रविवार, 26 अगस्त 2012

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -63- राजेंद्र अवस्थी (कांड) की कहानी : रक्त वर्षा

कहानी

" रक्त वर्षा "

राजेंद्र अवस्थी (कांड)

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सूरज की लालिमा कम हो रही थी, लेकिन गर्मी की बेचैनी हर इंसान से झलक रही थी, भन्ना को अहसास था आने वाले कल का। वो उदास सी एक टक कभी अपने बड़े बेटे को देखती कभी मंदिर के चबूतरे पर सोए हुए अपने साथी ढ़ेमा को। इस बार पूजा के लिये पुजारी जी ने ढ़ेमा के नाम की घोषणा की थी, ढ़ेमा भी जानता था पूजा का मतलब। गाँव के उत्तर में स्याह पहाड़ को पार करते ही एक रात की दूरी पर जो सफेद मैदान है उसी मैदान के बीच में केवना देवी के मन्दिर में बरसात शुरू होते ही उसके सर को धड़ से अलग कर दिया जाएगा।

बेचैन वो भी था फिर भी भागने का कोई भी प्रयास उसने नहीं किया, क्योंकि उसे मालूम था कि, हर साल जब बरसात नहीं होती तो पुजारी जी एक आदमी के सर को देवी केवना को अर्पित करते हैं। ना जाने हर साल बरसात खून ही क्यों माँगती है? पता नहीं बरसात कुछ माँगती भी है या नहीं। । सूरज आसमान की ऊंचाई से अब धरती पर उतरने ही वाला था।

भन्ना क्या करती, फिर उसकी सुनने वाला था भी वहाँ कौन। । पुजारी जी की बात को ना मान कर देवी की नाराजगी कोई नहीं झेलना चाहेगा। बलि देना तो धर्म का काम है पुरखों के समय से होती आ रही है। रात में विचित्र सी निस्तब्धता है। जुगनुओं को भी शायद खबर हो चुकी है इंसानी पूजा की, झींगुर आज मंत्र नहीं पढ़ रहे हैं क्यों कि कल के बाद रोज़ मंत्र पढ़ने हैं। फूलों ने खुशबू को पी लिया है इसीलिये आज तितलियाँ भी नही आईं।

भन्ना धीरे से बेआवाज़ ढ़ेमा की ओर बढ़ी ये सोच कर कि वो जाग रहा होगा लेकिन सूखी लकड़ी के खड़खड़ाने जैसी खर्राटों की आवाज़ ने उसकी सोच को विराम दे दिया। । अच्छा है जितनी जल्दी बिसरा दिया जाय अपनों को। अचानक भन्ना की नज़रों में वो बरसात के दिन घुमड़ आए जब वो नदी में सूखे पेड़ को तैरा कर मछलियों को पकड़ रही थी, और ना जाने कैसे एकाएक स्थिर पानी में हलचल को महसूस कर लिया था उसने। उसे पता तो तब चला जब ढ़ेमा की कठोर बाँहों में खुद को कैद पाया। फिर भी आज़ाद होने की कोई कोशिश नहीं की उसने। जान बचाने की खातिर।

आज भन्ना की कोमल बाँहे भी कठोर बन जाना चाहती हैं। ह्रदय में साहस जन्म लेने ही वाला है तभी साँसों की तीव्रता ने मौन धारण किया और ढ़ेमा की आँखो के कोर से उसने अपने अस्तित्व को गीला होते हुए महसूस किया। भन्ना अस्तित्वहीन होने लगी। फिर भी दुनियाँ भर की समझदारी के साथ उसने साहस को जन्म दिया। और चुपचाप दबे पाँव बिना अपने जिग़र के टुकड़े पर नज़र डाले पुआल पर आ लेटी। आज वो खुद को ढ़ेमा के शरीर में महसूस कर रही थी। इसलिये उसने ढ़ेमा की ओर से नज़रें फेर कर इस पल को जी भर जी लेना चाहा। और जोर से पलकों को बन्द कर लिया नयी सुबह का स्वागत करने के लिये।

ढ़ेमा सोया कब था वो तो बस मिलन की बेला में जुदाई का इन्तज़ार कर रहा था। उसके कसे हुए भूरे शरीर में 54 उम्र देखने के बाद भी ताक़त का सैलाब उमड़ चला था। निश्वास चुपके से उठ कर उसने एक नज़र भन्ना को देखा। भन्ना को लगा। जैसे हजारों जुगनुओं ने उसकी बंद पलकों के भीतर रौशनी कर दी हो। ढ़ेमा ने बेटे को देखा। बेटे के शरीर में भी हलका सा कम्पन हुआ। और फिर ढ़ेमा सूखे पत्तों की झोपड़ी से बाहर कहीं अंधेरे में गुम हो गया। शोर सुन कर भन्ना ने बेटे को जगाया। झोपड़ी के बाहर सारे कबीले के लोग एकत्रित थे पुजारी के साथ। ढ़ेमा दूर निकल आया था। उस ज़मीन से दूर जिस जमीन पर वो बड़ा हुआ और ना जाने कितनी बार पूजा के साथ उसने भन्ना को जिन्दा होने की कोशिश करते हुए देखा। पर इस बार की पूजा में भन्ना को जिन्दा रहने का श्राप मिल ही गया। उसी श्राप के सहारे अपने बेटे को साथ ले कर भन्ना अपनी देवी से दूर बरसात से दूर कबीले से दूर हो जाना चाहती है क्यों कि उसके अस्तित्व में ढ़ेमा आज भी अस्तित्ववान है -- राजेंद्र अवस्थी (कांड)

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