रविवार, 19 अगस्त 2012

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन - 50 - सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की कहानी : छोटे छोटे समर

कहानी

छोटे - छोटे समर

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव

सुबह से दोपहर, दोपहर से शाम होने को आयी, उसे दफ्तर मे चप्पल चटकाते हुए। हालांकि वह दिन भर, शीरे पर मँडराती मक्खियों की तरह बड़े बाबू के इर्द-गिर्द चक्कर काटता रहा, पर बडे बाबू थे कि पारे की तरह बार-बार उसके हाथ से छिटके जा रहे थे. और अब उसे ऐसा लग रहा था कि जिस काम को वह अदना सा समझ रहा था, वास्तव में छोटा नहीं था। घर से चलते समय उसने हिसाब लगाया था कि अगर दोपहर तक नहीं तो शाम तक यह काम हो ही जायेगा। लेकिन हमेशा की तरह एक बार वह फिर अपने गणित में फेल हुआ। झुंझलाया सा वह कभी सीढ़ियाँ गिनता रहा और कभी सड़क नापता रहा।

सुबह के वक्त जब वह आफिस पहुँचा तो उसने बड़े बाबू को अपना नियुक्ति पत्र दिखलाया और बतलाया कि उसका मेडिकल पत्र आया था, किन्तु वह कहीं खो गया है। अत: वह उसे पुन: बनवाना चाहता है, ताकि वह अपना मेडिकल दे सके।

बड़े बाबू ने बग़ैर उसकी तरफ देखे पान का बीड़ा मुँह में डालते हुए कहा, एक आवेदन पत्र लिख कर दे दो। उसने तुरन्त पहले से लिखी हुई एप्लीकेशन उनके सामने रख दी। वह जैसे इसके लिए तैय्यार नहीं थे। अब उन्होंने उसकी ओर देखा। पत्ते में से थोड़ा सा चूना निकाल कर ज़बान पर लगाया और बोले, "ठीक है ! रख दो। शाम तक पता कर लेना।"

अब तक बड़े बाबू की मुद्रा से वह काफी आतंकित हो चुका था। परन्तु फिर भी साहस कर धीरे से बोला, "साहब अगर दोपहर तक .....!" किन्तु उसकी बात बड़े बाबू ने ठीक उसी प्रकार लपक लिया जैसे कोई हुक शाट बाउन्ड्री पर कैच कर ले। बोले, "मियाँ, काफी ज़ल्दी में हो। यह सरकारी दफ्तर है। यहाँ इतनी ज़ल्दी कुछ नहीं हो सकता।" कह कर वह धीरे से मुस्कुराये। उनकी मुस्कुराहट काफी रहस्यपूर्ण थी। उसने कभी भी रावण को मुस्कुराते हुए नहीं देखा। परन्तु बड़े बाबू कि मुस्कुराहट देख कर उसने अनुमान लगाया कि रावण भी ऐसे ही मुस्कुराता होगा।

बड़ी अज़ीब बात है ! वह सोचता है, किसी भी चीज़ के आगे सरकारी शब्द लग जाने का मतलब है, एक ढ़ीला ढ़ाला अस्त-व्यस्त टरकाऊ प्रशासन ! कैसी परिभाषा बना ली है लोगों ने सरकारी शब्द की।

दोपहर के वक्त जब वह पहुँचा तो देखता है कि बड़े बाबू की सीट खाली है। थोड़ा सा परेशान हो उठता है वह। आधे से अधिक लोग गायब थे वहाँ। बड़े बाबू का पता पूंछे भी तो किससे ! यही सवाल उसके लिए भारी पड़ रहा था। थोड़ी दूर पर एक वृद्ध से बाबू फाइलों में उलझे थे। उसे लगा जैसे जेठ की तपती दुपहरी में उसे घने पेड़ की छाया मिल गयी हो। वह उनके नज़दीक पहुँचता है। कृशकाय शरीर, चौड़ा माथा। माथे पर चन्दन की लम्बी-लम्बी रेखायें और मुँह में पान।

