बुधवार, 29 अगस्त 2012

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -65- चंद्रकांता की कहानी : कल्पतरु

कहानी

कल्पतरु

चंद्रकांता 

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उफ्फ़! कितनी गहरी पीड़ा है यह मानों तालाब के पार्श्व पर पानी और उसके भीतर मछली तड़प रही हो. तुम्हें कैसे समझाऊं सुवास !तुम्हारे होते हुए भी एकाकीपन का यह बोध ह्रदय की भीत पर हर रोज़ उठा-पटक करता है. तुम ही कहो! तब, तुम्हारे होने का क्या औचित्य है ?

यह संदिग्धता वश किया गया कोई आक्षेप नहीं है; बल्कि हमारे इस संबंध से साधिकार किया गया बेहद स्वाभाविक सा प्रश्न है ताकि हमारे भविष्य पर कोई प्रश्न-चिह्न ना रहे.. और ये मौन को पालना कहाँ से सीख लिया तुमने !यह तो तुम्हारा स्वभाव नहीं था !.जानते हो, तुम्हारा यह अपरिचित मौन रात-दिवस अट्टहास सा करता आता है जिसके अनचाहे आलिंगन से मैं बिंध कर रह जाती हूँ ..और तुम्हें भी तो भीतर ही भीतर तोड़-मरोड़ रहा है यह.. आखिर ऐसा क्या जो तुम मुझसे साझा नहीं कर सकते ?

जिस दिन भावनाओं के उफान से इस मौन का बाँध टूटेगा तुममें भी, तुम बाकी ना रहोगे. प्लीज़ चुप मत रहो! अब तो परिभाषित करो इस मौन को. सुनो! अब यह घाव बनकर रिसने लगा है.. पल्लव ने उस मौन की कठोर दीवारों को अपने जवाब दे चुके धैर्य से आच्छादित करते हुए कहा.

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रु. 15,000 के 'रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन' में आप भी भाग ले सकते हैं. अपनी अप्रकाशित कहानी भेज सकते हैं अथवा पुरस्कार व प्रायोजन स्वरूप आप अपनी किताबें पुरस्कृतों को भेंट दे सकते हैं. कहानी भेजने की अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012 है.

अधिक व अद्यतन जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

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कॉलेज के दिनों से ही साथ थे पल्लव और सुवास. दिल्ली यूनिवर्सिटी में इन दोनों का प्रेम हमेशा चर्चित रहा. आज प्रणय के सात वसंतों बाद भी उनके सम्बन्ध में वही ताज़गी और वही आकर्षण था जो उस वक़्त हुआ करता था .संघर्ष के तोड़ देने वाले दिनों में भी उनके विश्वास और समर्पण की दीपशिखा प्रज्ज्वलित रही. प्रणय निवेदन की तो कभी जरुरत ही ना हुई मन की भाषा से ही सब लिखा पढ़ी हो गयी थी दोनों के बीच.

सुवास एक बेहद सुलझा हुआ पुरुष था. गंभीर व्यक्तित्व किन्तु लड़कपन की छुअन जिसमें अभी तलक बाकी थी. मेल ईगो जैसे कुंठित सूत्रों से अनभिज्ञ सुवास किसी भी स्त्री की अभिलाषा हो सकता था.

मैं तुम्हें खुश रखना चाहता हूँ पल्लव ..तुम भी जानती हो..जानती हो ना! एक अजीब सी छट-पटा-हट से टकराते सुवास ने पल्लव से कहा. शब्दों का माप-तौल तो नहीं जानता लेकिन, तुम मेरे जीवन का आधार हो..मेरी प्रतीक्षा, मेरी प्रेरणा हो ..हाँ, सही कहा तुमने - मुझमें, मैं भी बाकी ना रहूँगा.

लेकिन, तुम्हारे मेरे जीवन में नहीं रहने पर यह जीवन एक विवशता बनकर रह जाएगा. तुम्हारे बिना मर तो नहीं जाऊँगा क्यूंकि, दायित्वों का अधिभार इतना है कि, मरने को भी स्वतंत्र नहीं हूँ. ..मैं तो स्थितियों के अधीन रंगशाला की कठपुतली बनकर रह गया रह गया हूँ. जिसे स्टेज पर अभिनय तो करना होता है किन्तु, संवाद में जिसकी कहीं कोई भूमिका नहीं. और हिलती-डुलती भी है तो है स्वेच्छा से नहीं परवशता से...

