रविवार, 22 जुलाई 2012

कामिनी कामायनी की कहानी : विरक्त

विरक्त

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मध्यम वय के हैडमास्टर गोरे चिट्ट़े सक्रिय खुश मिजाज़ चुंबकीय व्यक्तित्व के सामाजिक और उपकारी जीव थ़े। सबके मदद के लिए सदैव तत्पर। घमंड नाम के विषाणु से परम दूर। अपने सहकर्मियों पर कभी उन्होंने बिना जरूरत अपनी राय नही थोपी। अनुशासन और अध्ययन के क्षेत्र में स्कूल उनके समय में ख्याति के चरम शिखर पर पहॅुच गया था। पूरे शहर ही नहीं बल्कि आस पडोस क़े दूर दराज के इलाकों के लोग भी अपने बच्चों को उस स्कूल में भेजने के लिए लालायित रहते थे।

वहॉ साधारण प्रतिभा के छात्रों में भी कुछ न कुछ विशिष्टता देखकर उन्हें विभिन्न अवसर और प्रोत्साहन प्रदान किए जाते जिससे विज्ञार्थी कुछ न कुछ नवीन कर दिखाते और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में भी वे अव्वल आते। गरीब और अमीर जैसा भयंकर प्रदूषण कारी तत्व उस विद्या मंदिर से सैकडों मील दूर। नूतन पुरातन शिक्षा का अपूर्व संगम।

शहर में खास इज्जत हो गई थी स्कूल की। वहां दाखिला एकदम मुश्किल हो गया था। एम पी एम एल ए़ मिनिस्टर चिफ मिनिस्टर तक के सिफारिश आते रहते थे मगर हैडमास्टर साहब नैतिकता अनुशासन देश भक्ति का ऐसा ओजपूर्ण उदाहरण देकर अपने इस स्कूल की गरिमा और मर्यादा बनाए रखने का आग्रह करते कि लोग लज्जित होकर नतमस्तक हो जाते। बेहद ईमानदारी से वहॉ काम होता था।

पर कहानी स्कूल के प्रतिष्ठा या महानता की नहीं है। विषय कुछ और। उस सहशिक्षा वाले आवासीय विद्यालय में लड़कियों की संख्या लड़को के मुकाबले बहुत कम थी उनका आवास विद्यालय परिसर में ही था जबकि लड़कों का आवास स्कूल के दूसरे कंपाउंड में टीचर्स फ्लैट के साथ था। लड़कियों के मन में मास्टर साहब के प्रति ज्यादा श्रद्धा नहीं थी। कई बार गर्ल्स कॉमन रूम म़ें या रिसेस के समय सरला बहनजी ने उन्हें सर की बुराई करते सुना था। ‘कैसे खॅूखार नजरों से देखते हैं जैसै पकड कर चबा जायेंगे। पूनम को तो कुछ ज्यादा ही लाड़ दिखाते हैं। ’ पूनम बड़ी मुश्किल से अपनी रूलाई रोक कर बोली थी ‘ तुमने ठीक कहा अंजना उस सोमवार को जब मैं थोड़ी बीमार सी थी मेरे पीठ के घाव में बड़ा दर्द हो रहा था नियम के मुताबिक रिसेस के बाद मैं आंफिस में उनसे छुट्टी के एप्लिकेशन पर साइन कराने गई उस वक्त वो अकेले थे। बड़े प्यार से कहा ‘कहां घाव है दिखाओ’। और फिर हॅस दिए। मुझे बहुत गुस्सा आया था। यह भी कोई हंसने की बात है। सिर झुकाकर मैंने जुराब हटा कर पैर के घाव दिखा दिया था।’ "हैं तूने घाव दिखा दिए ’ सातवीं कक्षा की सविता कुछ ज्यादा ही समझदार थ़ी । ‘भई लड़कियों के कहीं भी घाव हो सकते ह़ैं यह तो बड़ी बदतमीजी ह़ै। ’ अपने गल पर हाथ रखकर बेाल पड़ी थी। "और उस दिन जब क्लास में अंग्रेजी पढ़ाने आए थे तब मेरी कलम मुझे वापस लौटाने के वक्त मेरी अंगुली पकड़ लिए थे। ’ शोभा भी न जाने कब से अपना अनुभव सुनाने के लिए बेताब थ़ी।

