रविवार, 15 जुलाई 2012

पंकज राग की छः प्रेम कविताएँ

 

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पंकज राग

प्रेम : छः कविताएं

1

प्‍यार को सूफ़ियाना मत बनाओ

प्रेम यूँ भी एक अतिश्‍योक्‍ति है

बेहद की कल्‍पना कर रहे मेरे सज्‍जादानशीनों

वहां भी मिलेंगी चारदीवारियाँ - वहाँ भी खुलेगा मन्‍नतों का नया सिलसिला

तुम्‍हारे पाले हुए दरगाहों की तरह

 

2

यूँ वह खाली मैदान था जहाँ हम और तुम बैठे थे

और घास गीली भी नहीं थी

फिर भी हम बेचैन हो कर थोड़ी ही देर में उठ खड़े हुए

प्‍यार एक बाज़ी की शकल लेने लगा था

और हम दोनों पहले से ही परास्‍त थे

 

3

मुझे किताबों में सूखे हुए फूल कभी नहीं मिले

एक कम पढ़ी लिखी अनुभूति की तरह मैंने प्‍यार को हमेशा सरपरस्‍त किया

उसकी तरक्‍की पर अपनी पीठ भी थपथपाई

और उसे दिखाने के लिए कुछ और किताबें खरीद लाया

मैं सुबह सवेरे बगीचे में टहलने नहीं गया

न ही शाम में बालकनी पर खड़े होकर आकाश की रंगीन रेखाएँ देखीं

मैंने अपनी दिनचर्या कायम रखी

और उसके अतिक्रमण की एक-एक कोशिश नाकाम की

इस तरह बड़े सलीके से

एक अदबी तरीके से

मैंने भी प्‍यार किया

 

4

मैंने कहा मुझे सीधी रेखा अच्‍छी लगती है

उसने कहा मैं इस रेखा के दोनों ओर

परछाइयाँ बनाना चाहती हूँ

मैंने कहा कि साफ़-साफ़ देखना अच्‍छा होता है

उसने अंतर्मन का हवाला दिया और बोलने लगी

कि उसे ऐसी आवाज़ें सुनाई देती हैं जिन्‍हें वह पहचानती नहीं

मेरे हाथ में बँधी-बँधाई एक किताब थी

उसके हाथों में उलझती बिखरती छायाओं की एक तरस्‍वीर

शायद मुझे किसी खास रंगत का पूर्वाग्रह था

शायद उसे धुँधले की आदत पड़ चुकी थी

मैं शायद चल रहा था

और वह शायद कुहनियों के बल लेटी थी

हम फिर भी प्रेम कर सकते थे

पर किया नहीं

 

5

कमबख्‍त यह भी एक उम्र है

जब रोशनी की हर पगडंडी

झीने कपड़ों में लिपटी हुई सी लगने लगे

धूप छाँव से बढ़ कर लगे हल्‍की धूपों का यह खेल

उसके बारे में सोच-सोच कर ही थक जाए आदमी

झीने कपड़ों की सरसराहट कानों को चिढ़ाए

पर हाथ उठने से इंकार कर दें

अब इस उम्र में तुम भी तो हल्‍की सी ही नज़र आओगी

कितनी भी रोशन हो तुम्‍हारी याद

अब तुम्‍हारे साथ भी खेल फीका ही रहता है

फिर भी खेलते हैं कभी-कभी

बराबरी पर तो नहीं छूटते हम देानों

पर न कोई जीतता है न ही कोई हारता है

 

6

आँसुओं के सैलाब के साथ आया गश खाता प्‍यार

और मैं घबरा गया

हालांकि मैं सिर्फ़ एक कस्‍बाई प्रेम कहानी पढ़ रहा था

जिसकी तारीफ़ हर जगह उस पत्रिका के प्रबु( सम्‍पादक ने की थी

फिर भी मैं अनुभूतियों और उद्‌गारों के इस हुजूम को ठहरा नहीं पा रहा था

अनवरत सिलसिला था

लजाने का, झिझकने का, मन ही मन चूमने का और आँखें बंद करने का

‘हाय राम' के जुमलों से बन रहा था संसार

कस्‍बे की गलियों को भी दबोच रहा था प्रेम

और नायिका को अपने आस-पास एक सुगंध आने लगी थी

सब कुछ इतना अधिक-अधिक होने लगा

कि मुझसे पूरी नहीं हो पाई वह कहानी

बाद में कई जगह देखी उस कहानी की चर्चा

साहित्‍य के बड़े-बूढ़ों ने की जम कर तारीफ़

उस जवान कहानी की

और उसके सहारे

उसकी जवान लेखिका की

ऐसी कहानियों को पढ़ कर मुझमें क्‍यों नहीं आता जवानी का सैलाब?

प्रेम तो मैंने भी किया था किसी से

पर हमारी तो साँसें घटती थीं

किसी भी उफ़ान भरे सिलसिले से

न हमारे शब्‍द इठलाते थे

न हमारी देह सिहरती थी

कुछ तो आदतें ही संयत थीं

और कुछ महँगाई के मारे हम

खर्चते भी कम ही थे।

--

1 blogger-facebook:

  1. वाह.........
    बेहतरीन कवितायें...
    अब तुम्‍हारे साथ भी खेल फीका ही रहता है

    फिर भी खेलते हैं कभी-कभी

    बराबरी पर तो नहीं छूटते हम देानों

    पर न कोई जीतता है न ही कोई हारता है

    बहुत बढ़िया
    शुक्रिया.
    अनु

    उत्तर देंहटाएं

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