पल्लव ठीक से कुछ समझ नहीं पायी कि आखिर सुवास क्या कहना चाह रहा है. मन ही मन वह उन टूटे सूत्रों को जोड़ने लगी और सुवास से कहा –

‘ और मैं तुम्हारे जीवन में क्यूँ नहीं रहूंगी? आगे कहो सुवास, रुको नहीं कहते रहो..तुमहें भीतर ही भीतर घुटता देख बहुत दुःख होता है. मेरी चिंता नहीं करो आज अपने मन का समस्त भार मेरी पलकों पर उतार दो..’

पल्लव बहुत प्रयास किये लेकिन अंततः मेरा ट्रांसफर आगरा हो गया है अब वहीँ लेक्चररशिप करनी होगी और इधर माँ ने जिद पकड़ ली है कि बहन के लिए अपना कर्तव्य पूरा करो. पहले उसका ब्याह करो. और उन्होंने यह भी कहा कि 'मुझे तुम्हारा पल्लव से मिलना जुलना पसंद नहीं. घरेलू लड़कियों जैसी तो कहीं से नहीं दिखती वह..कपड़े पहनने का शहूर नहीं..कभी दुपट्टा लेते नहीं देखा उसे ..कल को बहू बनकर इस घर में आ गयी तो कहे देती हूँ एक गिलास पानी के भी मोहताज़ हो जायेंगे हम. दो क्लास पढ़-लिख क्या ली खुद को इंदिरा गांधी समझती है. न्याय दिलाती फिरती है लोगों को.

अरे! कल को कोई ऊँच-नीच हो गयी तो कौन जिम्मेदार होगा इसके लिए. खैर! मैं कौन होती हूँ तुम दोनों के बीच बोलने वाली. तुम्हारे बाबूजी चले गए एक दिन मैं भी चली जाउंगी इसी तरह. बस अपनी बहन के हाथ पीले कर दो फिर जो जी में आये करना'. .

इतना कहकर सुवास चुप हो गया और परिस्थितियों के समक्ष एक बेबस याचक की तरह पल्लव को निहारने लगा. पल्लव का सांवला रंग-रूप, किसी शिल्पकार की कूची से गढ़ी हुई उसकी गहरी काली मिटटी जैसी आँखें, बाहर परिवेश में आषाढ़ की दस्तक, घुमड़ते-बलखाते बादलों का शोर और उन्मादी बूंदों की खनक यह सब उसे और अधिक आकर्षक बना रहा था.

कभी तितली की तरह मचलती और चिरैया की तरह चहचहाती, गुड़िया सी दिखने वाली पल्लव अपना उत्तर पाकर भी एकदम शांत थी. जैसे बहुत लंबा सफ़र तय कर आई अल्हड़ हवा किसी तंग परबत पर आकर ठहर गयी हो.

कुछ क्षणों के लिए पल्लव भी मौन हो गयी. फिर ना मालूम क्या सोचकर बोली-

‘सुवास तुमने तेज़ बारिश के बाद आँगन में फर्श पर बाकी रह गए पानी को देखा है कभी ! उसमें आस-पास की जड़ता का जीवंत अक्स दिखाई देता है लेकिन जैसे-जैसे वह पानी सूखता जाता है कुछ देर पहले उसके भीतर दिखाई पड़ने वाला वह अक्स धुंधला होता जाता है और एक वक़्त बाद वहां कुछ भी शेष नहीं रहता. ठीक ऐसे ही हमारा मन-मस्तिष्क भी खूबसूरत रोमानी कल्पनाओं के सरोवर में मनचाही डुबकी लगाता है ..भीगता है.. और बीच-बीच में हवा का स्पर्श पाने से जब गीली देह सूखने लगती है तो शरीर कमल की पंखुड़ियों की तरह सिकुड्ने लगता है और कुछ क्षणों पश्चात वापिस अपनी चिर-नियत गति पा लेता है.’

हमारी तुम्हारी यह चाहना भी कुछ ऐसी ही है. जिसमें हमारे अभिसार के अमिट पलछिन हैं, कल्पनाओं की वह खूबसूरत मासूम दुनिया है जहाँ केवल हम-तुम हैं सोसायटी की कड़वी हकीक़त और उसके घुन चुके रिवाजों से सामना करने वाला वह आत्मविश्वास भी है जो हमें एक साथ रहने का आधार देता है .सुवास जीवन का आरोह-अवरोह कितना ही विचलित कर देने वाला क्यूँ न हो मैं तुम्हारे हर निर्णय में तुम्हारे साथ हूँ.. और साथ नहीं रह पाने से हमारा एक दूसरे के लिए प्रेम कम नहीं हो जाएगा.