सरला बहन जी थी तो जूनियर टीचत़ मगर अपने सुमधुर स्वभाव और मित्रतापूर्ण रवैये के कारण लड़कियों की काफी प्रिय थी। अधिकांश छात्र्राए उन्हें अपना परेशानी बताती थी और वे उसे हल करने का भरसक प्रयास भी करती थी। वे खुद बोर्डिंग स्कूल में रही थी तो उन्हें इनकी परेशानियों का सहज अनुभव हो जाता । घर से इतनी दूऱ कोई सगा संबंधी नहीं तब तो शिक्षिकाओं का ही दायित्व बनता है कि वे उन्हें हर तरह से देखभाल करें।

हैडमास्टर साहब की छोटी छोटी गुस्ताखियों पर उन्हें बड़ा कष्ट होता़ कितना प्रतिष्ठित व्यक्ति और करनी कैस़ी मगर उनके पास सबूत क्या था पानी में रहकर मगर से बैर भी कैसे कर सकती थी।

वैसे तो टीचर्स फ्लैट में उनका भी आवास था मगर उनका परिवार कहीं सुदूर गॉव में रहता था और विद्यालय के काम की आधिक्यता से वे अपने आंफिस में ही एक खाट लगा कर रखते थे मेस का पंडित उनका भेाजन भी वहीं भेज दिया करता था। अक्सर कल्चरल प्रेाग्राम वगैरह भी हुआ करता था यानि हमेशा उत्सव का माहौल। एक बार ऐसे ही पन्द्रह अगस्त के कल्चरल प्रोग्राम का रिहर्सल कराते कराते एक दिन शाम एकदम घिर गई थी अपने घर जाते वक्त अचानक उनकी नजर कार्यालय की ओर चली गई थी। वहां कोई लाइट नहीं जल रही थी सारे स्टाफ जा चुके थे। एक काली साया सी धीरे धीरे ससरती हुई छात्रावास की ओर चली गई कुछ ही देर में आंफिस की लाईट जल उठी थी।

उनके मस्तिष्क में दिव्या की बात प्रचंड विद्युतलता की भॉति कौंध पड़ी। ‘बहन जी हैड सर कभी कभी एकदम शाम को पायल को या ममता को बुलाते हैं फिर वह देर तक रोती रहती है उस रात खाना खाने के लिए मेस में भी नहीं जाती। ’ उनके हाथ पांव कांपने लगे थे सिर घूमता हुआ नजर आया था। समझ में नहीं आया क्या करें कौन उसकी बात पर विश्वास भी करेगा। ये नरभक्षी ऐसे ही छुप छुप कर मासूम जिन्दगी से खिलवाड़ करता रहेगा क्या । पता नहीं किन कदमों से चलती हुई वह अपने घर तक आई थी। सिर में तेज दर्द हो रहा था़ शरीर बुखार के कब्जे में सुलग रहा था। दूसरे दिन उसने छुट्टी का एप्लिकेशन भेज दिया था।

