रविवार, 22 जुलाई 2012

शाइरी में बच्चे लफ्ज़ के इस्तेमाल पर विजेंद्र शर्मा का मक़ाला

बच्चे जब ग़ज़ल में आ गये ......

विजेंद्र शर्मा

हिन्दुस्तान में ग़ज़ल ने पिछले 300 साला माज़ी में मुख्तलिफ़ - मुख्तलिफ़ रास्तों पे सफ़र किया है। फ़क़ीरों की ख़ानकाहों में पैदा हुई ग़ज़ल शाहों के दरबार से होते हुए कभी मयकदे में जाम के साथ छलकने लगी तो कभी महबूब की ज़ुल्फों की असीरी उसे रास आ गई। एक तवील अरसे तक ग़ज़ल सिर्फ़ हुस्न , शराब, ज़ुल्फ़,घटा और महबूब के पहलु में कयाम करती रही और बाद में इसे ही रिवायत का नाम दे दिया गया। ये कच्चे गोश्त की दुकान ग़ज़ल को क़फ़स के माफ़िक लगने लगी। ग़ज़ल की इस बैचेनी को हमारे अहद के सुख़नवरों ने महसूस किया और नए - नए पहलु उन्होंने ग़ज़ल को दिये जिससे ग़ज़ल रिवायत के मखमली रास्ते से जदिदीयत की उबड़ -खाबड़ राह पे आ गई। ग़ज़ल को एक लफ़्ज़ मिला "बच्चा " जिसने ग़ज़ल को संवेदना की एक मूरत बना दिया। इस लफ़्ज़ के आने से ग़ज़ल में शे'र का कैनवास बहुत बड़ा हो गया और जब-जब इस लफ़्ज़ की आमद हुई उस शे'र की किस्मत ही संवर गई। 70 के दशक के बाद ग़ज़ल के लिए ये लफ़्ज़ ग़ज़ल की ज़रूरत बन गया। जब निदा फ़ाज़ली को लगा कि इस लफ़्ज़ में ताजगी के साथ - साथ बड़ी मासूमियत है तो क्यूँ ना इसे शे'र बनाया जाय हालांकि वे जानते थे कि अगर घर से मस्जिद दूर है तो नमाज़ घर बैठ कर भी पढ़ी जा सकती है मगर बच्चे को शाइरी में लाना था और नतीजा ये हुआ कि इस शे'र को बे-पनाह मुहब्बत मिली:---

घर से मस्जिद है बहुत दूर तो चलो यूँ कर लें

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए

image

बशीर बद्र ने भी इस लफ़्ज़ का इस्तेमाल अपनी शाइरी में ख़ूब किया उनका ये शे'र देखें:-

हज़ारों शे'र मेरे सो गये काग़ज़ की क़ब्रों में

अजब माँ हूँ कोई बच्चा मेरा ज़िन्दा नहीं रहता

अस्सी के शुरूआती दौर में उर्दू के एक रिसाले में शकील जमाली का ये शे'र छपा जिसे पढ़कर बशीर बद्र ने कहा कि ये हमारी ग़ज़ल में इजाफा है। नई ग़ज़ल में वो इज़ाफा भी "बच्चे " लफ़्ज़ के इस्तेमाल से आया :--

ये सरकशी कहाँ है हमारे ख़मीर में

लगता है अस्पताल में बच्चे बदल गये

 

शकील जमाली ने बच्चे के मनोविज्ञान का अपनी शाइरी में ख़ूब इस्तेमाल किया:--

कोई स्कूल की घंटी बजा दे

ये बच्चा मुस्कुराना चाहता है

 

वक़्त के साथ - साथ मुफ़लिसी की टीस भी ग़ज़ल में आ गई। बच्चों की खिलौनों की ज़िद के आगे एक मज़बूर बाप बहाना ढूँढने लगा तो दूसरे ने बच्चे के खिलौने के लिए अपना सब कुछ दांव पे लगा दिया। मुनव्वर राना ने गुरबत और बच्चे की ज़िद के बीच की इस कशमकश से बहुत से शे'र निकाले जो बड़े मक़बूल हुए :--

