सोमवार, 20 अगस्त 2012

कहानी लेखन पुरस्कार -53- संध्या द्विवेदी की कहानी - लिच्छवी एक्सप्रेस

लिच्छवी एक्सप्रेस

संध्या द्विवेदी

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रु. 15,000 के 'रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन' में आप भी भाग ले सकते हैं. पुरस्कार व प्रायोजन स्वरूप आप अपनी किताबें पुरस्कृतों को भेंट दे सकते हैं. अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012

अधिक व अद्यतन जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

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कहां से कहां तक कभी जिंदगी पलों में गुजर जाती है और कभी एक पल जिंदगी भर नहीं गुजरता। फिर हमने तो सात घंटे एक साथ बिताए थे, गाड़ी के इंतजार में। गाड़ी आयी और हम अपने-अपने कोच में चले गए। हां, गाड़ी आने से पहले प्लेटफार्म की सीढ़ी पर बैठकर तुमने कई बार मुझे देखा था, हकीकत तो यह है कि मैं भी तुमसे बात करने का बहाना ढूंढ़ रही थी। क्या तुम लिच्छवी का इंतजार कर रही हो, तुम्हारे इस सवाल से मुझे तुम प्लेटफार्म पर खड़े लोगों में सबसे ज्यादा अपने लगने लगे। फिर तो बस बातों में बातों में वक्त गुजर गया। गाड़ी आ गयी, मैंने मुस्कराते हुए तुमसे विदा ली।

क्या तुम ब्राह्मण हो, तुम्हारे इस सवाल का जवाब मैं केवल सिर हिलाकर दिया था। पता था कि तुम मेरी सीट देखने जरूर आओगे। तुम्हारा दोबारा लौटकर आना मेरे लिए अप्रत्याशित नहीं था। अपने बिंदास रवैए की वजह से मैंने चौंकने का नाटक नहीं किया। बल्कि भर निगाह उसे देखा। इस अचकचाए से सवाल की तुम्हारी सीट मिल गयी क्या? मैं भाप गयी थी कि जनाब बेहद शर्मीले हैं। फिर क्या मेरी तो लाटरी लग गयी। मैंने चिढ़ाने के लहजे से कहा हां, बाइ डिफाल्ट ट्रेन के साथ ही मेरी सीट भी आ गयी। वैसे भी किसी को अपनी बातों से हराने में मुझे बहुत मजा आता है। हमेशा की तरह मेरे हाजिर जवाब रवैए ने मेरा साथ दिया था।

लंबे इंतजार के बाद शायद आधे घंटे के भीतर ही मैं सो गयी। सुबह अपनी सीट पर बेहोश सी सोयी हुयी। अचानक आंख खुली तो जनाब मेरे सामने थे, मेरे लिए यह भी अप्रत्याशित नहीं था। और आगे जो घटा वह भी प्रत्याशित ही था। गाजियाबाद आने से पहले मुझे पता था कि तुम मेरा नंबर मांगोगे। तुमने मांगा भी। अब जाके कहीं तुमने मेरा नाम पूछा। निशा है, मेरा नाम और तुम निखिल।

दिल्ली दूर नहीं थी। एक घंटे का ही सफर तय करना था अब मुझे। मतलब जिस सफर को तय करने के लिए मैं लिच्छवी में बैठी थी, वह सफर खत्म होने ही वाला था। खत्म हो भी गया। पर अनजाने में ही एक नए सफर की शुरुआत हो चुकी थी, तुम्हारे साथ। मैं ट्रेन से उतरते ही कमरे में पहुंची की घंटी बजी।

यहां तक कुछ भी अप्रत्याशित नहीं था। पर उसके बाद जो भी घटा वह घटना बन गया। आहिस्ता-आहिस्ता हम अजनबी नहीं रहे।

