बुधवार, 29 अगस्त 2012

नरेंद्र तोमर की लघुकथा - भगवान और भक्त

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नारद जी जब दरबार में पहुंचे तो देखा ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों सिर झुकाए चिंतित एवं उदास मुद्रा में बैठे हैं। ‘नारायण नारायण’ कहने और अपनी वीणा के तार झनझनाने पर भी तीनों ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, और न ही समाचार पूछे। कारण पूछने पर भी तीनों में से किसी ने भी उत्तर नहीं दिया।

बहुत आग्रह करने पर विष्णु जी ने कहा कि वे अब भगवान का पद छोड़ना चाहते हैं। शिवजी और ब्रह्मा जी ने अपना सिर हिला कर सहमति प्रकट की। नारद जी को महान आश्चर्य हुआ।

‘नारायण नारायण’ नारद जी ने अपनी भृकुटि को किंचित ऊपर चढ़ा कर माथे पर बल डालते हुए कहा, ”परंतु सृष्टि के निर्माता, तीनों लोक के नियंता और पालनहार, आप तीनों देव ऐसा विचार क्यों ला रहे हैं अपने मन में? प्रभु क्या मैं कारण जानने की घृष्टता कर सकता हूं।“

”अरे ऐसे पूछ रहे हो मानों आपको कुछ पता ही न हो? फिर भी यदि कहते हो तो बताए देते हैं। देखिए संक्षेप में बात यह है कि इस युग में हम लोग अपने भक्तों से बेहद तंग आ चुके हैं। न दिन में चैन लेने देते हैं न रात में। अब तो लक्ष्मी जी भी दुखी हो गईं हैं। कुछ समझ में नहीं आता कि क्या किया जाए? इन भक्तों से छुटकारा कैसे मिले?“

”परंतु आखिर हुआ क्या? आप तो युगों-युगों से भक्तों की नैया पार लगाते आ रहे हैं।“ नारद जी ने फिर कुरेदा।

इस पर भगवान शिव ने गहरी सांस भरते हुए कहा, ”पता नहीं कब, क्यों और किसने भगवान को भक्तों के बस में कर दिया था। पहले तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा पर अब न जाने कैसे भक्त पैदा हो गए हैं... आकर तरह-तरह के काम कराने के लिए हम पर दबाव डालते रहते हैं जो हमें बिल्कुल पसंद नहीं। पर कभी करने पड़ जाते हैं। हमारी आत्मा बड़ी दुखी होती है और हमारी साख भी घटती है... क्या बताएं दुविधा में पड़ जाते हैं। काम करो तो अपयश मिलता है और न करो तो भक्त बुरा मानते हैं।“

”भगवन् ! आप तो पहेलियां सी बुझा रहे हैं। कुछ स्पष्ट बताइए ना। देखिए इस युग में लोग तो आपका इतना आदर-सम्मान करने लगे हैं। जगह-जगह जहां जगह मिल पाती है लोग भव्य मंदिर खड़ा कर देते हैं। आपकी मूर्तियों में मानों जान डाल देते हैं, उनको सचल बना देते हैं... लाखों करोड़ों के चढ़ावे चढ़ रहे हैं। आप तो महादेव हैं अरे छोटे-मोटे देवताओं तक के मंदिरों में अपार, अभूतपूर्व भीड़ें हो रहीं हैं। सारा देश ईशमय हो रहा है। किंचित विचार तो कीजिए... आपका गुणगान करने, आपकी लीला बखान करने वाले प्रवचनों में कैसी बड़ी संख्या में लोग टूटते हैं... सब आपकी लीला है... अपरंपार है आपकी महिमा प्रभु...।“

”बस भी करो नारद! कोरा स्वार्थ है।“ भगवान शिव किंचित क्रोधित होकर बोले, ”आकंठ पाप में डूबे हैं, प्रवचन करने वाले और सुनने वाले दोनों ही।“

”पर प्रभु हुआ क्या?“ नारद जी ने अपनी चिरपरिचित स्थाई मुस्कान के साथ पूछा।

”अरे हुआ क्या पूछते हो? कभी-कभार की बात हो तो टाल भी जाएं। अब तो यह रोज का सिर दर्द हो गया है...“। थोड़ा सोच कर फिर बोले, ”बहुत दिनों से एक व्यक्ति पीछे पड़ा है। पुराना भक्त है। बचपन से ही हमारी सेवा कर रहा है। घर में हमारा विशाल मंदिर बनवाया है। उसमें हम सभी देवताओं की भव्य प्रतिमाओं को प्रतिष्ठित किया, और मानों कि हम पर पूरा भरोसा न हो उसने अनेक नए देवी-देवताओं की मूर्तियां भी लगा दी हैं। पहले ये सब हमारे निष्छल भक्त होते थे...अब उनकी भी पूजा करता है...