नेशनल स्कॉलरशिप के लिए कुछ मेधावी जूनियर स्कूल के बच्चों को अतिरिक्त समय देकर उन्हें तैयारी करवाया जा रहा था। वहां स्कूल साढ़े दस बजे से लगता था । इसलिए एक्सट्रा क्लासेज सुबह सात से नौ के बीच रखा गया था। सरला बहन की बारह वर्षीय पुत्री भी सातवीं क्लास में उस टैलेंट प्रतियोगिता के लिए चुनी गई थी। हैडमास्टर साहब सदा की भॉति आंफिस में ही अड्डा जमाए हुए थे। मेस का लड़का उनका भोजन सामने के टेबल पर रख दिया था। वे खाने से पहले हाथ धोने के लिए उठे ही थे कुरसी से कि प्रगति आ गई। कुछ सवाल पूछने थे उसे। उसे देखकर वे उसके नोट बुक पर कुछ सवाल टिक करते करते उसका हाथ पकडं लिए। उसी समय संजोग वश सरला बहन जी भी कुछ काम से वहां पहॅंच गई थीं। अपनी बेटी को वहां देख उनके तन बदन में भयानक आग लग गई। पिछला सारा वृतांत उनके आंखों के समक्ष तांडव करने लगा था। फिर तो उन्हें समझ ही नहीं आया कि इतना साहस और आत्मविश्वास उनके अन्दर कहां से आ गया। गुस्से से थरथर कांपती बहनजी ने उनके जलील और घृणित व्यवहार के लिए उन्हें खूब फटकारा भला बुरा कहा था। क्रोध से हैड सर दग्ध हो उठे। उन्होंने खाने की थाली जोर से नचाकर दरवाजे के बाहर फेंक दिया था। लम्बे चौड़े सुदर्शन हैडमास्टऱ तमतमाते हुए लाल लाल आंखों से बहनजी को घूरते रह गए थे जब तक वो कमरे से बाहर नहीं चली गई। अचानक उन्होंने टेबल पर से पेन उठाकर कागज पर सेकेंड मास्टर के नाम कुछ संदेश लिखा और खॅूटी से उतार कर अपना कुरता पहनने लगे थे। रेलवे स्टेशन स्कूल के ठीक पीछे था।

सरला बहन ने सोच लिया था प्राइवेट स्कूल ह़ै चेयरमैन हैड की मुठ्ठी में ह़ैं नौकरी तो जानी ही जानी ह़ै उसकी। पर उसने भी ठान लिया था कि वह झुकेगी नहीं चाहे जो हो समाज ऐसे साधु पुरूष रूपी भेड़िए से भरा ह़ै भले ही उसके चीखने चिल्लाने से कुछ नहीं होगा कीचड़ खुद उसी पर उछलेगा पर वह चीखेगी चीखेगी जरूर चीखेगी । उसकी चीख से आसमान फटे न फटे सागर का कलेजा दहले न दहले धरती के सीने में दर्द हो न हो पर वह चीखेगी चाहे उसका गला क्यों न फट जाए ।

स्टाफ रूम में बातें होतीं हैड सर क्यों छुट्टी पर चले गए अचानक़। किसी ने उनकी मां की तबियत खराब बताई तो किसी ने पत्नी क़ी। पर हकीकत सिर्फ सरला बहन जी को ही पता था। उन्होंने भी अपना मॅुह बन्द रखने का विचार कर लिया था जबतक उधर से कोई प्रति क्रिया न ह़ो तब तक के लिए़।

सुबह से शाम होते रहे थे। इसी बीच डेढ़ महीने का दुर्गा पूजा दीवाली की छुट्टी आ गई। इसके बाद भी हैड सर नहीं आए। उप प्रधानाचार्य को भी कुछ खबर नहीं था। खबरें आने लगी कि सर बहुत बीमार चल रहे हैं इसलिए लंबी छुट्टी पर चले गए हैं

उनकी कमी हर तरफ महसूस होने लगी थी। स्कूल के रिजल्ट पर भी असर पड़ने लगा था। वो कब आयेंगे पता ही नहीं। उनके गांव के पते पर भी आदमी भेजा गया पता चला वे कहीं बाहर चले गए हैं कब आयेंगे उन्हें भी पता नहीं।

