बुधवार, 22 अगस्त 2012

रमा शंकर शुक्ल का कविता संग्रह : ईश्वर खतरनाक है

ईश्‍वर खतरनाक है

(कविता संग्रह)

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    डॉ0 रमा शंकर शुक्‍ल
 
 
 
 
तुभ्‍यं एव समर्पयेत्‌
 
 
अजीब सा माहौल है वेद ने कहा-‘चरैवेति-चरैवेति‘। चलते रहो, चलते रहो। अब कोई चलता नहीं, सब दौड़ते हैं। नया वेद लिखा जाय तो कहा जायेगा- ‘दौड़ैवेति-दौड़ैवेति‘। दौड़ते रहो, दौड़ते रहो। दौड़ना ही जिन्‍दगी है। इतना दौड़ो कि सुबह-शाम, रात-दिन, खान-पान की भी सुधि न रह जाये। खाते-खाते दौड़ो और दौड़ते-दौड़ते खाओ। हंसना, बोलना, बतियाना, सोना, रोना, पूजा-पढ़ाई; सब दौड़ते हुए करो। रुके कि सब कुछ समाप्‍त। यही युगधर्म है। किसी के पास फुर्सत नहीं। दौड़ के सामान लगातार सस्‍ते होते जा रहे हैं। सूचना क्रांति का जमाना है। फोन की कॉलें सस्‍ती-दर-सस्‍ती होती जा रही है। अब साइकिल देखकर कोई चौंकने वाला नहीं। कार देखकर भी नहीं। लखटकिया का इंतजाम हो चुका है। आगे और भी सस्‍ती कारें आयेंगी। बल्‍कि एक पर एक फ्री मिलेंगी। पचास हजार में आप चाहें तो पूरा घर एक से एक खूबसूरत देसी-विदेशी सामानों से भर दीजिए। अभी और विकास होगा। कारें सड़कों पर उड़ेंगी। क्षुधा भरने के सामान महंगे हो रहे हैं तो होने दीजिए। हमारे वैज्ञानिक उसका भी इंतजाम कर देंगे। भूख न लगने वाली टेबलेट वे तैयार कर चुके हैं। आपको कुछ नहीं करना है। केवल दौड़ना है। दौड़ना है जानने के लिए, मारने के लिए, लूटने के लिए, चमकने के लिए, चमकाने के लिए, बैंक-बैलेंस के लिए, पड़ोसी को परेशान करने के लिए, मकान के लिए, दुकान के लिए, आन-बान-शान के लिए।

 

इतना दौड़ना है कि सब कुछ भूल जाये रिश्‍ता, नाता, परिवार, घर, नींद, नारि, भोजन- सब। दौड़ना है कि पछाड़ना है। एक के बाद एक-सब को। याद करने का काम मशीनें कर रही हैं। गांव-जवार अभी बचे हैं। आगे नहीं बचेंगे। रोबोट वहां भी होगा। कक्‍का, मक्‍का, भौजी का धक्‍का, सरसो का साग, बिल का नाग, फुन्‍नन का चैती राग, चूल्‍हे में सुरक्षित कई घरों की आग, ढोलक की थाप पर होली का फाग- सब इतिहास के विषय बन जायेंगे। आने वाली पीढि़यां उन्‍हें पढ़कर हंसेगी। कहेंगी, कितने पिछड़े थे हमारे पूर्वज। अब एक घर और उसमें बीस लोगों का बसेरा नहीं होगा। अब बीस बसेरा होगा और उसमें एक आदमी रहेगा। कभी यहां-कभी वहां। मम्‍मी के घर और रहेंगे, पापा के घर और। बड़ी बात नहीं होगी कि शीघ्र ही पापा जैसा दिखने वाला आदमी अंकल न होकर मम्‍मी हो। शादियों की जरूरत भी नहीं होगी। स्‍त्रियों को पुरुषों और पुरुषों को स्‍त्रियों की जरूरत नहीं रह जायेगी। वे अपना काम चला लेंगे। दोनों की तृप्‍ति के सामान बन चुके हैं। अब किसी की धमनियों में सीधे-सीधे लहू की धार उन्‍माद में नहीं भरेगी। अब तो सीडी लाइए, काम क्रीड़ा के बहुविध क्रिया-कलाप देखकर धमनियों को जगाइए।


चारों तरफ विकास हो रहा है जिनको करने का सऊर है, वे करेंगे नहीं। वे केवल सोचेंगे। लिखेंगे। छपेंगे। सीधे नहीं तो जोड़-तोड़ से। करने का काम उनका, जो कमजोर हैं। विवश हैं। कलम की दुनिया का गैंग अपना है। उसके अपने-अपने बाहुबली हैं। शब्‍द खिलौना हैं। खेल रहे हैं। जैसे लंगड़गुडिया, तास के पत्‍ते, शतरंज, क्रिकेट, जुआ। वैसे ही शब्‍द। शब्‍द नचाएंगे, हंसाएंगे, रुलाएंगे, सुधारेंगे, दंगे करवाएंगे, पैसा दिलाएंगे, पांव-पैरी करवाएंगे। पूरा जमाना शब्‍दों पर चलेगा। शब्‍द के कमाल सामने हैं। कक्षाओं में, परीक्षाओं में, चुनावों में, मठों में, सठों में- सब जगह शब्‍दों की सत्‍ता। बोलो, लिखो, फेंको- सब जगह धन ही धन। शब्‍द पसीने पर भारी, खून पर भारी, तेल, लकड़ी-नून पर भारी। शब्‍द ब्रह्‌म, शब्‍द पेटीकोट, शब्‍द साड़ी। जिसके पास शब्‍द है, वह धनी, मानी, जिसके पास नहीं है व बिल्‍ली खिसियानी। शब्‍द का प्रयोग वह भी करेगा, लेकिन बेकार हो चुके, सड़क पर फेंके हुए, नालियों में पड़े हुए अपशिष्‍ट शब्‍दों से। आप उसे गाली कह रहे हैं, कहिए। उसका काम तो चल रहा है न। देश की नब्‍बे फीसदी आबादी इन्‍हीं अपशिष्‍टों से ही काम चला रही है। रेल-वे पर फेंकी हुई रोटियों से पागलनुमा लोगों का भरण-पोषण हो रहा है कि नहीं। जो फेंकेगा, वह बुद्धिजीवी। जो फेंका हुआ पायेगा, वह पागल। वह गरीब। वह बेचारा। उसके पास आखिर क्‍या है चारा


यही हाल है आज का आज के समाज का। सरकार और राजकाज का। डा0 सुधाकर उपाध्‍याय कहते हैं धरती बूढ़ी हो गयी है। ब्रह्‌मांड बूढ़ा हो गया है। नदी-पहाड़-जंगल-झरने बूढ़े हो गये हैं। समाज बूढ़ा हो गया है। संवेदनाएं बूढ़ी हो गयी हैं। उन्‍हें उम्‍मीद है कि प्रलय जल्‍द होगी। सब कुछ तहस-नहस हो जाएगा। फिर से नये ब्रह्‌मांड का निर्माण होगा। संभव है ऐसा हो। बूढ़े आदमी की निजी स्‍वीकार और प्रतिरोध की ताकत चुक जाती है तो उसे मशीनों, उपकरणों, दवाओं, बोतलों के सहारे जिन्‍दा रखने की कोशिश की जाती है। लेकिन इस निराशा की दरकार नहीं। बूढ़ा आदमी भी तो एक उम्‍मीद में जीता रहता है। भले ही मौत सामने क्‍यों न हो। सुनते हैं कि कोई एक ऊपर वाला है, जो सबका सब कुछ देखता, जानता, सुनता, गुनता, समझाता और बताता रहता है। जरूर होगा। बल्‍कि यूं कहें कि वह है। है नहीं तो खेल कौन रहा है। हम नहीं चाहते हैं तो भी उसे कर जाते हैं। वह अच्‍छा इसलिए बनाता है कि बुरा बेचैन रहे। बुरा इसलिए बनाता है कि अच्‍छा रोये। वह किसी को मिला या नहीं, पता नहीं। हमें तो रोज मिलता है और बताता भी बहुत कुछ है। बहुत कुछ बताया भी है। लेकिन यह नहीं बताया कि प्रलय किस तारीख को होगी। न ही उसने ऐसा कोई संकेत किया है। उसने केवल इतना ही कहा है कि अगर जीना है तो अपनी अंतरात्‍मा को अपने से अलग कर दो। कक्षाओं में पढ़ाओ मत, केवल वेतन लेते जाओ। लड़ो वेतन पाने को, बढ़ाने को, खाने और कमाने को। ठीक है कि तुम राष्‍ट्र-निर्माता हो, लेकिन यह जरूरी नहीं कि निर्माता सब काम स्‍वयं करे। वह अपने आदमी रखकर भी तो काम करा सकता है। जिसके पास जितने काम करने वाले, वही बड़ा। वही मास्‍टर। जिसके पास नहीं, वह टुटहा-छलनी कनस्‍टर।


हरिवंश राय बच्‍चन मरने के एकाध साल पहले एक कविता लिख गये थे- गूंगा गावे, लंगड़ा नाचे, बहिर बलैया लेइ। देश की रीति यही है। जिसके पास जिसकी ताकत और इच्‍छा नहीं है, उसे वही काम सौंप दिया गया है। जो नौनिहालों को पढ़ाए नहीं, बल्‍कि चराये, वह मास्‍टर। जो बनाने में बिगाड़े, धन अपने घर में गाड़े, वह इंजीनियर। जो रोग पैदा करे वह डाक्‍टर। जो समस्‍या बढ़ाए वह अधिकारी। जो पति के खिलाफ षड्‌यंत्र करे वह प्राण प्‍यारी। सच पर पर्दा डालने में माहिर तो बड़ा वकील। जिसके पास शब्‍दों की तमीज नहीं, वही पी-एचडी और डी․ फिल․। जमाने के इसी दस्‍तूर में चल रही है कविता। कविता बह रही है। और केवल बह रही है। इतना कि कदम-कदम पर वही बह रही है। समझदार लोग उससे नहा रहे हैं, खा रहे हैं, खरीद रहे हैं, बेच रहे हैं। ठाट-बाट है। रजाई-तोषक और आलीशान खाट है। जो नासमझ हैं, वे रो रहे हैं। सबको जगाना चाहते हैं और खुद सो रहे हैं। कविता पर बहुतों के पेटेंट है। प्रकाशकों से सांठ-गांठ ऐसी कि आम आदमी के लिए वह करोड़ों का टेंट है। किसी के लिए बदबू और किसी के लिए सेंट है। लेकिन फुरसत कहां। इस बहती चीज को भरने के लिए। पिलाने के लिए। बोतल में होती तो बात भी कुछ बनती। पीने से आदमी ठंडा हो जाये तो उसकी क्‍या कीमत। कीमत तो तब जब बारास्‍ता बोतल हलक में उतरे। मिजाज बदले। जो चाहे, सो करवाए। हंसाए, नचाए, गवाए․․․․․․․․․․․․․․․․․․।

 

मैंने जरूरत के हिसाब से बहती कविता को यथावत रख लिया है। लाख कोशिश के बाद भी उसमें उन्‍माद नहीं भर पाया। इसलिए वह जैसा है, वैसा ही आपको अर्पित कर रहा हूं। त्‍वदीयं वस्‍तु मानवस्‍त्‍वं, तुभ्‍यं एव समर्पएत
                                  
 
 
डॉ. रमा शंकर शुक्‍ल
 
 
 

 

वरदान


मां, आज अपनी वीणा से
उठाओ एक ऐसी तान कि
सारा जग विकल हो जाये
हृदय अपनी नीचता पर शरमाए।
मुरझाए चेहरे खिलें
हर दग्‍ध हृदय हिमालय हो जाये।
तुम्‍हारी सुर-लहरी
जन-जन तक पहुंचे
हर सोई बुद्धि जग जाये
फैले आदिगंत चेतन प्रकाश
सूखी आंखों में पानी आये
बहती आंखों का पानी रुक जाये।
बच्‍चों का हो वापस बचपन
मिले चिपकी अंतडि़यों को रोटी
हर हाथ को काम मिले
महल-झोपड़ी का अंतर मिट जाये।
मानव केवल मानव बन जाये
रिसियाए परदेशी घर लौटें
हर बेहोश लेखनी थिरक पड़े
हम आतंक के मुकाबिल
हों डट कर खड़े़।
 
 
 

ईश्‍वर खतरनाक है

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सभा खचाखच भरी थी
लोग उत्‍सुक
कि अभी-
बाबा कबीर आयेंगे
ईश्‍वर का मर्म समझाएंगे
मुक्‍ति की राह बताएंगे।
और सुना है कि वे
अनहद नाद सुनाते हैं
जड़हीन कमल से
अमृत झरवाते हैं
ईश्‍वर से सीधे मिलवाते हैं।
अचानक फुसफुसाहट
शांत रहो, शांत रहो
बाबा आ रहे हैं।
सूखी लकड़ी-सी देह
चोंगे सी दाढ़ी
लाल-लाल सुर्ख आंखें
खिली हुई बांछें।
ताल ठोंक कर बोले बाबा -
अरे, जो देख रहे हो
वह सच नहीं है।
जो सोच रहे हो
वह भी सच नहीं।
जो कर रहे हो
वह तो एकदम सच नहीं।
जोर लगाओ
ईश्‍वर को देखो
बाहर नहीं
अंदर देखो
महसूस करो
और बताओ वह कैसा है ?
वह जैसा होगा
वहीं सच होगा।
 
खूब होड़ मची
सबने धकाधक आंखें अंदर धंसाई
सबने अलग-अलग देखा
सबने अलग-अलग सुनाया।
मोटे पट्‌ठे ने देखा
ईश्‍वर डंड मारता पहलवान।
कर्जदार ने देखा
सूद खाता बेईमान।
बच्‍चे ने देखा
ऐनक चढ़ाए मास्‍टर।
रोगी ने देखा
नस्‍तर उठाए डाक्‍टर।
उसको
भरी अटैची वाला धनवान
उसे
परदेशी प्रिय का पैगाम
उन्‍हें
जूहू की गुलाबी शाम
और उनको
अचानक मिले उधार के दाम।
मच गई सभा में भगदड़
हर कोई कहता
सच मैंने देखा।
दूसरे ने किया प्रतिवाद
नहीं, सच मैेंने देखा।
सबके अलग-अलग सच टकरा बैठे
लोग लाठियों से लहूलुहान हो बैठे।
सब्र टूट गया बाबा का
चिल्‍लाए-
रुको,
मैं बताता हूं
तुम्‍हारी सोच नापाक है
सच एक है
ईश्‍वर खतरनाक है।
 
 
 
 

रोज मिलता है भगवान


हमारे-भगवान के बीच में
तुम्‍हारी क्‍या जरूरत है भाई।
क्‍यों दौड़े चले आ रहे हो
क्‍या वहां से है कोई चिट्‌ठी आई ?
 
