मंगलवार, 21 अगस्त 2012

गोवर्धन यादव की लघुकथाएँ

लघुकथाएँ

पहचान

दो युवकों के बीच गहरी मित्रता थी. एक के पास बेशुमार दौलत थी, जबकि दूसरा फ़टेहाल था. बावजूद इसके दोनों के बीच कभी मन मुटाव नहीं हुआ.

वह युवक गरीब जरुर था लेकिन काफ़ी विद्वान था. जब वह भाषण देने के लिये खड़ा होता, तो श्रोता मंत्र -मुग्ध होकर उसे सुनते थे ,जब वह मंच पर होता तो फ़टी कमीज-पायजामा ही पहना होता. उसके धनी मित्र को यह बात बहुत अखरती कि उसका मित्र इतनी प्रखर बुध्दि का धनी मालिक है,लेकिन फ़टे कपड़े में उसका उतना प्रभाव नहीं पड़ता. यदि वह मंच पर शानदार कपड़ों के साथ हो तो और भी प्रभावशाली लगेगा.

एक दिन वह गरीब मित्र जब उस धनी व्यक्ति के घर पर बैठा था तो उस धनी मित्र ने सलाह देते हुये कहा:-मित्र तुम बुरा न मानो तो एक बात कहूँ. उसने मुस्कु्राते हुये कहा" कभी ऐसा हुआ है जो आज होगा .बोलो तुम क्या कहना चाहते हो .तुम जो कहोगे मैं वैसा ही करुँगा.

धनी मित्र ने कहा" तुम जब भाषण देने जाते हो,तब मेरे कपडे पहनकर जाया करो.( आलमारी खोलते हुये) देखो..यहाँ कपडों का अंबार लगा है. जो भी ड्रेस तुम पहनना चाहो शौक से पहन सकते हो.

जब भी,जहाँ भी भाषण देने उसे जाना होता,वह अपने मित्र के कपडे पहन कर जाता. उसका धनी मित्र भी उसके साथ होता.

अपने धनी मित्र के कपडे पहनकर वह मंच पर भाषण दे रहा था तो हीरे जैसा दमक रहा था. उसका धनी मित्र उसे देखकर खुश हो रहा था. उसने अपने बाजू में बैठे हुये आदमी से कहा;" मंच पर जो सुन रहे थे. किसी ने भी नहीं पूछा की उसके बदन पर जो अभी-अभी कपडे पहन रखे थे ,वे कहाँ गये

अपना भाषण समाप्त कर वह जैसे ही मंच से नीचे उतरा ,लोगों ने उसे घेर लिया और उसे बधाइयों पर बधाइयां देने लगे. .आज वह पहले से ज्यादा आत्मविश्वास से भरा हुआ था. उसकी प्रसन्न्ता देखने लायक थी.

उसका धनी मित्र अपनी सीट पर बैठा ,यह सब देख रहा था. वह चाह कर भी अपने मित्र को बधाई देने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. भाषण समाप्त कर वह जैसे ही मंच से नीचे उतरा ,लोगों ने उसे घेर लिया और उसे बधाइयों पर बधाइयाँ देने लगे.. उसने कई बार सोचा की चल कर उसे बधाइयाँ देनी चाहिये ,लेकिन उसके पैर ,जैसे जमीन से चिपक से गये थे.

हाथी की सी मस्त चाल से झुमता- मुस्कुराता वह अपने मित्र की ओर बढा चला आ रहा था.

 