खिलौनों के लिए बच्चे अभी तक जागते होंगे

तुझे ऐ मुफ़लिसी बहाना ढूँढ लेना है

मेरे बच्चे नामुरादी में जवाँ भी हो गये

मेरी ख़्वाहिश सिर्फ़ बाज़ारों को तकती रहगयी

खिलौनों की दुकानों की तरफ़ से आप क्यों गुज़रे

ये बच्चे की तमन्ना है यह समझौता नहीं करती

मैं हूँ ,मेरा बच्चा है , खिलौनों की दुकाँ है

अब मेरे पास बहाना भी नहीं है

दौलत से मुहब्बत तो नहीं थी मुझे लेकिन

बच्चों ने खिलौनों की तरफ़ देख लिया था

बच्चों की फीस , उनकी किताबें ,क़लम -दवात

मेरी ग़रीब आँखों में इस्कूल चुभ गया

 

बच्चों की ज़िद और मुफ़लिसी के दामन में से बहुत से दूसरे शाइरों ने भी शे'र निकाले और अपनी बात अलग ज़ाविये से कही :--

ग़रीब बच्चों की ज़िद भी न कर सका पूरी

तमाम उम्र खिलौनों के भाव करता रहा

(हसीब सोज़)

तनख्वा दूर ,खिलौनों की ज़िद और बहाने बचे नहीं

आज देर से घर जाउंगा बच्चे जब सो जायेंगे

(पवन दीक्षित )

महंगे खिलौने दे न सका मैं ये मेरी लाचारी है

लेकिन मेरी बच्ची मुझको जाँ से ज़ियादा प्यारी है

(अतुल अजनबी)

आ गया वह फिर खिलौने बेचने

सारे बच्चों को रुलाकर जाएगा

(ओम प्रकाश यती)

 

बच्चों की ज़िद और उनकी मांगें जब अपना सब कुछ ताक़ पर रख कर भी एक बाप पूरी नहीं कर पाता। उस वक़्त अपने आप को वह असहाय महसूस करता है उसकी इस हालत को मैंने भी इन दो मिसरों में इस तरह बयान किया :--

खूँटी पर ईमान तक, दिया बाप ने टांग।

फिर भी बाकी रह गई , बच्चों की कुछ माँग।।

 

खिलोनों के बाद अगरकोई बच्चों को रुला कर जाता है तो वो है गुब्बारे वाला और इस तरह बच्चों की गुब्बारा लेने की चाह ने भी ग़ज़ल को नया मफहूम दिया:--

दुःख का पहला पाठ पढ़ाया ग़ुरबत ने

कल बच्चे ने छुआ नहीं गुब्बारे को

(शकील जमाली)

ये फितरत का तकाजा है सज़ा देने से क्या हासिल

कि ज़िद करते है बच्चे जब गुब्बारा देख लेते है

(मुनव्वर राना)

शर्म आती है मजदूरी बताते हुए हमको

इतने में तो बच्चे का गुब्बारा नहीं मिलता

(मुनव्वर राना)

 

कई बार मजबूरियों के आगे विवश हो इन्सान जब बच्चों की तमन्ना पूरी नहीं कर पाता और फिर घर उसे खाली हाथ जाना पड़ता है उस वक़्त उसकी क्या मन-स्थिती होती है राजेश रेड्डी ने इसे क्या खूब शाइरी बनाया। ये मिसरे अब राजेश रेड्डी साहब की दस्तरस में नहीं रहे यानी आवारा हो गया ये शे'र:--

शाम को जिस वक़्त खाली हाथ जाता हूँ मैं

मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं

 

दूसरी तरफ़ दिनभर की थकनके बाद बच्चोंमें पहुँचने को आदील रशीद ने यूँ शे'र बनाया :-