अच्‍छा, सच-सच बतलाना
तुम्‍हारी भगवान से भेंट हुई ?
किसी मुक्‍ति की बात सेट हुई।
कैसे हैं वे, कहां रहते हैं
आदमी से मिलने पर क्‍या कहते हैं ?
क्‍या उन्‍होंने तुमसे ‘घर‘ फूंकने को कहा ?
तुमने फूंका ?
रेमंड का भगवा फेंका ?
सैलून में दाढ़ी कट करानी छोड़ी ?
मठ से अपनी मां, बहन, भतीजे को निकाला ?
करोड़ों का बैलेंस जरूरतमंदों में बांटा ?
एसी सफारियां, कारें, सोने के सिंहासन त्‍यागे ?
यदि हां, तो आओ, बैठो।
हाल-चाल करें
प्रवचन नहीं कर्म-ताल करें।
पेड़ तले सोएं, हाथ पर खाएं।
कलुई कई बार लुट चुकी है
चलो उसका व्‍याह करें।
विजयी की फीस जमा करें
भूलन को दवा
और बेफनी को धोती पहुंचा आएं।
आओ अपने में देखें इनसान
कुत्‍ते में भगवान
मूर्खता के खिलाफ छेड़ें निर्णायक अभियान।
तुम क्‍या सोचते हो
मैं हूं अनजान
अरे मुझसे रोज मिलता है भगवान।
 
 
 
 

राम को चिट्‌ठी!


मेरे त्राता राम !
आओ एक बार फिर भारत में
मगर सावधान!
राक्षस जान चुके हैं तुम्‍हारे हर दांव
हुनर, ज्ञान, कला
तीर-तरकश-बला।
वे चौकन्‍ने हैं।
बड़े-बड़े कान
बड़ी-बड़ी आंख
तीखे-लंबे नाखून
और रक्‍त सने दांत
अब वे नहीं रखते।
तुम्‍हारे जमाने में राक्षस ईमानदार थे
वे जो होते थे, शक्‍ले भी वैसी ही रखते थे
तब तुम आसानी से पहचान लेते थे उन्‍हें।
मगर, मेरे राम!
अब उन्‍होंने सीख ली है
कालनेमि से माया की सारी विद्या
अब वे संत-महंत लगते हैं
राक्षस सांझ ढले कर देते थे युद्ध विराम
अब वे रात भर हमले करते हैं।
राम वे हैं केवल कुछ हजार
पर पूरी जनता कर रही हाहाकार।
राम यहां आने के पहले
मेरी चिट्‌ठी एक बार जरूर पढ़ लेना।
शायद इससे उन्‍हें पहचानने में कुछ मदद मिले।
वे हनुमान के वेश में
पशुओं का चारा खाते हैं
एक ही छल्‍लांग में
पटना से दिल्‍ली फांदते हैं।
आपके वृद्ध जामवंत ने
कालनेमि से दोस्‍ती कर ली है
सीता को रावण के हाथ बेच दिया
और उनके कब्‍जे में पूरी बस्‍ती है।
रावण दो भाइयों के साथ
अयोध्‍या में मंदिर बनवा रहा है
और तुम्‍हारे हुजूम के साथ
संसद पर कब्‍जा करवा रहा है।
एक बात और राम-
वे जो असंख्‍य वानर-भालु
तुम्‍हारे लिए मरे थे
उन पर अब
अमृत छिड़कने की भूल मत करना।
आपके अमृत से वानर-भालु
पड़े रह जाएंगे
और राक्षस उठकर जश्‍न मनाएंगे।
वृद्धों के बारे में भी भ्रम न रखना
उन्‍हें कुर्सी और सुरकी
दोनों का रोग है
उनके रामायण में
महाभारत का योग है।
 
 
 
 

भग्‍न मूर्तियां


जीवन के उजड़ग्राम को भी
बना देंगे वे कविता की शाम
आप भीष्‍म-से सरसाई होकर
जोहते रहिएगा मां की धारा।
जब मैं पहली बार बसंत हुआ था
तब नहीं मालूम था कि
अचानक एक दिन मैं
जेठ की दुपहरी हो जाऊंगा
जहां हर आदमी मुझसे चौकस होकर
पेड़ों की छांव खोजने लगेगा।
हर मौसम में लगातार चलने वाली
त्रासदी की तरह
मैं अचानक हर घर में
दाखिल हो जाऊंगा
और लोग, मारे दहशत के
मेरी चर्चा के बाद
ईश्‍वर से सलामती की दुआ मांगेगे।
इसके पहले मैं पत्‍थर की एक मूरत था
और बहुत खुश था
तब मैं आस्‍था का केंद्र था
यह कहानी आज की है
जिसे कल ही एक औरंगजेब तोड़ गया है
और भग्‍न मूर्तियां
हिन्‍दू नहीं पूजते।
 
 
 

धरती पर


बड़ी मौज से
वहां जी रहा था मैं
एक दिन
धरती पर हो गया ट्रांसफर
आदेश था- ‘जा, वहां कुछ कर‘।
मैं लेने पहुंचा हुक्‍म
उस दरबारे खास।
वहां गाड भी थे
अल्‍लाह भी थे
और राम भी।
तीनों ने एक ही बात प्‍यार से समझाई
बेटा, वह धरती है
जरा संभल के रहना
वह जो आदमी है न!
उसकी तीन हाथ की आंत
और तीन अंगुल का सीना है।
तुम्‍हें दो जुबान रखकर
उन्‍हीं के बीच जीना है।
एक उनके लिए और
एक उनके पड़ोसी के लिए।
ऐसे संभाल कर रखना पांव कि
घाव तन पर कहीं न लगें
संवेदनाएं भले ही रोज बेमौत मारी जाएं।
वह धरती है
वहां मौत के बाद पूडि़यां खाने का रिवाज है।
मौत चाहे देह की हो या फिर संवेदनाओं की
तेरही जश्‍न के साथ मनाई जायेगी।
 

बहिन जी


बहिन जी, बहिन जी
इत्‍ते रुपये !
किसने दिये
कहां से आये ?
बंजर कोख में
किसने फूल खिलाए ?
 
बहिन जी,
क्‍या थे बाप और क्‍या हो गयीं आप
बजाती थीं बीन और खुद हो गयीं सांप ?
मैं नहीं, पूछ रही थी धनिया
बट्‌टू, भगनी, झलरी, मुनिया।
खूब दक्‍खिन से आया हूं
कल सुबह से खाया हूं।
 
बहिन जी, बहिन जी,
कहां हैं बच्‍चे, कहां हैं जिज्‍जा।
वे ताक रहे हैं रोटी-नीमक
आप खा रही लखनऊ में पिज्‍जा।
कैसे हो गयी इतनी मोटी
कौन है ताकत वाली रोटी
वहां तो अब भी चलता झगड़ा
अब भी गरियाता बांभन लंगड़ा।
चिलरू पासी उसका साथी
बांध लिया दरवाजे हाथी।
दोनों मिलकर हो गये एक
मिल खाते हैं रोटी सेंक।
जात-पांत सब ऊपर की बातें
नीचे सब में रिश्‍ते-नाते।
सोते संग, जगते संग
खेतों में हगते एक संग।
न कोई बाबा, ना कोई राम
मिलकर सब करते हैं काम।
बस, जिनके पाकिट में है पैसा
वही है समझो आन्‍हर भैसा।
 
 
 

पत्रकार हूं


पत्रकार हूं
अभी लिख दूंगा।
 
गाय लिखूंगा, भैंस लिखूंगा
दारोगा का तैश लिखूंगा
रिश्‍वत का कैश लिखूंगा
जो जी में आये लिख दूंगा।
 
मैं कलम का गुंडा
शादी के पाहुर का कुंडा
दिवान के हाथ का डंडा
धकियाऊं जैसे विन्‍ध्‍याचल का पंडा।
हर गले का हार हूं और
ताबीज का गंडा
लालू को हरिश्‍चंद्र लिखूंगा
मदर टेरेसा को परचंडा
क्‍या कर लोगे बंडा ?
 
नमस्‍कार पर नहीं खुश होने वाला
चाय-पान पर मुस्‍काता हूं
दारू संग सिगरेट मिले तो
हर धरम पार कर जाता हूं।
कौन प्रेस से मिल जाता है
माह के माह माल-खजाना
और पहचान-पत्र से पानी-दाना
अगर न बुनूं ताना-बाना
तो दिन भर बच्‍चों के फांके
रात को बीबी का गाना।
 
कलम की नोंक पर वर्दी लटकाता हूूं
बंधी-पुल, सड़क-स्‍कूल बनवाता हूं
महंगी-सी कार पर प्रेस लिखवाता हूं
और सीट के नीचे रख हेरोइन बिकवाता हूं।
कोई काम असंभव नहीं मेरे लिए
नियम होता है, होगा
जिसके लिए, उसके लिए।
मैं बनवाऊं हवेली वाले का इंदिरा आवास
कहो तो रोक दूं भारत सरकार की सांस।
 
कैसे नहीं मानेगा अधिकारी
कह कर रात भर कल्‍लू से तेल लगवाता हूं
पटाखे में बम की खबर छापकर
सारी रात बस्‍ती वालों को जगवाता हूं।
मैं बड़े-बड़ों की ऐसी की तैसी कर दूं
सोनिया को राबड़ी
और राबड़ी को सोनिया जैसी कर दूं
अरे मैं तो हर दरबार की आंत काढ़ू
पहूंच में हूं नारद का साढ़ू
पाकेट न करो मालामाल तो घोटाला दिखाऊं
भरो झोली तो करोड़ों का घपला जमीन में गाड़ूं।
 
काम कराने के है मेरे पास
तरह-तरह के हथकंडे
भला वैसा क्‍या काम निकालेंगे
पुलिस के डंडे।
पहले आंख दिखाऊंगा
किसिम-किसिम के कानून बताऊंगा
जांच और कोर्ट के दरवाजे दिखाऊंगा
उसकी भ्रष्‍ट जन्‍म कुंडली पकड़ाऊंगा।
तब भी नहीं बन पाया काम
तो लेकर हरि का नाम
रिठियाए दांत चियारूंगा
आंसू से पांव पखारूंगा।
उसके सात पुश्‍त को बना दूंगा भगवान
लिख दूंगा-
सब फर्जी इलजाम हैं
साहब तो बड़े महान हैं।
 
 

बैल और किलहटा


 
आप
महान हैं
विद्वान हैं
बलवान हैं
गुरू हैं
इसीलिए शुरू हैं।
मैं तुच्‍छ हूं
लघु हूं
जिज्ञासु हूं
घूरू हूं
इसीलिए सुरखुरू हूं।
आप बैल हैं
मैं किलहटा।
आप खीरा
मैं अरहर का पेंहटा।
 
आप आत्‍ममुग्‍धता की गुनगुनी धूप में
पसरे रहते हैं
मैं सराहना के नुकीले चोंच से
आपके देह से चिपकी
भ्रम की किलनी को
घंटों काढ़ता रहता हूं।
मग्‍नानंद की इस तुरीयावस्‍था में भी
आप कहते हैं-
‘अहा, बहुत सुंदर!
लगे रहो ऐसे ही
तुम्‍हें शीर्ष पर पहुंचाकर ही दम लूंगा।‘
मुझे मालूम है
इस आशीष के पीछे की धमकी
कि-
तुम ऐसे नहीं लगे रहोगे
तो
तुम्‍हें मिट्‌टी में मिलाकर ही दम लूंगा।
 
 
 

ईमान बहाल है


अब देश सभ्‍य हो चुका है
खूब खाता और खूब पहनता है
इतना कि शरीर का कोई कोना
खुला नहीं दिखता
फिर भी वह पूरा का पूरा नंगा है।
नंगा होना आदमी की लाचारी नहीं
उसके कमीनेपन की बरक्‍कत है।
 
दोस्‍तों की आश्‍वस्‍तियों में
मदद की टोह लेकर
थका हुआ आदमी
जिन्‍दगी के फैसले पर करता है पुनर्विचार
और रुलाई रोकने को
दारू की पूरी पाउच
हलक में उतार लेता है रोज।
 
आदमी सूनसान रात में
अपनेपन और रोटी की खोज में
अकल के घोड़े दौड़ाता है
और अंत में थककर
अनव्‍याही हमसफर की गोंद में
लुढ़क जाता है।
बुदबुदाते स्‍वर में कहता है-
‘हम दुनिया के लायक नहीं‘।
 
जुलूस से लौटा हुआ
नया कार्यकर्ता
अपनी उपेक्षा से झुंझलाता है
और पुस्‍तकों की दुनिया में
फिर लौट जाता है।
अखबार की खबर पढ़कर
लौटा हुआ बुद्धिजीवी
ढूंढता है बार-बार
अपनी प्रगतिशीलता का आधार
और घर में पड़ी जवान बेटी को
सीमाओं में पाबंद कर देता है।
 
मुर्गे की बांग के साथ
छत के कमरे से निकलती है चीत्‍कार
और सुबह चाय की गुमटी पर
बीड़ी सुलगाता बूढ़ा आदमी
देता है खबर-
‘प्रगतिशील की बेटी ने फांसी लगा ली‘।
घटना जानने को उमड़े जन सैलाब में
एक टिबियाया-सा आदमी
खांसते हुए किसी के कान में
फुसफुसाता है-
‘किसी से प्रेम-वेम का चक्‍कर रहा होगा‘।
 
घरों से पटे देश में
बेघर आदमी,
शहर की सबसे बड़ी हवेली में
पराई औरत के साथ
रात बिताने वाले मर्द को देखकर
सिसकियां लेती पत्‍नी
और,
जिन्‍दगी और भाषा में
समरसता की मुंहताज कविता
छोड़ जाती है सवाल-
‘क्‍या आदमी का ईमान
फिर होगा बहाल ?‘
 
