शेर सिंह की लघुकथा - पुण्य लाभ

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लघुकथा

पुण्‍य लाभ

  • शेर सिंह

तीर्थ स्‍थली पुरी में भगवान जगन्‍नाथ के उस बहुत बड़े मंदिर में जा कर उसने जहां -कहीं भी मूर्तियां, तस्‍वीरें, फल- फूल चढ़ाए हुए स्‍थान देखे, वह श्रद्धा और आदर से उन के आगे नत मस्‍तक हो कर अपना शीश झुकाता रहा। दरअसल, वह अपने एक प्रिय जन की अकाल मृत्‍यु के पश्‍चात मंदिर में दिवंगत आत्‍मा की शांति और अपने मन को संतोष, पुण्‍य कमाने के इरादे से आया था।

बहुत देर तक भगवान की मूर्तियों पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने के पश्‍चात एवं मंदिर की प्रदक्षिणा कर बाहर निकला तो मंदिर के आस- पास, बैठे- खड़े कुछ भिखमंगों को अपने प्रिय बन्‍धु को स्‍मरण करते हुए पच्‍चीस -पचास पैसों के सिक्‍के फैंकते हुए आगे बढ़ता रहा। जेब में पड़ी थोड़ी सी रेजगारी जब खत्‍म हो गई, तो उसने भिखारियों को और आगे बढ़ने से रोक दिया। लेकिन एक भिखारी जिसे शायद कुछ नहीं मिला था, उस के पीछे ही पड़ गया। " मोते भी दियो बाबू … मोते भी दिया बाबू " की रट लगा कर। भिखमंगा जब उस के साथ ही हाथ फैलाए चलने लगा तो वह असहज होने लगा। और, फिर उस को गुस्‍सा आ गया। उस ने एक नजर इधर - उधर डाली और एक झन्‍नाटेदार चांटा भिखमंगे के गाल पर जड़ दिया। भिखमंगा गाल पकड़े अविश्‍वास से खड़ा रह गया। परन्‍तु पल भर में भिखमंगे की आंखें घृणा से भर उठी थी। और, वह संतोष से आगे बढ़ गया जैसे कुछ हुआ ही न हो।

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शेर सिंह

के. के.- 100

कविनगर, गाजियाबाद -201 001

E-Mail: shersingh52@gmail.com

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