गुरुवार, 16 अगस्त 2012

विजेंद्र शर्मा का आलेख - आओ फिर से चिट्ठियाँ लिखें .....

आओ फिर से चिट्ठियाँ लिखें .....


घर में कुछ मेहमान आये हुए थे उनके साथ चाय की चुस्कियों का लुत्फ़ लिया जा रहा था। दसवीं जमात में पढ़ने वाली मेरी बेटी आयी और कहने लगी कि पापा कोई बेटियों पे शे'र लिखवा दो कल स्कूल में एक छोटा सा कार्यक्रम है मैं सुनाऊंगी। मुझे पद्मश्री बशीर बद्र साहब का एक मतला याद आया और उसे सुनाया :-


वो शाख़ है न फूल अगर तितलियाँ न हों
वो घर भी कोई घर है जहाँ बच्चियां न हों


इसी ग़ज़ल का मुझे एक और ख़ूबसूरत शे'र याद आ गया मैंने सोचा मेहमानों को ये भी सुनाया जाए :--


मैं पूछता हूँ मेरी गली में वो आये क्यों
जिस डाकिये के पास तेरी चिट्ठियाँ न हो


शे'र सुनते ही मेहमान तो वाह -वाह करने लगे मगर बेटी ने एक सवाल दाग़ दिया " पापा ये डाकिया क्या होता है ? उसका ये सवाल मेरे ज़हन में न जाने कितने और सवाल पैदा कर गया। मैंने उसे बताया कि बेटे पोस्ट मैन को डाकिया कहते हैं ,जो हमारी चिट्ठियाँ हम तक पहुंचाता है ,बेटी को बात आधी -अधूरी समझ आयी ,उसका प्रश्न स्वाभाविक था जब से उसने होश सम्भाला घर में कौनसी चिट्ठियाँ आयी थी और मैंने भी तो एक मुद्दत से किसी को ख़त नहीं लिखा था


बेटी का ये कहना कि "डाकिया क्या होता है" मेरे ज़हन में ऐसा शोर करने लगा जो शोर अख़बार के छपते वक़्त प्रिंटिंग मशीन करती है मैं सोचने लगा कि आख़िर कौन- कौन से ऐसे तत्व हमारे जीवन में आ गये जिससे कि हम हमारी ज़िंदगी के एक अहम् किरदार "डाकिये" को भी भूल गये। मेरे ज़हन में फ़िक्र मश्क़ करने में लगी ही थी कि अचानक एक दोहे की शक्ल में मुझे इस सवाल का जवाब भी मिल गया :---


मोबाइल ई - मेल ने , कैसा किया कमाल।
क्या होता है डाकिया ? बच्चे करें सवाल।


हालांकि तकनीक में आयी क्रांति ने हमारे जीवन को बड़ा सुलभ बना दिया है , दूर रह रहे अपनों से हम फट से बातें करने लगे हैं , बड़े - बड़े काग़ज़ात इक पल में
ई - मेल के ज़रिये एक जगह से दूसरी जगह जाने लगे है जिन्हें डाक के ज़रिये भेजने में कई दिन लग जाते थे। दोस्ती , जान- पहचान , संबंधों और रिश्तों का पूरा सागर जैसा फैलाव सिकुड़ कर एक मोबाइल में क़ैद हो गया है। मुनव्वर राना ने इसे यूँ बयान किया है :--


अब फ़ासलों की कोई हक़ीक़त नहीं रही
दुनिया सिमट के छोटे से इक "सिम" में आ गई


मुझे लगता है कि नयेपन के चस्के और वक़्त से भी आगे निकलने के चक्कर में हम लोग उन चीज़ों को भी भुलाते जा रहें हैं जो हमारी ज़िंदगी का कभी अहम् हिस्सा थी। .ख़त और डाकिया दो ऐसी चीज़ें थी जो हमे इंतज़ार के लुत्फ़ से जुदा नहीं होने देती थीं। हर उम्र की आँखों को चिट्ठी का इंतज़ार रहता था। एक माँ को सरहद पे तैनात बेटे की चिट्ठी का , बहन को अपने भाई की खैर - ख़बर की चिट्ठी का , एक बीवी को रोटी की जुगत में परदेस गये शौहर की चिट्ठी का , एक बे-रोज़गार को किसी सरकारी महकमें से नौकरी के लिए आये बुलावे और ज़माने की नज़रों से छुप कर मुहब्बत करने वालों को अपने मुहब्बत- नामे का इंतज़ार रहता था। इंतज़ार की इस सियाही से लिखी तहरीर ( लिखावट ) को जो शख्स सबसे ज़ियादा पढ़ना जानता था ,बड़ा अफ़सोस है कि अब वो डाकिया प्राय - प्राय लुप्त सा हो गया है।


