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पुस्तक समीक्षा : व्यंग्य का शून्यकाल

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सबसे पहले भूमिका जो व्यंग्य का शून्यकाल से ही ली गई है -"शून्यकाल वही है जो गोल कर दे. गोल घुमा देगा तो व्यंग्य हो जाएगा. यह टोटका कविता में काम नहीं आएगा. कविता में घुमाने की कोशिश की तो चुटकुला बन जाएगा. इसी चुटकुले ने तो हास्य-कवियों को हास्यास्पद बनाया है. मंच पर जो उन्हें पिला रहे थे, अब वही रुला रहे हैं. गोल करना वैसे विजय का प्रतीक भी है. अब यह प्रतीक क्रिकेट में कारगर नहीं है. क्रिकेट में रन बनाने होते हैं. रनों के घोड़े दौड़ाने होते हैं. सचिन दौ़ड़ा रहा है. पर यदा-कदा वह भी हांफ जाता है. रन बनाने से तात्पर्य यह नहीं है कि आपने इधर रन सुना और उधर दौड़ लगा दी. बुद्धि और विवेक दोनों का समन्वयकारी उपयोग करना पड़ता है. गोल हॉकी में किए जाते हैं. फुटबाल गोल होती है इसीलिए उसमें भी किए जाते हैं. बुद्धि जिनकी गोल होती है वह तो सदा गोल ही करते रहते हैं..."भूमिका से ही किताब की सलर, हंसती गुदगुदाती हर दूसरे वाक्य में व्यंग्य मारती भाषा शैली का पता चलता है, जो बदस्तूर सभी लेखों में जारी रहता है. 110 पृष्ठों की इस किताब में अविनाश वाचस्पति के एक कम चालीस व्यंग्यों का संग्रह प्र…

प्रमोद भार्गव का व्‍यंग्‍य निबंध : वाटरगेट बनाम कोलगेट

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भैया हमारे सनातन ऋषि तो पहले ही कह गए कि काजल की कोठरी में रहोगे तो थोड़े बहुत काले होगे ही। अब बेचारे निष्‍काम निर्लिप्‍त प्रधानमंत्री ने काजल की इस कोठरी में रहने की मजबूरी तो पूरे छह साल ढोई, सो सफेद पोशाक पर थोड़े बहुत काले छींटे पड़ भी गए तो उनकी यह नादानी क्षमा के काबिल है। अब विपक्ष संसद में चाहे जितना हल्‍ला बोले। बहस न होने दे। आप भले ही कहते रहें ‘‘कोयले की दलाली है, सारी कांग्रेस काली है।‘‘ मूर्ति सदृश्‍य मनमोहन इस्‍तीफा देने वाले नहीं हैं। ऐसे कई अवसरों का दिलेरी से मौन साधे वे कई मर्तबा सामना कर चुके हैं। टूजी स्‍पैक्‍ट्र्रम घोटाला, राष्‍ट मण्‍डल खेल धोटाला और सार्वजानिक निजी साझेदारी के कई ऐसे कई मुद्‌दे संसद में परवान चढ़े, पंरतु संसद में साधना के मौन हठयोग के चलते उन्‍होंने सब पर पार पा ली। हठयोग की इस सिद्धी की सीख बाबा रामदेव को मनमोहन से लेने की जरुरत है। संसद के बाहर बेचारे अण्‍णा और रामदेव भ्रष्‍टाचार, धोटालों और लूट की सरकार होने का मंत्रजाप करते ही रह गए, किंतु मंत्र सिद्धि दूर की कौड़ी ही रही। अब जो समन्‍वय समीति की बैठक काग्रेंस आलाकमान के धर हुई है, उसमें गठ…