 
 
 
 

बड़ा कवि


बहुत जरूरी है
बड़ा कवि होने के लिए
चार चेले
दो समझौतावादी प्रकाशक
कविता में भावों का तिलस्‍म
पाठकों का दिमाग सोखने की कला।
 
बड़ा कवि होने के लिए
जरूरी है
कविता में गंधहीन माटी
ह्‌वाइट हाउस की खुशबू
अंग्रेजी दा नाम, काल, मति, रति
नासमझ कसीदे, फितरे
कट-पिस के पैंतरे
अनसुने नाम, अनदेखे गांव।
बिम्‍ब वे, जिसे खुद ने जिया
अमृत वही, जिसे खुद ने पिया।
पढ़कर जिसे
कबीर का गूंगा
सिर हिलाने की बजाय
लुढ़क जाये।
कोशिश में खपे, तपे, मरे
फिर भी हवा न पाये।
 
बहुत जरूरी है
बड़ा कवि होने के लिए
उलटवासियां लिखना
औंधा नहीं, धंसा हुआ कुआं।
लिखना परंपरा को साजिश
मनु को मनुआ।
कपाल कुहर-सी भाषा
सहस्रार रस-से आकाशी भाव
जिसे चख पाने में
विकल कुंडलिनी
मूलाधार में ही
तोड़ दे दम
वही बड़ी कविता
वही बड़ा कवि
तूती बोले हरदम।
 

कुत्‍ता सावधान है


अक्‍सर देखता हूं
रोजी की यात्रा में
मंजिल से पहले
मेरे भीतर एक कुत्‍ता
दुम हिलाने लगता है।
 
मैं बार-बार समझाता हूं
मगर भूख और कृपा के बीच
भीतर की आग
मसोसते हुए कइयों के आगे
कुत्‍ता होने के लिए मजबूर है।
 
मित्रों की तफ्‌तीस में
मेरी आग मानने को तैयार नहीं
कि उसका कुत्‍ता होना
भूख और रोटी के बीच
एक आवश्‍यक कार्रवाई की बजाय
कुछ और है।
 
फिलहाल, रात के सन्‍नाटे में
सुबह से बंद कमरे को खोलकर
बेरोजगार आग को समझाता हूं
आइंदा ऐसा न करने के लिए
ढेरों तर्क देता हूं -
‘कि तुम्‍हें शेर होना चाहिए
ढेर हो जाओ, पर घास मत चरो
कि तुम्‍हें यदि लोग
एक बार कुत्‍ता समझ गये तो
एक टुकड़े पर
दिन के दिन ड्‌योढ़ी पर बैठाए रहेंगे
और तुम उनके कौरे के लिए
दुम हिलाने, बेवजह भौंकने के लिए
मजबूर रहोगे।
और यह भी, कि
एक दिन यही तुम्‍हारा स्‍वभाव बन जायेगा।
कोई तुम पर पत्‍थर फेंकेगा
और हमेशा चिढ़ाएगा।
तुम भौंकोगे तो दुलत्‍ती भी लगायेगा।
तब,
फिर जिस ताप को बचाने के लिए
तुमने खींसे निपोरी थी
उसका अर्थ व्‍यर्थ हो जायेगा।‘
 
भीतर मान गया।
गुर्राया।
पूंछ ऐंठा।
थोड़ी देर बाद ही शेर बनकर
बगीचे में एक बदमिजाज सूअर को
तमीज से पेश आने की हिदायत दी।
उसने समूचे जंगल का निरीक्षण किया
साफ सुथरी व्‍यवस्‍था पर नसीहतें दी।
मगर, बात जब फिर
रोजी और रोट पर टिकी
तो उसकी ऐंठी हुई पूंछ
धीरे-धीरे लटकने लगी
और मुड़कर पेट से सट गयी।
उसका धड़ चोचलाते हुए
खुद-ब-खुद हिलने लगा।
मुंह से लार टपकाती जीभ
बाहर निकल आयी।
पर, इस बार नाटक कामयाब रहा।
कुत्‍ता अब सावधान है।
वह पूंछ और मूंछ के बीच
वक्‍त का मुकाम नापता है
घूर पर पड़ी कागज की
लुगदियों को सूंघते हुए
भूख का इतिहास छापता हैै।
 
 

आजाद हूं


 
आजाद हूं, आजाद हूं
मुंबई और जहानाबाद हूं।
कुर्सी बची रहे
इसलिए दगाबाज हूं।
बंदोबस्‍त कर रहा हूं कि
बचे रहें मेरे अपनों के ओहदे
सलामत रहे मेरे कारिंदे, शोहदे
भेडि़या भीड़ जब तक चरती रहेगी
देश की धरती तब तक परती रहेगी।
तब तक तबाही के गहने जुटाता रहूंगा
बुद्ध के माथे पर काला तिलक लगाता रहूंगा।
यह यहां हो रहा है, वहां हो रहा है
सभी जगह तो यही हो रहा है।
क्‍यों कहते हो कि मैं ही अपवाद हूं
मैं तो पूरी दुनिया का मवाद हूं।
सबसे बड़ी चीज है प्रभुता
भले बिके राष्‍ट्र की संप्रभुता
केवल दादा के कदमों में गिड़गिड़ाता हूं
बाकी सब जगह तो मजे से इतराता हूं।
कौन खून के रास्‍ते मिली थी आजादी
उसे तो मांग-मांग कर लाए थे बाबा गांधी।
छन रही है संसद में जैसी, वैसा ही तो स्‍वाद हूं।
 
 
 

औरतें


औरतें
ट्रेनों की तरह दौड़ रही हैं
कभी रेंगते, कभी सरपट
धूप-तूफान-बरसात में
और किसी प्‍लेटफार्म पर
रुककर जन देती हैं
यात्रियों की तरह बच्‍चे।
ट्रेन फिर बेगानी हो गयी
किसी मंजिल की ओर
छोर-दर-छोर
ट्रेनें आती-जाती रहती हैं।
चढ़ते रहते हैं लोग
सफर पूरा होने तक खूब सगे
कभी खड़े, कभी बैठे
कभी सोते, कभी जगे
जिन्‍दगी की रफ्‌तार में
हार जाती हैं ट्रेनें
औरत की तरह
कभी आगजनी में
तो कभी दुर्घटनाओं में
एक चटपटी खबर के साथ
यात्री फिर हो जाते हैं सवार
किसी स्‍थानापन्‍न ट्रेन में।
 
 
 

बाप


बस, रुक जाओ
अब मत बोलो
गांठ बंधी रहने दो
मत खोलो।
कैसी हो औलाद
तुम कैसे बतलाओगे!
खुद हो कातिल
और न्‍याय दिलाओगे!
उसका जनना
तुम्‍हारी धमनियों के फव्‍वारे का
इत्‍तफाकन परिणाम है
मुड़कर फिर कहां देखे कि
उन पर कहां छांव, कहां घाम है।
तुम जीवन भर मर्द रहे
जाने कहां-कहां
किस-किसके साथ
कैसे पकड़ी छाती
कैसे छोड़े हाथ
कहां-कहां उगी
कैसी-कैसी पौध
कौन बनी कमली
कौन हरिऔध।
ओ पराये बाप!
भगोड़े पति!!
परजीवी बेटे!!!
हृदयहीन कवि!!!!
सच-सच बतलाना
जब तुम थे एकांतवास में
बहुत दूर
साधनारत (?)
निस्‍पृह
विरक्‍त से,
कमली-कल्‍लू की सुधि आई थी ?
उनकी आहें, उनकी बाहें
तुमको कभी बुलाई थीं ?
उनकी किलकारी
उनकी पिचकारी
उनके गुड्‌डे, उनकी क्‍यारी
मेले, टाफी
गुस्‍से-माफी
हंसी ठहाके
कभी भरे पेट
कभी फांके
क्‍या तुम सुन पाये थे ?
 
 
 

घर-परिवार


मेरा घर, मेरा शरीर
मेरा परिवार, मेरी आत्‍मा।
मेरा घर
रोज खड़ा हो जाता है
मेरे सामने रेगिस्‍तान बनकर
मैं कई वर्षों से
फुहार बनकर
उसे भिंगोता आ रहा हूं
ताकि उड़े नहीं, बिखरे नहीं
किसी की आंख में करके नहीं।
घर कभी नहीं पूछता कि
तुम फुहार ही बनकर क्‍यों रह जाते हो
कि तुम्‍हें फुहार बनने से पहले
बादल बनने में
हवाओं के कितने थप्‍पड़ पड़े
या कितने जख्‍म लगे ?
घर रोज पूछता है मुझसे
‘फुहार ही रह जाओगे क्‍या ?
भरी-पूरी बारिश कब बनोगे‘ ?
 
मेरा घर, मेरी भूख
मेरा शरीर, उनकी रोटी।
कई वर्षों से
चूल्‍हे की आग बन
अपने अरमानों की देगची में
उनके लिए दाल-भात
पकाता आ रहा हूं।
वे रोज लेते हैं डकार
और मैं रोज बुझ जाता हूं।
मेरा घर मुझसे कभी नहीं पूछता
कि तुम्‍हें लकड़ी बनकर जलने में
जलने से पहले कुल्‍हाडि़यों की चोट सहने में
कोई दर्द तो नहीं होता ?
मेरा घर भरी बरसात में
मुझसे खिसियाकर पूछता है
आखिर तुम्‍हें भींगने की जरूरत क्‍या थी ?
 
मेरा घर मेरा अखबार
मेरी कलम, उनका कारोबार
कई वर्षों से
रोज हादसा बनता आ रहा हूं
दर्दों को बटोरकर सनसनी तरासता हूं
वे रोज उछलते हुए कहते हैं
नंबर वन चल रहा हूं
और मैं, रोज चुक जाता हूं
फिर से हादसा होने के लिए।
मेरा अखबार
मुझसे कभी नहीं पूछता
कि तुम्‍हें हादसा होने में
कितनी गोलियां-गालियां
सामूहिक-एकल बलात्‍कार
सड़क दुर्घटना-निठारी बनने में
कितनी और कैसी-कैसी
आत्‍महत्‍याएं करनी पड़ती हैं ?
मेरा अखबार पूछता है रोज
आखिर मुंबई और गुजरात की त्रासदी
कब बनोगे फिर ?


 

वेदना


 
मेरी वेदना में अध्‍यात्‍म मत ढूंढिए
वह जैसा है, वैसा ही रहने दीजिए।
बड़ी मशक्‍कत से मैनें
इस दुनिया में तलाशा है उसे
अपने, तुम्‍हारे, उनके, इनके
और सभी के बीच से
चने की फुनगियों की मानिंद
हर गोधूली में
मैंने उसे खोंटा है
किसी मंदिर में घंटी बजाकर नहीं।
वह किसी माथे के
त्रिपुण्‍डी बोर्ड से पैदा नहीं हुआ
वह तब पैदा हुआ था
जब चित्‍थड़ हरिजन ने पहली बार
रोटी के बदले मुखिया को
अपनी बीवी सौंपकर
सारी रात रोते हुए दारू पिया था
वह वेदना तब अंखुआई थी
जब कमालू चोटी का मेधावी होने के बावजूद
एड़ी का जूता हुआ था
और, पचास हजार की खातिर
क्‍लर्की नहीं पा सका था
पांच दिन तक भूसा घर में
मुंह छिपाकर सारी रात रोता रहा।
जैसे उसकी प्रखरता ही
उसकी सबसे जुर्म थी
सातवें दिन
उसकी लाश
नदी के घाट पर
उतराई मिली थी।
 
 
 
 
 

शाही खिड़की

 


वासना की आंच पर
पक कर मधुर हो रहे रिश्‍तों
और किश्‍तों के टूटते जाने से
दरक रही छाती में
अंतर कुछ नहीं होता
फर्क केवल इतना है
एक फेंक दिया जाता है बदबू आने पर
दूसरा हवालात की कोठरी में।
सवालों से घिरा शहर
उफन पड़ता है किसी खास मुद्‌दे पर
तब
जब किसी हवेली की खिड़की का
एक सीसा टूट जाता है।
उसकी कीमत चाहे जितनी भी क्‍यों न हो
संसद बड़े करीने से सुनता है
उसकी एक-एक खनक
तब
न बैठती है कोई जांच समिति
न होता है थाने की तहरीर का इंतजार।
बड़ी आसानी से दबोच लेता है दारोगा
असली मुजरिम का गला।
मगर, अंतिम दम तक नहीं हो पाती पहचान
झोपड़ी में हुए अधेड़ औरत के साथ
समूहिक बलात्‍कारी शिकारियों की।
काश! उसके पास भी
एक शाही खिड़की होती।


 

कलम बोली न आत्‍मा


 
कलम बोली न आत्‍मा
चुप रहा परमात्‍मा।
चलते रहे कत्‍लनामे
अस्‍मतों के सौदे
मुल्‍क बिक्री के मसौदे।
उसने देखा, लिखा-
‘शंकराचार्यों ने करायी हत्‍या
सन्‍यासियों ने लूटी अस्‍मत
राज्‍यपालों ने किये
लोकतंत्र से बलात्‍कार
विधायकों ने
एक-एक करोड़ में बेचे
दस-दस लाख विश्‍वास‘
फिर भी,
कलम बोली न आत्‍मा
मूक था परमात्‍मा।
कलम लिखती रही
लिखती रहेगी
लिखना था उसका काम
बोलने के नहीं मिलते दाम
बोलती तो सुनाई जरूर पड़ता
हमको, तुमको, उनको- सबको।
क्‍या तुमने सुना!
नहीं न!
जैसे स्‍वामियों के प्रवचन
संसदों के अनबन
मंदिरों की घंटियां
नोटों की छल्‍लियां
पुरुलिया के हथियार
पाकिस्‍तान के प्‍यार
मंगरू का भूख से मरना
बेटी वालों का डरना
उसने सुना, पर,
कलम बोली न आत्‍मा
भीतर मर गया था परमात्‍मा!
वह लिखती है रोज
छपती भी है
जैसे बहुत बड़ी हो खोज
खूंखार हेडिंग के शोर
जैसे फिल्‍मों के डरावने दृश्‍य
जिसे हाल से निकलते ही
मन से पोंछ देते हैं हम।
कलम लिख रही है
लिखती रहेगी
इसलिए कि कलम को मिलता है वेतन
वह भोगती नहीं
भकोसती है जिंदगी
जैसे मठों में
चल रही साधना
मर रही वंदगी।
 