ख़त, हमारी ज़िंदगी और हमारे अदब ( साहित्य ) का हिस्सा थे जिसे भूला कर हमने अपनी तहज़ीब के दरख्त को ख़ुद अपने ही हाथों से काट दिया।


मीर ओ ग़ालिब के ज़माने से ही ख़त और ख़त को पहुंचाने वाले डाकिये (क़ासिद, नामावर ) के बिना शाइरी अधूरी थी। मीर ने तो ख़त और क़ासिद के हवाले से एक पूरी ग़ज़ल ही कह दी थी। उस ग़ज़ल का मतला और एक शे'र मुलाहिज़ा हों :--


न पढ़ा ख़त को या पढ़ा क़ासिद
आख़िरे -कार क्या कहा क़ासिद
है तिलस्मात उसका कूचा तो
जो गया सो वहीं रहा क़ासिद


उस ज़माने में ये आलम था कि ख़तों का सिलसिला थमता ही नहीं था तभी तो ग़ालिब ने कहा कि :---


क़ासिद के आते -आते ख़त इक और लिख रखूं
मैं जानता हूँ जो वह लिखेंगे जवाब में


ग़ालिब शाइरी के साथ - साथ ख़त लिखने में भी बड़े माहिर थे उनके अहबाब ( मित्र ) उनसे अपने मुहब्बत-नामे (प्रेम-पत्र ) लिखवाने आते थे। अपनी एक मक़बूल ग़ज़ल में ग़ालिब ने इसी लिए ये शे'र कहा :--


मगर लिखवाये कोई उसको ख़त ,तो हम से लिखवाये
हुई सुबह , और घर से कान पर रखकर क़लम निकले


आज की नस्ल मोबाइल के एस एम् एस की दीवानी है मगर ये एस .एम् .एस और ई मेल कोई सहेज के नहीं रखेगा, ख़त सहेज के रखे जाते थे ग़ालिब ने जो ख़त लिखे लोग आज उन पर शोध कर के पीएच. डी. कर रही है। ख़त जिन्हें अब हमने लिखने बन्द कर दिये हैं वाकई धरोहर होते है तभी तो ग़ालिब ने पहले ही लिख दिया था :--


चंद तस्वीर ए बुताँ , चंद हसीनों के ख़ुतूत
बाद मरने के मिरे घर से यह सामाँ  निकला


नौजवान शाइर डॉ. विकास शर्मा ख़तों को  पूंजी समझते है और अगर नई उम्र का कोई शाइर इस ख़याल को शाइरी में ढालता है तो थोड़ी उम्मीद जगती है कि ख़ुतूत की क़ीमत हमारी नई - नस्ल को मालूम तो है। डॉ .विकास शर्मा "राज " का ये मतला और शे'र सुनने के बाद उनके क़लाम को सलाम करने का मन करता है :--


क़बीले से जुदा कर दे
मुहब्बत बावला कर दे
ख़तों को भी उठा ले जा
मुझे दिवालिया कर दे


ख़त होते ही ऐसे थे जिन्हें मुहब्बत करने वाले महबूब के दिये गुलाब की तरह किताबों में संभाल के रखते थे आज की तरह नहीं कि एस. एम् .एस पढ़ा ज़ियादा से ज़ियादा एक-दो रोज़ रखा और डिलीट कर दिया। हसरत मोहानी ने यूँ ही थोड़ी कहा :--


लिक्खा था अपने हाथ से तुमने जो एक बार
अब तक हमारे पास है वो यादगार ख़त


ख़तों के उस ज़माने में ऐसे - ऐसे ज़ावियों (कोण ) से शाइरों ने अपनी बात कही कि बस आह - वाह अपने - आप दिल से निकलने लगे , बशीर बद्र के ख़त लिखने का अंदाज़ सबसे मुख्तलिफ़ था :---


जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाए रात भर
भेजा वही काग़ज़ उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं


कई बार मुहब्बत में ऐसे भी मुकाम आते थे की ख़त जला दिये जाते थे मगर वे कोई आज के एस एम् एस की तरह डिलीट नहीं होते थे उनकी तहरीर ज़िन्दा रहती थी। बकौल वसीम बरेलवी :---


प्यार की फांस किसी तरह निकलती भी नहीं
ख़त जला डालिये तहरीर तो जलती भी नहीं


ख़त लिखने में कोई आंसुओं की सियाही काम में लेता था तो कोई अपना लहू इसलिए न तो कोई इन्हें फाड़ता था ना ही कोई जलाता था ..हाँ मगर राजेंदर नाथ रहबर ने किसी के मुहब्बत भरे ख़त गंगा में ज़रूर बहाए :---


तेरे खुश्बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे
प्यार में डूबे हुए ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे ख़त आज मैं गंगा मैं बहा आया हूँ
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ


मोबाइल के किसी एक मैसेज को आप दो -तीन बार से अधिक नहीं पढ़ते मगर जब - ख़तों का दौर था तो ख़त को कई - कई बार पढ़ने के बाद भी मन नहीं भरता था।
इसका कारण ये था कि ख़त लिखने वाला अपने जज़बात , अपने आंसू यहाँ तक कि अपने लहू तक को सियाही बना देता था। जब आंसुओं की सियाही से कोई ख़त लिक्खा हो तो शाइर यहाँ तक तसव्वुर करता था :---


सियाही आँख से ले कर ये नामा तुमको लिखता हूँ
कि तुम नामे को देखो और तुम्हे देखें मेरी ऑंखें
(नामा =ख़त )


ये पाकीज़गी , ये शिद्दत क्या आज की नस्ल समझ पाएगी , शायद नहीं क्यूंकि हमने उन्हें चिट्ठियों से दूर कर दिया है। आज के बच्चे पुराने गानों से भी दूर होते जा रहें है अगर पुराने फ़िल्मी गीतों से भी उन्हें लगाव हो जाए तो उन्हें मालूम हो जाएगा कि ख़त क्या होते है और डाकिये की क्या अहमियत होती है। हमारे फ़िल्मी दुनिया के गीतकारों ने ख़त को लेकर जो गीत लिखे वो मशहूर हुए और लोगों की ज़ुबान पे चढ़ गये। इन्दीवर का लिखा ये गीत :-


फूल तुम्हे भेजा है ख़त में ,फूल नहीं मेरा दिल है
प्रियतम मेरे तुम भी लिखना क्या ये तुम्हारे काबिल है
प्यार छिपा है ख़त में इतना, जितने सागर में मोती
चूम ही लेता हाथ तुम्हारा पास जो मेरे तुम होती

नीरज जी का लिखा ये गीत :---


फूलों के रंग से दिल की क़लम से तुझको लिखी रोज़ पाती
कैसे बताऊं किस किस तरह से पल पल मुझे तू सताती


"नाम" फिल्म के लिए आनंद बक्शी ने जब ये गीत लिखा तो जिसने भी सुना उसे अपने घर की दास्तान मालूम हुई , पंकज उदास के गाए इस गीत ने लोगों की सोई हुई संवेदनाओं को जगाया ,हमे अपने बच्चों को ये गीत ज़रूर सुनाना चाहिए :--
चिट्ठी आयी है आयी है चिट्ठी आयी है ....


फिल्म "बोर्डर" के लिए जब जावेद अख्तर की लिखी चिट्ठी " संदेशे आते है हमे तड़पाते है , के घर कब आओगे , लिखो कब आओगे .....को सोनू निगम ने गाया तो वो भी लोगों के दिलों में घर कर गयी। ये सब चिट्ठी / ख़त के ही तो कमाल थे।
आनंद बक्शी ने भी सनम को ख़त लिखा त ऐसे लिखा :--


हमने सनम को ख़त लिखा ख़त में लिखा .....
ऐ दिलरूबा दिल की गली शहरे वफ़ा ..
इसी गीत में ये मिसरा तो कमाल का लिखा
पहुंचे ये ख़त जाने कहाँ ,जाने बने क्या दास्ताँ
उस पर रकीबों का ये डर लग जाए उनके हाथ गर