दिन-भर की थकन ओढ़ के जब बच्चों में पहुंचूं

आती है पसीने से लोबान की खुशबू

 

दिल की तुलना राजेश रेड्डी ने बच्चे की ज़िद से की तो उनके खाते में एक और आमफेम शे'र आ गया ये कमाल भी बच्चे की वजह से हुआ:--

दिल भी इक बच्चे की मानिंद अड़ा है ज़िद पे

या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं

 

बच्चे की मासूमियत को शाइरी में दिल समझा गया और अक़ील नोमानी ने इसे ज़हन से इस तरह अल्हेदा रखा गया :--

तुझको मासूम कहा जाए कि ज़ालिम ऐ दोस्त

दिल है बच्चों की तरह ज़हन है क़ातिल की तरह

बच्चों की जिदें कुछ और तरह की भी होती है एक शाइर के मन को वे आहत करती हैं और वो मन अगर वसीम बरेलवी साहब का हो तो पीड़ा शब्द बनकर इस तरह काग़ज़ पे उतरती है :--

नयी कॉलोनी मेंबच्चों की जिदें ले तो गयीं

बाप -दादा का बनाया हुआ घर ख़त्म हुआ

घरों की तरबीयत क्या आ गयी टी वी के हाथों में

कोई बच्चा अब अपने बाप के ऊपर नहीं जाता

अपनी - अपनी ज़िद पे अड़ने को हुए बच्चे जवाँ

और बुज़ुर्गों का मकाँ नादानियों में बट गया

 

बच्चा हालांकि नादान होता है मगर उसके छोटे हाथ कई बार क्या-क्या कमाल कर देते हैं। वसीम बरेलवी ने बच्चे के इस कमाल को भी ग़ज़ल बनाया :-

कहाँ गयी मेरे चेहरेकी झुर्रियां सारी

ये नन्हे बच्चे के हाथों ने क्या कमाल किया

तेरे ख़्याल के हाथों कुछ ऐसा बिखरा हूँ

कि जैसे बच्चा किताबे इधर -उधर कर दे

 

मुनव्वर राना ने इस बात को कुछ इस अंदाज़ से कहा --

उलझता रहता हूँ मैं यूँ तुम्हारी यादों में

कि जैसे बच्चे के हाथों में ऊन आ जाए

बच्चे के मन में जब-जब चाँद को छूने की चाह हुई। बच्चे ने अपना हाथ बढ़ाया और चाँद को छू भी लिया। ये ख़याल जब शाइरी में ढाला गया तो ये अशआर सामने आये:--

इस दुनिया का हर मंसूबा हर कोशिश बेकार हुई

इक बच्चे ने हाथ बढ़ाया चाँद को छूकर देख लिया

(तारिक़ क़मर)

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो

चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जायेंगे

(निदा फ़ाज़ली)

नन्हे बच्चों ने छू भी लिया चाँद को

बूढ़े बाबा कहानी सुनाते रहे

(वसीम बरेलवी)

 

ग़ज़ल के दयार में अपनी पुख्ता जगह बना चुका ये बच्चा अब नादान नहीं रहा ये बड़ा चालाक हो गया। परवीन शाकिर ने बच्चे की इस चालाकी को शाइरी बनाया तो उनका शे'र दुनिया भर में मशहूर हो गया :--

जुगनू को दिन के वक़्त परखने की ज़िद करे

बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गये

 

कैफ भोपाली भी आज के दौर के बच्चों की समझदारी देख के हैरान हो गये और उन्होंने अपनी हैरानी यूँ जताई :--

पैर न बांधे पंछी के पर बाँध दिये

आज का बच्चा कितना सयाना लगता है

 

मगर बच्चे कितने भी चालाक हों जाए बच्चे तो बच्चे ही रहते हैं। बच्चों को माँ-बाप की मजबूरियों से फरेब भी खाना पड़ता है और ये फरेब जब ग़ज़ल की शक्ल अख्तियार करता है तो इस तरह :--