वह बोला, - "बड़े बाबू, वो सामने वाले मिश्रा जी कहाँ गए है !" उन्होने कछुएं की तरह फाइलों के बीच से सिर निकालते हुए उसकी ओर देखा। पान की पीक से लबालब मुहँ। अचानक उन्होने सिर झुकाया और पीच्च ...च्च ...। वहीं मेज के नीच्रे ढ़ेर सारा पीक दे मारा। अगर वह अतिरिक्त सावधानी से काम न लेता तो उसके सफेद पैंट पर काफी सुन्दर छींट बन चुकी होती। उसका मन ज़ुगुप्सा से भर उठा।

"घड़ी देख रहे हो न, यह लन्च का समय है। बाहर गए होंगे।" पर लन्च तो डेढ़ बजे ही समाप्त हो जाता है। और इस वक्त तो दो बज रहे है।

"नये लगते हो।"

"नये ! नये का क्या मतलब।"

"मतलब वहीं जाकर देखों , चले आते है दिमाग खाने ..... !" बड़े बाबू का ज़वाब सुनकर वह कातर हो उठा।

निरूद्देश्य भटकते -भटकते जब वह ऊब जाता है तो थक कर वह एक कुर्सी खींच कर बैठ जाता है। कुछ देर बाद बड़े बाबू तशरीफ लाते दिखलायी पड़े। वह उनके पास पहुँच जाता है ,बड़ी विनम्रता के साथ। बड़े बाबू कुर्सी पर बैठ जाते है और फाइलों को खोलते हुए बोले, - "तुम्हारा लेटर बन गया है।बस .....!" बस जैसा शब्द सुनते ही उसके मुँह का थूक गले के भीतर जाते - जाते रह गया। बस ओ.एस. के साइन होने बाकी है। वह तो चार बजे तक ही हो पायेगा।" उसे लगा कि अब वह निस्तार नहीं पायेगा। लगा कि जैसे साँप छछूंदर की गति हो गयी है उसकी।

बड़े बाबू , वह अधीर हो कर बोला,- "बड़ी दूर से आया हूँ और दिन भर आपके ही दरबार में हाज़री देता रहा हूँ। कुछ तो ख्य़ाल कीजिए। " बड़े बाबू भी अपना बाड़ा तोड़ कर बाहर निकल आए। बोले - "अज़ीब इंसान हो तुम , तुम्हारे ही काम से ही सुबह से परेशान हूँ और ज़नाब कह रहे है ....!" वाक्य बीच मे छोड़ कर वह बुद्‌बुदाते हुए स्वर में कहते है, - " स्वागत , न सेवा ,बस काम चाहते है सभी।"

अचानक उसे लगा कि जैसे आत्मज्ञान मिल गया हो। उसे लगा कि इस अदने से काम के लिए उसे इतना परेशान नहीं होना चाहिये। वह धीरे से मुड़ा और आहिस्ते से घर वापस आ गया।

अगले दिन वह पूरी तैयारी के साथ गया था। जिस समय वह पहुँचा बड़े बाबू अपनी कुर्सी पर ही थे। यह एक अच्छा शगुन था। बड़े बाबू की खातिरदारी के चक्कर में वह यह भूल गया कि वह हमेशा से इस तरह की खातिरदारी से परहेज़ करता आया है।

उसने पहुँचते ही बड़े बाबू को एक लम्बा सलाम ठोंका और पास ही कुर्सी खींचते हुए बैठ गया। ऊपरी ज़ेब से एक बंद लिफाफा निकाल कर उसने मेज़ की दराज़ खोल कर लिफाफा उसमे डालते हुए कहा,-" बड़े बाबू , क्या कागज़ तैय्यार हो गया !" न चाहते हुए भी उसके स्वर में कम्पन था। अनाड़ी और खिलाड़ी में शायद यही अन्तर होता है। बड़े बाबू मूँछों मे मुस्कुराते है और अपना काम बंद करके कुर्सी के पृष्ठ भाग से टेक लगाते हुए आराम की मुद्रा मे आते है,- " भई तुम्हारे काम में बड़ी मेहनत करनी पड़ी। सोचा तुम नए हो , तुम्हें ज्यादा कष्ट न हो इसलिए व्यक्तिगत रूप से मैने रुचि ली। वरना यह सब इतनी जल्दी कहाँ हो सकता है।"

