सोमवार, 30 जुलाई 2012

रामवृक्ष सिंह की रम्य रचना - वाह रे मेरे भारतीय मन !

रम्य रचना

वाह रे मेरे भारतीय मन !

डॉ. रामवृक्ष सिंह

हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में युवाओं की जीवन-शैली को विधि और निषेधों में बाँधने की बड़ी ज़बर्दस्त कवायद आजकल चल रही है। पीढ़ियों की वैचारिक टकराहट कोई आज की बात नहीं है। इस लिहाज से इसमें नया कुछ भी नहीं है। नयी है तो वह सरगर्मी, जो मीडिया के कारण चारों ओर दिखाई दे रही है और जिसकी तपिश प्रत्येक संवेदनशील उत्तर भारतीय अनुभव कर रहा है।

सदियों से समाज को सही रास्ते पर चलाने की फिक्र समाज की विभिन्न संस्थाओं ने की है। यदि वे ऐसा न करें तो समाज में अराजकता फैल जाए। लेकिन आधुनिक युगीन मनुष्य लोकतांत्रिक जीवन-मूल्यों और वैयक्तिक स्वतंत्रता के बारे में अधिक आग्रही है और इसी कारण कभी-कभी व्यक्ति और समाज में टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है। इस टकराव से बचने के लिए या तो व्यक्ति समाज से पलायन कर जाता है या समाज के विधि-निषेधों को येन-केन प्रकारेण स्वीकार कर लेता है। यदि दुर्दैव से टकराव हो गया तो बड़े विध्वंसक नतीजे निकलते हैं।

स्त्री और पुरुष में सृष्टि के आरंभ से ही प्रेम-संबंध होते आए हैं, शारीरिक संबंध बनते आए हैं। सृष्टि का क्रम बनाए रखने के लिए यह जरूरी भी था। विवाह नामक संस्था के आविर्भाव ने इसके लिए एक व्यवस्था बनाई, जिसे समाज ने स्वीकार किया। क्योंकि सभी जोड़े एक ही रीति से संबंध नहीं बनाते थे, इसलिए हमारे शास्त्रों ने प्रायः दस प्रकार के विवाहों का प्रावधान किया, जिसमें पैशाच, राक्षस, गंधर्व आदि विवाह भी समाहित थे। अंग्रेजों के आगमन के बाद अपने यहाँ कोर्ट मैरिज भी प्रचलन में आई, जिसे आज पश्चिम का समाज सबसे उत्तम और विधि-सम्मत विवाह मानता है। कोर्ट मैरिज के दस्तावेजी प्रमाण के बिना कई देशों में स्त्री-पुरुष को पति-पत्नी स्वीकार ही नहीं किया जाता। लेकिन कालांतर में हिंदू समाज ने केवल ब्राह्मण अथवा दैव विवाह को ही अधिक उपयुक्त मानना आरंभ कर दिया और विवाह के बाकी प्रकारों को एक प्रकार से अस्वीकार ही कर दिया।

आज हरियाणा-पश्चिमी उत्तर प्रदेश की विभिन्न खाप पंचायतें माता-पिता की मरजी से और समाज के सामने किए गए ब्राह्म विवाह से इतर विवाहों में आबद्ध होनेवाले युवाओं का विरोध करती हैं, और उन्हें समाज से बाहर निकालने अथवा अन्य सजाएं देने के बारे में तरह-तरह के आदेश जारी कर देती हैं, जो कई बार देश के सभ्य समाज के कानून और विधि-संहिताओं के विरुद्ध भी होते हैं। दिक्कत है कि अपना देश परस्पर विरोधी विचार-धाराओं और जीवन-पद्धतियों का एक साथ अनुकरण करता है। अपने देश में एक ओर जहाँ खाप पंचायतों के नेतृत्व में चलनेवाला बेहद परंपरावादी समाज है, वहीं दूसरी ओर ऐसा उदार समाज भी है, जो वृद्धावस्था में किसी कारणवश अकेले रह गए स्त्री-पुरुषों, विधवाओं और विधुरों के लिए लिव-इन रिलेशनशिप की न केवल वकालत करता है, बल्कि खुले आम उनका सम्मेलन आयोजित करके ऐसे संबंध बनाने के लिए अनुकूल वातावरण भी निर्मित करता है। सन् 2005 में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी ऐसे संबंधों को पति-पत्नीवत संबंध स्वीकार किया। (स्रोत- रविवार 15 जुलाई 2012 को स्टार प्लस चैनल पर प्रसारित सत्यमेव जयते सीरियल)। हाल में दिवंगत हुए सिने स्टार राजेश खन्ना के बारे में भी इस तरह की बातें उजागर हुईं।

