे गरीब की गरीबी की तुलना अपनी अमीरी से करने लग जाते है। वे सोचते है जो पानी और आइसकी्रम केवल हमारे और हमारे बच्‍चों के लिए थी वो अब इन को क्‍यों नसीब होने लगी। जार्ज आरबेल ने ठीक ही लिखा था, आल आर इक्‍वल बट सम आर मोर इक्‍वल।

सत्‍ता वाले किसान का भला सोच रहे है या किसान को आत्‍महत्‍या का रास्‍ता दिखा रहे है। सत्‍ता वाले मध्‍यम वर्ग और किसान में फूट डाल कर वर्ग संघर्प की एक नई इबादत लिख रहे है। सरकार का हर मामलो में अन्‍तिम जवाब ये होता है कि वक्‍तव्‍य को तोड़ मरोड़ कर प्रस्‍तुत किया गया। सरकार सम्‍पादन को सेंसरशिप तक ले जाना चाहती है मगर क्‍या यह सम्‍भव है। आवारा भीड के खतरे है और सरकार को इन खतरो को समझना चाहिये। सरकार की कार्य प्रणाली, विचार और सोच में यदि खराबी है तो सरकार को इसे समझना चाहिये। नेता यदि देश की जनता की जमीनी हकीक्‍त को नहीं पहचान सकते तो उन्‍हें नेता कहलाने और बने रहने का कोई हक नहीं है। सब जानते है कि कारों के दाम बठने से खास फर्क नही पड़ता लेकिन यदि अनाज, सब्‍जियों, फलों, दवाओं के दाम बढ़ते है तो आम जनता का गुस्‍सा जायज है। सरकार को इस गुस्‍से को देर होने से पहले ही समझना चाहिये। सरकार को संवाद हीनता नहीं संवेदनशीलता का परिचय देना चाहिये। तभी लोकतंत्र की सार्थकता बन सकेगी।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

09414461207

2 blogger-facebook:

  1. Dukh to yeh ha ki aapka yeh aalekh bhee Madhyavarg Ko hee padana ha. Vitt mantree ko fursat kahan.

    Dr madhu madhu

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  2. mahoday koshana sabse assaan kam kam hota hai vayavastha ko koshna aur bhi ashan hota hai
    jabki sach ye hai ki amdani badhi hai , baap jis payment mai ritayar ho raha hai beta ush pyment par join ho raha hai, kher achha lagta hai vayavatha ko koshana too koshte rahiye____

    उत्तर देंहटाएं

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