सोमवार, 27 अगस्त 2012

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -64- गिरिजा कुलश्रेष्ठ की कहानी - उसके लायक

कहानी
उसके लायक
गिरिजा कुलश्रेष्ठ
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ह जिस दिन पहली बार कक्षा में आई थी ,उस दिन तो सबने ऐसा मुँह बना लिया था जैसे धोखे से कड़वी ककड़ी चबा गए हों .....

दो माह पहले मैं शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्रांगण में कचनार के पेड़ के नीचे बैठा  अनायास ही पन्द्रह साल पहले के उन दिनों को याद करने लगा था जब मैं आठवीं कक्षा पास कर आगे की पढ़ाई के लिये बुआ के पास सुजानगढ़ में रहा था। 

कस्बा कम देहात ज्यादा लगने वाला सुजानगढ़ मुख्य सड़क से दूर एक पहाड़ी कस्बा है। गढ़ के नाम पर एक छोटा सा किला है जहाँ कभी राजा रहते थे। कभी उनका ही राज चलता था पर अब वहां स्कूल ,बैंक और डिस्पेंसरी चलती है। पहाड़ी के नीचे एक छोटी सी नदी बहती है। इन पन्द्रह सालों में वहाँ इतना अन्तर आया है कि गोपू हलवाई की दुकान बीच बाजार से हट कर बस-स्टैंड पर आ गई है और उसके पेड़ों में अब वह बात नहीं जो कभी सुजानगढ़ की पहचान थी। नदी में पानी की जगह बच्चे खेलते हैं और लड़कियाँ जो दुपट्टा को कन्धों पर पैला कर और गर्दन को कन्धों के समानान्तर रख कर बहुत जरूरी होने पर ही सड़क पर निकलतीं थीं वे निस्संकोच खूब हँसती-बतियाती हुई स्कूल जातीं हैं और हर तरह के बिल भरने तक का काम करतीं हैं। जो बात आज भी वहाँ के लोगों में देखी जाती है वह है लोगों की बेफिक्री व मौजमस्ती। कहो तो ताश खेलते-हँसते पूरा दिन गुजार दें और कहो तो जरा सी बात पर विधानसभा में हंगामा खड़ा कर दें। खैर यह सब मेरी कहानी का हिस्सा बिल्कुल नहीं है। मेरी कहानी सोलह-सत्रह साल पहले के केवल अपने स्कूल पर केन्द्रित है। स्कूल में भी  हमारी कक्षा और कक्षा में भी उस एकमात्र लड़की पर केन्द्रित है जो मेरे साथ स्कूल में पढ़ी थी हालाँकि नियमित रूप से एक-डेढ़ साल ही कक्षा में आई थी। बाकी डेढ़ साल उसने कैसे पढ़ाई की। और परीक्षा-परिणाम क्या रहा ,मुझे नहीं मालूम था। 

पहले यह बता दूँ कि जी.पी. कॅालेज के प्रांगण में मैं इस तरह अतीत की गलियों में गुजरने के लिये नहीं बैठा था। वहाँ मैं एक प्रतियोगी परीक्षा के लिये आया था और मेरे लिये एक-एक पल महत्त्वपूर्ण था। बस नौ बजे ही मुरैना पहुँच गई थी और परीक्षा प्रारंभ होने में अभी एक डेढ़ घंटा था। तब तक यही बेहतर था कि इधर-उधर भटककर समय गुजारने की बजाय याद किये हुए को दोहरा लूँ।

सच पूछा जाए तो परीक्षा से ठीक पहले कुछ पढ़ना या याद करना तेज चलती ट्रेन के डिब्बे गिनने जैसी कोशिश करना है। कुछ पल्ले ही नहीं पड़ता। लेकिन जब तक कोई हाथ से किताब छीन कर न रख दे छोड़ने का मन भी तो नहीं होता। लगता है कि कुछ और समय मिल जाए तो पूरी तैयारी हो ही जाएगी। जैसे कि उन पलों की तैयारी पर ही सारी सफलता टिकी होती है। जो भी हो वह परीक्षा मेरे कैरियर की दिशा में बड़ी महत्त्वपूर्ण ही नहीं बल्कि अन्तिम परीक्षा भी थी। कुछ ही महीनों बाद मैं ओवरएज जो होने वाला था। और आपको आज यह बात बड़ी खुशी के साथ बता रहा हूँ कि अब मैं उस परीक्षा में सफल भी हो चुका हूँ। आज ही परिणाम की सूचना मिली है और इस सफलता के बाद तो और भी जरूरी है कि मैं आपको वह सब बताऊँ जो कहीं न कहीं इस परीक्षा से जुड़ा है। क्योंकि परीक्षा के दौरान जो कुछ हुआ उसके तार मेरे स्कूली जीवन से भी जुड़े है।