भूके बच्चों की तसल्ली के लिए

माँ ने फिर पानी पकाया देर तक

(नवाज़ देवबंदी)

पत्थर उबालती रही एक माँ तमाम रात

बच्चे फरेब खा के चटाई पे सो गये

(क़ैसर उल जाफरी)

हुमेरा रहमान नेजब शाइरी की माला में बच्चे नाम का मोती पिरोया तो ऐसी माला बनी कि इस माला का हर जगह जाप होने लगा :--

वो लम्हा जब मेरे बच्चे ने माँ कहा मुझे

मैं एक शाख़ से कितना घना दरखत हुई

 

इसी मासूम बच्चे को जब राजेश रेड्डी ने अपने दिल के कोने में बिठाया तो वो बच्चा सहम गया और यहाँ से जन्मा शे'र राजेश रेड्डी की शिनाख्त हो गया :--

मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा

बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है

 

यही बच्चा जब धीरे - धीरे बड़ा होने लगा तो इसके तेवर भी बदल गये और मलिकज़ादा जावेद को कहना पड़ा :--

सम्हल कर गुफ़तगू करना बुज़ुर्गों

के बच्चे अब पलटकर बोलते हैं

दिल के टूकड़े अज़ाब देने लगे

हमको बच्चे जवाब देने लगे

 

ये शे'र कहने के बाद मलिकज़ादा साहब को महसूस हुआ कि बच्चों पे गुस्सा करना जायज़ नहीं है तो उन्होंने यहाँ तक भी कहा:--

अपने बच्चों पे क्यूँ करूँ ग़ुस्सा

हर कमी उन में ख़ानदानी है

 

मगर कमियों और नादानियों के बावजूद बच्चों ने बड़ों को हमेशा सिखाया कि ज़िंदगी का फ़लसफ़ा क्या है ,ज़िंदगी कैसे जी जाती है। हस्ती मल हस्ती ने बच्चों से मुतास्सिर हो क्या ख़ूब कहा :--

पंडित उलझ के रह गए पोथी के जाल में

क्या चीज़ है ये ज़िंदगी बच्चे बता गए

बड़े-बड़ों को ज्ञान मिला उन बच्चों की नादानी से

काग़ज़ की जो नाव लड़ाते खेल-खेल में पानी से

 

इसी तरह अपने बच्चों को देखकर शमीम बीकानेरी ने भी जो समझा उन्होंने उसे ऐसे ग़ज़ल बनाया :---

अपने बच्चो को जो देखा तो समझ में आया

घर पहुंचता है सरे -शाम परिंदा कैसे

 

जब बड़े- बड़े मोतबर शाइर "बच्चे" लफ़्ज़ को अपने मिसरों में बाँधने लगे तो बच्चे का ग़ज़लों में इस्तेमाल शाइरी की रिवायत का हिस्सा बन गया। इस लफ़्ज़ में सुख़नवरों को इतना जादू नज़र आने लगा कि बच्चे का शे'र में आ जाना शे'र के कामयाब होने की गारंटी हो गया। मेराज फैजाबादी ने अपने एक शे'र में"बच्चे " लफ़्ज़ को बांधा तो वो शे'र उनकी पहचान बन गया :--

मुझको थकने नहीं देता ये ज़रूरत का पहाड़

मेरे बच्चे मुझे बूढा नहीं होने देते

 

पवन दीक्षित ने जब बच्चे का इस्तेमाल इस कडवे सच को काग़ज़ पे उकेरते हुए किया तो सुनने वाले इस हक़ीक़त से सन्न रह गये:--

लाखों बच्चे तरसे दाने -दाने को

भूखे बच्चों की तस्वीरें लाखों की

 

इसी दौरान बच्चों को लेकर बड़े शे'र कहे गये और सब सुनने वालों की ज़बां पे चढ़ गये कुछ मिसाल के तौर पे:--