जसबीर चावला की कविताएँ

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नई गरीबी रेखा
----------------वे गरीब नहीं थे
चाहते थे करना
महसूस
गरीबी क्या हैनामी मॉल गए
देखी/परखी
ब्रांडेड ब्लू जींस/ टॉप
छपे थे
फटे थेगले
जिस पर
आगे पीछे
चूना सा पुता था
दूसरी पर
लटक रहे थे
पायंचो के धागे
तीसरी केखुश हुए
खरीद लिए
सारे कपड़े
जो उन्हें
दिखाते थे गरीब
अपने लिए
बीबी/ बाबा/बेबी/केलिए
अब वे भी थे नीचे
हाई क्लास
गरीबी रेखा के
---------------------.बार बार
---------यह जानकार भी
रंग बिरंगे/ चमकीले
कागजों से लिपटे 
डब्बे में
सस्ता सा
उपहार होगा
मन आँखें
उत्सुक होते हैं
देखने/ छूने/ खोलने के लिए
यही
जिज्ञासा/ बेचेनी/ अतृप्ति
कदमो को
ले जाती है
फिर फिर
अज्ञात की
तलाश में
ठगाने के लिए --------------.अथ:राजनीतिज्ञ कथा
--------------------- खरबूजों का समाज है
सडान्ध मारते/ गंधाते
यहाँ स्वागत नहीं
किसी अन्य का
रेल के डब्बे
में आये
नए यात्री के समानअपने है नियम/कायदा/ कानून
यहाँ रंग बदलना है
हर खरबूजे को
गिरगिट के समान
दूसरे खरबूजे
को देख
यहाँ
खींचनी हैं टांग
केकड़े
के समान
दूसरे की
अलग/ अलग
झपटकर
मिल/बांटकर
खाना/ नोचना है
गिद्धों के समान
यह समाज है
राजनीतिज्ञों का
गिद्धों का
खरबूजों का
गिरगिटों का
केकड़ों का
-------------…

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -68- प्रभुदयाल श्रीवास्तव की कहानी तांगेवाला

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कहानीतांगेवाला प्रभुदयाल श्रीवास्तवमन बड़ा चंचल और चलायमान होता है इस पर‌ बड़े बड़े देवता, ऋषि मुनि और‌ साधु संत तक‌ नियंत्रण नहीं कर सके तो इंसान बेचारा तो हाड़ मांस का पुतला ही है किसी अज्ञात की डोरी से बंधा उसी के इशारे पर जिंदगी भर नाचता रहता है। फिर भी कभी कभी ऐसी घटनायें हो जातीं हैं जो मन मस्तिष्क पर अमिट और गुदगुदाने वाली छाप छोड़ जातीं हैं। बात कोई पच्चीस साल पहले की है। दिन के बारह बज चुके थे। मैं अपनी पत्नी सविता और बड़ी दीदी के साथ तांगे में बैठा स्टेशन की ओर बढ़ा जा रहा था। तांगे का वह मरियल सा घोड़ा अपने मालिक की तरह सुस्त सा सड़क पर टक टक करता चला जा रहा था। मेरे मुहल्ले धरमपुरा से हमारे शहर दमोह का रेलवे स्टेशन कोई तीन किलोमीटर के लगभग था। तांगेवाला हमारे लिये अपरचित था। धरमपुरा में हमारा पुस्तेनी घर है। शहर से जुड़ा हमारा यह गाँव अब शहर की गोद में समाकर उसका एक मोहल्ला बन गया है। पहले यह एक मालगुजार के अधीनस्थ चालीस पचास गाँव की मालकियत का केन्द्र था। हमारा यह गाँवनुमा मोहल्ला राजसी मर्यादाओं और परिपाटियों में बाधित था। हिन्दू मुसलमान और सभी छोटी बड़ी जाति के लोग एक मर्यादित परि…

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -67- वंदना अवस्थी दुबे की कहानी : नहीं चाहिए आदि को कुछ...

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कहानी                         नहीं चाहिए आदि  को कुछ......वंदना अवस्थी दुबे' ये क्या है मौली दीदी?" " आई-पॉड है." "ये क्या होता है?" " अरे!!!! आई-पॉड नहीं जानते? बुद्धू हो क्या?" इतना सा मुंह निकल आया आदि का.  क्या सच्ची बुद्धू है आदि ? क्लास में तो अच्छे नंबर पाता  है.....हाँ, कुछ चीज़ों के उसने नाम  सुने हैं, लेकिन देखा नहीं है. "अरे पागल,  ये आई-पॉड है, इसमें बहुत सारे गाने भरे हैं. पांच सौ से ज्यादा गाने डाउन-लोड कर सकती हूँ मैं इसमें. और हाँ ये एम्.पी. फ़ोर है." " इत्ते सारे गाने? इसमें??? ..............वैसे मौली दी, ये एम्. पी. फ़ोर क्या है......?" पूछते हुए अपने आप में सिमट गया था आदि, पता नहीं अब कौन से विशेषण से नवाज़ा जाएगा उसे.......... " अरे इधर आओ बसंतकुमार, मैं तुम्हें समझाती हूँ. " आदि झिझकते-सकुचाते मौली के पास बैठ गया. " ये देख , स्क्रीन दिखता  है इसमें?" "............................" " दिखता है या नहीं?"  ' दिखता तो है" ' तो जब हम कोई वीडियो क्लिप इसमें डा…