 
 
 

औरत और नारा


लगाओ
और जोर से नारा
दांव पे औरत
पति बेचारा।
आदमी सब जानता है
पर है वक्‍त का मारा।
रोशनी बुझाकर जने जा रहे हो बच्‍चे
चौथाई में सच्‍चे
बाकी के टुच्‍चे।
भटकइया उगाकर
खोज रहे बागवानी
पालो दरबों में चूजे
खाओ बिरयानी।
हडि्‌डयों का ढेर
तो क्‍या करे कुत्‍ता आवारा
लुढ़के, चाहे चढ़े पारा
लगाओ फुटपाथ पर पिल्‍ला मंडी
छोड़ दो सड़क पर बेखौफ
क्‍या करेगी गर्मी, क्‍या करेगी ठंडी।
पेट्रोल पास में है तो
क्‍या करेगा अंगारा।
 
कपड़े केवल आवरण नहीं होते
देह की लक्ष्‍मण रेखाएं भी हैं
स्‍वर्णमृग सौंदर्य मिथ ही नहीं
लालसाओं की सीमाएं भी हैं
दहलीज पार यदि उठ गये कदम
क्‍या करेगा रावण बेचारा।


 

धन्‍य-धिक्‍कार


 
गंधाते बच्‍चे
हगते आंगन द्वार
चमकती मांएं
वाणी तलवार
धन्‍य हो देवी
तुम्‍हें धिक्‍कार।
तुम करुणा की देवी
पति परायण
ईश्‍वर सेवी
लुटाती रहती हरदम
जाने किस-किस पर।
पांव महावर
आंखों में काजल
खोजो-खोजो ताजा साजन।
चांदी की पेटी
फूलों का जूड़ा
मर जाये स्‍साला बूढ़ा।
दिखा दो सबको सब
बचे हैं दिन चार
धन्‍य हो देवी
तुम्‍हें धिक्‍कार।
हाथ घड़ी
हसरतें बड़ी
निहारें गली-गली
द्वारे खड़ी-खड़ी
जाने किसे।
पति परमेश्‍वर अंदर
लागे ज्‍यों बंदर
इनसे-उनसे मठराना
सास-ससुर गरियाना
ऐ वाह! तुम्‍हारी लाली
गजब की पप्‍पू की साली
भरी है गगरी
पर, मारे लाला
खुला दरवाजा
बक्‍से में ताला।
घर में डोलें कीरा-बिच्‍छी
तन में स्‍वर्ग बिहार
धन्‍य हो देवी
तुम्‍हें धिक्‍कार।
 
 
 
 
 

गांव-जवार


समय के साथ
जाने कहां पहुंच गये
अपने गांव-जवार।
ताजी हवाएं
शाखों पर चिडि़यों का कलरव
भोर में रंभाती गांएं
पूंछ उठाए सरपट दौड़ते बछड़े
अब नहीं दिखते।
जब मां के थन से जा लगते
भोड़ी मार खींच लेते दूध की धार
धार के पार मां का प्‍यार।
मगन मन, चल पड़े जंगल
झुंड के झुंड, परस्‍पर धकियाते।
झाडि़यों, छतनारे पेड़ों के बीच अठखेलियां
घूरती निकलतीं जंगली बिल्‍लियां।
वो देखो, कुलांचे भर
सरपट भागा छौना
नजर ना लगे
लगा दो यार डिठौना।
सूरज चलता रहता साथ-साथ
दुपहरी में गर्म हो गये माथ।
सलोनी झील ने दुलराया
पेड़ों ने सहलाया
सन्‍नाटे ने दी दस्‍तक तो
अपने पास सुलाया।
फिर जैसे कोई जगा गया चुपके
चल फिर खा ले
नहीं तो सांझ ढल जायेगी।
सूरज चल पड़ा मां की गोंद
कदम बढ़े खरके की ओर
मां की छाती के इर्द-गिर्द
घिसते देह
वो देखो मुस्‍कुरा रहा मेह।
महुए का पेड़
पेड़ के नीचे खरका
खरके में खूंटा
खूंटे में गूढ़ा
बाप-सा चरवाहा बूढ़ा।
बंध जाते बंधन में रात भर
थनों से निकालकर
गरम-गरम दूध
छौनों को लिए लौटता किसान
गाता-
‘आई रे निरमोहिया जवानी लेके‘
‘पांच बीरा पान लगउली, पचही रुपइया‘
‘चारि जने मिलि खाट उठाएं‘।
और भी क्‍या-क्‍या
कौन-कौन से गीत-बयार।
सूरज की कनियों के साथ
डूब जाता गांव
नींद की गोंद में
आहिस्‍ता-आहिस्‍ता।
अब नहीं रहे खेतों में
चौदह फुटे इठलाते बैलों की जोड़ी
पूंछ ऐंठता किसान
घुटने तक धोती
अद्धी कुर्ती।
बुद्धू की महुआरी
शोभा-बेचनी की लुकाछिपी
मड़ई में स्‍वर्ग
पूरे गांव का परिवार
परिवार का गांव -
सब पता नहीं कब शहर हो गया।
जाने कब होलियां हउलियां हो गयीं
दीवाली पटाखे
दशहरे रावण
देखते ही देखते सब पालीथीन हो गये।
बैलगाडि़यां मोटर
घंघरा-चुन्‍नी
जिंस-टाप में कसे उभार
जाने कब होरी, कल्‍लू, लल्‍लू का गांव
सलमान, सेट्‌टी, गोविंदा, प्रीति जिंटा का शहर हो गया।
आचार्य शुक्‍ल, प्रेमघन, बंग महिला की कलम
नयी कविता में डूब गयी।
तब की भेंट मुलाकातें
अब गोष्‍ठियां हो गयीं।
रह गये हैं अब अलग-अलग संस्‍थाओं के चूल्‍हे
जलते गैस सिलेंडर
दर्प में पकती कविताएं
परोस रहे महाराज
अधपके दाल-भात
ब्रेड मक्‍खन, जूस
सब नयी कविता हो गयी
सब नये कवि।
 
 

लोकतंत्र


लोकतंत्र
समय से पहले
पंच पिताओं के बीज से पैदा हुआ
और
भीड़ के साथ खड़ा हो गया।
उसने दशहरे के उल्‍लास की तरह
पहले जमात को उकसाया
खूनी होली खेली
और, विदेशी चेहरे में
देसी राजा बन बैठा।
देश बांटा, दिल तोड़े
फिर, कई रात घडि़याली आंसू बहाते हुए
एक शाम लंबी नींद सो गया।
जागा तो
एक शातिर दिमाग औरत से
आसनाई कर बैठा।
कुछ दिन बाद वह
ईड़ा के राज्‍य में
मनु की तरह घायल मिला
उसकी संततियों की श्रद्धा ने
उसे सहलाया, दुलराया और ताजा किया।
वह थका था
फिर सो गया।
लोकतंत्र मल्‍लिका शेरावत के
धमाके के साथ फिर जागा
और नंगा होकर
हुस्‍न का सौंदर्य बेचने लगा।
कभी पुलिस में भर्ती हुआ
खोमचे-मूंगफली लुचका
बुधई को जेल
और गब्‍बर को दिल में बैठाया।
वह खेलता रहा
और ऊबकर एक दिन
निलंबित हो गया।
कुछ दिन पहले उसे
अपनी ही झोपड़ी फूंककर
थाने की ओर भागते देखा था
बाद में पता चला कि
वह कानूनी पोशाक में
दलितों का मसीहा बन बैठा है।
आजकल वह विधानसभा में
अदालती हलफनामे की तरह
जनहित का श्‍वेतपत्र जारी करता है
हाथी पर घूमता है
विधायकों का कारखाना चलाता है।
वह जादूगर की तरह
कभी हांसिये और कभी पंजे से
वोट की फसल काटता-बेचता है
और झंडे में गठियाकर
राजधानी में बेचता है।
वह सुतक्‍कड़ भीड़ के साथ
पत्‍नी की तरह सोता है
और तवायफों की तरह
खद्‌दरवालों के साथ
गलबहियां करता है।
 
 

कविता


 
दारू की घूंटों
सिगरेटों की कश से
मादक धुंआ नहीं
लहू में पकती
कविता का पकवान चाहिए।
 
मखमल के गद्‌दों पर
बदलते करवटों से ऊब
तराने अपने दर्दों के
छेड़ते रहोगे कब तक ?
थके-उदासे भारत जन को
बिहारी की नायिका नहीं
प्रलयंकारी भैरव गान चाहिए।
 
परिवर्तन लाने में कब
लश्‍कर यहां सफल रहा
मुट्‌ठी भर बागी-वीरों का
कतरा ही अब तक अटल रहा
ध्‍वस्‍त गढ़ दुर्योधन का करने
रोती-सोती-मुर्दानी भीड़ नहीं
वनवासी पांडव की आन चाहिए।
 
मंथरा और शकुनी तो
मुंह मारेंगे ही, मारते रहें
कैकेइयों के गदराये बदन पे
दशरथ तो मरेंगे ही, मरते रहें
पर, वध दशकंधर का करने को
पर्वत पर जटाधारी समाधि नहीं
विकल राम का सर-संधान चाहिए।
 
 

 

भाषा की गंगा


यार जवान हो और चुप हो!
जरा देखकर समझो
और समझकर देखो।
 
बगल में खड़े
तुम्‍हारी प्रशंसा करते
उस आदमी को सूंघो
जिसकी कमर में एक छूरा है
जो हिम्‍मत में आधा
और साजिश में पूरा है।
 
अभिभावक बने आदमी के साथ
घूमती लड़की को रोको
उसकी दाढ़ी के खिचड़ी बालों को
नोच कर दिखाओ कि
इसका चाल-चलन और चरित्र भी खिचड़ी है
यह उम्र में जरूर तुम्‍हारा बाप है
मगर, सावधान रहना
यह भीतर से पूरा काला सांप है।
यह बात किसी खिसियाए आदमी से
सुनकर नहीं
बल्‍कि उसकी अतीत की खिड़की में झांको
शब्‍दों को सावधानी से तौलो
दिल की गुलाबी-सफेद रंगीनियों को परखो
और देखो
कहीं वह उस कवि की तरह तो नहीं
जो अपने प्रतीकों और उपमानों के
आलीशान कमरे तो दिखाता है
किन्‍तु, उस बिम्‍ब को नहीं
जिसे वह हर सम्‍मेलन में
विदाई के वक्‍त दुहराता है
और जो पिता के अरमानों का कत्‍ल कर
उसकी जवान बेटी से सहानुभूति के गीत गाता है।
 
मेरी बात मानो
उस बगुले को पकड़ो
पेट चीर डालो
जिससे तमाम खेतों को
उसके संत होने का भ्रम है
और दिखाओ कि
इसका संत होना
महज एक बहाना है
इसके परोपकारी ढांचे में
एक मोहक कसाईखाना है।
 
शहर में होने वाली गोष्‍ठियों में
पहले तो जाओ मत
और यदि चले ही गये
तो पता लगाना कि
उस मानिंद आदमी को
अध्‍यक्ष बनाने का क्‍या राज है ?
क्‍योंकि आजकल के अधिकतर आयोजक
ऋण और धन के गुणनफल से भयभीत
किन्‍तु धन और धन के योगफल में
पक्‍के समीकरणबाज हैं।
 
और हो सके तो
उन तमाम नालियों को सीज कर दो
जिनके कई बदबूदार चित्र हैं
और जिनका बिष्‍ठाया पानी
भाषा की गंगा में मिलकर
आजकल पवित्र है।
 
 
 
 

भाषा के आदमी


आप यदि कवि बन गये
तो हम क्‍या करें
नाचें या मरें!
मेरे ख्‍याल से
आपका ‘यह‘ या ‘वह‘ होना
माने एक अरब की भीड़ में
एक और गीदड़ पैदा हो जाना।
आप जवान कवि हैं
तो मासूका के हुस्‍न का
बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन करेंगे।
उसके चमड़े के मुंह को
चांद का टुकड़ा बताएंगे।
पैसे तो हैं नहीं
सो चांद-तारों से मांग सजाएंगे।
हाथ से जो खिसकी
तो शब्‍दों के आंसू बहाएंगे।
समझाते फिरेंगे -
‘भाइयों, मेरा हृदय शीशे का है
जरा संभाल के बात करना
नही ंतो टूट जायेगा‘।
यदि बूढ़े कवि हैं
ते जवानों की छाती पर मूंग दलेंगे।
अपने पहनेंगे लक्‌ धोती-कुर्ता
उनकी काया से पसीने बहाएंगे।
आप खाएंगे लड्‌डू-पेड़ा
वे झोला और खर्च उठाएंगे।
तय है, वे ही आपकी भाषा की बरही पर
आपके रसूखों की तेरही मनाएंगे।
बुरा मत मानना भाई
आप भाषा के आदमी हैं
आपके करोड़ खून माफ।
नाचेंगे, गायेंगे
रोयेंगे-धोयेंगे
चीखेंगे-चिल्‍लाएंगे
हमें तो वाह-वाह करना ही पड़ेगा।
आपसे संकट ही संकट है
नया-पुराना
आगा-पीछा
बुरा-भला
सड़ा-गला
सब खा सकते हैं
सब पचा सकते हैं
आपके अजीब-अजीब नखरे हैं
आपसे अच्‍छे तो शहर के बकरी-बकरे हैं।
 
 

अब विद्वान․․․․․․


 
बचपन में
बापू ने दुलराया
‘बेटा विद्वान बनेगा
सत समुद्र पार तक पूजा जायेगा।‘
मैंने पढ़ना शुरू किया
खूब पढ़ा और पढ़ता गया
वेद, उपनिषद, पुराण, स्‍मृतियां
गोरख से गुरुग्रंथ साहब तक
सुकरात से रजनीश तक
मनु से गांधी
आदि संस्‍कृत से अंगरेजी
शब्‍दार्थ से कोश तक
लगातार पढ़ता गया।
सब कुछ पढ़ा
सब कुछ समझा।
घर-मकान
जमीन-जायदाद
सब बिक गये।
कई दिनों खाली पेट सोया।
एक दिन चौराहे पर
अखबार के मुख्‍य पृष्‍ठ पर
छपा पाया-
दस्‍यु सुंदरी को
अमरीकी राष्‍ट्रपति ने
अपने पारिवारिक भोज में
अपने देश में
दावत पर बुलाया है।