"सो तो है ! " वह भीतर ही भीतर कुढ़ता है किन्तु ऊपर मुस्कुराहट थी। ज़िन्दगी में अक्सर ऐसा हो जाता है कि आदमी करना कुछ चाहता है किन्तु कर कुछ और ही डालता है। उसने लोगों के दोगले चरित्र को तो खूब देखा था किन्तु आज स्वयं अपने आचरण पे आश्चर्य ज़रूर हुआ।

घर लौट कर वह देखता है कि सबके चेहरे पर क्या हुआ ! का भाव चिपका हुआ है। सबको एक साथ सन्तुष्ट करने की ग़रज़ से तीव्र स्वर में बोला, - "हो गया भई किसी तरह ! वाह रे सरकारी काम ! अब अगले मंगलवार को मेडिकल टेस्ट होगा।" संक्षिप्त सी जानकारी का उसने ऐलान कर दिया। जानता था कि अब कौन - कौन से सवाल दागें जायेगे।

चाय का प्याला हाथ में थमाते हुए भाभी बोली, - "पहली तन्ख्वाह में मेरा कमीशन मत भूल जाना देवर जी।" चाय की चुस्की लेते हुए उसी अंदाज़ में बोला वह, - "अभी और न जाने कितने बंद लिफाफे का प्रबन्ध करना होगा , पहले उसकी तो सोचों भाभी।" कह कर चाय का प्याला थामें - थामें वह माँ के पास पहुँच जाता है - "दवा खायी अम्मा !"

"हाँ , पर तेरे काम का क्या हुआ !"

" जिसके सिर पर तुम जैसी माँ का आशिर्वाद हो , काम तो उसका होना ही है अम्मा।"

"माँ तो सभी का भला चाहती रे , तू भी लग जाता तो एक ज़िम्मेदारी यह भी कम हो जाती।"

माँ की बात सुन कर वह सोचने लगता है कि दूसरो की ज़िन्दगी को सवाँरने सजाने में आदमी खुद किस क़दर घिस जाता है , क्या कुछ खो देता है , शायद उसे खुद भी नहीं मालूम पड़ता। जब से उसने होश सम्भाला है, उसे नहीं याद कि उसकी माँ ने कोई भी दिन बिना दवा के गु़ज़ारी हो। वह आज तक नहीं समझ पाया कि आखिर किस सुख के लिए उसने इतने कष्ट उठाये।

इधर माँ की तबियत कुछ ज्यादा ही खराब चल रही थी। खून की कमी और दमा की बीमारी तो थी ही साथ ही जब कभी खाँसी का लम्बा दौर चलता तो पूरा शरीर जैसे हिल उठता था। लगता शरीर से प्राण जैसे निकलना चाह रहे हो लेकिन सूखे कफ की तरह भीतर ही रह जाता। एक असहनीय और अदर्शनीय कष्ट ! लेकिन जिसे देखा भी जाता और सहा भी जाता। इसी से इच्छा तो नहीं हो रही थी कि वह ट्रेनिंग पर जावे। किन्तु आज के ज़माने में हाथ आयी नौकरी क्या इतनी सहजता से छोड़ी जा सकती है। सच, कितना विवस है आदमी।

" चलो हटो, जरा रास्ता छोड़ो !" खड़े - खड़े जब दो तिहाई टांगें दुखने लगी तो किसी का स्वर उसके कानों से टकराया। देखा डाक्टर का सहायक था। और उसके पीछे - पीछे डाक्टर साहब चले आ रहे थे। अब बारी - बारी से सबका मेडिकल होना था। अपनी बारी में वह भी भीतर पहुँचा। जिस तरह टेपरिकार्डर में सवाल भरे हो उसी तरह डाक्टर सबसे एक जैसे ही सवाल कर रहा था।

" कभी बुखार आया था।"

" नहीं।"

"खाँस के बताओ !"