हम दोनों का नेटवर्क काफी मैच करने लगा। मतलब मैं जब भी उसे याद करती घंटी बज जाती उधर वो मुझे याद करते उनके फोन की घंटी बज जाती। सिलसिला चल पड़ा। हर हफ्ते मेरा नोएडा जाना, एंकरिंग से ज्यादा तुमसे मिलने की खुशी होती। हां, दो घंटे के छह सौ रुपए मेरे लिए कम नहीं थे। पर तुमसे मिलना इस खुशी को दुगुनी कर देता था। तकरीबन डेढ़ महीने बाद एंकरिंग तो खत्म हो गयी पर नोएडा जाना वैसे ही जारी रहा। क्योंकि अब मैं तुमसे मिलने जाती थी। इस बीच तीन फिल्में मैंने तुम्हारे साथ देखीं, रात को बातों का सिलसिला। तुमने प्रपोज जो कर दिया था। पर यह भी सच है कि तुम हमेशा दुविधा में ही रहे। मेरी जिद करने के बाद ही तुमने रात को सोने से पहले लव यू कहना शुरू किया। काश उस वक्त मैं तुम्हारे अचकचाने का मतलब समझ जाती। पर सच है, इश्क का बुखार सिर चढ़कर बोलता है। तुम्हारी झिझक भी मुझे तुम्हारी एक अदा लगी। तुम किस दुविधा में हो मैं समझ नहीं पायी। तुमने कभी भी बढ़कर मेरा हाथ तक नहीं पकड़ा, मुझे तुम्हारे इस रवैए से काफी कोफ़्त होती। पहली बार नए साल में अक्षरधाम मंदिर में भीड़ से बचाने के लिए ही सही तुम्हारा मेरा हाथ पकड़ना सुकून भरा लगा। मुझे याद है, भीड़ खत्म होते ही तुमने हाथ छोड़ भी दिया था। हमेशा की तरह मैंने फिर तुम्हें चिढ़ाया था, मौका मिलते ही हाथ पकड़ लिया। तुम्हारी अचकचायी, शर्मायी सी हंसी का असर मेरे ऊपर क्या होता था, तुम समझ भी नहीं सकते।

मैंने तो ख्वाबों में रंग भी भरने शुरू कर दिए। अड़चन भी तो नहीं थी। तुम पंडित मैं भी पंडित, मेरे ही शहर के करीब, ठीक-ठाक नौकरी। तुम मुझे पसंद, मैं तुम्हें पसंद। हां तुम्हारे लुक को सुधारने के लिए मैं रोज कुछ न कुछ सोचती। वजह साफ थी मैं चाहती थी कि मेरी पसंद आन द टॉप हो। अबकी होली में घर जाने का इंतजार जितना मुझे था पहले कभी नहीं हुआ, तुम जो मेरे साथ जा रहे थे। 25 फरवरी को हमें साथ जाना था। पूरी रात तुम्हारे साथ गुजारने का एहसास। तुम्हें भी इंतजार था। मुझे पता है, हम साथ गए एक कोच में एक ही सीट में। मेरी तो वेटिंग थी।

पता नहीं क्यों मुझे आज भी लगता है कि जनाब आपने जानबूझकर मेरी सीट रिजर्व नहीं करायी। मैंने कई बार तुमसे कहा भी। लेकिन तुमने माना नहीं। लेकिन मैंने माना कि मैं यही चाहती थी। बस यही अंतर था तुममें और मुझमें मैंने तुमसे सबकुछ कहा, तुमने कुछ नहीं। पर तुम्हारे प्यार पर मुझे न तब शक था और न हीं अब। क्योंकि एहसास झूठ नहीं बोलते। मुझे एहसास है तुम्हारे प्यार का। पर दिल्ली से कानपुर तक का वह सफर भी बेहद रोचक था, राजू श्रीवास्तव का लाईव शो जो हम देख रहे थे। पहली बार स्लीपर में यात्रा करने से रोमांचित परिवार। अजीब-अजीब सी उनकी हरकतें। देखकर हम तीनों का तो पेट ही फूला जा रहा था। सामने अतुल भईया की सीट। रह-रहकर मुझे उन पर गुस्सा आ रहा था। उनके जगने की वजह से। बस बार-बार मुझे यही लग रहा था कि आखिर भईया समझते क्यों नहीं। पर पूरी रात आपका बार-बार उठना, टहलने का बहाना करना। आपकी अपनी मजबूरी थी। क्योंकि कहानी से पहले गुजरे वक्त के भी चश्मदीद थे। मुझे लगा की यह सफर केवल हम दोनों का ही है, पर मैं गलत थी। मेरे और तुम्हारे अलावा नेहा भी इस सफर में हमेरे साथ थी। नेहा और मैं दोनों एक दूसरे से अनजाने थे।

मैं तो वेटिंग में थी नेहा कन्फर्म थी। गाड़ी के इंतजार के वक्त ही तुम मुझे बता देते कि तुम अपनी मंगनी करके आए हो। क्यों छिपाया तुमने। गाड़ी आने का वक्त हो चुका है और अब तुम मुझे बता रहे हो कि मैं वेटिंग में हूं। इंतजार खत्म नहीं हुआ...., उम्मीद भी कायम है। कई बार मेरी वेटिंग भी कन्फर्म हुयी। कई बार जरूरी काम निकल आने पर लोग कन्फर्म टिकट भी कैंसिल करवा लेते हैं...।

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संध्या द्विवेदी

गोविंद पुरी, दक्षिणी दिल्ली

वर्तमान में एक गैरसरकारी संगठन ‘निरंतर’ में कार्यरत हूं।

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