सुवास हम तुम आपस में गुंथे हैं जैसे शब्द में भाव गुंथा होता है.

बीहड़ में खो जाने के डर से तुम्हारा खूबसूरत साथ छोड़ दूँगी यह ख़याल भी मन में नहीं लाना. मेरे लिए प्रेम सुविधा का नहीं समर्पण का नाम है.

अपनी धमनियों की आहट से अपरिचित सुवास एकाग्रचित हो पल्लव की हर एक बात उसके कहे एक-एक शब्द को ध्यान से सुन रहा था चेहरे पर कहीं कोई शिकन नहीं थी ..कोई प्रश्न नहीं था..मानो सांझ अपने सुरमई पंखों को क्षितिज पर फैलाकर धीरे-धीरे सागर की गोद में उतर रही हो और सागर उसके इस शिवत्व पूर्ण सौन्दर्य से अभिभूत होकर जड़वत रह गया हो.

...अनायास ही उसकी समाधि भंग हुई ..तेज़ हवा के झोंकों से खिड़कियाँ आपस में बज रही थीं हवा अपनी पूरी शक्ति से पर्दों के पीछे की तरफ धकेल रही थी..उसने देखा कि पल्लव उसके पास ही जमीन पर आकर बैठ गयी है..और बेहद इत्मीनान से उसने अपने दोनों हाथों को उसकी गोद में रखा हुआ है. जैसे कोई थक चुका पथिक किसी कल्पतरु का आश्रय पाना चाहता हो .सुवास ने भी पल्लव के हाथ थाम लिए और अपलक देखता रहा उसकी और.. मानों अपनी समस्त वेदना उन हाथों में उतार देना चाहता हो ..

शायद बहुत कुछ कहना चाहता था अपनी पल्लव से; उसे बताना चाहता था की समाज उनके बीच कहीं नहीं है लेकिन उसे कुछ वक़्त चाहिए उन सपनों को पूरा करने के लिए जो उन्होंने साथ बुने हैं.

एक और पहर बीत गया उन दोनों को इसी तरह बैठे हुए. अचानक पल्लव की देह में हरकत हुई और किसी पराजित वीरांगना की तरह उसने कहा..

‘चलती हूँ सुवास. तुम्हारे मौन पर तुम्हारा स्वत्व, मुझे संवाद की ये आड़ी-तिरछी शिलाएं लांघने की इजाजत नहीं देता. तुम्हें समझती हूँ, तुममें खुद को जीती रही हूँ अब तक ..और कुछ कहने की जरुरत नहीं लेकिन एक निवेदन है तुमसे अपनी इस विवशता के लिए कभी खुद को कटघरे में मत रखना. जानते हो! प्रेम की सार्थकता एक साथ रहने से कहीं अधिक उसे निभाने में है..

कभी वक़्त के नियत पृष्ठों के उस पार मिलना तुम्हें तुम्हारे हिस्से की गुनगुनी धूप लौटानी है.. और पल्लव ने सुवास की भीगी पलकों पर अपनी नरम गुलाबी अधखुली पंखुड़ियों को स्पर्श करते हुए कहा तुम्हारे साथ थी..साथ रहूंगी. .लेकिन अभी जाने की इजाजत दो..भोर होने ही वाली है ..’

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लेखिका का नाम:चंद्रकांता
परिचय:स्वतंत्र लेखक,चित्रकार,सोशल एक्टिविस्ट
पता:आर.के.पुरम दिल्ली.
ई मेल :chandrakanta.80@gmail.com

3 blogger-facebook:

  1. Chandrakanta, you have portrayed an inspiring piece of reality on a very motivational note through which no one knows how many lives will potentially be impacted. The story very quietly outlines integrated simplistic yet soulful beauty hailing the sublime nature of love.

    What most impressively took me aback is how mellifluously reality found its way on a successful note.

    Wish, you keep on writing evermore, to let the literature-love be emblazoned.

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  2. बहुत कठिन शब्‍दों का इस्‍तेमाल किया गया है। कहानी विकसित होने से पहले ही टूट रही है। लेकिन मैंने पहली बार तुम्‍हारा लिखा गद्य पढा । प्रयास के लिए बधाई । लेकिन ईमानदारी की बात यह है कि और मेहनत की जरुरत है।

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  3. कहानी जटिल है । शुरू होने से पहले ही टूट गयी है कहानी। और मेहनत की जरुरत है। मैं जानता हूं कि तुम्‍हें लिटरेचर की समझ है और स्‍त्री आंदोलनों की । और काम करो

    उत्तर देंहटाएं

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