पुस्तक समीक्षा - मेघा : आशावादी मन को तृप्त करती कविताएं

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पुस्तक--- मेघा लेखक-----बसन्त चौधरी मूल्य-----१०० रूपये प्रकाशक-------श्री लूनकरणदास गंगादेवी चौधरी साहित्यकला मन्दिर,नेपाल,२०१२ जिस प्रकार बंजर हो चुकी भूमि के लिए बारिश की बूँदें वरदान साबित होकर उसकी प्यास बुझाती हैं ठीक उसी प्रकार जीवन में हार मान चुके व निराश हो चुके लोगों के लिए ‘ कविबसंत ’ कृत मेघा संकलन की कविताएँ आशावादी दृष्टिकोण पैदा करते हुए अतृप्त मन को तृप्त करती हैं l मेघा संकलन में मानव -जीवन की सच्चाई ,रिश्तों की अहमियत ,अकेलेपन ,संघर्ष ,परिवार व माता –पिता के प्रति गहन आस्था ,प्रेमिका के प्रति भावनात्मक प्रेम ,यादें ,आशाएं –निराशाएं सभी का मिलाजुला संगम है .मेघा सहज कलात्मक अभिव्यक्ति है .किसी भी व्यक्ति के जीवन में उसका बचपन अनमोल होता है . बचपन की यादें ताउम्र हमारे साथ रहती हैं ठीक इसी प्रकार कवि ने कविता 'मासूम बचपन ' में इन्हीं बचपन के बीतों दिनों का याद करवाया है ---- “ मेरा वह मासूम बचपन खो गया है वक्त के लम्बे सुरंग में चुपचाप कहीं सो गया है आज जी करता है उसको कहीं से भी ढ़ूँढ़ लाऊँ ” बचपन के उपरान्त व्यक्ति यौवन के दहलीज चढ़ता है जहाँ उसे प्यार जैस…

डाक्टर चंद जैन 'अंकुर' की रचना - मैं नीर माँ....

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मैं नीर माँ....... जीवन, देह में विचारों ,भावनावों और क्रियाओं का योग है और विश्व शिव संग माँ का परमयोग है। मानव आदिगुरू का  प्रयोग हैI देह को तो गुरुत्व का बंधन है पर विचार तो मुक्त है, आकाश के अनंत आयामों में इसे उपग्रह बना कर स्थापित करना चाहता हूँ, विचारों को तो कम से कम सत्य का आधार दिया जा सकता है, भाव अतिसूक्ष्म  है और चेतना सूक्ष्मतम है,  भाव चेतना और विचारों के बीच की कड़ी है, क्रिया ही जीवन है, करनेवाला 'मैं' है, जीने के लिए जीवन में सत्य से समझौता करना पड़ता है,  झूठ का भी सहारा लेना पड़ता है, पर औरों को क्षति पहुचाएं बिना यह उतना हो जितना रोटी में नमक हो और ये संभव है। उस ईश्वर ने सत्य और असत्य के बीच यह जीने का  रास्ता दिया है यहाँ पर पद, प्रतिष्ठा और धन संतुलित रहता है,  विश्व पंचतत्वों के संतुलन से दिखाई देता है मेरा भी ऐसा ही कुछ है, सबको गुरुत्व का आधार है, जीवन जीने के लिए तरलता और सरलता की आवश्यकता है पर गतिमयता और आनंदमयता से जीवन रंगीन हो जाता है, इन्द्रधनुष की तरह दर्शनीय हो जाता है, मैं अपनी पूरी चेतना को नीरमय करना चाहता हूँ , जल तो स्नेह और तरलता का परम…

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -66- त्रिपुरारि कुमार शर्मा की कहानी : दिल्ली की दोपहर