 

चीख


तुम्‍हारे नये शब्‍दों को जोड़ने से
चीख की परिभाषा नहीं बदलेगी।
चाहे जितनी भी गोष्‍ठियां
सेमिनार करवा लो
भेज दो
विद्यालयों में वाद-विवाद के विषय
संसद में बहस करवाकर देखो
या जी नहीं भरता तो
पारित करवा लो एक कानून कि
अब व्‍यक्‍ति को
वर्तमान के अनुसार चीखना होगा।
तब भी व्‍यक्‍ति अपने हिसाब से चीखेगा।
इसका नवीनीकरण
या नया प्रयोग
कभी सफल नहीं होगा।
इसके रूप-रवैये में अगर
तुम फीकापन और कुरूपता महसूस करते हो
जैसे कि ईसा और सुकरात
अभिमन्‍यु और पृथ्‍वीराज
सभा में निर्वस्‍त्र होती द्रौपदी
या पतित्‍यक्‍ता सीता की चीखों में,
तो नये प्रयोग करो-
नैना साहनी वाला
या मीना में लाखों ऊंटों की
हर साल बलि।
नहीं तो
गांधी-इंदिरा
और राजीव की अंतिम चीख का।
तब भी भीतर से चीख
वैसी ही निकलेगी
जैसे तब निकलती थी
न उससे कम
न अधिक।
 
 
 
 
 

परंपरा के निहितार्थ


परंपरा के कटघरे में खड़े कर
पूछे जा रहे हैं बागी आत्‍मघाती से सवाल-
‘बोल, क्‍या है तुम्‍हारी बगावत का मतलब
और क्‍या है आधार ?‘
 
आदमी समझ और समझाकर बताता है-
मैं आदमियत का स्‍वत्‍व तलाश रहा हूं।
उसे बचाये रखना चाहता हूं।
क्‍योंकि,
आदमी रहा गया है
एक मौखिक विचार मात्र
जो कि मुहरबंद होने से डरता है।
आत्‍मा की चमक दफन करके
रखता है एक मुखौटा
और रोशनी के लिए
सजाता है क्षणजीवी मोमबत्‍तियों की कतारें।
धर्मग्रंथों के निहितार्थों की
कर दी गयी है अंत्‍येष्‍टि
और जनता !
अस्‍थिशेष को ही मान बैठी है सत्‍य श्रेष्‍ठ।
ऐसे में भीतर
अमावस पालना आवश्‍यक हो गया है।
 
मांएं चाहती हैं
बेटे को ढर्रे पर चलते देखना
लीक छोड़ने पर
देने लगती हैं दूध का वास्‍ता
और पिता
समाज-स्‍वीकृत कायरता को
बता रहे हैं आदर्श।
और, अनेक कलियों का
रसस्‍नान कर लौटे भौंरे
बता रहे हैं हंस को मर्यादा का पाठ।
ऐसे में फिर किसी पौरुषेय के लिए
मर जाना क्‍या श्रेयस्‍कर नहीं।
बागी कटघरे में शेर की तरह
और जकड़ दिया जाता है।
मौत और जिन्‍दगी के बीच
वह करता है सत्‍य की तलाश
और न्‍याय की तुला पर
बन जाता है एक जिंदा लाश।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

धनिया


खाना पकाते हुए
भाई ने पूछा-
धनिया की सब्‍जी बन सकती है भइया ?
 
मैं चौंका
सवाल अप्रत्‍याशित था।
धनिया रौनक, धनिया सुगंध
धनिया स्‍वाद, धनिया संतुष्‍टि की खाद।
लेकिन अकेली धनिया का
अलग से कोई अस्‍तित्‍व नहीं।
न चटनी, न सब्‍जी।
जैसे भइया बिन भौजी
सत्‍व बिन सती
कांशी बिन मायावती
राम बिन सीता
बाल बिन फीता
पान बिन सुर्ती
बुढ़ऊ की फुर्ती
बेमतलब।
वह शादी में
ढोल पर थपकी देकर
गीत चिल्‍लाती पड़ोसन हो सकती है
पर सुहागरात की शय्‌या पर
अलसाई दुल्‍हन नहीं हो सकती धनिया।
 
भूख के युद्ध में
तुरही तो हो सकती है
पर भीम-भोज की तृप्‍ति
नहीं हो सकती धनिया।
चुनावी उथल-पुथल में
बैनर-पोस्‍टर तो हो सकती है
पर मतदाताओं की प्रतिबद्धता
नहीं हो सकती धनिया।
 
 

जंगल


खामोश जंगल-सा
जीता हुआ मैं
देख रहा हूं
अपने कटते प्रत्‍यंगों को।
मेरे अंतरगह्‌वर में
सारे हिंस्र-अहिंस्र दोस्‍त
बसेरे को उजाड़ होता देख
किसी दूसरे वतन को चले गये।
मैं देख रहा हूं चुपचाप
अपने महुआ, खैर, तेंदू, काकोर
गुलसकरी, सागौन
चार-साखू, झरबेर वगैरह का निर्वासन
और उनकी स्‍मृतियों का धुंधलका।
बचे हुए कंटीले दरख्‍तों
ठूठ बांस, पलाश, बेहया-मकोइ जैसे दोस्‍तों को
गले लगाते हुए
जिये जा रहा हूं
अपने रखवालों के
सर्वांग नीच होने की अवधि गिन रहा हूं।
 
 
 
 

कविता का धर्म


मैं कविता हूं
गंगा-सी सरिता हूं
अपूज्‍य हो गये जैसे ब्रह्‌मा जी
मैं भी उसी तरह शापग्रस्‍ता हूं।
 
पहले मेरे अर्थ बदले
कुछ न बोली।
कपड़े उतारे
चुप रही।
सर्जरी कर जवान बनाया
फिर भी चुप रही।
अब किसी भी महफिल में
सजा कर पेश की जा रही हूं
बन कर शाकी खुद शराब पी रही हूं।
कहो कैसे कह सकते हो कि
ब्रह्‌मानंद सहोदरा हूं ?
मेरे परिवार में इतने झगड़े
इतने लफड़े-पचड़े कि
अब पूरी की पूरी हिन्‍दुस्‍तानी गोधरा हूं।
मेरे बच्‍चे गाते हैं गीत पक्‍का
कि -
युवती की जांघ में साइकिल का धक्‍का
सरस्‍वती की अर्चना में समोसे का प्‍लेट
ऐसे-ऐसे भाव-भोजन-भदेश
कि फटने लगा है मेरा पेट।
वे हनुमान को बनाते जासूस
रावण से डलवाते फूट
कविता न रही, हो गयी खुली नाभी
जैसे गदराए बदन वाली पूरे गांव की भाभी।
अब लगाते हैं वे मंचों पर सट्‌टा
जैसे माया मकान का बंट रहा पट्‌टा।
मेरे जिगर के टुकड़े, मेरे प्‍यारे लाला
नाम-दाम खातिर
रोज करते हैं मेरे साथ मुंह काला।
वे जलसों में पीट रहे हैं ताल
शब्‍द और अर्थों की खींच रहे खाल।
रोज ही वे हमें लटका रहे हैं उल्‍टा
अब कहते हैं सब, तुम हो कुल्‍टा।
अरे अब तो मैं बारातों में भी बिकने लगी हूं।
वहीं से लौटी हूं, सारी रात नाचते हुए जगी हूं।
 

आदमी हूं


आदमी हूं कि तिलस्‍म हूं
अपने ही गुस्‍से से भष्‍म हूं।
अर्थहीन हो चुके संस्‍कारों को
मनाये जाने वाली रस्‍म हूं।
 
पद-पदार्थ, जीव-शिव की
एक बचनी, द्विवचनी और बहुवचनी
गुणधर्मी प्रवृत्‍ति मात्र नहीं हूं।
मैं सर्ववचनी गुणधर्म हूं।
हर जीव-जंतु, जलचर-थलचर-नभचरों का
पुंजित अभेद रूप हूं, कर्म हूं, मर्म हूं।
मैं लाल हो सकता हूं, पीला भी
वज्र हो सकता हूं, ढीला भी
मैं कुत्‍ता, मैं बिलार
मैं सिंह, मैं सियार
मैं गीदड़, मैं सांप
नाप, मेरी ऊंचाई
मेरी निचाई, मेरी बुराई
मेरी भलाई नाप।
लगा सको तो लगाओ थाह
ले लो मिनट, घंटे, दिन, माह।
कितने कुबेर उड़ेल कर कोष
मिटा चुके हैं दान का जोश
महलों को छोड़, पकड़ लिये झोपड़ी
फिर भी न भरी, खाली रह गयी मेरी खोपड़ी।
 
हर जीव-जंतु का
क्रूर और संत का
तुच्‍छ और अनंत का
मुखौटा है मेरे पास
फिर भी क्‍या मजाल
कि घुट जाये मेरी सांस
अब तो कृष्‍ण का क्‍लोन बनाने वाला हूं
एक नहीं, सौ-सौ महाभारत करवाने वाला हूं।
 
 
 
 

चींटियां


अल सुबह
चीटियां चल पड़ीं
मालूम नहीं कहां!
झुंड की झुंड
बूढ़े-बच्‍चे-जवान
सभी शामिल हैं।
उम्र का अंतर पता करना मुश्‍किल
सब एक रूप
सब एक रंग।
मानव जातियों की
रंगभेदी दुनिया से एकदम अलग।
कोई तकरार नहीं
नोक-झोंक, खून-खराबा नहीं
शायद यह श्रम का प्‍यार
या फिर प्‍यार से श्रम है।
संभवतः श्रमशीलों का रंग
एक जैसा हो जाता है।
रंगभेद तो परजीवी बुद्धिजीवियों में होता है।
चींटियां चल रहीं हैं
कुछ खाली हैं
कुछ लादे हैं अंडे।
कुछ डाक्‍टर हैं तो कुछ सैनिक
कोई तनिक रुका कि
दो पहुंच पहकड़ लिए बांह
खींचे चले गये।
चींटियों के पास फुर्सत नहीं
वे बहाने नहीं जानतीं।
उन्‍हें पता चल चुका है कि
शाम को बारिश होगी।
वे सारा सामान सहेज रही हैं
सुरक्षित ठौर में
सभी परस्‍पर मददगार हैं
सभी एक दूसरे की यार हैं।
नर-मादा भाव से पृथक
संगताने की मुकम्‍मल दुनिया।
सब धरती उनकी है
सब उनके हैं।
हिम्‍मत का मत पूछिए-
चट्‌टानों को भी फाड़कर
बसा सकते हैं बसेरा
पाताल में भी रह सकते हैं वे।

 


 

मां को चिट्‌ठी


अम्‍मा,
तुम्‍हें दोष नहीं दूंगा।
पता है मुझमें पल रहे हैं तुम्‍हारे सारे सपने
तिल-तिल कर खड़ी की हो
मेरे देह की इमारत
दिन के दिन भूखी ही काटी हो
पर, प्‍यार हमेशा
मुझको ही बांटी हो।
 
उपवास के दिनों में
ईश्‍वर को कोसने की बजाय
तुमने मुझमें तृप्‍ति देखी
अपनी फटी धोती पर
लोगों के तानों को
भीतर से उगते हुए
मेरे उज्‍ज्‍वल भविष्‍य में
अनसुनी कर देती थी।
दिन फिरने की प्रतीक्षा
और उत्‍तर देने की ताकत
तुमने मुझे ही बनाया था-
‘मेरा लाल बड़ा होगा
मेरे भी दिन फिरेंगे‘ की हौंस
तुम्‍हारी पनियाई आंखों में
हमेशा चमकती रही है।
 
मुझे याद है मां
तुम स्‍वाभिमानी रही
मगर हमारे लिए
पड़ोसियों से पिसान और नीमक भी मांगा
उपलियों पर सेंक कर
गिनी-गिनाई लिटि्‌टयां
पुचकारते हुए हमें ही खिला देती थी
और गोंद में लिटा
लोरियों की धुन और
थपकियों की आश्‍वस्‍तियों से
रोज सुला देती थी।
कई बार मैंने चुपके से देखा है
तुम्‍हें इसके बाद
लोटे भर सूखा पानी
पी कर सोते हुए।
पानी, तुम्‍हारी सूखी आंतों में
खाली घड़े की तरह बजता था।
तुम राख खुडि़हारते हुए
देखती रहती मुझ सोते हुए को
घंटों एकटक।
तुम्‍हारी आंखें बरसतीं और
राख निर्दय समाज की तरह
सोख जाती सब का सब।
आंचल में मुंह छिपाकर
तुम्‍हारा फफक-फफक कर रोना
आज भी मेरे कानों में गूंज रहा है।
 
अम्‍मा मुझे सब याद है
मेरी पढ़ाई को
कितनी ही बार पिताजी से झगड़ी हो तुम
उनकी लाल आंखों
और बरसते थप्‍पड़ों से
कभी न दहली हो तुम।
बचे-खुचे जेवर भी
हम पे कुर्बान कर दी।
मां, तुम पुण्‍य हो, तीर्थ हो
एक समूची करुणा हो।
तुम्‍हारे आंसुओं में एक प्रलय की ताकत है।
पर, आज अचानक इतनी निर्दय कैसे हो गयी।
बताओ मां, बताओ
तुम अपने आंसुओं में
उसी लाल को आज
वेदना प्रलय में डुबा रही हो।
मैं तुम्‍हें सब कुछ दूंगा
सब कुछ लाऊंगा
पर मत छीनो मेरा प्‍यार
केवल यही भर तो मेरा है
शेष सब कुछ तेरा है।
यह तन, धन, जीवन
चिंतन, मनन, निदिध्‍यासन
सब ले लो।
 