जीवन की कई घटनाएं अप्रत्यक्ष रूप से आपस में जुड़ी होतीं हैं। समय आने पर उनके जुड़े होने का अहसास हमें रोमांचित करता है।

हाँ तो मैं बता रहा था कि मैं कालेज के प्रांगण में एक पेड़ के नीचे अकेला ही बैठा था और गाइड खोल कर कुछ और भी पढ़ने--समझने की कोशिश कर रहा था कि एक महिला  वहाँ से गुजरी। जाने क्यों उसे देख कर अपनी क्लासमेट सरिता याद आ गई। मैं अनायास ही स्मृतियों की उन गलियों में पहुँच गया जहाँ उम्र के वसन्त में हर टहनी पर कलियाँ फूट निकलने को आतुर होतीं हैं। सूरज क्षितिज की बाँहों से छूट कर पूरे आसमान में फैल जाने को उत्साहित रहता है।
 
मिडिल स्कूल के छोटे से दायरे से निकल कर बड़े स्कूल में पहुँचना मेरे लिये काफी रोमांचक था। नए दोस्त ,नया माहौल ,नए शिक्षक और उम्र के नए अहसास...। अभी पढ़ाई विधिवत् शुरु नहीं हुई थी। केवल प्रेजेन्ट लेने हिन्दी वाले सर आते थे और नागरिकशास्त्र वाले सर संविधान की कुछ चलताऊ कहानियाँ सुना कर चले जाते थे। बाकी समय में हम लोग या तो चुटकुले सुनाते रहते या स्कूल से भागने की योजना पर अमल करने की सोचते रहते थे तभी एक दिन एक सहपाठी घनश्याम ने एक सूचना दी ----"अरे भाइयो सुनो-सुनो ,ध्यान लगा कर सुनो। अभी-अभी पता चला है कि हमारे क्लास में एक लड़की भी आने वाली है। उसके पिताजी आज ही उसका फार्म व फीस जमा करने आए हैं।"

उन दिनों किसी लड़की का पढ़ने जाना और वह भी लड़कों के स्कूल में एक ब्रेकिंग न्यूज जैसा था
उस सूचना पर हम सब ऐसे केन्द्रित होगए थे जैसे बरसाती रात में जलते बल्ब के आसपास कीड़े-मकोड़े जमा होजाते हैं।

घनश्याम हमारे क्लास का मसखरा था। मस्त व बेफिक्र। बात बात पर चुटकुले सुनाना ,गीत गा गाकर कमर-कूल्हे मटकाना और मिमिक्री करना--ये सारी खूबियाँ उसे खूब लोकप्रिय बनातीं थी। दूसरे स्थानों पर हो न हो लेकिन सुजानगढ़ के स्कूल में लड़की के पढ़ने आने की बात सचमुच एक खास घटना थी। सुदूर अंचलों में किसी बिसाती के पहुँचने जैसी। पूरे इलाके में एक ही हायर सेकेन्डरी स्कूल था। लड़कियों के लिये भी वही एक स्कूल होने के बावजूद लड़कियाँ वहाँ कम ही पढ़ने आतीं थीं। तब देहात में तो लड़कियों को कोई पढ़ाता ही नहीं था। पर सुजानगढ़ के पढे-लिखे अच्छे घरों की लड़कियाँ भी नाम लिखाने के बाद सीधी परीक्षाओं में ही दिखतीं थी। बात यह थी कि सुजानगढ़ का स्कूल हुल्लड़बाजी के लिये जिलेभर में जाना जाता था। वहाँ आकर बाहर गाँवों के सीधे लड़कों के भी मानो सींग निकल आते थे।

क्या बात कर रहा है तू। जगदीश एकदम उछल पड़ा। उस सूचना ने लगभग सभी को जिज्ञासा से भर दिया था।
"अरे घनश्याम जी बड़ी मीठी सी खबर लाए हो। जरा हमें तो बताओ कि लड़की कौन है कैसी है ?"-मुंशी ने शरारती अन्दाज में पूछा।