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कहानीदिल्ली की दोपहर त्रिपुरारि कुमार शर्मा --रु. 15,000 के 'रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन' में आप भी भाग ले सकते हैं. अपनी अप्रकाशित कहानी भेज सकते हैं अथवा पुरस्कार व प्रायोजन स्वरूप आप अपनी किताबें पुरस्कृतों को भेंट दे सकते हैं. कहानी भेजने की अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012 है.अधिक व अद्यतन जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html----समंदर के साफ़ पानी में काली कतार बनाकर तैरती हुई मछलियों की तरह, उजली और चमकती हुई चमड़ी पर नीली नसें निकल आई थीं। मालूम पड़ता था कि लड़की की देह में बहते हुए लाल लहू का रंग अब काला हो गया है। वह जून का जलता हुआ दिन था। दिल्ली की सबसे गर्म और सफ़ेद दोपहर। उसने जेब में हाथ डाला, जैसे कुछ टटोल रहा हो। कुछ देर बाद उंगलियों के बीच फँसा हुआ बादामी रंग का रुमाल दिखाई पड़ा। हवा में हिलता हुआ रुमाल, जो सीधा उसके चेहरे पर आकर रुका। उसने दोनों हथेलियों से चेहरे को छुपा लिया। फिर धीरे से रुमाल को नीचे की ओर सरकाने लगा। ऐसे, जैसे पसीने के साथ-साथ सारी परेशानियाँ भी पोंछ कर फेंक देना चाहता था। मेट्रो में जो थोड़ी देर को ‘…

विनय कुमार सिंह का आलेख - अपवादों में सोशल मीडिया का शोषण

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विनय कुमार सिंह अपवादों में सोशल मीडिया का शोषणअपने नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए सरकार वर्तमान में अपवादों का जरिया सोशल मीडिया को बताकर सोशल मीडिया के शोषण में जुट गई हैं। जिसका उदाहरण असम हिंसा हैं। पिछले एक महिने से असम में तेजी से बढ़ती जा रही हिंसा को रोकने में जब केन्‍द्र सरकार और राज्‍य सरकार की सभी कोशिशों विफल हो गईं तो अपने गले से इस फांस को टालने के लिए दोनों ही सरकारों ने इस हिंसा का मुख्‍य आरोपी सोशल मीडिया को करार दे दिया और आरोपी सोशल मीडिया को इसके बदले अपने करीब 300 से ज्‍यादा वेबसाइटों और ब्‍लॉगों के साथ-साथ कई अन्‍य सेवाओं का बलिदान देना पड़ा। अब तक तो आपने मानसिक शोषण, शारीरिक शोषण दोनों के बारे में सुना होगा, लेकिन सोशल मीडिया का शोषण ये नाम आपके गले नहीं उतर रहा होगा न? लेकिन सच्‍चाई भी यही है। जनता को जिस मंच से एक मजबूत जनाधार मिलता है। जहां से एक नया जनतंत्र का मंच तैयार होता है। जिस जगह से एक व्‍यक्‍ति की आवाज हजारों की आवाज बनती है। जिसके माध्‍यम से एक दूसरे का आपसी संवाद होता है। जहां से देश बचाने की मुहिम छेड़ी जाती है। जिसके जरिये से भ्रष्‍टाचार के खिल…

विजय वर्मा की बेहद महंगी ग़ज़लें

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ग़ज़लों पर महंगाई का असर कुछ चुनिन्दा शे'र और अगर वे आज के ज़माने में लिखे जाते तो कैसे होते --इसे पेश कर रहा हूँ,मीर साहब,कतील शिफई साहब ,शहरयार साहब,फैज़ साहब और खुमार साहब की आत्माओं से माफ़ी माँगते हुए,अगर माफ़ कर सके तो. -----------------------------------------------------.----------------------------------- सिरहाने 'मीर' के आहिस्ता बोलो टुक रोते-रोते सो गया है. ......................................................................................................... पेटी अनार  के आहिस्ता खोलो  भाव पहुँच के बाहर हो गया है. .................................................................................................. .एक धूप सी जमी है निगाहों के आस-पास ये आप है तो आप पर कुरबान जाइए .       [ कतील शिफई ] ............................................................................................................ एक हूक सी उठी है कलेजे के आस-पास हल्दी २०० Rs /kg है,दाल बिना हल्दी के खाइए. .................................................................................…

नरेंद्र तोमर की लघुकथा - भगवान और भक्त

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नारद जी जब दरबार में पहुंचे तो देखा ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों सिर झुकाए चिंतित एवं उदास मुद्रा में बैठे हैं। ‘नारायण नारायण’ कहने और अपनी वीणा के तार झनझनाने पर भी तीनों ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, और न ही समाचार पूछे। कारण पूछने पर भी तीनों में से किसी ने भी उत्तर नहीं दिया। बहुत आग्रह करने पर विष्णु जी ने कहा कि वे अब भगवान का पद छोड़ना चाहते हैं। शिवजी और ब्रह्मा जी ने अपना सिर हिला कर सहमति प्रकट की। नारद जी को महान आश्चर्य हुआ। ‘नारायण नारायण’ नारद जी ने अपनी भृकुटि को किंचित ऊपर चढ़ा कर माथे पर बल डालते हुए कहा, ”परंतु सृष्टि के निर्माता, तीनों लोक के नियंता और पालनहार, आप तीनों देव ऐसा विचार क्यों ला रहे हैं अपने मन में? प्रभु क्या मैं कारण जानने की घृष्टता कर सकता हूं।“ ”अरे ऐसे पूछ रहे हो मानों आपको कुछ पता ही न हो? फिर भी यदि कहते हो तो बताए देते हैं। देखिए संक्षेप में बात यह है कि इस युग में हम लोग अपने भक्तों से बेहद तंग आ चुके हैं। न दिन में चैन लेने देते हैं न रात में। अब तो लक्ष्मी जी भी दुखी हो गईं हैं। कुछ समझ में नहीं आता कि क्या किया जाए? इन भक्तों से छु…

