बुधवार, 15 अगस्त 2012

पूरन सरमा का व्यंग्य : अंधेर नगरी और चौपट राजा !

व्‍यंग्‍य

अंधेर नगरी और चौपट राजा !

पूरन सरमा

लम्‍बे समय से उस नगर की बिजली कटौती के कारण नहीं आ रही थी। अंधेरे के जीव अंधेरे का फायदा उठाकर अपने करतबों को अंजाम दे रहे थे। चोर, उचक्‍के और बदमाश अपनी-अपनी कलाओं में सफाई ला रहे थे। अंधेरे का फायदा उठाकर ही उस नगरी का राजा गहरी नींद में सो गया था और बचा कोतवाल उसकी आंखों में भला नींद कहां ? वह भी अंधेरे के कारण सो नहीं पा रहा था। चोर, उचक्‍के और बदमाश सक्रिय हो तो उसकी आंखें नींद कैसे ले सकती थीं। वह सबकी खबर लेकर अपनी जेबें गर्म कर रहा था। गलती से मैं जा फंसा उस अंधेरे नगरी में। घुप्‍प अंधेरा और उसमें किसी ने मेरे ऊपर टार्च का उजाला फेंका और बोला-‘रूक जाओं। कौन हो तुम ?'

मैं हक्‍का-बक्‍का था। समझ में कुछ आ नहीं रहा था, तब तक वह मेरे और नजदीक आ गया और बोला-‘कहीं तुम डकैत तो नहीं हो।' मैंने अपना मतदाता पहचान पत्र निकाला और बोला-‘मैं इस देश का जिम्‍मेदार नागरिक मुसद्दी लाल हूँ।' इस बार उसने पूछा-‘जानते हो, मैं कौन हूँ।' मैंने कहा-‘नहीं सर, मैं शहर में नया हूँ। आपको नहीं पहचानता। आप अपना परिचय दीजिये। आपका परिचय पाकर मुझे हार्दिक प्रसन्‍नता होगी।' मैंने अंधेरे में उसे गौर से देखा, घनी मूंछों में अटा उसका चेहरा रौबीला तथा हाथ में डण्‍डा था। वह बडे़ रौब से बोला-‘मुसद्दी लाल मुझे पहचानो मैं इस शहर का कोतवाल, घासीराम कोतवाल हूँ।'

मैंने कहा-‘नाम तो जाना-पहचाना लगता है। लेकिन सर आप इस रात्रि में कहाँ भटक रहे हैं ?' घासीराम कोतवाल बोला-‘मैं मुसद्दी लाल की तलाश में निकला था और मुसद्दी लाल मिल गया। मैं भटक नहीं रहा मूर्ख, मैं शहर की रक्षा में आंखों की नींद उड़ाकर महाराज चौपट सिंह का राज-काज संभाल रहा हूँ।' मैं डर गया और घिघियाता सा बोला-‘सर, मैं यहाँ ठहरने के लिए किसी धर्मशाला की तलाश में हूँ। जहाँ यह अंधेरी रात गुजार सकूं।' घासीराम कोतवाल हंसकर बोला-‘धर्मशाला नहीं, तुम पहले थाने चलो। तुम्‍हारी तलाशी लेनी है। एक बदमाश अभी एक अमीर आदमी को लूटकर चम्‍पत हो गया है। वह कहीं तुम तो नहीं हो। चलो मेरे साथ थाने, वरना यहीं चमड़ी उधेड़ दूंगा। देखा नहीं है तुमने घासीराम कोतवाल का डण्‍डा। सच बताओ तुम इस अंधेरी रात में निकले कहाँ से हो ?' मैं बोला-‘सर, मैं तो पास के गांव से आया था। आते-आते रात हो गईं। मैं एक सज्‍जन और ईमानदार आदमी हूँ। आप मुझ पर खामख्‍वाह शक कर रहे हैं।'

‘हम ठहरे पुलिस वाले, हम शक के बिना पर अपराधी तक पहुंचते हैं, चलो थाने तुम्‍हारा मतदाता पहचान पत्र मुझे नहीं, चौपट सिंह महाराज को बताना।

उन्‍हीं को दिया है न, तुमने अपना वोट।' घासीराम कोतवाल अड़ा हुआ था। हारकर मैं उसके साथ थाने आया तो वहाँ एक सिपाही मोमबत्त्‍ाी जलाकर खड़ा था। मोमबत्ती के उजाले में मेरा चेहरा देखकर घासीराम कोतवाल बोला-‘अब बताओ तुम्‍हारी जेबें।' यह कहकर कोतवाल ने मेरी जेब में हाथ डालकर मेरे पैसे निकाल लिये और बोला-‘कहाँ से लाये तुम यह पांच सौ के पन्‍द्रह नोट ?' मैंने कहा-‘मैं शहर में खरीद-फरोख्‍त के सिलसिले में आया हूँ। मेरी परचूनी की दूकान है। उसी का सामान ले जाना है।' घासीराम कोतवाल ने मेरे उत्त्‍ार को सुनकर मेरी टांगों पर एक जोरदार डण्‍डा जड़ दिया। मैं दर्द के मारे चीख पड़ा और वह आंखें चौड़ी करके चिल्‍लाया-‘सच बता इस अंधेर नगरी और चौपट राजा के राज्‍य में आया कैसे ?' मैंने लाख मिन्‍नतें कीं, लेकिन घासीराम कोतवाल ने मेरा हुलिया बदल दिया और अंत में मेरे रूपये अपनी जेब के हवाले करके बोला-‘भग जा, अगर शिकायत की तो मैं हाल और बेहाल कर दूंगा।'

मैं लुट-पिटकर चौपट राजा के यहाँ पहुंचा तो दरबान उंघ रहे थे और पहरेदार सो रहे थे। मैंने एक को जगाकर अपनी व्‍यथा सुनाई तो वे बोले-‘जाओ तुम्‍हें लूटा है तो घासीराम कोतवाल से मिलो।' मैंने कहा-‘मुझे लूटा ही घासीराम कोतवाल ने है। अपनी फरियाद लेकर मैं चौपट राजा के पास आया हूँ। मेरी फरियाद उन तक पहुंचाओ।' पहरेदारों ने कहा-‘बकवास करते हो। घासीराम जी पर आरोप लगाते हो।' यह कहकर पहरेदारों ने भी पांच-सात डण्‍डे मुझ पर बरसा दिये और कहा-‘भाग जाओ, महाराज सो रहे हैं और कोतवाल जाग रहे हैं।' वहाँ से मैं इतने जोरों से भागा कि हांफकर गिर पड़ा और बेहोश हो गया। होश आया तो मैं एक बंदीगृह में पड़ा हुआ था। बिजली अभी भी नहीं आई थी। सब तरफ अंधेरा था, एक खौफनाक अंधेरा। जिसमें चेहरे पहचानना मुश्‍किल था।

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(पूरन सरमा)

124/61-62, अग्रवाल फार्म,

मानसरोवर, जयपुर-302 020,

(राजस्‍थान)

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