"बड़ी जल्दी में हो--- सुरेश मुस्कराया----अरे यार लड़की है तो अच्छी ही होगी" ।
मुंशी ,जगदीश ,ओम, सुरेश वगैरा दो-दो साल के फेलुअर थे। उनका काम नए लड़कों पर रौब चलाना ,शरारतें करना और लड़कियों पर फब्तियाँ कसना था। रात-रात में जंगल से लकडियाँ काट बेच कर सुबह तक सुजानगढ़ लौट आते थे। मैं कक्षा में सबसे छोटा था। अपेक्षाकृत होशियार और स्मार्ट भी माना जाता था। इस कारण वे सब मुझे प्रिंस कहते थे। और इसी बहाने अपने छूटे हुए काम मुझसे करवा लेते थे। घनश्याम की बात सुनने के बाद से सब यही सोच रहे थे कि कक्षा में लड़की रहेगी तो रौनक तो रहेगी ही। यही नहीं बैठने की जगह ,उसकी मदद और उसके साथ जोड़ी भी बनाने की योजनाएं विधिवत् बना ली गई थीं। जोड़ी बनाने की बात पर खूब खींचतान हुई। मुंशी उस पर अपना दावा करता और जगदीश अपना। सुरेश ने मेरा भी नाम उसके साथ जोड़ दिया। मुझे ऐसा सोचना काफी अच्छा भी लगा था। अच्छा और नया।

लेकिन पहली बार जब वह कक्षा में आई ,उसे देख कर पहले तो यही हुआ कि सबकी हालत फूँक मार कर बुझाई हुई बत्ती जैसी होगई। जो सामने था वह कल्पना से एकदम उल्टा था। एकदम अनगढ़ पत्थर सी वह लड़की तो लड़की नाम को भी लजा रही थी। न रंग की न रूप की। किसी भी कोण से आकर्षक नहीं। ऊपर से खींच कर बाँधी गईं चोटियों के कारण आँखें खिंची--खिंची सी होगईं थीं। चेहरे पर चमकता तेल पुरानी फ्राक प्लास्टिक की जूतियाँ और कन्धे में टँगा हुआ हाथ का सिला थैला उसकी फूहड़ता को दर्शा रहे थे। उसे देख कर हमारी आशा व जिज्ञासा दोनों ही मन से निकल गईँ। टायर से जैसे हवा निकल जाती है। वह चार-पाँच कि.मी. दूर देहात से पैदल चल कर आती थी। कभी--कभी साइकिल से भी आती थी। उसकी साइकिल काफी पुरानी व जंग खाई थी। उसके हिसाब से काफी ऊँची भी थी। शायद उसके पिता की होगी। उसके पाँव पैडलों तक ठीक से नहीं पहुँचते थे। पूरा पैडल घुमाने के लिये उसे लगभग आठ-आठ इंच आजू-बाजू झुकना पड़ता था।

उसके पिता प्राइमरी स्कूल के मास्टर हैं। सो इतना जरूर समझते होंगे कि भगवान ने अगर रंगरूप देने में कमी कर दी है तो उसे पढ़ा-लिखा कर पूरी किया जा सकता है। तभी तो अकेली लड़की को इस तरह पढ़ने भेज दिया है।----सुरेश ने बताया। उसकी पूरी पत्रिका उन लोगों के पास आ चुकी थी 
और सीधा हमारे सिर पर ठीकरा फोड़ दिया है।

"यार घनश्याम यह क्या जलेबियों की जगह रूखी रोटियाँ ले आया वह भी बाजरे की।-"-जैसे ही वह पहली बार कक्षा में आई थी मुंशी रोने का अभिनय करके बोला। निराशा जब सीमा पार होजाती है तब व्यंग्य व प्रतिशोध जन्म लेता है।

सुरेश ने पुचकारा--"-वत्स चिन्तित न हो। इसके लिये हमारा सुरेन्द्र है न। एकदम फिट। राम मिलाई जोड़ी एक अंधा एक कोढ़ी।"
सब लड़के हँसने लगे। लड़की चकित सी सबकी ओर देखने लगी। 

सुरेन्द्र हमारी कक्षा का सबसे कुरूप लड़का था। गहरा स्याह रंग ,पीले कंचे जैसी आँखें और नाक आँखों के बीच पूरी तरह गायब रह कर सीधी होठों के ऊपर निकली थी। डेल्टा के आकार में। उसके घर में आटा माँगने का काम होता था इसलिये मुंशी उसे चुकट्या कहता था जिसका वह उतना बुरा नहीं मानता था जितना उसे उस लड़की के साथ जुड़ने की बात सुन कर लगा। तिलमिला कर बोला---
अच्छा , तो तुम लोगों ने मुझे बस उसके लायक ही समझा है और खुद को सलमान खान समझते हो। कि तुम्हारे लिये कोई माधुरी दीक्षित आएगी ..।

वह वह सहमी सी चुपचाप एक तरफ बैठ गई। उसके बगल वाले लड़के इधर-उधर भागने लगे तो हँसी का एक फव्वारा फूट कर बह चला। और कक्षा में इस तरह स्वागत हुआ उस लड़की सरिता का। 