दामन की सिलवटों पे बड़ा नाज़ है हमे

घर से निकल रहे थे के बच्चा लिपटगया

ये ख़्वाब था मेरे बच्चों के ख़्वाब पूरे हों

सो अपने आप को मैंने अधूरा छोड़ दिया

(हसीब सोज़)

बच्चों के हाथ लग के कहीं खो गया है वो

या मैं ही उसे रख के कहीं भूल गया हूँ

(अनवारे इस्लाम)

फूल से बच्चों को ख़ुद भी नहीं मालूम कि कौन

आ के चुप-चाप सीखा जाता है नफरत लिखना

घर की ज़रूरतों के लिए अपनी उम्र को

बच्चे ने कारखाने की चिमनी पे रख दिया

दिखाते है पड़ौसी मुल्कआँखें तो दिखाने दो

कहीं बच्चों के बोसे से भी माँ का गाल कटता है

जो अश्क गूंगे थे वो अर्जे हाल करने लगे

हमारे बच्चे हमी से सवाल करने लगे

(मुनव्वर राना)

 

ऐसा नहीं कि हमारे शाइरों ने सिर्फ़ बच्चों की ज़िद और आदमी की बेचारगी ,उसकी मुफ़लिसी को ग़ज़ल बनाया बल्कि बच्चों को अगर कोई नसीहत भी दी गई तो वो भी शाइरी के ज़रिये दी गई:--

अब खेल के मैदान से लौटो मेरे बच्चो

ता-उम्र बुज़ुर्गों के असासे नहीं चलते

(शकील जमाली)

मेरे बच्चों। तुम्हे कितनी ही मैं आसानियाँ दे दूँ

बिना ठोकर लगे कोई सफ़र पूरा नहीं होता

( वसीम बरेलवी)

मेरे बच्चों कहाँ तक बाप के काँधे पे बैठोगे

किसी दिन फेल इस गाड़ी का इंजन हो भी सकता है

(हसीब सोज़)

 

भाई रिताज़ मैनी ने जब देखा कि दो भाइयों के बीच में कैसे दरार पड़ जाती है ,एक आँगन में दो आँगन कैसे हो जाते है ...कहीं इसकी जड़ें बचपन से तो जुड़ी नहीं है तभी उन्होंने भी बच्चों से कह डाला :--

खिलौने बाँट कर खेलो न बच्चों

यहीं से उठती है दीवार शायद

हमारे अहद के शाइरों ने बच्चे पे एतबार भी किया तो खूब किया :-

अपने खून से इतनी तो उम्मीदें हैं

अपने बच्चे भीड़ से आगे निकलेंगे

 

हर आदमी के अन्दर एक बच्चा होता है ये बात और है कि किसी के अन्दर का बच्चा बच्चा बना रहता है किसी के अन्दर का बच्चा वक़्त से पहले ही बूढा हो जाता है अपने अन्दर के बच्चे को ज़िन्दा रखना भी एक कमाल है। आलम खुर्शीद ने इसे ऐसे कहा है :-

एक छोटा सा बच्चा मुझमें अब तक ज़िन्दा है

छोटी - छोटी बात पे अब भी रो सकता हूँ मैं

 

वसीम बरेलवी ने अपने जज़बात और अहसासात यूँ कहे :-

किसी ने रख दिये ममता भरे दो हाथ क्या सर पर

मेरे अन्दर का कोई बच्चा बिलख कर रोने लगता है

 

शकील आज़मी ने भी अपने अन्दर के बच्चे को ज़िन्दा रखने के लिए क्या -क्या जतन किये :--

वरना मर जाएगा बच्चा मेरे अन्दर का

तितलियाँ रोज़ पकड़ना मेरी मज़बूरी है

 

बच्चे का अपना एक किरदार होता है उसे क्या सिखाना है उसे क्या नहीं सिखाना मुनव्वर साहब ने इसी मौज़ूँ से शे'र कुछ इस तरह निकाला :--

