शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

रामवृक्ष सिंह का आलेख : आम आम ना रहा

आम आम ना रहा

लखनऊ में इन दिनों आम की आमद चरम पर है। लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि आम की आपूर्ति बढ़ने के कारण उसके दाम कम हो गए हैं। बल्कि इसका ठीक उलटा हो रहा है। इस वर्ष आम की फसल बहुत अच्छी थी। वसंत के मौसम में जहाँ देखिए बौर ही बौर दिखते थे। फिर अमियाँ आईं और अंततः आम। अमराइयाँ महक उठीं। इस बीच कोई आँधी नहीं आई। इस बीच ओले भी नहीं गिरे। और इस बीच कीड़े का प्रकोप भी नहीं फैला। बारिश देर से आई, जिसके कारण आम पका जरूर थोड़ा देर से। लेकिन आम पेड़ों पर बदस्तूर बना रहा। पिछले साल इसका ठीक उल्टा हुआ था। एक तो बौर कम था, फिर बार-बार की आँधी-तूफान ने ज्यादातर फसल बर्बाद कर डाली थी। इसके बावजूद पिछले वर्ष आम के दाम इस वर्ष की तुलना में काफी कम थे। यानी आपूर्ति कम रहने और माँग अधिक होने के बावजूद आम के दाम कम थे। इस वर्ष आपूर्ति अधिक है, माँग में कोई कमी-बेशी नहीं, वह पिछले वर्ष जैसी ही, यानी स्थिर है, किन्तु आम के दाम पिछले वर्ष से बहुत अधिक हैं। पिछले वर्ष जो आम पंद्रह-बीस रुपये किलो बिका था, वही इस वर्ष तीस-पैंतीस रुपये किलो से अधिक दाम पर बिक रहा है।

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गौर करने पर हमें एक ही बात समझ आ रही है। इस साल मलिहाबादी आम और आम आदमी के बीच कुछ बिचौलिए घुस आए हैं। मार्केटिंग कंपनियों ने आम को अचानक अपनी गिरफ्त में लेकर खास बना दिया है। पद्मश्री जनाब कलीमुल्ला खाँ को अपना पोस्टर बॉय बनाकर एक मार्केटिंग कंपनी ने आम की बाकायदा पैकिंग करा डाली है और पाँच किलो की पैकिंग ढाई हजार रुपये में बेच रही है। सात जुलाई को इस कंपनी ने आम दिवस के तौर पर मनाना शुरू किया है। इस अवसर पर आयोजित जलसे में कंपनी ने महामहिम गवर्नर साहब को आम की दावत खिलाई और खूब पब्लिसिटी बटोरी। खूब हो-हल्ला हुआ और लखनऊ के आमों को विश्व-पटल पर ख्याति दिलाने की पुरजोर कोशिशें की गईं।

जैसाकि आम तौर पर होता है, मार्केटिंग कंपनी की इस सारी उठा-पटक का खामियाजा लखनऊ ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत के हर उस आम आदमी को उठाना पड़ रहा है, जिसे गरमी खत्म होते-होते आम के मीठे जायके का इंतजार रहता है। इस बार कुदरत की यह नेमत दशहरी आम के गढ़ लखनऊ को भी ठीक से मयस्सर नहीं होगी, इतना लगभग तय हो गया है। धन्य हैं मार्केटिंग कंपनियाँ।

आप को याद होगा, कुछ समय पहले रिटेल क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का विरोध करने के लिए देश के कई लाख व्यापारी-वणिक सड़क पर उतर आए थे। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आने से अपने देश में जगह-जगह बड़े-बड़े स्टोर खुलते जो किसानों से सीधे खरीद करके दैनिक उपभोग का सामान (मुख्यतया खाद्य सामग्री) सीधे उपभोक्ता को बेचते। गुजरात में बहुत से स्टोर ऐसा कर रहे हैं। लेकिन यह बाद उस वणिक वर्ग को हजम नहीं हुई, जो किसानों से औने-पौने दाम पर उपज खरीदता है और महँगे दाम पर उपभोक्ता को बेचता है। आज अपने यहाँ लहसुन, गेहूँ और आम सहित ढेरों खाद्य उत्पादों का यही हाल है। किसान से कम दाम पर उपज खरीदी जा रही है और उसे महँगे दाम पर बेचा जा रहा है।

रिटेल क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मुखालफत करनेवाले कुछ लाख की संख्या वाले वणिक वर्ग ने अपने फायदे का हवाला तो दिया किन्तु करोड़ों की आबादी वाले उपभोक्ताओं के हित की कोई चिन्ता उन्होंने नहीं दर्शाई। यही बात आज आम की मार्केटिंग करनेवाली कंपनियों पर लागू हो रही है। वे आम आदमी को आम के स्वाद से महरूम रखने पर आमादा हैं। सुना है कि पूजा और दाह-कर्म में अनिवार्य रूप से इस्तेमाल होनेवाली आम की लकड़ी पर भी इन कंपनियों ने अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू कर दी है।

यदि समय रहते हम नहीं चेते और मार्केटिंग कंपनियों की इन दुर्नीतियों का विरोध नहीं किया गया तो आम खाना तो दूर हिन्दू मृतकों की दाह-क्रिया के लिए नौ मन आम की लकड़ियाँ खरीदने में भी हमें अपने पूरे जीवन की कमाई खर्च करनी पड़ेगी। बताते चलें कि श्मशानों पर दाह-क्रिया करानेवाले भाई लोग अब सात मन लकड़ी में मुर्दा नहीं फूंकते। यदि कोई जिद करे तो आग लगाने के कुछ देर बाद यह कहकर फिर दो मन लकड़ियाँ खरीदवाते हैं कि लाइए नहीं तो लाश अधजली रह जाएगी। और तो और भैंसाकुंड के श्मशान का ठेकेदार 3 रुपये प्रति किलो की दर निर्धारित होने के बावजूद 5 रुपये किलो की दर से कम पर लकड़ी नहीं देता। चाहे जेठ-बैसाख की लू से पूरी धरती झुलस रही हो, लेकिन श्मशान की लकड़ी हमेशा गीली मिलती है।

हमारे जीने और हमारे मरने, दोनों ही के जरुरियात के सामान पर मार्केटिंग कंपनियों की निगाह है। क्या हम जाग रहे हैं? क्या हम सचेत हैं? क्या हमारी आत्म-मुग्धता में कुछ कमी आने की गुंजाइश है? क्या हम इस दुर्नीति का विरोध करेंगे?

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