अच्‍छा, मेरा अपराध यही न!
कि मैं तुम्‍हारी परंपरा को तोड़ रहा हूं!
उस बेईमान परंपरा को
जिसको निभाने ही में
हवन हो गये तुम्‍हारे सारे अरमान
रोटी-धोती, �ाृंगार-चोटी
सब छीन लिये।
जो तुम्‍हें आज तक
आदमियत से बेदखल किये रहा।
तब कहां था तुम्‍हारा यह कुलीन कुनबा
कहां थे धर्म के ठेकेदार
पुरोहित-पंडित और सारे परंपराओं के रक्षक
तुम्‍हारी सहजता के तक्षक।
मां अब मैं पाखंड के विरुद्ध
लामबंद होने जा रहा हूं
शकुनियों को बेपर्द करूंगा
जो तुम्‍हारे अर्जुन को
लाक्षागृह में दहन करने जा रहे हैं।
 
 
 

महाभारत


मेरे भीतर
एक महाभारत चल रहा है।
समस्‍याओं के कुरुक्षेत्र में
अर्जुन शस्‍त्रों की शक्‍ति भूल गया है।
वह बैठा है चुपचाप
देख रहा है और
देखे जा रहा है
निष्‍फल होते अपने दिव्‍यास्‍त्र।
वह डरता है
एक सीमा के बाद
दुर्योधनी सेना
उसे घेर लेगी और
बरछियां भोंक उसे मार डालेगी।
आंसू बहाते हुए वह
महसूस कर रहा है
अपने भीतर एक निरीह अभिमन्‍यु
जो कुचक्र के अंतिम सवाल से घिर गया है।
अर्जुन, एक पराजित आत्‍मविश्‍वास।
वह लगातार कृष्‍ण को पुकार रहा है
और कृष्‍ण!
इक्‍कीसवीं शदी में रोजगार  की तरह
अलविदा कह रहे हैं।
आज का अर्जुन
भूल गया है आपद्‌धर्म की परिभाषा
वह ब्राह्‌मण बन कर्ण से
उसका कवच-कुंडल नहीं
अपनी जिंदगी की भीख मांग रहा है।
 

प्‍यार ः एक


लेगों ने प्रेम पाला
ऐश किये
मुझे प्रेम ने पाला
और मैं उसके निर्देशन में
तप रहा हूं
बदले में एक मौत
दुल्‍हन की तरह सजा रहा हूं।

 

प्‍यार ः दो


जब मां से प्‍यार किया
तब सबसे डरता था
और
जिन्‍दगी बड़ी अच्‍छी लगती थी
और जब उससे प्‍यार किया
तो जिन्‍दगी से नफरत हो गयी
और अब लोग मुझसे डरते हैं।
 

प्‍यार ः तीन


मैंने शहर छोड़ना चाहा
वह बूढ़ी मां की छाती बन गया।
रोजगार बेवफा प्रेमिका-सा
परिवार कांटे की तरह चुभने लगे।
 
 
 

युद्ध के विरुद्ध


हिजड़े युद्ध के विरुद्ध हैं
वे नहीं चाहते खून-खराबा
वे छिछोरेपन से चाहते हैं
समस्‍या का समाधान।
लंबी पंचायत के बाद
उन्‍होंने निकाला है निष्‍कर्ष-
आतंकी हमला करें
तो जवाब बंदूक से नहीं
बल्‍कि अपना लहंगा
कमर तक उठा कर दिखा दो।
 
हिजड़े विद्वान हैं
तर्क विद्या के पारंगत
उनका होम वर्क तैयार है
वे शीघ्र दिखाएंगे
आदि से अद्यतन ग्रंथों में
सामाजिक-सांस्‍कृतिक समन्‍वयवाद
वे सिद्ध कर देंगे कि
जिन्‍दगी जीने के लिए
शिखंडी होना आवश्‍यक है।
हिजड़े युद्ध नहीं होने देंगे
उन्‍होंने समाधान खोज लिया है
अब वे गांव-गांव घूमेंगे
सबको एक जगह गोलियाएंगे
तबले की थाप पर
समस्‍याओं को गीतों में ढालकर
नाचते, मन बहलाते हुए
उनकी प्रताड़ना की कथा सुनाएंगे।
हिजड़े नहीं चाहते कि
उनके हाथ खून से रंगे
वे किसी भी प्रकार की दिल्‍ली के लिए
अलाउद्‌दीन खिलजी का
कलंक ढोने को तैयार नहीं
वे हिजड़ी अहिंसा से न्‍याय दिलाएंगे।
 
 
 
 

देहाती कवि का बयान


मेरी कविता क्‍यों नहीं छपती
पत्रिकाओं में ?
इसलिए तो नहीं कि
नहीं होते विदेशी नाम और नगर
लेविंस्‍की न क्‍लिंटन
विदेशी अनुभवों का हवाला
फाइव स्‍टार रेस्‍तरां
विदेशी कवि और कविता का बखान
हि्‌वस्‍की, साकी, मयखाना
स्‍वदेशी कविताओं की चीर फाड़
नहीं होती दिल्‍ली
न वहां की करतूत
लक्‍जमवर्ग, न्‍यूयार्क की चिकनी गलियां
या फिर नीत्‍से, शेली, ओक्‍तावियो, पाज का भूत!
पिछड़े जिले के पिछड़े गांव में रहता हूं
मैं संवेदना खोजता नहीं भोगता हूं।
आखिर जब रोज गांव में
अठन्‍नी के लिए उठती हैं लाठियां
किसी लड़के से बतियाती लड़की होती है कुल्‍टा
एक पानी बिना मरती फसलें
मास्‍साब बिन नरछोई में घूमते
स्‍कूली बच्‍चे
रोग का इलाज ओझाई
दूध के लिए रात भर चिंचियाता बच्‍चा
भगनी की टिबियाई देह
डसकी चुचकी छाती को चूसता मुन्‍ना।
तो कहां पाऊं गमकते आख्‍यान
क्‍यों नहीं चाहता इसे कोई सुनना ?
वह जो बेचैन सा युवक है न!
उसकी विद्रोही कविताओं को
प्रकाशित कराने की एवज में
शहर का काना कवि
उससे कई रातों से
तैयार करा रहा है अपनी ‘पाण्‍डु‘ लिपि।
पहले भी कई बार ऐसा ही किया है उसने।
फिलहाल, अभी तक नहीं छप पायी है
उसकी एक भी कविता।
पता नहीं क्‍यों ?
उसकी कविता में है -
चरित्‍तर की दुलही माने गांव की मेड़
एक रात में मरीं गडे़रिया की चार भेड़
दस्‍सी के विधवा से पेंशन खातिर ऐंठी रकम
इंदिरा आवास में दोयम दर्जे की ईंट
एक-बारह का मसाला
होरहा चोरी पर थाने में पिटाई
बूढ़े से व्‍याही गयी किशोरी
जमींदार की कलुई से छिछोरी।
सवाल अनुत्‍तरित है
कृपया प्रकाशक जवाब भेजें।
 
 

आप और हम


आपको चाहिए
उनको देना है
आपका मुंह सुरसा
वे तो अदद चबेना हैं।
 
खाइए और गाइए
मंच पर, तंत्र पर
यंत्र पर, संत पर, महंथ पर।
गांव-शहर, झोपड़ी-महल पर।
सुनाइए प्रवचन
बनिए सज्‍जन
आप तो पवित्र वेदी हैं
हम ही हैं हवन।
आपको वरदान चाहिए
उन्‍हें खान-पान चाहिए
इन्‍हें भगवान चाहिए
हम तो आदमी हैं
हमें एक अदद इंसान चाहिए।
बाकी सब तेरी पूंजी
जो चाहे कर
चाहे देश बेच
चाहे दिल्‍ली में मर
हमें इससे क्‍या लेना है।
 
दे मेरा इनसान
बभनौटी हो या चमरान
राबर्ट हो या जौहर खान।
दे जल्‍दी दे, मुझको जाना है
नहीं कहूंगा तुझको अब ‘आप‘
कौन है तू और कौन है तेरा बाप
सब जानता हूं, इसीलिए तुझे नहीं
तेरे दरवाजे की कुतिया को मानता हूं।
तीसरी पीढ़ी में कर रही तेरी रखवाली
जहां बदली हैं तूने आधा दर्जन घरवाली।
तुझे रूप चाहिए, देह चाहिए
पैसा बरसाने वाला मेह चाहिए
संसद में करांची और लाहौर चाहिए।
ले, सैंतालीस से ले रहा तू, ले
और भी सदियों तक लेता रह
तूं खड़ा रह, बाकी जायें ढह
तूं ही पूरा राजा, हम तो तेरी सेना हैं।


 

शौक साहब


वे पहले व्‍यक्‍ति हैं
जिन्‍होंने मुझे ‘गुड ब्‍वाय‘ कहा
मेरे संघर्षों को सराहा।
उस बूढ़े ने मेरे सामने मित्रता का प्रस्‍ताव रखा।
मैंने पूछा-
क्‍या मैं आपके सामने शराब पीने को स्‍वतंत्र हूं !
सिगरेट का सुट्‌टा मारूं तो कोई असर !
हसूं, बोलू, पसरूं
गरियाऊं- सरवा, ससुरू
जिद-जूनून
लिहाज-कानून
करूं तो !
मेरी लोफर जिन्‍दगी पर
आपको कोई ऐतराज !
उन्‍होंने कहा- ‘नहीं
बिल्‍कुल ही नहीं।
बल्‍कि, अच्‍छा लगा तो
मैं भी हो सकता हूं सरीक।‘
मुझे तसल्‍ली हुई।
यह मेरे लिए बौद्धिक आतंकियों से निजात भी थी
और अपनी आजादी के लिए मुहर भी।
 
 
 
 

चलता चल


मुसाफिर चल
चलता चल
कभी सूख
कभी फल।
 
मुसाफिर चल
मत रुक, मत झुक
उड़ा सब मार के फूंक
अड़ा रह, सबका करेगा धुक-धुक।
क्‍या हुआ जो जुगुनू सा ही रहा प्रकाश
जल तो सकता है, जल
इसी में निकलेगा कोई हल।
 
रात भयानक तो क्‍या
कड़े हैं मानक तो क्‍या
हवाएं कहां मानती हैं दीवारें
कौन दाब सका है मन की पीरें
निकल, मन के दरबे से निकल
जब तक जीता है जी
दुश्‍मन की छाती पर अरहर दल।
मुसाफिर चल
चलता चल।
 
 
 
 
 
 

जी रहे हैं


एक सी दुनिया
तरह-तरह के लोग
रोज ही मरते हैं
फिर भी जी रहे हैं लोग।
 
आ रहे हैं, जा रहे हैं
नाच रहे हैं
खा रहे हैं
लाश आंगन में
पड़ोसी गा रहे हैं।
 
कक्षाएं खंडहर-सी
सुनाती-सी अतीत गौरव
पहले बजती थी वीणा
अब घूरते श्‍यामपट भैरव।
बच्‍चे आ रहे हैं
धूल पोछ बैठ रहे हैं
ऊंघ रहे हैं
धूप सेंकते मास्‍टर का
मिजााज सूंघ रहे हैं।
 
आफिस खुला है
बाबू चाय की दुकान पर
खिदमत जारी है
फाइल के निबटान पर।
साहब दौरे पर हैं
चपरासी मयखाने में
आजकल काम लगा है
गांव के पायखाने में।
 
खेत की फसलें
अधेड़ के बाल
किसान की आंख
पूस में ही सूखे ताल
झोपड़ी में बेटी
जन्‍म पर पछता रही है
मौत के लिए
छलिया कृष्‍ण को मना रही है।
 
 

कविता और साजिश


कविता का नाम लेते ही
उसने दे मारा एक झन्‍नाटे दार सवाल-
बोल, क्‍या है कविता और कौन है कवि!
उल्‍लू बनाते फिर रहे सभी।
कि वह ब्रह्‌मानंद सहोदरा है।
तू जो बोले, सुंदर
मैं जो भी बोलूं, वह भोथरा है।
बड़ी तेज चोट थी
वर्तमान में खड़ा था
और पिछली सदी घूमने लगी।
 
क्‍या करता!
सब सच-सच बता दिया-
हां, सचमुच हमने घालमेल किया
दरबार में अमृत हमने चखा
और विष उनके खाते में दिया।
भीतर तो बर्फ जीता हूं
बाहर ही आग सीता हूं।
हमारे पूर्वज
जिन औरतों पर मरे थे
वे आज जैसी ही थीं
बखानना मजबूरी थी
क्‍योंकि उनके वियोग से डरे थे।
यह भी कि वे देह देखते थे
अंतरपरख का माद्‌दा नहीं था
स्‍त्रियों का मन बहुत सुंदर था
पर पूर्वजों का ही मन भद्‌दा था।
लेकिन करते भी तो क्‍या !
रोटी तो राजा ही देता है न!
यदि उन्‍हें बताते कि वह
नपुंसक है, कायर है
बकरे से भी नहीं लड़ सकता
मुर्चाए कट्‌टे का हवाई फायर है
वगैरह तो क्‍या होता
पूर्वज अपनी जान से हाथ धोता
दे देते राज से निकाला
तब हम क्‍या करते लाला !
उसने कनपटी पर सटाई बंदूक
कहा, आज की भी बात भूंक।
मरता क्‍या न करता
जिन्‍दगी के लिए क्‍यों न डरता।
बोला, हुजूर तरक्‍की का जमाना है
गा रहे हैं इसिएल कि गाना है।
हमारे भाई पूर्वजों से भी महान हैं
हर शहर में कोई न कोई डान है।
वे एसी में रहते हैं
सफारी में चलते हैं
दिल्‍ली के बबूल बाग में
आम की कोपलें उगाते हैं
श्रोताओं की मंडी में
बयाई पर ऊंचे दाम दिलाते हैं।
वे गढ़ते हैं इंसानियत की परिभाषा
हर शहर में भेज दिये हैं अपना सांचा
हम उसी में दलित और औरत की पीड़ा
गुदगुदाते मन की भट्‌ठी पर खौलाते हैं
फिर थोक के भाव से प्रकाशकों को पटाकर
सिफारिशों के तराजू पर तौलाते हैं।
लेकिन, हुजूर आप हैं क्‍यों खिसियाए
अपने हो, क्‍यों मान रहे पराये।
हमने बेवकूफ से बेवकूफ अधिकारियों को
लिखकर दी है कविता, कराये हैं बड़े काम
आइए आपको भी बना दूंगा कवि
खूब मिलेगा नाम, ऊंचा होगा दाम।
 