इन्हें फ़िरकापरस्ती मत सीखा देना कि यह बच्चे

ज़मी से चूमकर तितली के टूटे पर उठाते हैं

बच्चों का घर में खेलना -कूदना, उनका उत्पात मचाना एक बार तो अखरता है मगर जब वे घर में नहीं होते या वे घर में बड़े अनुशासन से सहमे -सहमे रहें तो फिर घर ,घर नहीं लगता तभी तो पवन कुमार सिंह को मजबूर हो कहना पड़ा:--

बेतरतीब सा घर ही अच्छा लगता है

बच्चों को चुप-चाप बिठा कर देख लिया

 

आज के दौर के बच्चों का दुर्भाग्य है कि वे अपने बचपन में ही जवान तो क्या बूढ़े होने लगे हैं ..अब ना तो पहले सी मौज -मस्तियाँ रहीं है ना ही पहले के से घरों में आँगन रहें है तभी तो फैयाज़ फ़ारूक़ी साहब को ये कहना पड़ा :-

हमारे वक़्त के बच्चों की कैसी बदनसीबी है

पले बचपन जहाँ अब घर में वो आँगन नहीं होता

 

बच्चों ने भी अपने आप को आज के हालात् में ढाल लिया है उन्हें ना तो खुले आँगन की दरकार है ना ही बारिशों में काग़ज़ की नाव की तभी तो मुझे भी ये लिखना पड़ा :--

कहाँ गयी वो लोरियां ,कहाँ गये वो चाव।

बच्चों ने भी फाड़ दी, काग़ज़ वाली नाव।।

 

भाई शकील आज़मी ने इसे इस अंदाज़ में कहा :--

नाव काग़ज़ की ना अबके थपकियाँ बच्चों की थी

बाढ़ का पानी गली में यूँ ही बहता रह गया

आज के इस चका -चौंध भरे माहौल में अपने अन्दर के बच्चे को ज़िन्दा रखना बड़ा दुश्वारतरीन काम है तभी तो मुनव्वर राना बस यही दुआ करते है:--

मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से फ़रिश्ता हो जाऊं

माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं

कम से कम बच्चों के होंटों की हँसी की ख़ातिर

ऐसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊं

 

यूँ तो बच्चों को लेकर बहुत से शे'र कहे गये पर मैंने कुछ मिसाल के तौर पे रखे मगर ये सच है कि इस लफ्ज़ में कोई ना कोई तो बात है कि किसी मिसरे में "बच्चा "लफ़्ज़ का आजाना ही उस मिसरे के महकने के लिए काफ़ी है। ये सब इस लफ्ज़ की ताक़त है इसके साथ जुड़ा हस्सास है और इस लफ्ज़ में लिपटी हुई मासूमियत है। कुछ लोग अपनी शाइरी को भीड़ से अलग रखने की कोशिश और फारसी ,अरबी के मुश्किल अलफ़ाज़ को बरतने के चक्कर में ग़ज़ल से कुश्ती करते रहतें है तभी तो मुनव्वर राना फरमाते है :--

ग़ज़ल तो फूल से बच्चों की मीठी मुस्कराहट है

ग़ज़ल के साथ इतनी रुस्तमी अच्छी नहीं होती

 

बच्चे की मुस्कराहट एक मुद्दत की थकन कम कर देती है , बच्चे की मासूमियत के आगे एक बार तो ज़ुल्म की रूह भी कांपने लगती है। बड़े से बड़ा संगदिल इन्सान भी बच्चे के आगे मोम की तरह पिघलने लगता है इस बात को मुनव्वर राना ने शाइरी का लिबास पहना दिया :--

तलवार तो क्या मेरी नज़र तक नहीं उठी

उस शख्स के बच्चों की तरफ़ देख लिया था

 