जब ख़तों के दौर थे तब एक बात का अंदेशा हमेशा बना रहता था कि ख़त किसी के हाथ ना लग जाये ,ख़त को न जाने कहाँ - कहाँ छिपा के रखा जाता था कभी किताबों में , अलमारी में , संदूक में तो कभी दराजों में। कैसर उल जाफरी ने इसे यूँ शाइरी बनाया :-


ख़त में दिल की बातें लिखना ,अच्छी बात नहीं
घर में इतने लोग है , जाने किस के हाथ लगे


आज ना तो घरों में इतने लोग होते है ,ना अब घर घर रहें है ना अब वो पहले सी पर्दादारी रही है। नई पीढ़ी की रफ़्तार देख के अब तो डर लगता है। आज किसी को देखा , आज ही उस से सीधे - सीधे बात की और आज ही चले गये डेट पे , कहाँ गहराई आयेगी ऐसे प्यार में। उस ज़माने में इज़हार करने और पहला ख़त लिखने की हिम्मत जुटाने में ही साल गुज़र जाते थे। हस्ती मल हस्ती जी ग़लत थोड़े कह्ते हैं :-


प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है
नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है


जब पहला ख़त लिख दिया जाता था और महबूब तक पहुँच जाता था तो फिर मुहब्बत परवान चढ़े बिना दम नहीं लेती थी। ऐसा भी नहीं था कि सभी ख़तों के नसीब में महबूब तक पहुंचना लिखा हो कुछ ख़त बस लिखे ही रह जाते थे। कुंवर बैचैन साहब ने जो ख़त लिखे वो आज भी उनकी दराजों में है :--


अब भी किसी दराज में मिल जायेंगे तुम्हे
वो ख़त जो तुमको दे न सके लिख - लिखा लिए


बशीर बद्र साहब पे क्या गुज़री वो तो उन्होंने बताया नहीं हाँ ये ज़रूर कहा उन्होंने :---


हम पे जो गुज़री बताया न बताएँगे कभी
कितने ख़त अब भी तेरे नाम लिखे रक्खे है


कुछ ऐसे बदनसीब ख़त भी थे जिन्हें लिखने वाला उनसे भी बड़ा बदनसीब था :--


मैंने जितने मुहब्बत भरे ख़त लिखे
सब पे अपने ही घर का पता लिख दिया


अगर ख़तों का सिलसिला किसी वजह से थम जाता था तो सिर्फ़ ख़त में ये लिखा हुआ आता था :---


हमसे क्या ख़ता हो गयी कि ख़तों का आना बन्द है
आप ख़फ़ा है हमसे या फिर डाक खाना बन्द है


ख़तो - ख़तावत से कोसों दूर हो चुकी हमारी नई पीढ़ी को ख़त लिखने के लिए हमे प्रेरित करना चाहिए। ख़त लिखना भी शाइरी और कविता लिखने की तरह एक आर्ट है। जो ख़ूबसूरत ख़त दुनिया के सामने आये है उन्हें पढ़ा जाए तो इन नए- चराग़ों को पता चले कि बिन बाती के जलने का हुनर क्या है। अमृता प्रीतम और इमरोज़ के ख़त पढ़कर महसूस किया जा सकता है कि मुहब्बत ऐसे होती थी वैसी नहीं जो आज की नई उम्र की खुदमुख्तारियो ने समझ लिया है। मिसाल के तौर पे अमृता और इमरोज़ के ख़तों के कुछ अंश आपको पढवाता हूँ :---

"यह मेरा उम्र का ख़त व्यर्थ हो गया। हमारे दिल ने जो महबूब का पता लिखा था ,वह हमारी क़िस्मत से पढ़ा न गया ..तुम्हारे नए सपनों का महल बनाने के लिए अगर मुझे अपनी ज़िंदगी खंडहर भी बनानी पड़े तो मुझे एतराज़ नहीं होगा। जो चार दिन ज़िंदगी के दिये है ,उनमे से दो की जगह तीन आरज़ू में गुज़र गये है और बाकी बचा एक दिन सिर्फ़ इंतज़ार में ही न गुज़र जाए। अनहोनी को होनी बना लो मिर्ज़ा