सरिता...हाँ यही नाम था उसका। पर लड़के उसे सरीता कहते थे। फिर सरीता से सरौंता भी होगया। हाँ मैंने जरूर आज से पहले उसे उसके नाम से कभी नहीं पुकारा। मुझे लगता है कि नाम लेने का आधार अच्छी जान-पहचान व अपनापन होता है। नहीं होता तो बनने लगता है। मेरे साथ न तो पहली स्थिति थी न ही दूसरी बनने वाली थी। मेरे लिये तो वह मात्र एक 'परसन' थी। एक लड़की। बस और कुछ नहीं। उसके लिये अगर कोई भाव था तो वह था उसके समग्र व्यक्तित्त्व से वितृष्णा का। कुछ--कुछ हेयता का भी। यह भाव दो कारणों से था। एक तो यही कि वह लड़की होकर भी लड़कों के स्कूल में पढ़ने आ गई थी। लड़की का लड़कों के साथ बैठ कर पढ़ना यानी लड़कों बदतमीजी करने तथा उसके बदनाम होने के पूरे सौ परसेंट चान्स। दूसरे उसकी बोलचाल व बर्ताव बड़ा ही उजड्ड व गँवारू सा था।

स्कूल में एक-दो लड़कियाँ और भी थीं पर वे थीं काफी सम्पन्न घराने की और सलीके वालीं लड़कियाँ । उनके घरों में न केवल एक-दो लोग अच्छी नौकरियों पर थे और अंग्रेजी बोल सकते थे बल्कि थाने से लेकर मंत्रालय तक उनकी पहुँच थी। उनके विषय में किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने का साहस भी नहीं था किसी में। उनमें एक लड़की बहुत खूबसूरत भी थी। मुंशी वगैरा उसे दबी जुबान से आपस में ही मृगनयनी कहा करते थे। वे लड़कियाँ जब भी स्कूल आतीं ,सरिता को ऐसे देखतीं थीं जैसे किसी शानदार मॅाल में कोई ठेठ अनपढ़ देहाती घुस आया हो। वह  एकदम फूहड़ किस्म की देहातिन लगती भी थी। उसके बालों व फ्राक की जेबों में घास के तिनके या कुट्टी के टुकड़े मिलते थे। शायद घर में भैंस-गाय होंगी। उसके होंठ खुले रहते थे। और कभी-कभी नाक भी भरी हुई रहती थी। कपड़े भी एक ही जोड़ थे क्योंकि कई बार उसका पाजामा अधसूखा होता था
अनगढ़ पत्थर सी वह छोटी और नासमझ लड़की हमारे किसी काम की नहीं थी। दादी के शब्दों में कहूँ तो --बिल्ली का गू। न लीपने का न थापने का। जोड़ी बनाने की बात पर सबने एक दूसरे को जलती आखों से देखा।
वह या तो बिल्कुल ही नासमझ थी या फिर नासमझी का दिखावा करती थी हालाँकि दिखावा करने लायक अक्ल उसमें लगती नहीं थी। क्योंकि वह हमारी उपेक्षा से अनजान कई तरह के सवाल करने में नहीं हिचकिचाती थी जैसे कि चार बजे यहाँ से कौनसी बस जाती है। कि अँग्रेजी में सर ने कितना पढ़ा दिया है। या कि एक दिन के लिये अपनी कापी दे दो भैया ..।

अरे यार क्या मजाक है यह तो बहन-भाई का रिश्ता जोड़ने लगी --मुंशी रुआँसी मुद्रा में कहता। सुरेश हँसता--अच्छा है न। दूसरे रिश्ते लायक वह है भी नहीं।

 यही नहीं जगदीश ,मुंशी और दूसरे लड़के अक्सर उसे सुनाने के लिये बहुत ही फालतू से कमेंन्ट्स करते रहते थे। जैसे कि यार सुरेश पेड़ में ढंग से पानी नहीं दिया होगा वरना इसमें भी फूल--फल तो आ ही जाते। एक तो गिलोय ऊपर से नीम चढ़ी यार कैसे पीसें और पियें। यही नहीं वह आकर जहाँ भी बैठती कोई न कोई अपनी किताबें रख देता वह खड़ी रहती। शिक्षक जब क्लास में आते तो चुपके से जगह खाली कर देते। यह सब वह चुपचाप देखती रहती पर किसी से कोई शिकायत करना ही नहीं जानती थी। उसे अपने होने का कोई भान ही नहीं था जैसे। एक दिन तो गजब ही हो गया---