इस मज़मून को लिखने के पीछे मेरा मकसद यही था कि कुछ तो कमाल इस लफ़्ज़ में है के बड़े- बड़े उस्ताद शाइरों ने भी अपने क़लाम में इसे बांधा। शाइरी में बच्चे का इस्तेमाल करना उतना आसान नहीं है जितना लगता है इसके लिए पहले ख़ुद बच्चा होना पड़ता है। क्यूँ ना हम भी अपनी रोज़मर्रा की मसरूफ ज़िंदगी में कम स कम एक पल के लिए ही फिर से बच्चे हो जायेँ …

फूल से मासूम बच्चों की ज़बां हो जायेंगे

मिट भी जायेंगे तो हम इक दास्ताँ हो जायेंगे

(वाली आसी)

 

आख़िर में इसी दुआ के साथ कि हमारे अहद के सुख़नवर इसी तरह अपनी गज़लात में बच्चों को लाते रहे और हम बच्चों से बेपनाह मुहब्बत करते रहें क्यूंकि बच्चे तो सिर्फ़ बच्चे होते हैं चाहे वे किसी भी ज़ात या मज़हब के हों। भाई आदील रशीद की इसी दलील के साथ ...

मैं दुनिया के हरेक बच्चे से यूँ भी प्यार करता हूँ

बच्चा सांप का भी हो तो ज़हरीला नहीं होता

--

ख़ुदा हाफ़िज़।

विजेंद्र शर्मा

vijendra.vijen@gmail.com

बी.एस ऍफ़मुख्यालय

बीकानेर

9414094122

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  1. --ख़ूबसूरत वर्णन किया है...गज़ल में बच्चे का .. साथ में इतिहास भी ...

    --- गज़ल तो मूलतः ---इश्के मजाजी के साथ ही प्रारम्भ हुई ....बाद में सूफी- संतों द्वारा अपनाए जाने पर ...खानकाहों में आई .... साथ ही साथ दरवारों में इश्के-मजाज़ी भी चलती रही ...आज गज़ल में प्रत्येक विषय होने पर भी ..आशिक-माशूक भाव भी बरकरार है...क्योंकि यही गज़ल का मूल चरित्र है... बकौल गालिव ..." बनती नहीं है मीना ओ सागर कहे बगैर "...

    उत्तर देंहटाएं
  2. कहाँ गयी मेरे चेहरेकी झुर्रियां सारी

    ये नन्हे बच्चे के हाथों ने क्या कमाल किया//बेहद ख़ूबसूरती से विजेन्द्र जी आपने ग़ज़ल के इतिहास के कुछ पन्नों से रु ब रु कराया .....वैसे तो मोहब्बत,ख्वाब ,ख़ूबसूरती पर ग़ज़ल ज्यादातर ही अपना बिस्तर बिछाती है पर इसके लिहाफ में नए कशीदा कारी के नमूने कैसे कैसे कढाई कर सजाये गये .......कैसे इसके रूप में धीरे धीरे परिवर्तन आता गया .कैसे खासो खास से ये आम रियाया की जिंदगी के नज़दीक आती चली गयी ......इसका पदार्पण आपने यहाँ बखूबी किया है और बेशकीमती नज़रानो के साथ साथ अपने मिसरों से इस वर्णन को और रंगीन बना दिया है ......बधाई और शुक्रिया ....:)




    आगे पढ़ें: रचनाकार: शाइरी में बच्चे लफ्ज़ के इस्तेमाल पर विजेंद्र शर्मा का मक़ाला http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_7328.html#ixzz21bhkyrwu

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  3. इतनी महंगाई के बाज़ार से कुछ लाता हूँ,
    अपने बच्चों में उसे बाँट के शर्माता हूँ,
    -खलील धनतेजवी

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  4. इतनी महंगाई के बाज़ार से कुछ लाता हूँ,
    अपने बच्चों में उसे बाँट के शर्माता हूँ,

    -खलील धनतेजवी

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