हीरालाल प्रजापति की उन्मुक्त चतुष्पदियाँ

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उन्मुक्त चतुष्पदियाँ (मुक्तक)

  [ डॉ. हीरालाल प्रजापति ]

1. काम का कबाड़ा

सामान यकीनन कुछ कम दाम का निकलेगा ॥

लेकिन कबाड़ में भी कुछ काम का निकलेगा ॥

तलवार  शिवाजी की , टीपू की न मिले पर ,

चाकू, छुरी, सुई, पिन हर आम का निकलेगा ॥

 

2. सुरक्षित सच

न  हरिशचन्द्र  न  सुकरात मुझे बनना है ॥

आत्मघाती न हो उतना ही सच उगलना है ॥

फूट जाये न कहीं सर ये छत से टकराकर ,

बंद  कमरों  में  एहतियात से उछलना है ॥

 

3. इश्क़ का असर

लोग थक जाते हैं हम तो तेज़ रफ्तार हो गए ॥

जबसे हम तेरी मोहब्बत में गिरफ्तार हो गए ॥

इस कदर तुझसे हुए हम बावफा ईमानदार ,

अपने से अपनों से दुनिया भर से गद्दार हो गए ॥

 

4. आज का दौर

वो जमाने गए जो थे किसी जमाने में ॥

लोग थकते न थे महबूब को मनाने में ॥

सख्त जोखिम भरी है आज रूठने की अदा ,

यार लग जाते हैं नये यार झट बनाने में ॥

 

5. तोहफा

उसने जब मांगा मकां मैंने उसे इक घर दिया ॥

उसको कब तकलीफ दी खुद उसके घर जाकर दिया ॥

एक दिन मुझको ज़रूरत पड़ गयी थी टांग की ,

उसने भी लाकर मुझे इक खूबसूरत पर दिया ॥

 

6. ज़िंदा मुर्दा

क्या फायदा कि चुप हो गज़ भर ज़बान रखकर ॥

सुनते नहीं अगर तुम हाथी से कान रखकर ॥

आँखें हैं पर न देखो न देखो , सर धर के गर न सोचो ,

फिर तुम तो चलता फिरता मुरदा हो जान रखकर ॥

 

7. बेरोजगारी

तमगे तो हमे एक नहीं चार मिले हैं ॥

इक बार नहीं चार चार बार मिले हैं ॥

चुन चुन के ऊंची ऊंची डिग्रियों के वास्ते ,

अब तक मगर न कोई रोज़गार मिले हैं ॥

 

8. इश्क बनाम शादी

इश्क में जाने कैसे कैसे पापड़ बेले हैं ॥

शादी के तो बाद और भी विकट झमेले हैं ॥

पहेले लगता था कि अकेलापन इक विकट सज़ा है ,

अब लगता है हमसे बेहतर निपट अकेले हैं ॥

 

9. हश्र

कार  सा  जीवन  था मेरा बैलगाड़ी  हो गया ॥

मुझसे खरगोशों से कछुआ भी अगाड़ी हो गया ॥

हर कोई बेताब मुझसे जानने  इसका सबब ,

बांटने  वाले  से  मैं  कैसे  कबाड़ी हो गया ॥

 

10. कोरा तकल्लुफ

अब जब दाँत रहे न बाकी पान सुपाड़ी लाये हो ॥

पीने  वाला  उठ  बैठा जब दारू ताड़ी लाये हो ॥

करवाया तब खूब सफर पैदल जब छाले पाँव में थे ,

अब क्या मतलब मंज़िल पर तुम मोटर गाड़ी लाये हो ॥

 

11. दोस्त की परिभाषा

लाख  खूंखार  हो  शैतान  हो  वली समझे ॥

दौस्त वो है जो अपने दोस्त को सही समझे ॥

दोस्त का चिथड़ा चिथड़ा दूध भी टहे दिल से ,

रबड़ी छैना बिरज का मथुरा का दहि समझे ॥

 

12. त्याग

उसके खर्च उठाने हर दिन बिकता रहा हूँ मैं ॥

वो क्या जाने उसे बनाने  मिटता रहा हूँ मैं ॥

उसको काले काले कि आवाज़ न दे दुनिया ,

उसको सूरज सा चमकाने घिसता रहा हूँ मैं ॥

 

13. आमद – ए – अक्ल

जी करता है अपने सर से पटक  गिराऊँ मैं ॥

अपने हल्केपन का कब तक बोझ उठाऊँ मैं ॥

खूब रहा गुमनाम कभी बदनाम भी खूब हुआ ,

अब सोचूँ कुछ यादगार कर नाम कमाऊँ मैं ॥

 

14. कड़वा सच

गैया  से  कहीं ज़्यादा  देती है दूध भैया ॥

लेकिन न भैंसिया को कहता है कोई मैया ॥

है रूप रंग जात पात की अभी भी बात ,

सीरत से  कहीं ज़्यादा हैं सूरत के पुजैया ॥

 

15. संकल्प

न  सिर्फ  ख्वाब देख  न  केवल विचार कर ॥

करना है जो भी तुझको वो सब आर पार कर ॥

बेशक तू  पहन  करके जामा सादगी का चल ,

बस  बैलगाड़ी  चाल  छोड़ खुद को कार कर ॥

 

16. बदकिस्मती

खास तकदीर  हमने  पायी है ॥

खुद कि मय गैर है  परायी है ॥

लोग पी पी के डोल झूम रहे ,

अपने हिस्से में प्यास आयी है ॥

 

17. कारण

क्या बताएं दोस्तों  हम किसलिए खामोश हैं ,

आयें तो बस वो हमारे फिर चहकना देखना ॥

जाम पर हम जाम पीकर भी अभी हैं होश में ,

उनसे आँखें चार तो हों फिर बहकना देखना ॥

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