करनी और कथनी

सावित्री पढी-लिखी युवती है. पढ़ने में जितनी निपुण, उतनी ही खूबसूरत. एम.ए. करते ही उसकी शादी ,एक बड़े रईस परिवार में हो गयी. घर में नौकर-चाकरों की भीड़ लगी हुए है. अतः उसके लिए करने को कोई काम न बचता था. वह चाहती थी कि उसे भी कोई जाब कर लेना चाहिए, लेकिन अपने मन की बात वह अपने पति से कह नहीं पायी. उसने सोचा जब इनका अच्छा मूड होगा, उस दिन वह अपने मन की बात कह देगी. समय बीतता रहा, लेकिन उसके मन की बात, मन में ही धरी रह गयी. एक दिन दो मित्र बैठे बात कर रहे थे और वह उनके लिए चाय बना रही थी. दोनों के बीच नारी की स्वतंत्रता को लेकर गर्मा-गरम बहस चल रही थी. उसके पति ने अपने मित्र के सामने शेखी बघारते हुए कहा कि वह नारी की स्वतंत्रता का पक्षधर है. उसका यह भी मत था कि पढी-लिखी युवतियों को दिन भर खाली बैठे रहने के अपेक्षा कुछ करना चाहिए. उसने सोचा कि अब वह समय आ गया है, जब उसे अपने मन की बात कह देना चाहिए, लेकिन उनके मित्र के सामने कहना उचित नहीं लगा. शाम को उसने अपने मन की बात उजागर करते हुए उसने कहा:-विद्यानिकेतन की प्राचार्या उसकी जान पहचान की हैं, एक मुलाकात में उन्होंने मुझसे कहा था कि खाली बैठे रहने के अपेक्षा मुझे कोई जाब कर लेना चाहिए. यदि तुम्हारा मूड बच्चों को पढ़ाने का हो तो मुझे बतला देना. यदि आप अनुमति दें तो मैं उनसे कहकर अपनी ज्वाइनिंग दे दूँ. बात सुनते ही वह भड़क उठा था:-“क्या बकती हो तुम? दुबारा ऐसी-वैसी बात करने की सोचना भी मत. हमारे जैसे ऊँचे खानदान की औरतें बेपरदा होकर बाहर नहीं निकलती, नौकरी करना तो दूर की बात है. फ़िर ईश्वर की दया से हमारे पास क्या कमी है, आराम से इसी चारदीवारी के बीच रहो. अपने पति के मुख से ऐसी बात सुनकर उसका मन बुझ सा गया था. वह सोचने लगी थी कि सारे मर्द बातें तो खूब करते हैं ”नारी स्वतंत्रता” की,लेकिन जब उसे निभाने का मौका आते है, तो अपने पैर पीछे खींच लेते हैं. कथनी और करनी में क्या फ़र्क होता है, वह जान गई थी.

 

कौआ और लोमड़ी

कौवे के लिए आज का दिन बड़ा भाग्यशाली रहा. रोज सूखी रोटी पर काम चलाना पड़ता था,आज उसे घी चुपड़ी रोटी खाने जो मिल रही थी. रोटी का टुकड़ा चोंच मे दबाते हुए उसने बड़ी शान के साथ हवा के बलखाते-तो कभी डाई मारते हुए लगाया और फ़िर एक डाल पर बैठ कर रसास्वादन करने लगा. पिछले कई जनम की बैरन लोमड़ी सब देख रही थी और मन ही मन सोच रही थी कि यदि आज वह काले-कलूटे कौवे को बेवकूफ़ बनाने में सफ़ल हो जाती है तो घी लगी रोटी उसके मुंह में होगी. पिछली घटना वह अब तक भूल नहीं पायी थी,जब उसने कौवे को गाना गाने को कहा था और उसने अपने आपको तानसेन की औलाद मानते हुए अपना मुंह खोला दिया था और रोटी उसमें कब्जे में आ गयी थी.

इस बार उसने पैंतरा बदलते हुए कौवे को गालियां देना शुरु कर दिया- साला काला कलूटा कौआ, न जाने अपने आपको क्या समझता है/ तू तो शरीर से ही नहीं, मन से भी काला है,तू चाहे जितनी साबुन लगा कर नहा ले, फ़िर भी काला की काला ही रहेगा..और भी न जाने क्या-क्या वह बकती रही और कौआ अपनी रोटी खाने में मगन रहा. वह जानता था कि मुंह खोला और गए काम से.

पूरी रोटी पेट में उतार चुकने के बाद उसने लोमड़ी से कहा:-देख, पूंछ कटी लोमड़ी...मैं उतना मूर्ख नहीं हूं,जितना तू मुझे समझती है. मैं एक बार बेवकूफ़ क्या बन गया..तू हमेशा उसी तर्ज पर मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश मत कर. मैं किसी भी प्रकार से तेरे झांसे में अब आने वाला नहीं हूँ. मैंने विष्णु शर्मा का पंचतंत्र पूरा पढ लिया है,अतः दुबारा ऐसी कोशिश करना ही मत...समझी..पूंछ कटी लोमड़िया...”

लोमड़ी की समझ में नहीं आ रहा था कि इस कलूटे को कैसे पता चला कि मेरी पूंछ कट गई है. अपने अपमान के क्रोध में खिसियाती लोमड़ी ने कहा:- अरे वाह रे कालिया, तू तो पक्का नेता बन गया है रे !.देखती हूँ. कब तू मेरी हाबड में आता है.?” कहती हुई झाडियों में समा गयी थी.

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गोवर्धन यादव

103,कावेरी नगर,छिन्दवाडा (म.प्र.) 480001

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