..... तुम्हारी अमृता

इमरोज़ ये लिखते हैं :---


मुझ पे और भरोसा करो , मेरे अपनत्व पे पूरा एतबार करो। जीने की हद तक तुम्हारा। ये अपने अतीत ,वर्तमान और भविष्य का पल्ला तुम्हारे आगे फैलाता हूँ , इसमे अपने अतीत , वर्तमान और भविष्य को डाल दो जीतो।..तुम्हारा इमरोज़
ये था प्यार और खतों के ज़रिये इस तरह अपने दिल की बात पहुँचती थी। हम फोन पे किसी को अपने दिल के जज़बात नहीं कह सकते ना ही उन्हें मोबाइल के मैसज में तब्दील किया जा सकता है। दिल के जज़्बे तो अपने हाथ से ही काग़ज़ के सीने पे उकेरे जा सकते हैं।


ख़तों के दौर में लोगों का रुझान अदब ( साहित्य ) की तरफ़ ख़ुद ब ख़ुद हो जाता था। ख़त तक़रीबन सभी लिखते थे और ख़त लिखना किसी अनुष्ठान से कम न था और जब मोहतरम डाकिया जी गली में नज़र भर आ जाते थे तो उत्सव का सा नज़ारा हो जाता था। ख़त में संबोधन क्या लिखना है ...इसकी शुरुआत किस लफ़्ज़ से की जाए वगैरा - वगैरा उस वक़्त एक इम्तेहान की तरह होता था। अपनी प्रेयसी को ख़त लिखते समय कुछ तो ..मेरी ग़ज़ल , मेरी जाने जाँ , मेरी तरन्नुम , मेरी रूह , मेरे ख़्वाबों की मल्लिका आदी संबोधन का इस्तेमाल करते थे। आशिक के दिल का जज़्बा क़लम में मिसरी की डली की तरह घूल जाता था जबकी आज ख़त लिखने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता मैसज में लिखा जाता है hi स्वीटू ,hi जानू जैसे संबोधन जो किसी भी कोण से मुहब्बत की राह के मुसाफ़िर नज़र नहीं आते।


ख़त वाकई अमूल्य पूंजी थे , नेहरू जी के पत्र "भारत एक खोज " जैसा एतिहासिक दस्तावेज़ हो गयी। मेरे फ़िरोज़ पुर में एक मित्र है गौरव भास्कर उनके वालिद स्व. श्री मोहन लाल भास्कर कवि थे उनके मरासिम हरीवंश राय बच्चन जी से बहुत अच्छे थे। भास्कर साहब बदकिस्मती से पाकिस्तान में जासूसी के इल्ज़ाम में पकडे गये। सात साल तक उन्होंने पाकिस्तान की जेलों में यातनाएं सही। बच्चन जी तब विशेष मंत्रालय में थे उन्होंने भास्कर साहब की रिहाई में अहम् रोल अदा किया। उस दौरान उनमें ख़तों का बड़ा आदान - प्रदान हुआ। गौरव भाई की माता जी ने उन सब ख़तों को सहेज के रखा। किसी माध्यम से जब अमिताभ बच्चन साहब को पता चला कि बाबू जी के हाथ से लिखे ख़त फीरोज़पुर में किन्ही के पास है तो ख़बर की पूरी तस्दीक के बाद अमिताभ जी ने उन्हें सपरिवार मुंबई बुलवाया उस परिवार का सम्मान किया और उन ख़तों की एक - एक छाया- प्रति  ली ,ये है ख़त की ताक़त।
अपने महकमे की बात करता हूँ , सरहद पे तैनात जवान के लिए ख़तों की बहुत अहमियत होती थी। घर से बीवी - बच्चों के ख़तों का सरहद के पहरेदारों को इंतज़ार रहता था। बीवी लिखती थी कि आपके जाने के बाद मन नहीं लग रहा , जी बहुत घबराता है तो जवान भी ख़त के ज़रिये जवाब दे देते थे।


भाई जीतेन्द्र परवाज़ ने इसे महसूस किया और लिखा :-

तुम तो ख़त में लिख देती हो घर में जी घबराता है
तुम क्या जानो क्या होता है हाल हमारा सरहद पर


