शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - आओ समिति -समिति खेलें।

सरकार जिस काम को नहीं करना चाहती है उस काम के लिए एक समिति बना दी जाती है। समिति का अध्‍यक्ष सरकार का एक स्वामीभक्त बन्‍दा होता है जो और सब कुछ करता है मगर समिति की रिपोर्ट नहीं देता। बाजवक्‍त वो समिति का कार्यकाल बढ़ाने में व्‍यस्‍त रहता है। सरकार भी समिति की रिपोर्ट नहीं चाहती अतः समिति का कार्यकाल बढ़ा देती है। कमेटी निर्माण कला में सरकार के अफसर बहुत समझदार होते हैं वे कमेटी में अपने सेवानिवृत्‍त मित्रों को भर लेते हैं। कमेटी सबसे पहले अपने लिए बजट और आफिस की मांग करती है।

बजट मिलते ही कमेटी के अध्‍यक्ष और सचिव के पंख निकल आते हैं, वे दफ्‌तर में टेबल कुर्सी, ए․सी․, कम्‍यूटर, कार, पर्दे, स्‍टेशनरी, जनसम्‍पर्क आदि कार्यों में व्‍यस्‍त हो जाते हैं। जब दफ्‌तर जम जाता है तो सरकार पूछती है-रिपोर्ट का क्‍या हुआ। अध्‍यक्ष बताते हैं कि रिपोर्ट के लगभग पांच-सात हजार पन्‍ने लगभग तैयार है बस टाईपिस्‍ट चाहिये। टाइपिस्‍ट के आने के बाद टंकण होता है। शानदार रिपोर्ट, शानदार बाइंडिंग और शानदार तरीके से इस रिपोर्ट को सरकार के मुखिया तक पहुंचाया जाता है। अखबारों में फोटो छपते है, टीवी पर मुखिया और कमेटी के अध्‍यक्ष के मुस्‍कराते हुए चेहरे दिखते हैं और रिपोर्ट एक विभाग से दूसरे विभाग में धूल खाती हुई घूमती रहती है।

संसद हो या विधान सभा सरकारें जल्‍दी से कमेटी बनाने की घोषणा कर देती है। कई समितियां तो स्‍थायी हो जाती हैं। कई कमेटियां संविधान के हिसाब से अनन्‍त काल तक चलती रहती हैं। समिति बनाने का मामला कोरपोरेट सेक्‍टर में भी खासा प्रचलित है। कई बार तो सभी समितियों के कार्यों पर नजर रखने के लिए एक नई समिति बना दी जाती है। केबिनेट मंत्रियों के समूह की कमेटी होती है और ऐसे सैकड़ों मंत्री समूह वाली कमेटियां है समिति के अध्‍यक्ष व्‍यस्‍तता के कारण मीटिंग तक नहीं करते। मीटिंग करते हैं तो निर्णय नहीं करते। निर्णय करते हैं तो लागू करने के लिए सरकार को नहीं भेजते, यदि सरकार को भेजते हैं तो सरकार समिति की अनुशंसाओं को रद्‌दी की टोकरी में फेंक देती है या, तब तक सरकार ही बदल जाती है। एक राज्‍य सरकार तो अल्‍प मत के कारण ऐसी ही एक समिति के कारण चल रही है, रिपोर्ट आई और सरकार गई।

एक अधिकारी ने मुझे बताया समितियां केवल अनुशंसा कर सकती हैं। इन पर प्रशासनिक निर्णय का दायित्‍व नहीं है-ये काम हमारा है प्रशासनिक निर्णय हम करते हैं और ये निर्णय जनहित में नहीं सरकार के हित में होता है।

हर काम के लिए समिति। प्रजातन्‍त्र में समिति या समिति में प्रजातन्‍त्र कुछ समझ में नहीं आता है। कौन किसे चला रहा है।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

․․09414461207

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