हमारे समाज के कुछ धड़ों को युवतियों और महिलाओं की वेश-भूषा पर ऐतराज है। बात-बात पर अपने देश के गौरवशाली इतिहास और परंपराओं की दुहाई देने वाले लोगों से हमारा तो बस इतना ही निवेदन है कि अपने ऐतिहासिक और पौराणिक ग्रंथों को ज़रा ध्यान से पढ़ें और अपने देश के सदियों पुराने मंदिरों में जो मूर्तियाँ और चित्रांकन दिख जाते हैं, उन्हें खूब ध्यान से देखें। फिर अपनी दुहाई और अपने दुरूह मन, दोनों के बीच एक सेतु बनाएं, दोनों के बीच थोड़ा ताल-मेल बिठाएं। उन्हें अपने कराहते मन का मरहम, अपने नुकीले-चुभीले सवालों का जवाब खुद ब खुद मिल जाएगा।

आज भारत के महानगरों, छोटे शहरों और कस्बों में सैकड़ों की संख्या में ऐसी महिलाएं और युवतियाँ मिल जाएँगी, जो अपने हाथ-पैर और चेहरे पूरी तरह ढके रहती हैं। ऐसी लड़कियाँ हमारे कॉलेज के दिनों (सन 1980-85) में बहुत कम दिखती थीं। हमें अब भी याद है, उन दिनों जब हम हिन्दू कॉलेज से निकलकर, बाहर बस स्टैंड पर खड़े होकर बस का इंतजार कर रहे होते थे, तब कई बार सामने से, युनिवर्सिटी रोड पर फर्राटा भरती मोटर साइकिलों पर लड़कों के पीछे बैठी लड़कियाँ अपनी पहचान छिपाने के लिए ऐसा बाना धारण किए रहती थीं। आज ऐसे नज़ारे बहुत आम हो गए हैं, लेकिन केवल दिल्ली विश्वविद्यालय में नहीं, बल्कि लगभग पूरे भारत में। सवाल यह उठता है कि अपनी पहचान को पूरी तरह छिपाकर किया गया यह आचरण क्या हमारे समाज को स्वीकार्य है? घूँघट तो खूब होता है उनका, लेकिन क्या ऐसी युवतियाँ समाज को स्वीकार्य आचरण कर रही होती हैं? क्या इससे अच्छा यह नहीं रहता कि उनके मुख अनावृत रहते और वे लड़कों से सार्वजनिक तौर पर ऐसे दो जिस्म एक जान होकर फर्राटा न भरतीं? वैसे इन पंक्तियों के लेखक को इसमें भी कोई गुरेज नहीं है, क्योंकि वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थक है। बस हम तो समाज के उस तबके की दिलजोई के लिए यह बात कह रहे हैं, जो युवाओं को उनकी हद में देखना चाहता है।

सुपठ और विज्ञ पाठकों को शैलेष मटियानीजी की कहानी ‘फूलो का कुर्ता’ याद होगी, जिसमें बाल-विवाहिता बच्ची फूलो दूसरे बच्चों के साथ खेल रही होती है। तभी उसके ससुर आते दिखते हैं। फूलो के साथी बच्चे कहते हैं कि फूलो तेरे ससुरजी आ रहे हैं, तू पर्दा नहीं करेगी क्या? अबोध फूलो अपना कुर्ता उठाकर चेहरा ढाँप लेती है, लेकिन चूंकि उसने नीचे कोई अधोवस्त्र नहीं पहने थे, इसलिए वह वस्तुतः निर्वसन हो जाती है। हम जब अपने युवा बच्चों को जबरन पर्दानशीं बना रहे होते हैं, तो क्या वास्तव में उनके यौनाचार को भी नियंत्रित कर रहे होते हैं? शायद नहीं। देश में यौन-चर्या पर हुए सर्वेक्षण बताते हैं कि ऐसे समाज जहाँ परंपरागत पोशाकें खूब प्रचलन में हैं और महिलाएं सीधे पल्ले की साड़ी पहनती हैं, वहाँ बेडरूम में यौन-चर्या अपने चरम पर होती है। गुजरात का स्थान इस मामले में अव्वल है। धार्मिकता भी यौन-चर्या को नियंत्रित नहीं करती। इस प्रपत्ति की पुष्टि के लिए हमें पुनः गुजरात जाना चाहिए, जहाँ सबसे अविवाहित युवतियों द्वारा सबसे अधिक गर्भपात नवरात्र के परवर्ती महीनों में कराए जाते हैं। इसलिए जो लोग युवाओं के तन ढँपवाकर और उनमें धार्मिकता के संस्कार लाकर उनकी यौन-चर्या को नियंत्रित करने का सपना देख रहे हैं, वे वस्तुतः किसी भारी मुगालते में हैं। ऊपर जिन चित्रों और मूर्ति-शिल्पों की बात हमने की है, वे सब के सब (शत-प्रतिशत) हिंदू मंदिरों में अंकित हैं।