गरमी की छुट्टी में सरला बहन पहाडों पर घूमने के लिए निकल पड़ी थी। बाहर से भले बोल्ड दिखती अन्दर से बिल्कुल परेशान खोखली हो गई थी अच्छा किया बुरा किया़ क्या किया वह भी उनका अनिष्ट तो नहीं चाहती थ़ी मगर उनका कुकृत्य़ फिर लगता क्या पता लड़कियां बढ़ा चढ़ा कर कह रही हों। खैर जो ह़ो कहकर तत्काल मन को तसल्ली देती।

छुट्टियॉ कुछ ही दिन शेष रह गई थी। मसूरी देहरादून से लौटते वक्त सोचा गंगा भी नहॉ लॅू हरिद्वार म़ें पता नहीं अब कब आना हो। प्रातः काल की अनुपम वेला में गंगा स्नान आरती वगैरह कर के शहर घूमने के क्रम में भारत मंदिर के बाद चिन्तामणि आश्रम देखने आई। बडे से बारामदे के भीतर विशाल हॉल में किसी स्वामी जी का प्रवचन चल रहा था। उपस्थित जनसमुदाय पूरी निष्ठा के साथ उनके अमृतमयी वचनों का दत्तचित्त होकर श्रवण कर रहे थे। करीब पैंतालिस मिनट के बाद उन्हें दंडवत करके जैसे ही बहनजी हॉल के बाहर आईं देखा आंगन में गाय का रस्सी पकड़े एक अत्यंत आकर्षक संन्यासी पश्चिम की ओर बने गौशाले की ओर जा रहा है। संयोग दोनों एक दूसरे के विपरित दिशा की ओर जाने के लिए आमने सामने खड़े हो गए। भिति चित्रों की भांति एक क्षण के लिए वह जडवत हो गई़ जैसे पांव धरती से चिपक गए ह़ों शायद़ किंत़ु परंतु नह़ीं वह हैडमास्टर साहब ही थ़े निश्छल निर्विकाऱ से खड़े मंद मंद मुस्कुराते हुए। अन्दर जो मनसा वाचा कर्मणा पवित्रता का प्रवचन चल रहा था उसका जीता जागता स्वरूप़ सुन्दर तो वे थे ही मन की शान्ति और इस गैरिक वस्त्र ने उन्हें और अलौकिक आभा प्रदान कर दी थी। सिर झुका कर वह आगे अपने मंतव्य की ओर बढने लगी त़ो असहनीय मौन को तोडते हुए मास्टर साहब आगे बढ़े "सरला बहन यों हतप्रभ क्यों हो गई मैं वही हैड मास्टर हॅू शरीर से जिसे सब लोग जानते हैं पर मन से चित्त से वित्त से मैं अब वह नहीं रहा जिसे तुम्हारी जैसी ममतामयी मॅा का भर्त्सना सुनना पड़ा था पहले वाकई मैं अशांत था़ वासना के दलदल में आकंठ डूबा़ कोई जेल कोई दंड मेरे कर्म को नष्ट नहीं कर सकता था। मैंने खुद के लिए खुद ही सजा निर्धारित की थी। उस समाज में इज्जत से रहने का मुझे कोई अधिकार नहीं था इसलिए दुनिया त्यागकर मैं संन्यासी हो गया। तुम मिल गई आज तुम्हारे समक्ष पाप का प्रायश्चित भी हो गया। ’सरला बहन शायद सुन रही थी शायद नहीं पर इस धीर वीर तपस्वी को देखकर उन्हें कौपीन वस्त्र धारी इतिहास पुरूष भर्तृहरि की याद आ गई एक स्त्री के कारण उन्हें भी संन्यास लेना पड़ा था।

श्रद्धा ने कलुषित विचारों को धूल धूसरित कर दिया था। टूटे बांध की तरह दोनों आंखों की नदी हहराने लगी थी। न जाने कौन सी शक्ति के वशीभूत होकर सरला बहन उनके पांवों पर गिर कर बेतहाशा रोने लगी थी।

। । कामिनी कामायनी। ।

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