वह खाँस के बताता है।

"पंजों के बल खड़े हो।"

वह खड़ा हो कर दिखाता है

"कभी टायफाइड हुआ था।"

"नहीं।"

"पैन्ट उतारो !" टार्च की रौशनी एकाएक भभकी। "ठीक है ऊपर कर लो। बाहर जाओ।" डाक्टर देखता जा रहा था और उतनी तेजी से कुछ लिखता भी जा रहा था

उसने रोबोट कभी भी नहीं देखा था लेकिन जैसे वातावरण से वह निकला था, उससे लगने लगा कि कुछ इसी तरह का होगा।

एक्स-रे के लिए जब वह सभी लोग पहुँचे तो पहले ही कह दिया गया कि फी-आदमी पचास रूपया लेकर भीतर पहुँचे।

"फी आदमी पचास रूपया ! इसका क्या मतलब हुआ। "उसने अपने बगल में खड़े कुछ लोगो से पूछा।" "मतलब ......मतलब यही है कि सही रिपोर्ट की गारन्टी !"

"लेकिन मुझे तो कोई रोग नहीं है। फिर मैं क्यों रूपये दूं।"

"रोग नहीं है तो लगाया जा सकता है और रिपोर्ट ग़लत भी तो बनायी जा सकती।" बगल वाले लड़के का स्वर था यह।

"क्या ये ऐसा कर सकेंगे !" उसे जैसे विश्वास नहीं हो रहा था।

"कर सकेंगे !" " प्यारे ये ऐसा ही करते है। हूज़ूर आप इक्कसवीं सदी में जी रहे है लेकिन तर्क करने की आदत नहीं छोड़ रहे है। जैसा सब कर रहे है ,वैसा तुम भी करो वरना माहौल खराब हो जायेगा।"

माहौल खराब हो जायगा। वह सबके चेहरे को ताकने लगता है। होना तो यह चाहिए था कि सबके चेहरे शर्म से झुक जाते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ बल्कि उसने स्वयं अपने कन्धे हताशा में झुका लिए। और सामने कुर्सी पर एक सरदार जी के बगल में बैठ गया। बोला,- "सुन रहे हो न यार, इन लोगों की बात को।"

"ठीक ही तो कह रहे है।" सरदार जी का सपाट सा उत्तर था।

"क्या ठीक कह रहे हैं।" उसके स्वर में थोड़ी उत्तेजना थी, पर कदाचित सरदार जी ने सुना ही नहीं। वह अपनी रौ में बोलते रहे- "पिछले साल मेरा चुनाव हुआ था.......इसी पद के लिए .....लेकिन डाक्टर को फीस न देने के कारण मेरी एक्स-रे रिपोर्ट खराब कर दी गयी और इलाज के लिए रोक लिया गया। इसी बीच मैंने एक प्राइवेट डाक्टर से एक्स-रे करवाया रि़पोर्ट सही निकली। उसे लेकर डी.एम.ओ. के पास पहुँचा। .....काफी लिखा पढ़ी और दौड़ धूप के बाद कही जाकर फिट सर्टिफिकेट मिला। किन्तु तब तक तीन महीने बीत चुके थे और यह कहा गया कि अगले बैच में भेजा जायेगा। ...फिर ....फिर धीरे-धीरे एक साल गुज़र गया। आज सोचता हूँ कि उस दिन डाक्टर को फीस दे दी होती तो साल भर नौकरी करते हो जाता।" सरदार जी की बात सुनते ही उसके मस्तिष्क में जैसे प्रेशर कुकर की सीटी सी बजने लगी थी।

