गुरुवार, 16 अगस्त 2012

मनोज 'आजिज़' व मो. मुरसलीन साकी की ग़ज़लें

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मनोज 'आजिज़' की ग़ज़लें

ग़ज़ल


हर शाख गुल मुस्काए , बरसात जो है
तपिश ख़त्म हो जाये , बरसात जो है
खामोश रहने की बात ऐसे आसाँ नहीं
यूँ नज़्म लब पे आये , बरसात जो है
सैलाब दिल में होता है मुरादों का
कैसे कोई छुपाए , बरसात जो है
हर शै में खूबसूरती का मौजूं होना
हर शै दिल को भाये , बरसात जो है
मुमकिन हो हर गम सबके धुल जाये
उम्मीद शख्त हो जाये , बरसात जो है
कब किस पर हमेशा ही रहम बरसा
कोई घर पे भींग जाये , बरसात जो है

ग़ज़ल


शहर में ये कैसी आवाज है
आसमाँ में कैद परवाज है
नजर से नजर तो मिल जाती
जी चुराते लोग क्या राज है
आवाज़ा हर बात पर क्यूँकर
बढती आबादी घटता दमसाज है
छूटता चैन जिन्दगी के दौड़ में
जो, कुछ पा लिया , जांबाज है
चलो, कुछ करें सुकूं कायम हो
वही आरती, वही नमाज है

ग़ज़ल

साथ दो कि कुछ और कदम चल लें
कुछ और दिन नाम रौशन कर लें
रहमत की दुनिया को सेंध लग चुकी
दो मीठे बोल लब पर जड़ लें
राहे हयात में क्या गुजरे किसे खबर
चलो मिलकर ख़ुशी की झोली भर लें
दुनिया की चमक में प्यार फिका न हो
रिश्तों को और भी मजबूत कर लें

--

-- मनोज 'आजिज़'
जमशेदपुर , झारखण्ड
फोन-09973680146,
इ-मेल -- mkp4ujsr@gmail.com

--

मो. मुरसलीन साकी की ग़ज़लें

(1)

बहारों ने हमको ही रूसवा किया

जो रहबर थे आगे निकल वो गये ।

जो गुलशन था वीरानियां बन गया

और कांटे मेरे हमसफर बन गये।

था तो साहिल सफर का मेरे सामने

आते आते भंवर में मगर फंस गये ।

जो चाहा था हमको मिला भी नहीं

मेरे रहबर ही मुझको दगा दे गये।

चाहता था कि हमको भी साहिल मिले

आके झोंके सफीना उड़ ले गये।

 

(2)

दिल मेरा बेखबर था अभी दौर आयेगा

थी मुझको क्‍या खबर की कोई और आयेगा।

मुझ पर तो तेरी याद ने ऐसा असर किया

अब मुझको सजा देने भला कौन आयेगा।

हर वक्‍त तसव्‍वुर में तेरा अक्‍स रूबरू

तेरे सिवा ख्‍यालों में क्‍या गैर आयेगा।

तन्‍हा ही चल रहा हूं राहे जिन्‍दगी पे मैं

अब बनके हमसफर की तरह कौन आयेगा ।

इक टूटा आईना है मेरी जिन्‍दगी यहाँ

इस आईने में सजने भला कौन आयेगा।

--

मो0 मुरसलीन साकी

--

मो0 न0 9044663196

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