 
 

देखुहार


देखुहार आये हैं
देखुहार आये हैं
झोला में मीठा
और अनार लाये हैं।
 
ये है बोलेरो और ये है सफारी
राजा-से उतरे हैं कल्‍लू तिवारी
लकालक कुर्ता, चमाचम जूता
माथे पे रोली, करेजा में बूता।
बिछा है माचा और सेमर का गद्‌दा
बतियाने की खातिर आये हैं दद्‌दा।
आंगन में खुसुर-फुसुर, दरवाजे ठहाका
बब्‍बू का सीना हुआ जैसे वीर-बांका
कलाई पकड़के खींची हैं भौजी
बाल बिखराए ही जाएंगे क्‍या जी !
बन-ठन के जाओ, वो बहार लाये हैं।
 
तस्‍तरी में मीठा और मग्‍गा में पानी
बब्‍बू चले ज्‍यों झुमाते जवानी
गोरा सा चेहरा, बड़ी-बड़ी आंखें
जैसे कल ही परिंदे ने खोले हैं पांखे।
बोलेंगे दद्‌दा आगा और पाछा
पहले से तैयार है सारा ढांचा।
दद्‌दा की सफेदी में बातों का अनुभव
दूर से बता दें बोरी में गेहूं है या जव
सुनिये तिवारी जी, जमाना है बदला
वरना दरवाजे पर बजता था तबला।
बातों ही बातों समझाया कुछ ऐसा कि
तिवारी की गट्‌ठी से निकल आया पैसा।
न पूछा उन्‍होंने कि क्‍या है पढ़ाई
दद्‌दा की करने लगे हैं बड़ाई।
आंखों ही आंखों हुए हैं इसारे
झक्‌ से बाबूजी पहुंचे पिछवारे।
पोछें रूमाली से आंखों के कोरे
लौटे तो कल्‍लू खड़े खींस निपोरे।
कहां तो कोदो को सिहकता था मनवा
कहां तो कल्‍लू चावल का खरिहान लाए हैं।
 
 
 

छोटा सा गांव


छोटा सा गांव
चल रहे दांव पर दांव
लाठी के बूते लल्‍लू
जमा रहे हैं अपने पांव।
 
चकरोड-नालियां रखैल
दोगले से खड़े डांड़।
देख बंडुल की गदराई खेती
होरी ने पाले तगड़े साड़।
तहसील की टोली लाकर
हीरो बन गये पन्‍ना साव।
 
छोटे-छोटे मुंह
बड़ी-बड़ी बातें
फुटपाथ के चूल्‍हे-से
जलते-बुझते नाते
माघ-सी बिटिया की देह
जलने लगे हैं नजरों के अलाव
 
शहर- सपना और मंजिल
घर- राह तकती बिरहिनि
बेटे की पकती सफलताएं देखने
काट रहीं दादी-अम्‍मा दिन
बंटाईदारों के बिरते छन रहे
कालोनी के पूरी और पुलाव।
 
 
 

अंतरमन


रोते रहना, हंसते रहना
दम भर-भर चलते रहना।
मत रुकना, मत झुकना
अंतरमन को सुनते रहना।
 
अंतरमन के न्‍यायालय में
फैसले निश्‍चय सच्‍चे होंगे
सिद्धांत कोख में तप कर
प्रसवित तेरे बच्‍चे होंगे।
गूंगे-बहरों का गांव है लेकिन
तुम वाणी बन मुखरते रहना।
 
खोना मत तुम संयम अपना
बीसवीं सदी-सा चलते रहना
सूत पुत्र का पहन कर चोला
सौ-सौ दुर्योधन ढोते रहना
यादों के उन्‍माद काल में
कफ्‌र्यू रोज लगाते रहना।
 
 
 

प्रेम और दुनिया


कील कहो, पत्‍थर कहो
बरबादियों के अक्षर कहो
छलना कहो, माया कहो
मेरी जिन्‍दगी को मत्‍सर कहो
जो जी में आये सब कहो
तुम समाज हो
तुम्‍हें कहने का हक है
तुम्‍हारी उजली-उजली चादर है
तुम्‍हें दाग लगाने का झक है।
बड़ी-बड़ी जीभ और लंबी-लंबी आंत
अपनी-अपनी शेखी है और अपनी-अपनी जात।
कोठी है, कोठा है
शेखी है, सोटा है
कोई तरीका अपनाओगे
बड़ी होगी बिसात।
तुम्‍हें क्‍या पता है कि
ब्रज ही नहीं दुनिया की हर गली में
आज भी वंशी की भटकी हुई धुन
कदंब की शाखों में
हर शाम आकर टकराती है
रोज ही उसके सिर में होते हैं घाव
रोज ही खून के आंसू बहाती है।
यदि बंद नहीं हो गयी होती
तुम्‍हारी असमय में दृष्‍टि
तो शायद तुम देख पाते कि
राधा आज भी हर जगह
पागल सी अपने कान्‍हा को खोजती है
हर आहट में उस छलिया की सूरत ढूंढती है।
भाई मठ के मठाधीशों !
पोथियों के अगस्‍त्‍य !
गोटियों के सेटरों !
तुम्‍हें क्‍या पता कि
प्‍यार के मकहमे में रहने वालों की
सूरत और सीरत क्‍या होती है।
जिस चादर को ओढ़कर
कबीर कबिरा हुआ था
उसे बुनने में उसे
कितनी मशक्‍कत करनी पड़ी थी।
उसकी देह पर कितने ठेकेदारों के
कैसे-कैसे घाव थे
उसकी राममयी छाती पर
किस-किसके पांव थे।
फिर भी वह हर शाम
अपने राम की बहुरिया बन जाता था
सब खर्राटे लेते थे और वह जागता जाता था।
तुम्‍हें पता है !
कि तुम उस पर हंसते थे
और वह तुम्‍हारे लिये क्‍यों रोता था !
 
 
 
 
 
 
 
 
 

तुम और मैं


 
तुम और मैं एक जैसे
फर्क बस इतना ही कि
तुम कभी-कभी आदमी बनते हो
और मैं कभी-कभी पशु।
 
तुम्‍हारा आदमी होना
मंचों और तमंचों पर आधारित है
मेरा पशु होना इसलिए जरूरी है कि
उसके बाद मैं
आराम से आदमी को
खड़ा कर लेता हूं।
तुम थोड़े से आदमी
हम थोड़े से पशु
तुम रोज चरते हो
मैं कभी-कभी।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

नयी कविता


 
भैंस गाने लगी हैं
और सुन रहे हैं बीन
लगता है लौट गये
नयी कविता के दिन।
 
भर्तियां जारी हैं
नये कवि आमंत्रित हैं
पुस्‍तकों से रिश्‍ता नहीं
स्‍वयं में अभिमंत्रित हैं।
नितंबों की थाप को
कह रहे- ताक-धिना-धिन धीन।
 
व्‍याकरण बेकार का अनुशासन
शब्‍द-ध्‍वनि क्‍या चीज है
फूट पाया अब तक नहीं
कल्‍पना शक्‍ति का बीज है
नायिकाओं के लिए शब्‍द
जानेमन, कमसीन, नमकीन।
 
बिम्‍ब हुए चाट फुल्‍की
और कनस्‍तर के पत्‍ते जूठे
मिथकों में श्रीप्रकाश-ददुआ
चचा केशरी के करम फूटे
अज्ञेय तुम ठहरे कहां
चलों करें एक-दो-तीन।
 
बता रहे हैं वे कि
‘नयी कविता मारुति कार है
महफिल में नाचती तवायफ
प्‍यार को बेकरार है‘
कविता अब मोटी हुई
कवियों की बुद्धि महीन।
 
 
 

सीना मेरा, चोट तुम्‍हारी


 
सीना मेरा, चोट तुम्‍हारी
जमाना तुम तीर चलाओ।
 
तंत्र तुम्‍हारा ढीला-ढाला
नहीं कोई सुथरी तस्‍वीर
उनके काले करतूतों को
तुम कहते हो तकदीर।
तेरी जंजीरों को तोड़ रहा हूं
तुम अपने पहरेदार बिठाओ।
 
कोई खाए रोटी-टुक्‍कर
कोई फेके हलुआ खीर
अपने ही कुनबे का कलुआ
रोज बहाये नयनों से नीर।
मैं चला रहा हूं तलवार
तुम अपनी ढाल उठाओ।
 
यह कैसा कानून तुम्‍हारा
प्रीति की जिसमें नीति नहीं
प्रकृति के शाश्‍वत मूल्‍यों की
हत्‍या की जिसमें रीति रही।
मैं प्रेम का दीप जलाता हूं
तुम अपने तूफान बुलाओ।
 
दो पंछी मिल गये अगर तो
टूट गया सब धर्म तुम्‍हारा
धर्म जहां कमजोर है इतना
नहीं है उसमें विश्‍वास हमारा।
मैं प्रेम धर्म का निर्माण करूंगा
तुम सब अपने मनु बुलाओ।
 
मानव को मानव से बांटे
तुम खींच रहे संयम-लीक
जीवन मेरा, नियम तेरा
कहो कहां तक यह है ठीक।
काट रहा हूं वर्ण-धर्म के बंधन
तुम मुझको फांसी पर लटकाओ।
 
कितने दिल टूट चुके हैं
तेरी चक्‍की में पिसकर
निकल रहे हैं आज लहू बन
आंखों से उनके रिस कर।
लो उन रीतियों का यह पिंडदान
तुम अपने पंडित बुलवाओ।
 
 
 
 

समय


एक बकरी
एक लड़की
एक बुढि़या
तीनों बैठती हैं
एक जगह रोज।
तीनों की मुद्रा
खामोशी
टकटकी
एक-सी।
एक परिवार की
तीनों सदस्‍य।
तीनों के
कट रहे हैं समय
चारे के लिए
शादी के लिए
मौत के लिए।
 
 
 
 

आओ खेलें


बहुत हो चुकीं
निराशा की बातें
आओ अब चलें
कुछ खेलें।
हिमालय के कंधे पर चढ़
उसके मस्‍तक पर तिलक लगाएं
उसके पथराए दिल को तोड़ें
और एक ठंडी नदी बहाएं।
बात सही है कि
इधर देश का चेहरा
काफी धुंधला हुआ है
गुत्‍थियों में उलझा हुआ है।
मगर क्‍या फर्क है
वहां तो और भी नर्क है।
आओ सुभाषों को जगाएं
भ्रम को सच्‍चाई से धोएं।
ठीक है कि चट्‌टानों पर
फूल नहीं उगा सकते
उन्‍हें तोड़कर इमारत तो बना सकते हैं।
आओ, करें प्रामिश-
अब हम व्‍याख्‍यान नहीं देंगे।
हम केवल ‘करेंगे‘।
अब पड़ोसी का बेटा नहीं
सरहद पर हम मरेंगे।
आओ, सोखें दुःख
बांटे खुशी-सुख।
फिरकापरस्‍तों को क्‍यों कोसें
अपने-अपने घरों, पेटों
दिमागों और लालचों को ही
सिखाएंगे तमीज।
आओ, बंद करें
सरकारों की साजिश।
आरक्षण से विकलांग होती बस्‍ती को
दिखाएं उनके भविष्‍य की सीडी
उनकी परजीवी सुतक्‍कड़ आत्‍मा को
पिलाएं चाय और सुरखुरू बीड़ी।
 
 
 
 

मेरी रानी


 
मेरी रानी
भरो नदी से पानी
अगली पीढ़ी के लिए
बनो एक कहानी।
मिलने लगे हैं प्रकृति से संकेत-
आगे नदी नहीं रहेगी
नहीं रहेंगी गंगा।
खूब रहेंगे कपड़े
आदमी रहेगा नंगा।
न रहेंगी बेटियां
न होगा शर्म
इक्‍कीसवीं सदी में
विकसित है पुरुष धर्म।
पहाड़, जंगल, हवा
नींद, हंसी-कहकहे
प्‍यार-दुलार
गीत-गांव
पेड़-छांव
दूध-गाएं
छाती-माएं
बिकेंगी सब बाजार में
विज्ञापनों में।
रोबोट बताएंगे अल्‍हड़ता
भावनाएं बाजार में
किलो के भाव बिकेंगी
गडि्‌डयों की तुला पर
बाबा जी की दुआ निकलेगी।

 


 

कनेल के फूल


 
हां, बहुत जरूरी है
एक जबर्दस्‍त प्रतिक्रिया बनना।
अगर वे बनें मुलायम
तो तुम मायावती-सी तनना।
 
अब नहीं लगाएंगे बागवानी
फूल तोड़ ले जाएंगे आडवानी।
देखा नहीं, सारे गमकाऊं फूल
बिखेर दिये गये गांव-बाजार में
थपकियों से छिल गयी पूरी पीठ
नहीं अंतर शातिर फूल और कटार में।
 
वे बनें हाथी तो हम बनें कुत्‍ता
वे बने साफा तो हम बने ‘जुत्‍ता‘।
वे हथौड़ा तो हम बनें आग
वे मनाएं दिवाली, हम गाएं फाग।
उनका रहे पंजा
हमारा सिर गंजा।
वे लगाएं हैंडपंप
हम मचाएं हड़कंप।
वे चलाएं साइकिल
हम बिछें सड़क पर कील
वे बनें त्रिशूल
हम कनेल के फूल।
वे देवता के पांव गिड़गिड़ाएं
हम मस्‍तक पर इतराएं।
गुलाबों-कमलों को बताएं-
तू है फुटही ढोल
मैं बड़ा अनमोल
तू बाबाजी का ढकोसला
मैं गरीब का घोसला।
 
 