मुंशी लड़की की ओर इशारा कर जगदीश से कह रहा था---"ए टेक माइ पेन्....।"
जगदीश को पूरा यकीन था कि मुंशी इसके आगे भी कुछ अक्षर जोड़ना चाहता था सो ढिठाई से हँसता हुआ बोला---"मुझे नहीं चाहिये। मेरे पास तो अपना है उसे दे दे जिसको जरूरत हो। जगदीश का इशारा भी लड़की की तरफ था।"
"चल हट मेरी चीज ऐसे-वैसे लोगों के लिये नहीं है ..।"
सुन कर सब हँस पड़े। वह लड़की भी हँस पड़ी। जगदीश बोला---"यह तो सचमुच निरी बेवकूफ है।
अभी बच्ची है।"--सुरेश ने भी दया दिखाई।

कक्षा में उसके होने न होने का कोई अर्थ नहीं था। और पूरे साल वह इस तरह कक्षा में बनी रही जिस तरह किसी के बाजू वाले फ्लैट में कोई सालों साल रह जाता है पर न कोई विवाद और नहीं कोई संवाद।  
लेकिन आगे के दो सालों में संवाद जरूरी लगने लगे और जब उसमें व्यवधान आए तो विवाद हुए और उसमें हमारी प्रतिपक्षी होने के लक्षण उसमें जल्दी ही दिखने लगे। फिर एक बार तो ऐसा हुआ कि लड़की को स्कूल छोड़ना ही पड़ा।

हुआ यह कि जब उस लड़की में उम्र के साथ चेहरे में कुछ लोच और आकर्षण आ गया तो उसके प्रति लड़कों का नजरिया भी कुछ बदल गया। मुंशी उससे कोई परेशानी होने पर बेझिझक मदद माँगने का आग्रह करता तो जगदीश उससे किसी न किसी अधूरे रहे होमवर्क के बारे में पूछता। तो सुरेश ,जब भी वह कुछ पढ़ती सबको ऊँची आवाज में निर्देश देता--अरे यार डिस्टर्ब मत करो। पढ़ने वालों को पढ़ने दो। लेकिन वह गजब की मट्ठर थी। इन गतिविधियों से बेअसर जैसे भारी वर्षा में कोलतार की सड़क। व्यवहार में नाम का भी लोच नहीं आया। मदद माँगना तो दूर वह एक दूरी सायास बनाए रखती थी तथा सबसे अलग अनजान बनी सी अपनी किताबें पढ़ती रहती थी। हालाँकि मेरी नजर में एक लड़की के लिये यह उचित भी था। मेरा तो यह भी मानना था कि वह इन लोगों की बातों से बचने के लिये ही व्यस्त रहने का दिखावा करती थी। पढ़ाई क्या खाक करती होगी। पर उसका यों कट कर रहने के लिये पढ़ने का बहाना खोजना मुंशी और उसी जैसे दूसरे लड़कों को अपना अपमान लगने लगा। ऐसा कैसे हो सकता था कि एक लड़की उनके होते हुए न केवल पढ़ती रहे। बल्कि उनके कमेंट्स पर भी ध्यान न दे। अकड़ और गरूर तो खूबसूरत लड़कियों को शोभा देता है। उस पर यह भी गजब कि कक्षा में वही सबसे पहले अपना काम पूरा करके शाबासी पाती। सर लोग हम सब लड़कों को सम्बोधित कर कहते सरिता को देखो और सीखो कि जब काम करना ही होता है तो कोई बहाना नहीं चलता। यह लड़की होकर भी गाँव से पढ़ने आती है घर के काम करती है और तुम सबसे अच्छा काम करके दिखाती है।

एक दिन बात बहुत बढ़ गई। हुआ यह कि पीरियड खाली था। मुंशी रजिस्टर से तबला बजा कर कोई भद्दा सा गीत गाने लगा। वह लड़की क्लास से बाहर जाकर आफिस के पास पड़े स्टूल पर बैठ कर पढ़ने लगी। गुप्ता सर ने उसे यही निर्देश दे रखा था। लेकिन हमारी बदकिस्मती से सिंह साहब (प्रिंसिपल) ने यह सब देख लिया। यानी लड़की को कक्षा से बाहर और हमें गाते बजाते। सिंह साहब अपने अनुशासन के लिये जिले भर में जाने जाते थे। बस हम चार-पाँच लड़कों को बुलवाया। शायद वे पहले से कुछ समझ रहे होगे हमारे बारे में वरना नाम लेकर हमें ही क्यों बुलवाते। बुलाकर उन्होंने हमें एक लम्बी नसीहत व चेतावनी दीं कि अगर ऐसी वैसी हरकतें कीं , किसी लड़की को परेशान किया तो ठीक नहीं होगा। कि सारा लफंगापन निकाल देंगे कि स्कूल से रेस्टीकेट कर देंगे आदि..। इस बात से मैं और सुरेन्द्र जैसे ओम के मन में तो जैसे आग ही सुलगा दी। ओमपाल शर्मा तेजपाल शर्मा का बेटा था जो सुजानगढ़ के जाने हुए लोगों में से था और जनपद अध्यक्ष भी। यह जाना-माना-पन केवल धन का ही नहीं तमाम हथकण्डों का भी था जिनके बल पर अपनी सत्ता जमाए था। सत्ता को बनाए रखना सत्ता हासिल करने से कम कठिन नहीं होता।

