गुरुवार, 16 अगस्त 2012

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -43- दिलीप भाटिया की कहानी : चिराग

चिराग

दिलीप भाटिया

प्रिय मेडम आंटी,

नमस्‍ते। मैं, सुजाता, श्री राजकमल की बेटी। आप को स्‍मरण होगा कि आपके गांव के स्‍कूल में मैं भी एक बार अपने पापा के साथ आई थी। मेरे पापा तो आपके स्‍कूल में हर वर्ष आते थे। पेन, पेन्‍सिल, नोटबुक, गाइड, ज्‍योमेट्री बाक्‍स बांट कर लौट आते थे। गत वर्ष मेरी दादी की स्‍मृति में जब उन्‍होंने आपके स्‍कूल के हर कमरे के लिए पंखे दिए थे। घर आ कर बता रहे थे कि धन्‍यवाद देते समय आपकी आंखें भर आई थी।

आंटी, आज मैं आपको पापा के जीवन की कहानी संक्षिप्‍त में बता कर पुत्री धर्म निभाकर मन हल्‍का करना चाहती हूॅ। मध्‍यम वर्ग में पले बढे़ पापा के पास बस एक ही गहना था, शिक्षा का। आज समाज में कन्‍या भू्रण हत्‍या रोकने के लिए कई आंदोलन, शो करने पड़ रहे हैं, पर सच आंटी पापा-मम्‍मी की मैं इकलौती संतान होते हुए भी मैंने कभी भी मम्‍मी पापा के मुंह से बेटा नहीं होने का रोना नहीं सुना। दादी से संस्‍कार, मम्‍मी से ममता, पापा से अनुशासन में लिपटा निर्मल स्‍नेह मुझे मिला। बचपन तृप्‍त था। कन्‍या का लालन पालन उच्‍च शिक्षा हेतु मेरे मम्‍मी पापा एक ऐसा जीवन्‍त उदाहरण रहे। जिससे आज का समाज बहुत कुछ सीख सकता है। दादा की भी मुझ में जान थी। सौभाग्‍यशाली हूँ कि मुझे भगवान ने इतने अच्‍छे परिवार में भेजा, हाँ जब मैं मात्र 17 वर्ष की भी नहीं थी, 15 दीन की बीमारी में मम्‍मी ईश्‍वर के यहां चली गई पर पापा ने धैर्य, हिम्‍मत से मुझे संभाला, उच्‍च शिक्षा दिलाई। नगर व गांवों के स्‍कूलों के बच्‍चों को समय, परमाणु ऊर्जा, नैतिकता, जीवन मूल्‍य पर सैंकड़ो व्‍याख्‍यान देने वाले, कई लेख, पुस्‍तकें लिखने वाले पापा ने मुझे भाषण, उपदेश, सलाह नहीं दी, बस जब मैं थोड़ा भटकती तो मुझे रास्‍ते पर लाने के लिए संकेत भर देतें। पापा का मौन ही मुझे सिखा देता था, पापा का अनुशासन, धैर्य, सादगी, सरलता, स्‍वाभिमान, स्‍पष्‍टता मुझे बहुत कुछ सिखाती रही।

आंटी, जब मैंने अपना जीवन साथी स्‍वयं चुना, तो पापा ने हर तरह से मेरा मन टटोला, फिर चुपचाप मेरी पसन्‍द पर अपनी मोहर लगा दी। शायद, पापा , अन्‍दर से टूटे हों, अकेलापन महसूस कर रहे हों, पर मुझे कोई आभास नहीं होने दिया। यथाशक्‍ति यथा संसाधन दादी की भी सेवा की। वे भी मुक्‍त हो गईं। समाज रिश्‍ते विरोध करते रहे कि बेटी के यहां रहना पाप है पर मेरी इच्‍छा का सम्‍मान करते हुए पापा, मेरे विवाह के बाद अंत तक हमारे साथ ही रहे। मुझे जीवन साथी का सहयोग एवं ससुराल की स्‍वीकृति मिली। पापा के संगी साथी जब अपने बेटों-बहुओं के दुर्व्‍यवहार का रोना रोते, तो पापा के चेहरे पर संतुष्‍टि व तृप्‍ति स्‍पष्‍ट दिखती थी। पापा की मैंने क्‍या सेवा ही, यह तो मुझे नहीं पता पर, मित्रों, रिश्‍तों में पापा ने हमारे लिए काई भी नकारात्‍मक बात नहीं की, जो बना वो खा लिया, पढ़ने लिखने, स्‍कूलों में व्‍यस्‍त रहे, कॉलोनी की कई भाभियां पापा से मिलने आतीं, लौटते समय भरी आंखों से बेटी का शगुन लेकर लौटती थीं। आंटी, क्‍या क्‍या लिखूं? समाज की कई समस्‍याओं का समाधान है, पापा का जीवन, कभी उन पर एक बड़ी सी पुस्‍तक लिखूंगी।

आंटी, आप को पता है ही, पापा नहीं रहे। आप के स्‍कूल के लिए दो कमरों हेतु वह संकल्‍प कर चुके थे, ताकि गांव की बेटियां जो कक्षा 8 के बाद नहीं पढ़ पाती, कक्षा 10 तक पढ़ सकें। दो कमरों की सुविधा होने पर शिक्षा विभाग से क्रमोन्‍नत करवाकर अपने स्‍कूल को माध्‍यमिक स्‍तर तक ला सकें। इस पत्र के साथ यह ड्राफ्‍ट दे रही हूँ, इसे पापा की स्‍कूल को अंतिम भेंट समझ कर स्‍वीकार कीजिएगा। लड़कियों की शिक्षा केरियर हेतु पापा ने अपने जीवन की पूरी शाम समर्पित कर दी। बस आंटी अब लिखा नहीं जा रहा है, आखें छलक रही हैं। आपके गांव के स्‍कूल में शिक्षा का दीपक ‘चिराग‘ बना रहे, यही पापा की अंतिम इच्‍छा थी। इस चिराग में मैं भी यथा शक्‍ति घी तो नहीं, पर तेल तो डालती ही रहूंगी। अच्‍छा आंटी, स्‍कूल में सबको नमस्‍ते। सादर-

आपके स्‍कूल के सभी बच्‍चों की

सुजाता दीदी

आपकी एक बेटी - सुजाता

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3 blogger-facebook:

  1. marmik dil ko choo leti achhi kahani,BADHAIE

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  2. बहुत अच्छा लगता है जब कहानी के अन्त में समाज कल्याण की बात की जाती है! यही जीवन की सार्थकता भी है!

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  3. बहुत अच्छा लगता है जब कहानी के अन्त में समाज कल्याण की बात की जाती है! यही जीवन की सार्थकता भी है!

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