गुरुवार, 30 अगस्त 2012

विजय वर्मा की बेहद महंगी ग़ज़लें

ग़ज़लों पर महंगाई का असर

कुछ चुनिन्दा शे'र और अगर वे आज के ज़माने में लिखे जाते तो कैसे होते --इसे पेश

कर रहा हूँ,मीर साहब,कतील शिफई साहब ,शहरयार साहब,फैज़ साहब और खुमार साहब की आत्माओं से माफ़ी माँगते हुए,अगर माफ़ कर सके तो.

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सिरहाने 'मीर' के आहिस्ता बोलो

टुक रोते-रोते सो गया है.

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पेटी अनार  के आहिस्ता खोलो 

भाव पहुँच के बाहर हो गया है.

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.एक धूप सी जमी है निगाहों के आस-पास

ये आप है तो आप पर कुरबान जाइए .       [ कतील शिफई ]

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एक हूक सी उठी है कलेजे के आस-पास

हल्दी २०० Rs /kg है,दाल बिना हल्दी के खाइए.

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.माना कि दोस्तों को नहीं दोस्ती का पास

लेकिन ये क्या कि ग़ैर का एहसान लीजिये.  [शहरयार.]

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माना कि शासकों को नहीं शासितों का ख्याल

लेकिन ये क्या कि हँसते-हँसते जान लीजिये.

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दोनों जहान तेरी मुहब्बत में हार के

वो जा रहा है कौन शबे-ग़म गुजार के.      [फैज़]

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बेज़ार है वो दाम बढ़ने से ,बार-बार के

कोई  जा रहा है बाज़ार झक मार के.

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कैसे-कैसे गिले याद आये 'खुमार'

उनके आने से कब्ल, उनके जाने के बाद.

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कैसे-कैसे बोझ लाद दिये हज़ार

कुछ बजट से पहले, कुछ बजट के बाद.

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v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

4 blogger-facebook:

  1. बहुत सुंदर
    वाकई काफी पैनी नजर है विक्रम जीकी
    बधाइयां

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. 'ग्राहकों' को धोखे मेँ रखना मना है ,
    कुछ नयाँ लिख डालिए, शुभकामना है ।

    उत्तर देंहटाएं

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