अब तो यह प्रस्टेज पाइंट बन गया। दो कौड़ी की लड़की के कारण हम अपमानित हो रहे हैं।---मुंशी ने दाँत चबाते हुए कहा--- "परेशान अब तक तो नहीं किया था पर अब करके दिखाएंगे। नदी में रह कर मगर से बैर। अब यह सुजानगढ़ में नहीं पढ़ पाएगी। हमने सोचा था कि चलो गाँव की सीधी-सादी लड़की है ..। पर यह तो हमें ही रास्ता बताने लगी।"
इसके बाद ऊपर से सब शान्त पर भीतर भारी उथल-पुथल। संकल्प। पुरुष को जो सबसे ज्यादा अखरता है वह है स्त्री की अपराजेयता। उसे तोड़ना ही उसके लिये जैसे सबसे जरूरी काम हो जाता है। फिर सचमुच उसके लिये बहुत सारी मुश्किलें पैदा की गईं। कभी उसकी किताबें गायब की जाने लगीं। कभी उसके नाम चिट्ठियाँ ड़ाली जाने लगीं। यही नहीं उसके नाम के साथ दीवारों ,फर्श ,छत और रास्ते में कहीं भी अश्लील बातें लिखी जाने लगीं। पहले तो स्कूल में खूब हलचल मची। सर लोगों को लाख कोशिशों के बाद कोई सबूत हाथ नहीं लगा। क्योंकि राइटिंग किसी से मेल ही नहीं खाती थी। बिना सबूत के तो चोर राजा बराबर ही होता है। धीरे-धीरे पूरे सुजानगढ़ में इसकी चर्चा होने लगी। लड़की जिधर से भी निकलती ,उसे देखते ही हर कोई कहता ---"अरे देखो वो लड़की है जिसका नाम कोई बड़े गन्दे तरीके से लिख जाता है। बाप जी उसे बनाने चले थे पिराम मिनस्टर। हमारी भी तो लड़कियाँ हैं।"

उस लड़की के गाँव के दूसरे लड़के भी पढ़ने आते थे उन्होंने हमें बताया कि थू-थू होरही है सब जगह। गाँव में जहाँ देखो यही कहा जा रहा है कि कितनी मना करी थी कि लड़की को मत पढ़ाओ। जमाना खराब है पर कान्तीलाल को तो धुन सवार हुई कि लड़की को पढ़ा लिखा कर काबिल बनाना ही है। इस सबका असर यह हुआ कि वह अकेली पड़ गई। स्कूल में तो वह अकेली थी ही पर अब गाँव से भी उसके साथ कोई नहीं आता था। सुनसान रास्तों से अकेली कब तक स्कूल जाती। आखिर लड़की ही तो थी।

और अन्ततः उस लड़की का स्कूल आना बन्द हो ही गया।  मजे की बात यह कि दोषी अपशब्द लिखने वाले को नहीं बल्कि उस लड़की को माना जिसके लिये वह सब लिखा गया। आखिर बदनामी लड़की की ही होती है न। मुंशी ने सिकन्दर की तरह सबको देखा। छाती ठोकी। मुझे लगा कि लड़की ने यह ठीक ही किया। पढ़ लिख कर भी वह कौन सी इन्दिरा गान्धी बन जाती। इतनी बदनामी झेल कर पढ़ना क्या जरूरी है। कम से कम लड़की के लिये तो बिल्कुल नहीं।