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -65- चंद्रकांता की कहानी : कल्पतरु

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कहानीकल्पतरुचंद्रकांताउफ्फ़! कितनी गहरी पीड़ा है यह मानों तालाब के पार्श्व पर पानी और उसके भीतर मछली तड़प रही हो. तुम्हें कैसे समझाऊं सुवास !तुम्हारे होते हुए भी एकाकीपन का यह बोध ह्रदय की भीत पर हर रोज़ उठा-पटक करता है. तुम ही कहो! तब, तुम्हारे होने का क्या औचित्य है ? यह संदिग्धता वश किया गया कोई आक्षेप नहीं है; बल्कि हमारे इस संबंध से साधिकार किया गया बेहद स्वाभाविक सा प्रश्न है ताकि हमारे भविष्य पर कोई प्रश्न-चिह्न ना रहे.. और ये मौन को पालना कहाँ से सीख लिया तुमने !यह तो तुम्हारा स्वभाव नहीं था !.जानते हो, तुम्हारा यह अपरिचित मौन रात-दिवस अट्टहास सा करता आता है जिसके अनचाहे आलिंगन से मैं बिंध कर रह जाती हूँ ..और तुम्हें भी तो भीतर ही भीतर तोड़-मरोड़ रहा है यह.. आखिर ऐसा क्या जो तुम मुझसे साझा नहीं कर सकते ? जिस दिन भावनाओं के उफान से इस मौन का बाँध टूटेगा तुममें भी, तुम बाकी ना रहोगे. प्लीज़ चुप मत रहो! अब तो परिभाषित करो इस मौन को. सुनो! अब यह घाव बनकर रिसने लगा है.. पल्लव ने उस मौन की कठोर दीवारों को अपने जवाब दे चुके धैर्य से आच्छादित करते हुए कहा. --रु. 15,000 के 'रचनाकार कहान…

छत्र पाल का कविता संग्रह - भाषाई हुड़दंग

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कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -64- गिरिजा कुलश्रेष्ठ की कहानी - उसके लायक

कहानी
उसके लायक
गिरिजा कुलश्रेष्ठ
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वह जिस दिन पहली बार कक्षा में आई थी ,उस दिन तो सबने ऐसा मुँह बना लिया था जैसे धोखे से कड़वी ककड़ी चबा गए हों .....

दो माह पहले मैं शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्रांगण में कचनार के पेड़ के नीचे बैठा  अनायास ही पन्द्रह साल पहले के उन दिनों को याद करने लगा था जब मैं आठवीं कक्षा पास कर आगे की पढ़ाई के लिये बुआ के पास सुजानगढ़ में रहा था। 

कस्बा कम देहात ज्यादा लगने वाला सुजानगढ़ मुख्य सड़क से दूर एक पहाड़ी कस्बा है। गढ़ के नाम पर एक छोटा सा किला है जहाँ कभी राजा रहते थे। कभी उनका ही राज चलता था पर अब वहां स्कूल ,बैंक और डिस्पेंसरी चलती है। पहाड़ी के नीचे एक छोटी सी नदी बहती है। इन पन्द्रह सालों में वहाँ इतना अन्तर आया है कि गोपू हलवाई की दुकान बीच बाजार से हट कर बस-स्टैंड पर आ गई है और उसके पेड़ों में अब वह बात नहीं जो कभी सुजानगढ़ की पहचान थी। नदी में पानी की जगह बच्चे खेलते हैं और लड़कियाँ जो दुपट्टा को कन्धों पर पैला कर और गर्दन को कन्धों के समानान्तर रख कर बहुत जरूरी होने पर ही सड़क पर निकलतीं थीं वे निस्संकोच खूब हँसती-बतियाती ह…

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अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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