शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

पुस्तक समीक्षा : व्यंग्य का शून्यकाल

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सबसे पहले भूमिका जो व्यंग्य का शून्यकाल से ही ली गई है -

"शून्यकाल वही है जो गोल कर दे. गोल घुमा देगा तो व्यंग्य हो जाएगा. यह टोटका कविता में काम नहीं आएगा. कविता में घुमाने की कोशिश की तो चुटकुला बन जाएगा. इसी चुटकुले ने तो हास्य-कवियों को हास्यास्पद बनाया है. मंच पर जो उन्हें पिला रहे थे, अब वही रुला रहे हैं. गोल करना वैसे विजय का प्रतीक भी है. अब यह प्रतीक क्रिकेट में कारगर नहीं है. क्रिकेट में रन बनाने होते हैं. रनों के घोड़े दौड़ाने होते हैं. सचिन दौ़ड़ा रहा है. पर यदा-कदा वह भी हांफ जाता है. रन बनाने से तात्पर्य यह नहीं है कि आपने इधर रन सुना और उधर दौड़ लगा दी. बुद्धि और विवेक दोनों का समन्वयकारी उपयोग करना पड़ता है. गोल हॉकी में किए जाते हैं. फुटबाल गोल होती है इसीलिए उसमें भी किए जाते हैं. बुद्धि जिनकी गोल होती है वह तो सदा गोल ही करते रहते हैं..."

भूमिका से ही किताब की सलर, हंसती गुदगुदाती हर दूसरे वाक्य में व्यंग्य मारती भाषा शैली का पता चलता है, जो बदस्तूर सभी लेखों में जारी रहता है. 110 पृष्ठों की इस किताब में अविनाश वाचस्पति के एक कम चालीस व्यंग्यों का संग्रह प्रस्तुत किया गया है. व्यंग्यों की विषय वस्तु आम जीवन से लिए गए हैं और जीवन के प्रायः तमाम पहलुओं को छुआ गया है. कुछ व्यंग्यों के शीर्षक से ही आपको इसका अनुमान हो जाएगा -

दाल का अरहरापन

अरे महंगाई रुक

खरबूजा आपका है कौन

छिलकों में संभावनाएं

पैट्रोल पेट का रोल

बिजलीबाई आई

दिल्ली में पैदल

फैशन में घोड़ा क्रांति .. इत्यादि

अविनाश के व्यंग्यों में कहीं कहीं सामाजिक विद्रूपों को दूर करने की समझाइशें भी हैं. बेशक उनके व्यंग्य उतने मारक नहीं बन पाए हैं, मगर पढ़ते पढ़ते आपके चेहरे पर स्मित मुस्कान खींच लाने का माद्दा जरूर रखते हैं. और सबसे बड़ी बात यह है कि व्यंग्यों में पठनीयता बनी रहती है. भाषा कहीं भी बोझिल नहीं है.

यह इस संकलन का दूसरा, सजिल्द संस्करण है जो इस किताब की लोकप्रियता को स्वयं ही बयान करता है. इस संस्करण का गेटअप, कागज व छपाई इत्यादि उच्च कोटि की है.

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व्यंग्य का शून्यकाल

व्यंग्य संग्रह

व्यंग्यकार - अविनाश वाचस्पति

पृष्ठ 110, मूल्य 180 रुपए

अयन प्रकाशन - 1/20, महरौली, नई दिल्ली - 110 030

ISBN NO. 978-81-7408-561-0

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3 blogger-facebook:

  1. शुक्रिया रवि जी
    पुस्‍तक पर अपनी बेबाक प्रतिक्रिया देने के लिए
    पुस्‍तक खूब प्रसन्‍न है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. अविनाश जी को इस पुस्तक के लिए बहुत बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. समीक्षित कृति के लेखक और समीक्षक दोनों को बधाई .समीक्षा भाई .यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai
    बृहस्पतिवार, 30 अगस्त 2012
    लम्पटता के मानी क्या हैं ?

    उत्तर देंहटाएं

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