मजे की बात यह कि उसके घर से कोई शिकायत करने भी नहीं आया। यह हमारी जीत थी।
"कौन आता ! पिता तो वैसे ही शर्म के मारे गर्दन झुकाए बैठा होगा।"--जगदीश बोला --मेरी दादी कहती थी कि रूप और गुणहीन कन्या का पिता सबसे ज्यादा बेचारा होता है फिर यह तो बदनाम भी होगई थी। हाँ परीक्षा देने के लिये वह जरूर आई थी लेकिन वैसे ही जैसे कोई सुरक्षा के बीच कोई अपराधी लाया जाता है। इसके बाद क्या हुआ। वह पास हुई या फेल ( वैसे फेल होने के चांस ही ज्यादा लग रहे थे।) शादी हुई या नहीं कुछ पता नहीं चला। इसकी कोई जरूरत भी नहीं थी। हमारे लिये वह गए साल के कैलेण्डर की तारीख भर थी। पर उस साल के गुजर जाने का कही हल्का सा भी मलाल नहीं था ,यह कहना भी मुश्किल था। दूब की जड़ की तरह वह घटना मन की जमीन में कहीं दबी थी तभी तो एक महिला को देख कर एकदम हरियाने लगी थी। हालाँकि यहाँ इतने बड़े कालेज में उसके मिलने की कल्पना मुझे एक बारगी निरर्थक ही लगी।

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परीक्षा प्रारंभ हुई। पेपर देख कर मुझे पहले तो पसीना ही आ गया। उसमें हिन्दी वाला भाग मुझे सबसे ज्यादा मुश्किल लगा। वैसे जितनी भी कठिनाइयाँ हैं वह हिन्दी में ही आतीं हैं। वह भी साहित्य के इतिहास और काव्य सिद्धान्त में। मैं खीज उठा। अब इससे क्या फर्क पड़ता है कि दुष्यन्त कुमार गीतकार हैं या गजलकार कि निराला जी छायावाद के कवि हैं। पर उनकी कविताओं में प्रगतिवाद के स्वर सबसे ज्यादा हैं कि ध्वनि सिद्धान्त का ज्ञान किस काम का है और साधारणीकरण किसका होता है। किस काम के हैं ये सवाल।
अब समझ आ रहा है कि लड़के-लड़कियाँ ऐसे सवालों को छोड़ क्यों तकनीकी शिक्षा में जा रहे हैं।उन्हें हिन्दी आए न आए पर अशिक्षित मजदूर वर्ग में बच्चों की पैदावार की तरह ही उग रहीं कम्पनियाँ उन्हें धड़ाधड़ नियुक्तियाँ दे रही है। मैं सोच रहा था कि क्यों नहीं मैंने भी उस तरफ ध्यान क्यों नहीं दिया। खैर....।

पिछली बार की अपेक्षा इस बार पेपर कुछ ठीक रहा और मैं उम्मीद के साथ लिखने में व्यस्त था कि एक गुलशन ग्रोवर टाइप एक व्यक्ति ने अचानक आकर मेरी कापी उठाली और कड़क कर कहा --"आउट। यही सब बचकानी हरकतें कर रहे हो।" उसे मेरे पास ही पड़ी दो चिटें मिलीं थी और संयोग से मैं वही सब लिख भी रहा था।
"सर वो मेरी नहीं हैं। आप यकीन करें मैंने कुछ नहीं किया।"--मैंने गिड़गिड़ाते हुए कहा।
ऐसे में कैसी दयनीय हालत हो जाती है। पर वह मुझसे फार्म भरवाने अड़ा ही रहा।
"फार्म भर कर तो मेरा कैरीयर चौपट हो जाएगा सर।"--मैं फिर गिड़गिड़ाया।

यह पहले नहीं सोचा था। वह बोला। वह सचमुच बड़ा ही कठोर अधिकारी था। जरा नहीं पिघला । मैंने असहाय होकर चारों ओर देखा। एक-दो लोग और भी आगए। मन का ज्वाला मुखी ठंडा पड़ चुका था। वरना इतना सुनने के बाद कौन चुप रहता। अपनी बेइज्जती सहने का आदी कहाँ था मैं। पर गरज जो थी। पिताजी व माँ की उम्मीद भरी आँखें मन में ज्वार उठा रही थी। तभी एक पतली मगर मजबूत आवाज आई----"राजीव जी वहाँ मैं देखती हूँ आप इधर आइये...। आपको हिन्दी के विभागाध्यक्ष श्री तोमर साहब याद कर रहे हैं।"

मैं चौंका। यह तो वही महिला थी जो प्रांगण में मेरे सामने से गुजरी थी। जिसे देख कर मुझे सरिता वर्मा का ध्यान आया। अब वह ध्यान और भी निरन्तर हो गया। इसकी तो आवाज भी सरिता जैसी है। कहीं यह वही तो नहीं ...। हाँ वही तो है। एकदम सरिता वर्मा। बाकी कमी उसकी  इस टिप्पणी ने कर दी जो मेरे अतीत को खोल रही थी ----"यह क्या है। आप अपने कैरियर के प्रति आज भी सचेत नहीं हैं ?"