एक बड़ी आफत है मोबाइल। पाठकों को बता दें कि इन पंक्तियों का लेखक सन 1982 से 87 तक टेलीफोन विभाग में काम कर चुका है। उस समय मोबाइल प्रचलन में नहीं आए थे और उसके बहुत बाद जब आए भी तो मोबाइल फोन का आकार काफी बड़ा था, उससे भी बड़े थे दाम। एक-एक सेट की कीमत पैंतीस –चालीस हजार रुपये होती थी। इसलिए अधिक प्रचलन तो लैंडलाइन फोनों का ही था।

खैर, तो जिन दिनों मोबाइल नहीं थे, उन दिनों भी फोन पर बड़ी रसीली बातें होती थीं, इसका श्रवणशील गवाह आपका यह खादिम है। कभी टेस्टिंग करते-करते पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पीसीओ नंबर जब हम बोर्ड पर ले लेते थे तो ऐसी-ऐसी बातें सुनने को मिलती थीं, कि कब्रदोज़ इन्सानों की भी तमन्नाएँ हरी हो उठें, फिर हम तो उस समय उन्नीस-बीस के ही थे। टेलीफोन विभाग के किसी डीई के सर्विस कनेक्शन से, माल रोड से करोल बाग कोई लड़का फोन मिलाता था और वे सारी बातें करता था, जो मुर्दे में जान डालने के लिए काफी होती हैं- पूरी यौन-चर्या, वह भी फोन पर। मोबाइल ने क्या गुनाह किया? उसने पहले से चले आते सारे किस्से को आम कर दिया। बस। पहले जो काम कबूतर करता था, हमारी नानी-दादी के किस्सों कहानियों में जो काम कुट्टनियाँ करती थीं, वही काम इस मोबाइल ने किया। लेकिन काम नया नहीं है, नया है माध्यम। काम तो पहले भी होता है, आज भी हो रहा है।

तो लब्बे-लुआब यह कि हमारी पंचायतों को युवाओं के मोबाइल इस्तेमाल करने पर भी ऐतराज है। ऐसा ही ऐतराज कभी मुगलों को अपनी शहजादियों की शादी के बाबत हुआ करता था। मरदुओं ने एक की भी शादी नहीं कराई। उनको यही ठसका था कि अपनी बेटियाँ ऐसे किस मरदूद को दें जो हमसे ऊँचे या हमारे बराबर के रुतबे वाला हो? कुँआरी मर गईं सब की सब। शुक्र है कि दीन नाम की एक शै थी, जिसके आसरे उन्होंने अपनी जिन्दगी गुजारी। तो पंचायतों को चाहिए कि युवाओं को दीन के रास्ते चलाएं। न मोबाइल, न आधुनिक कपड़े, न प्रेम। दिक्कत फिर भी वही रहेगी। युवा चाहे दीनी हों या दानिश, उनकी यौन तमन्नाओं का क्या इलाज करेंगे?

जिद है कि हम अपने बेटे-बेटियों को समाज के परंपरागत मानदंडों के हिसाब से चलाएँगे। कितने परिवारों के बच्चे समाज के बँधे-बँधाए ढर्रों पर चल रहे हैं और फिर भी तरक्की कर रहे हैं? या तरक्की कर रहे हैं फिर भी बँधे-बँधाए ढर्रे पर चल रहे हैं? बचपन में देखे हुए कुछ दृश्य दिमाग में तिर जाते हैं। याद आती हैं वे मरकही और खूँटा तुड़ाकर भागनेवाली भैंसे, जिनके गले में रस्सी बाँधकर खाट का पुराना गोड़ा या लकड़ी का मोटा टुकड़ा लटका दिया जाता था। भैंस भागती तो उसके अगले पाँवों में यह अवरोध अटक जाता। मजबूरन भैंस को यह बाधा अपनी गरदन में लटकाए-लटकाए किसी तरह खटर-पटर करते घास चरनी होती।