बेचैनी के कारण वह उठ खड़ा होता है। काफी देर तक अनायास टहलता रहता है असहाय सा , होना यह चाहिए था कि उसका क्रोध उबल कर बाहर आ जाता लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्यों नहीं हुआ प्रेशर कुकर ..... हॉ उसे लगा उसका शरीर प्रेशर कुकर सा हो गया है। सब कुछ उबलता है किन्तु बाहर कुछ नहीं आता है। बाहर आती है तो सिर्फ हता्शा की सीटी और तमाम तरह की बड़बड़ाहट दूसरों को चार गाली देकर किसी तरह खुद का जोश कम करना, शायद यही संघर्ष रह गया है आज का! वह एक बार सभी के चेहरे को बारी-बारी देखता है। सभी व्यस्त हैं अपनी-अपनी बातों में | क्या इनके भीतर भी कुछ उबल रहा है या अपने भीतर की भाप निकाल कर इन सभी ने समझौता कर लिया है ?

वह और अधिक देर तक नहीं सोच पाता है कि उसे अपने नाम की पुकार सुनाई पडती है और वह एक्स-रे वाले कमरे में घुस जाता है। एक्स-रे करवाकर वह कमरे से निकलने वाला ही था कि उसके कानों में आवाज टकरायी, फीस! उसने नजरे उठाकर एक्स-रे वाले को देखा। लेकिन दृश्य थे कि उससे सम्भल नहीं रहे थे। उसकी ऑंखों के सामने सरदार जी का चेहरा घूम गया। नहीं.........बिल्कुल नहीं........इस वक्त उसकी ऑंखों के सामने दृश्य ठहर ही नहीं रहे थे। सरदार जी की जगह उसे दिखायी दी अपनी सदा बीमार रहने वाली मॉ और जरूरत से ज्यादा आशावादी बाप! अगर उस दिन मैने बीस रूपये दे दिए होते तो आज साल भर हो जाते नौकरी करते....! सरदार जी का स्वर जैसे उसके कानों में आकर मस्तिष्क से चुगली करने लगते हैं।

जल्दी करो भई, समय कम है। सामने वाला व्यक्ति उसे चैतन्य करता है। अय! कह कर वह कमीज की ऊपरी जेब से बीस रू. की नोट निकाल कर उसकी हथेली पर दे मारता है और झटके से बाहर निकल जाता है। जाते-जाते उसके कानों में यह आवाज टकराती है - "समय की कद्र नहीं करते चले हैं स्टेशन मास्टर बनने।"

बाहर निकल कर वह सोचने लगता है कि उसने यह क्या किया? कम से कम उसे विरोध तो करना ही चाहिए था। विरोध! कैसा विरोध! क्या उस समय तुमने विरोध किया था जब तुम मेडिकल लेटर लेने आफिस गए थे।

आदमी पुराने फैशन के कपड़े बहुत आसानी से बदल सकता है किन्तु उसकी मानसिकता को बदलना बहुत मुशकिल होता है, चाहे वे कितनी भी पुरानी क्यों न हो! और अगर तुम विरोध भी करते तो क्या अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है ! ‘अकेला चना!’ तो क्या अकेला वह कुछ नहीं कर सकता, तो फिर पहल कौन करेगा। वह भीतर ही भीतर लडता है।

‘तुम मूर्ख हो !’ उसके अन्दर से जैसे कोई चिल्लाता है। शक्ति का सामना करने के लिए शक्ति की जरूरत होती है और अकेला आदमी कभी भी शक्ति का पर्याय नहीं हो सकता है। अगर अकेले लड़ने को तैयार ही हो तो शहीद होने के लिए भी तैयार रहो।

- ‘हॉं मै शहीद भी हो सकता हूँ। क्या शिव ने विष को आकंठ नहीं किया? क्या ईशा सूली पर नहीं टंगें। वह भी तो अकेले थे। फिर मैं क्यों नहीं.......|’

तुम ठीक सोच रहे हो लेकिन उनका क्या होगा, तुम्हारी हमेशा बीमार रहने वाली मॉ और जरूरत से ज्यादा आशावादी बाप ..........। क्या होगा उनका?