'' तो आपको ईष्या क्यों हो रही है,भगवन!,'' नारद जी ने फिर निशाना साधा।

''अरे बात यह नहीं है। बात यह हैं कि कुछ महीने पहले उसने पहले बिजनेस में अपने एक प्रतिद्वंदी की सरे आम हत्या कर दी और जेल पंहुच गया। अपने वकील के जरिए पुलिस और निचली अदालत में रिश्वत देकर जमानत पर बाहर आ गया। तब से मेरे पीछे पड़ा है। दिनरात मंदिर में पड़ा रहता है,कहता है कि नीचे तो मैने सबको पटा रखा है पर मेरा वकील कहता है कि इसके आगे वे कुछ नहीं कर सकते, बस भगवान ही बचा सकते हैं। गवाहों को वे ही तोड़ सकते हैं और उपर की अदालत का दिमाग को वे अर्थात आप ही पलट सकतें हैं। वह मामले से बरी होकर चुनाव लड़ना और मंत्री बनना चाहता है......भक्त पक्का है । बताओ क्या करूं ? आखिर मेरी भी तो रिपुटेशन है। इसके मैं पहले भी सही गलत काम करा चुका हू्ं कि वे इसके बिज़नेस से जुड़े थे। पर यह तो धोर पाप है......वो भी सबके सामने दिन दहाड़े! अब उसने भगवती जागरण बिठा दिया है कि यदि मैं नहीं करूंगा तो अपना काम वह पार्वती से करा लेगा..अजब दुविधा में हूं...अब तो मैं भक्तों से ही पीछा छुटाना चाहता हूं .... ''

''अरे आप मना कर दीजिए! सिंपल। निर्णय तो लेने ही पड़ते है,'' अपनी वीणा के तार टनटनाते हुए नारद जी बोले।

''अरे एक मामला हो तब ना!यहां तो अब लाइन लगी है। पहले तो दो चार पापी भक्त होते थे। क्षमा करके वैतरणी पार करा देते थे। अनंत काल तक स्वर्ग में पड़े रहते थे किसी को कोई हानि पहंचाए बिना। हमें भी परेशानी नहीं होती थी। पर इनका क्या करें। इनको न तो मोक्ष चाहिए और न स्वर्ग। ये तो पृथ्वी पर ही भोगविलास करते अजर अमर बने रहना चाहते है। अब मेरी उलझन देखो! मेरे अनन्य भक्तों में एक डाक्टर है। अभी कुछ समय पहले तक वह नामी डाक्टर था अब वह उतना ही बदनाम है। फुसला धमका कर वह गरीब लोगों की किडनी चुरा कर अमीरों को बेच देता था। करोड़ो अरबों कमाए। अपने दुनिया भर में बने घरों और तथाकथित अस्पतालों में शानदार मंदिर बनवाए, धर्मार्थ संस्थांए स्थापित कीं। साधु संतों का आना जाना बना रहता था। पर होनी को कौन कब तक टाल सकता है। पकड़ा गया। अब जेल में पड़ा है साल भर से। वहां कोई काम धंधा तो है नहीं, दिन भर पूजा पाठ करता रहता है। दूसरे देवी देवताओं से सिफारिश भी कराता रहता है। जेल में मौज मस्ती का प्रबंध तो हनमानजी ने करा दिया था,जेलर भी हनुमान जी का भक्त है। अब वह मेरे पीछे पड़ा है कि मैं कैसे ही उसे बरी करा दूं। उसकी पहली पतिव्रता पत्नी देश भर के मंदिरों मोटा चढ़ावा चढ़ाती फिरती है। मेरे दूसरे असरदार भक्तों से संपर्क कर दबाव बना रही है.....मैं तो बहुत दुखी हो गया हूं इन भक्तों से.... ''

''नारायण नारायण,''नारद जी ने किंचित व्यंग्य भाव से कहा, ''पर भगवन आप भी तो इन भक्तों का माल उड़ाते रहते हैं। छप्पन प्रकार के भोग, सोने चांदी के मुकुट, सिंहासन सहर्ष स्वीकार करते रहते है। यह कभी सोचते विचारते भी नहीं कि यह अकूत संपदा कहां से आती हैं इनके पास। जब पाप का माल डकारोगे तो सिफारिशें तो करनी पड़ेंगी।''

कह कर अपनी वीणा के तार टनटना कर नारद जी नारायण नारायण कहते हुए वहां से विदा हो गए।

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नरेंद्र तोमर

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