हम अपने बच्चों को उनकी स्वाभाविक चाल नहीं चलने देना चाहते। उनके पाँवों में बेड़ियाँ डालना चाहते हैं- विधि-निषेध की बेड़ियाँ। बच्चे तरक्की न करें तो न सही। हमारी परंपराएँ सलामत रहें। हमारा इकबाल बुलन्द रहे। हम इन परंपराओं का पालन करेंगे और हमारे बच्चे मध्य-युगीन मानदंडों के हिसाब से चलेंगे। अजीब गड़बड़झाला है। तरक्की करो तो उसके साथ मिलनेवाले पैकेज में बुराई पाओ। बुराई से बचो तो दौड़ में पीछे रह जाओ। मैनेजमेंट कॉलेजों और तकनीकी संस्थानों में पढ़नेवाले बहुत-से लड़के-लड़कियों की खान-पान, रहन-सहन की आदतें कैसी हो जाती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। जीवन की रेस में आगे निकलना है तो इन बुराइयों की अनदेखी कर दो, वरना अपने नैतिक मूल्य लिए अपने कस्बे में पड़े रहो और परचून या पनवाड़ी की दुकान चलाए जाओ। आज का जीवन बड़ा विषम है। करें तो क्या करें!

वैसे बताते चलें कि स्थिति इतनी खराब भी नहीं है। आज ही अख़बार में पढ़ा कि इन खाप पंचायतों ने एक रुपये के दहेज पर शादी, लड़कियों की अनिवार्य शिक्षा आदि से संबंधित कुछ बहुत ही प्रगतिशील निर्णय भी किए हैं। शायद जीन्स-टॉप और मोबाइल पर रोक का निर्णय इन्हें इसलिए करना पड़ा कि लड़के-लड़कियों ने अपनी सीमा-रेखाओं को लाँघकर कहीं न कहीं मुक्त यौन-व्यवहार का रास्ता अपना लिया है। कुछ दिनों पहले एक मोबाइल कंपनी का होर्डिंग देखा, जिसमें एक लड़की एक साथ चार-चार लड़कों से बात करती है और यही मोबाइल कंपनी का यूएसपी है। यदि मोबाइल रखने पर लड़कों-लड़कियों की दशा ऐसी हो जाए तो निश्चय ही चिंता की बात है। लेकिन हम इसका उलटा सोचते हैं। बिटिया कॉलेज गई है, लौटने में देर हो रही है। हमने उसके मोबाइल पर कॉल किया- क्या बात है बेटा बहुत देर कर दी? बिटिया ने तुरन्त जवाब दिया- पापा, बस नहीं आई। बस स्टैंड पर खड़ी इंतजार कर रही हूँ। कुछ तसल्ली हुई? शुक्र है कि बिटिया के पास मोबाइल है। हम मोबाइल का इस्तेमाल अच्छे उद्देश्य के लिए क्यों नहीं करते? यह तो उस आग की तरह है जिसपर चाहें तो भोजन पका लें, और चाहें तो अपनी चिता जला लें। इतना विवेक तो हमारे पास होना चाहिए कि हम इसका क्या उपयोग करने वाले हैं।

चिंता तो होती है। बताते चलें कि इन पंक्तियों के लेखक के दो युवा बेटे हैं। और दोनों ही ब्याहने योग्य और सदाचारी, टो-टोटलर और सन्मार्गी। कभी-कभी चिन्ता होती है कि इन भोले-भंडारी बेटों के लिए मेरी बहू के बतौर सुशिक्षिता, अक्षत-यौवना, सदाचारिणी कन्याएं मिलेंगी क्या? यदि खाप पंचायतों के विधि-निषेध व्यवहारतः लागू हुए, मुक्त यौनाचार पर नियंत्रण हुआ तो जरूर मिलेंगी, वरना कोई भरोसा नहीं। इतना बड़ा समझौता हमारा मन तो नहीं करता। इतनी उदारता अभी हमारे समाज में नहीं आई है। और यही है हमारी पंचायतों की पीड़ा का उत्स। वाह रे मेरे मध्यवर्गीय (और मध्यकालीन) भारतीय मन! कितना पिछड़ा रह गया तू!

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डॉ. आर.वी. सिंह

उप महाप्रबन्धक (हिन्दी)/ Dy. G.M. (Hindi)
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक/ Small Inds. Dev. Bank of India
प्रधान कार्यालय/Head Office
लखनऊ/Lucknow- 226 001

2 blogger-facebook:

  1. Fauji5:05 pm

    अधकचरा लेख. थोड़े और अध्ययन तथा शोध की आवश्यकता है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. विचारणीय ।
    रोचकता बनाए रख कर आप ने कई गंभीर बातें कह दी हैं ।
    सार्थक प्रस्तुति । बधाई!

    उत्तर देंहटाएं

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