श्‍मशान


अक्‍सर सोचता हूं कि
क्‍यों जी रहा हूं
और कौन हूं !
सर-सय्‌या का भीष्‍म-
प्रतिज्ञाओं का भोगता प्रतिफल
एक विवशता, जीवंतता, मृतप्राय!
नहीं, नहीं, अभिमन्‍यु-
सामाजिक चक्रब्‍यूह में जिसने
अधकचरी विद्या का फल पाया!
नहीं मैं मरना नहीं चाहता।
तो फिर कृष्‍ण हूं!
ऊफ्‌! महान धैर्यशाली हो कर भी
जिसने प्रतिज्ञा तोड़ी और
बहेलिये के हाथ मारा गया!
तब क्‍या राम!
नहीं, स्‍त्री का लगातार अपमान
रोना, फिर भी दूसरों के उलाहने पर
अपनी प्रियतमा का परित्‍याग किया।
तब क्‍या हूं ?
लौटता हूं जमीन पर
पाता हूं कि मैं एक तनाव हूं
संशय हूं, धृतराष्‍ट्र हूं, संजय हूं
एक त्रिशंकु हूं
सिद्धांत और व्‍यवहार के बीच
लटका हुआ।
भागता हूं खूबसूरत ताजमहल बनने
कि तभी भीतर से चीखती हैं कई आवाजें
कान में फेकरती हैं वे-
मैं बेकसूर था
सम्राट ने बेवजह मेरा खून निचोड़ा
यह इमारत मेरे खून के गिलेवे से बना है।
शोर बढ़ रहा है
मैं भाग रहा हूं
पुराण और वर्तमान के पात्रों को
अपने में लगातार नाप रहा हूं।
हारकर रोज अकेले में विरान हो जाता हूं
यकीन मानिए रोज रात को शमशान हो जाता हूं।
 
 
 

बहने दो


रोको नयनों को
मत आंसुओं की धार बहने दो
भर चुकी है जितनी नदी
उसे ही पार करने दो।
 
समय की हर शिला पर
अब तक सजाता था जिसे
बड़ी मुश्‍किल से हंसा है
उसे प्‍यार करने दो।
 
लंबे समय से घिर गयी थी
बालुओं की जो यवनिका
हट रहा है धीमे से वह
रुको दीदार करने दो।
 
अधपकी नींद में भी रोया है खूब
भीतर ही भीतर घुलता हुआ
मत लगाओ तोहमतें अब
उस चांद को मनुहार करने दो।
 
रात की कालिमा से कहो
अंधेरा अब नहीं होगा
खत्‍म हुआ दौर गर्द-ओ-गुबार का
बह रही है, यह बयार बहने दो।
 
 
 
 

परिभाषा


जिंदगी माने खींसनिपोरी
दाल-भात-टुक्‍कर
मेहमान, कद्रदान, भगवान
हाय-तौबा, नींद-मैथून
कभी गर्दन ऐंठी
और कभी बैठी।
कभी वाह-वाह
कभी हवा-हवा।
अस्‍मिता- नक्‍कारखाने में तूती
प्रतिष्‍ठा- शो रूम का माल
डिग्री- जी हुजूरों की भीड़ में शामिल होने का लाइसेंस
न्‍याय- पत्‍थर पर सिर पटक कर लाल करना
विद्यालय- भुलावे का मसालेदार साधन
समाज-गूंगे-बहरों की महफिल
नेता- गिरगिट की नयी प्रजाति
ईमानदारी- बेईमानी का मौका न मिलना
पंडित- लोमड़ी का सभ्‍य मुखौटा।
 
 
 

अंधड़


जीते हैं जो अंधड़ में
उनसे गम का हाल न पूछो
नफरत में जलते दिल से
आग थी कितनी लाल, न पूछो।
 
आदर्शों की ढपली वाले
क्‍या प्रीति का मोल चुकाएंगे
सौ-सौ बिस्‍तर नाश किये
फिर भी नीति पढ़ाएंगे।
एक ही प्रीतम पर जिसने
सौ-सौ जीवन वार दिया
उसमें वंशी वाले के प्रति
भरा है कितना मलाल, न पूछो।
 
तारे जमीं, आदमी आसमान पर
सवाल उठे हैं सूरज के बिहान पर
तन गयी हैं इमारतें आलीशान
आ गयी है आफत अब शमशान पर
नुक्‍कड़ों के मंदिरों में बिक रहे कंडोम
उस देवता पर क्‍या बीती है, हाल न पूछो।
 
बड़ा धुंधला है सब, कुछ भी साफ नहीं
चलते हैं जहां से पहुंचते हैं वहीं
कहां तो हमले थे पराई नार से भोग पर
राजू-काजू के संभोग को कह रहे अब सही।
बुलंदियां छूने को गिर पड़े हैं हम जिस तरह
कितनी बार आत्‍मा का किया है हलाल न पूछो।
             

अखबार का आदमी


अखबार का आदमी हूं
लिखता हूं, बेचता हूं
बिकता हूं और बिकवाता हूं
आदमी रह भी गया हूं!
अखबार बनकर सोचता हूं।
ढर्रे की जिंदगी बेतरतीब
ठीक बनारस की सड़कों, लड़कों
घाटों, गलियों और मंडियों की तरह।
बयान मेरे- पागलों का आंय-बांय-सांय गाना
गाते जाना, खाते जाना, पीते जाना
हंसते जाना, हंसाते जाना
अकेले में बैठकर गुदड़ी पूरते जाना।
अस्‍सी, लंका- एक से एक वीर-बंका
घूमते-टहलते चाय-पान की गुमटियों पर
पीना-खाना कम, कान कनबतियों पर
उनका चूल्‍हा-उनकी औरत
किसी की बेटी, किसी की शोहरत।
चौराहे पर तैनात पागल-
खामोश, दार्शनिक-सा
जैसे माथे पर हर मंदिर से लगा आया हो तिलक
देह पर कथरी, गुदड़ी, चीकट टोपी।
सड़क पर आते-जाते लोग
रिक्‍शे, स्‍कूटर, भैंसों का झुंड, साड़
फर्र-फर्र उड़नपरी-सी
देह के कई झरोखे खोले
स्‍कूटी सवार लड़कियां
मुंह में सिगरेट दबाए अंग्रेज लेडियां
पुरुषनुमा औरतें, औरतनुमा पुरुष
छोटे-छोटे मुहों से बड़ी-बड़ी बातें
बड़े-बड़े मुंहों के बंद दरवाजे
घूमते-घामते
आवारा कुत्‍तों-शातिर बिल्‍लियों-से टोह लेते
रोज घुस जाना अखबार के दफ्‌तर
एसी कमरे की कड़क ठंड
लिफाफों में खबरें- अंड, बंड, संड
कहीं सड़क टूटी, अधिकारियों की आंख फूटी
मौसमी दर्द, दुर्घटना, पेड़ पर फांसी लगाई बधूटी
कूटनीति, राजनीति के अंदरखाने का कुहराम
अबोध के साथ दुराचार किया दुलहीपुर का कांशीराम
और भी बहुत कुछ- भाषण, प्रवचन, चेतावनी
मुठभेड़, हत्‍या, रेलवे पर लाश, नेता जी की आगवानी
पैड के पन्‍नों पर
आड़े-तिरछे-चिरकुट काले अक्षर
अक्षरों में रिपोर्टर की खिसियाहट
चापलूसी, मक्‍कारी, समाचार में विज्ञापन।
सबको खूबसूरत बनाना है
खाली दाल, चावल, आलू मिला है
उसे जायकेदार व्‍यंजन बनाना है।
हड़बड़ी में प्रिंट लेकर दौड़ते लोग
जल्‍दी-जल्‍दी, छूट रहा है एडीशन
अफरा-तफरी में निकल आया बटर।
चलो मुश्‍किल से खत्‍म हुआ काम
सड़क पर ठेलेवाला खड़ा है लेकर आम
बारह बजे की रात
अब निकले हैं पेपर के सांड़ छुट्‌टा
बड़ी मशक्‍कत रही भाई
अब आओ मार लें बीड़ी का सुट्‌टा
 
 

सावधान!


मत बैठो रखकर हाथ पे हाथ
विकट हवाएं फिर चलेंगी
परिंदे फिर उड़ेंगे
इमारतें फिर ढहेंगी।
गिद्धों की खूनी आंखें
बड़ी दूर से तलाश रही हैं लाशें
जहां कोई कफन नहीं बांधना चाहता
जहां आदमी केवल गाय रहना चाहता है।
मत बैठो पकड़कर खूंटा और नाद
गलघोंटू फिर उठेगा
सियारिन फिर फेंकरेगी
कागजी पुतले जलाकर
समझ रहे हैं लोग कि
रावण मर गया!
पटाखों के बीच
राम का तिलक हो गया
मिट्‌टी के दीपों से
अंधेरा भग गया
रखना संभाल कर घर की आग
रावण फिर जगेगा
प्रह्‌लाद फिर पकड़ा जायेगा
होलिकाएं शातिर हैं
वे फिर ममता का विश्‍वास जलाएंगी।
देशी बरगदों पर नहीं रहा विश्‍वास
चहारदीवारियों में लग गये हैं यूकेलिप्‍टस
उपयोगितायों की संभावना पर
रहना सावधान, सोख लेंगे भीतर का पानी
गले फिर सूखेंगे, खेत फिर बंजर होंगे।


 

हिन्‍दुस्‍तान


 
सब दौड़ रहे हैं।
सब हांफ रहे हैं।
पहले से काफी गरमी है
फिर भी कांप रहे हैं।
अपने घर महफूज हैं
आग तो पड़ोसी की ताप रहे हैं।
माथे पर त्रिपुंड
लंबी चोटी
बिछाए जा रहे हैं
गोटी दर गोटी।
हार कतई बर्दाश्‍त नहीं
दबाना पड़ा तो दबा देंगे
गर्दन पतली हो या मोटी।
घर में ही उहापोह है
एक भाई खुशबू है
तो दूसरा गोह है।
कक्षाओं में सन्‍नाटा
मयखाने में हलचल
झोपड़ी में जवान विधवा के
मुश्‍किलन बीत रहे हैं पल।
सेयर मार्केट चेरापूंजी
खेतों में रेगिस्‍तान है
आओ चलें भाई अमेरिका
यह तो नये जमाने का हिन्‍दुस्‍तान है।
 
 
 

आओ खेलें पूजा


आओ खेलें पूजा
जो-जो हैं एक
उन्‍हें करें दूजा।
लगाएं माथे चंदन
रावण का अभिनंदन।
चलो करें रामलीला
भरत को भेजें जंगल
हथियाएं पूरा किला।
मारीचों से दोस्‍ती में क्‍या हर्ज है
जब सफलता शातिराने में ही दर्ज है।
आओ खेलें, हिस्‍सा बांटें
मन करे थूकें, मन करे चाटें।
हम पहने माला
उन्‍हें पहनाएं फांसी
कुत्‍ते बैठें मंदिर
हम खेलें सांसी।
धत्‌, तू तो पूरा सत्‍यानाशी
अपने खाये ताजा
हमें खिलाए बासी ?
हम खेलेंगे सूर-कबीरा
मेरी मर्जी ऊंट
तेरी मर्जी जीरा।
मैं पुजारी, तू भिखारी
मैं प्राण, तू पियारी
मैं पानी, तू कियारी
मैं सगुनिया, तू निर्गुनिया
बस, बीनते रहो श्रद्धा की बिनिया।
मैं बजरी तू चकवड़
कर दिया न सब गड़बड़।
अच्‍छा, आओ खेलें सियासत
मनु-माया की आफत
बोल क्‍या करेगा मुल्‍ला
चूड़ी पहनेगा या चुल्‍ला
अबे चुप हो जा अब्‍दुल्‍ला
जा पहले कर दिल्‍ली में कुल्‍ला
ले मनु का लोटा
दे इधर माया का सोटा
लाएं पूरब से हथौड़ा और हंसिया
क्‍या करेगा, मर चुका है कशिया।
सोट, सोट सके जित्‍ता सोट
कौन जाति एवन, कौन बचा है खोट?
काट जबानी हंसिये से वोट
न पीएं दारू तो मार गड्‌डी भर नोट।
चल, तू लखनऊ, मैं दिल्‍ली
उड़ाएं संविधान की खिल्‍ली
माया से कराएं मनु की शादी
बनायें सदी की नयी आबादी।
हां सच्‍ची, कैसी होगी दुनिया !
पंडिताइन जैसी हड़ही मुनिया।
पर मानो पहले मेरी शर्त
नहीं तो तुमको मिला दूंगा गर्त।
अब हर जाति कर सकेगा बलात्‍कार
करते आये हैं जिसे सभी जमींदार
बड़ा होने को यह जरूरी है
जैसे पाकिस्‍तान का जूता मजबूरी है
जब इसी से पूज्‍य होते थे पंडित
गरिमा, महिमा और श्रद्धा से मंडित
तो क्‍यों न करें चोरी, क्‍यों न बनें मक्‍कार
अब सब मिल करें यह शाश्‍वत चमत्‍कार।
जय भीम, जय भारत
जय पैगम्‍बर, जय नारद।
कूट माता की जय !
फूट माता की जय !
लूट माता की जय !
घूंट प्‍यारी की जय !
मनु की जय हो
मनुष्‍य का नाश हो
दलालों में सद्‌भावना हो
माफियाओं का कल्‍याण हो
नमः नवधर्म पतिने हर,
हर, सब हर माया देवे।

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  1. जय शंकर तिवारी6:17 pm

    'रोज मिलता है भगवान'कविता बहुत अच्छी लगी । कवि का हृदय सचमुच विशाल होता है। शुक्ल जी ने जो सवाल इस कविता में उठाए हैं उन्हें पढ़कर हर पाठक को रुककर कुछ सोचना तो पड़ेगा

    उत्तर देंहटाएं
  2. जय शंकर भाई. शुक्रिया.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी सभी कविताएं मुझे बहुत पसंद आयीं। और आपने जो समाज की परिभाषा दिया है,वो अविश्वसनीय सत्य है, मेरी नज़र में समाज की इससे अच्छी परिभाषा नहीं दी जा सकती। आपकी कविताएं हमारी इस पीढ़ी को बहुत कुछ सिखाती हैं।

      हटाएं
  3. आपकी सभी कविताएं मुझे बहुत अच्छी लगीं। समाज के प्रति लोगों को अपना रवैया बदलना पड़ेगा।एक दूसरे के खिलाफ होकर नहीं बल्कि एक दूसरे के साथ कदम से कदम मिला कर चलना होगा। आपने जो ऊपर लेख लिखा है , उसमे लोगों को अच्छा मैसेज मिला है। आपने जो समाज की परिभाषा दी है , वह अविश्वसनीय हकीकत है , मेरी नजर में समाज की ऐसी परिभाषा कोइ दे ही नहीं सकता।

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