अय ! उसने सिर को एक झटका दिया अगर थोड़ी देर और सोचा तो उसके मस्तिष्क की नसे फट जायगी।

"अरे आशुतोष!” सामने से आशुतोष के गुजरते ही उसने आवाज लगायी – “अब अगला कार्यक्रम क्या है?"

"अब कल सुबह दस बजे हाजिर होइये। डाक्टर से मुठभेड़ करने के लिए, लेकिन पूरी तैयारी के साथ।"

यह भी कोई कहने की बात है। डाकुओं से मुठभेड़ हो तो पूरी तैयारी और मय अस्त्र शस्त्र के आना ही होगा। उसके शब्दों में छुपे व्यंग्य को पकड़ कर आशुतोष ने जोरदार ठहाका मारा लेकिन वह उसके ठहाके में शामिल न हो सका।

दूसरे दिन वह और उसके साथी पूरी तरह लैस होकर आए थे। अगर आदि काल का समय होता तो समर भूमि में कूदने से पहले वह अपने तीर कमान या तलवार को देखता। विज्ञान के इस युग में भी हो सकती है कुछ लोग बम या पिस्तौल लेकर चलते लेकिन इस पूँजीवादी व्यवस्था के चलते ज़िन्दगी के कुछ ऐसे भी समर है जिन्हें लड़ने के पहले आदमी को अपनी जेब देखनी पड़ती है कि वह कितनी वज़नदार है या फिर सिफारिश को तलवार कितनी नोकदार है।

अस्पताल के बरामदे में टहलते-टहलते वह अपनी जेब का वजन अंदाजना नहीं भूलता। डाक्टर ने आते ही सबको भीतर बुलाया ! भीतर कमरे में चारों तरफ तमाम रोगों के लक्षण व प्राथमिक उपचारों के पोस्टर लगे थे। सामने एक शिशु का चित्र टंगा था। शायद किसी टानिक की कम्पनी का विज्ञापन पोस्टर था वह !

वह सोचता है कि क्या वह बचपन में ऐसा ही रहा होगा। शायद नहीं! वह एक-एक कर अपने मोहल्ले के सारे बच्चों को याद करता है लेकिन कोई भी उस बच्चे सा मुस्कुराता नहीं दिखायी पड़ता। यह भी हो सकता है कि मुस्कुराहट अब केवल फोटो तक ही सीमित हो। उसे किसी फोटोग्राफर का यह वाक्य याद आता है "स्माइल प्लीज़"।

अचानक डाक्टर के वाक्य से उसकी तंद्रा भंग होती है और वह चौक कर डाक्टर के चेहरे को देखने लगता है। डाक्टर बोल रहे थे, "देखो, तुम लोगों को कितनी मुश्किल से यह नौकरी मिली है और तुम लोगों में से कोई यह नहीं चाहेगा कि यह अवसर हाथ से निकले! मै भी नहीं चाहता की तुम लोगों को मेडिकल में अनफिट कर तुम्हें नौकरी से वंचित करू। काम ऐसा हो जिसमें तुम्हें भी खुशी हो और मुझे भी। कोई जोर जबरदस्ती की बात नहीं है, बात खुशी की है।"

थोड़ा रूकता है! डा। फिर बोला, - "अच्छा अब आप लोग बाहर जाइये तथा अपनी-अपनी बारी की प्रतीक्षा करें। उसकी समझ में नहीं आया वह डाक्टर के चेहरे पर किसी बनिये का चेहरा लगाए या किसी भिखारी का। बहरहाल इस समय वह बाहर था।

इसके बाद एक-एक लड़के से मोल भाव शुरू हुआ। पचास से दो सौ रूपये तक के बीच सौदा रहा। अपनी जेब से सौ रूपये निकालते वक्त वह सोच रहा था कि इस महीने या तो दूध वाले की चिरौरी करनी पडेगी या राशन वाले दुकानदार को पटाना होगा। आखिरकार बजट के इस घाटे को और पूरा ही कहां किया जा सकता है ..........!

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इति

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव

5/2 ए रामानन्द नगर, अल्लापुर, इलाहाबाद,

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