मैं मुश्किल से ही उसे देख पाया। वह काफी सुलझी सँवरीथी। सुरुचिपूर्ण वेश में शालीन भी लग रही थी। यहाँ उसकी ऐसी स्थिति है कि उसकी आवाज पर ही निरीक्षक मेरे नकल प्रकरण को छोड़ कर उसके पीछे चला गया। मेरे लिये यह सब अप्रत्याशित था। और दिल--दिमाग पर पूरी तरह छा जाने वाला भी पर वह समय केवल परीक्षा देने का था। मैं कुछ समय सब कुछ भूलकर उत्तर लिखने लगा। लेकिन उसकी बात अन्त तक दिमाग में गूँजती रही।

परीक्षा देकर जैसे ही मैं बाहर जाने लगा ,एक आदमी ने मुझे पुकारा---"ओ भाई ,आपको वो मैडम बुला रहीं हैं। छह नं. वाले रूम में।"
उसी आदमी से मुझे पता चला कि सरिता यहाँ असिस्टेंट प्रोफेसर है। उसके पति भी इसी कालेज में ही हैं। वाह सरिता वर्मा कैसी हार उपहार में दी है तुमने। मुझे याद आया कि लड़के उसे मैडम क्यूरी , लैक्चरारनी , प्रोफेसरनी ..और न जाने किन किन नामों से नवाजते थे। जगदीश कहता---"इतना मत जलो ,मास्टरनी तो वह बन जाएगी।"

"अरे भाई जगदीश की बातें हैं ...वरना यह मुँह और मसूर की दाल..।"
मैं कक्ष में जाने में झिझक रहा था। किस मुँह से सामने जाऊँ। पुरानी बातें पीछे छोड़ भी दे तो इस हाल की बात पर क्या शर्मिन्दा न करेगी यह सरिता वर्मा।
"अरे नरेश भाई ,आओ। "

उसकी आवाज पर मैं फिर चौंक उठा। वह निश्छलता से कहे जा रही थी ---"मैंने तुम्हें देखते ही पहचान लिया। अन्दर आओ।" मैंने कृतज्ञता दिखाते हुए अभिवादन किया।
आप यहाँ ...वाह क्या बात है एकदम अप्रत्याशित। कहाँ वे सब विवाद और कहाँ आपकी यह पोजीशन...।
"अरे वह सब छोडो। यह बताओ पेपर कैसा गया ? कौन सा अटेम्प्ट है यह ?
"मैडम आखिरी है बस। देखते हैं...।"

"इस बार तो निकल जाओगे मेरा विश्वास है। लेकिन वह क्या मामला था जो भदौरिया जी कापी छीन रहे थे। उन्हें मैंने ही वहाँ से हटाया था।"
"उसमें मेरी गलती नहीं थी मैडम ..।"
"अरे, यह मैडम--मैडम क्या लगा रखी है ? मैं सरिता हूँ भाई। आपकी क्लासमेट। ..और उन लोगों के क्या हाल हैं ? मुंशी ,सुरेश ..जगदीश.. ओम..।"
"ये लोग बड़े शरारती थे-"--हँसते हुए उसने अपने पति को बताया---"दिमाग में जाने क्या-क्या चलता रहता था। असल में भविष्य के तय होने का समय भी वही होता है न !"

मैं अवाक् था। उसकी बातों में सहजता थी। कोई कटुता या मलाल नहीं था। आज भी अगर वह न होती तो....।
उस दिन मुझे लगा कि अचानक मेरा कद बहुत छोटा होगया है। बौना कहलाने लायक। मुझे एक बार फिर याद आया कि सुरेन्द्र जैसा लड़का भी सरिता वर्मा को अपने लायक नहीं समझता था लेकिन आज यह सच साबित हो ही गया कि उसके लायक वहाँ कोई था ही नहीं। न सुजानगढ़ के सर्वसम्पन्न और प्रतिष्ठित घर का ओम और न ही स्कूल भर में प्रिंस कहाने वाला मैं।

"रिजल्ट आए तो बताना जरूर---" ग्लानिबोध के साथ जब मैं पीछा छुड़ाता हुआ सा वहाँ से भाग रहा था ,उसकी आवाज मेरा पीछा कर रही थी।

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गिरिजा कुलश्रेष्ठ
मोहल्ला - कोटा वाला, खारे कुएँ के पास,
ग्वालियर, मध्य प्रदेश (भारत)

1 blogger-facebook:

  1. 'भविष्य के तय होने का समय भी वही होता है न !'
    ..सत्य है.
    कहानी के विषय में नयापन नहीं मिला ..लेकिन बुनावट है और
    प्रवाह भी .

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