मगर जब से ख़तों की जगह मोबाइलों ने ले ली हमारे यहाँ समस्या कुछ गंभीर हो गयी है। पहले ख़त के आने में दस-पंद्रह दिन लग जाते थे। पीछे से जवान के घर में अगर कोई बात हो जाती या सास - बहू की मामूली कहा - सुनी हो जाती तो जब तक बीवी ये सब ख़त में लिखती उस से पहले मुआमला शांत हो जाता था मगर अब मोबाइल के दौर में जैसे ही घर में कोई बात होती है घर से फ़ौरन फोन आ जाता है जवान अपनी ड्यूटी पे एक दम परेशान हो जाता है और कई बार ऐसा भी हुआ कि जवानों ने ख़ुदकुशी भी कर ली। इस लिहाज़ से ख़तों का ज़माना सरहद के प्रहरी के लिए ज़ियादा बेहतर था।


एक ज़माना था जब ख़तों को पहुंचाने का काम कबूतर किया करते थे। क़ासिद का किरदार कबूतरों ने बड़ी ख़ूबी से निभाया वे इतने मंझे हुए होते थे कि सीधा ख़त उसी को देते जिसके लिए लिखा जाता था। अस्सी के दशक के आख़िर में आयी फिल्म " मैंने प्यार किया में " इस की मिसाल भी दी गयी , कबूतर जा जा जा कबूतर जा ...वाला गीत भी बड़ा प्रसिद्ध हुआ। जाने - माने शाइर राहत इन्दौरी ने भी इसी मफ़हूम से शे'र निकाला :--

अगर ख़याल भी आये कि तुझको ख़त लिक्खूं
तो घौसलों से कबूतर निकलने लगते हैं


आठों पहर मोबाइल से चिपके रहने वाली ये नस्ल कहाँ समझेगी कि ख़त क्या है, कबूतर क्या है और डाकिया क्या। राजेश खन्ना अभिनीत एक फिल्म आयी "पलकों की छाँव में " उसके लिए गुलज़ार ने एक गीत लिखा "डाकिया डाक लाया .... राजेश खन्ना का खाकी वर्दी में साइकल पे फिल्माया ये गीत हर आँख में डाकिये की सच्ची तस्वीर बनाता है मगर हमारे आज के बच्चे ऐसे गीत भी तो नहीं सुनते है जिससे उन्हें पता चले कि डाकिया क्या होता है।

 
डाकिये की शान में निदा फाजली ने तो यहाँ तक लिखा :--


सीधा - साधा डाकिया , जादू करे महान।
इक ही थैले में भरे , आंसू ओ मुस्कान।


चिट्ठी या डाक अपने गंतव्य तक जल्दी से जल्दी पहुंचे लोगों ने डाक महकमे की जगह कुरियर कंपनियों पे भरोसा करना शुरू किया मगर जब डाक ले के कुरियर कंपनी का कोई नुमाइंदा आता तो वो डाक तो दे के चला जाता पर वो डाकिये जैसा मुहब्बत का रिश्ता नहीं बना पाया। वक़्त के साथ - साथ ख़त लिखने का चलन कम होता गया और ख़त लिखने की लोगों को ज़रूरत भी नहीं रही। चिट्ठी के काम मोबाइल से होने लगे और डाकिया हमारे स्मृति पटल से गायब होने लगा मुझे आज भी याद है शाम के वक़्त रोजाना डाकिया हमारे मोहल्ले में आता था। मोहल्ले की औरतें एक दूसरे से पूछती रहती थी कि डाकिया आया क्या , बगल वाली अम्मा को अपने बेटे के मनी -ऑर्डर का इंतज़ार रहता था। बहुत से दरवाज़े बार - बार सिर्फ़ डाकिये की प्रतीक्षा में पलकें बिछाए रहते थे। अब तो ये नज़ारा देखे बरसों हो गये तभी मैंने लिखा :--


कब आवेगा डाकिया , पूछे कौन सवाल।
क़ासिद को देखे हुए , गुज़र गये है साल।।


बीकानेर के कलंदर सिफ़त शाइर शमीम बीकानेरी  से एक दिन इसी मौज़ू पे गुफ्तगू हो रही थी उन्होंने कहा कि विजेंदर भाई मैं ये प्रण करता हूँ कि आज से ख़त लिखने का सिलसिला दोबारा शुरू करूंगा। मेरी आप सब से भी यही गुज़ारिश है कि हम एक बार फिर से ख़त लिखने का सिलसिला शुरू करें अगर कोई बहुत ज़ियादा आपात स्थिती ना हो तो हम सिर्फ़ ख़त लिखें और हो सकता है कि हमे देख कर बच्चों को भी लगेगा कि वाकई ये मुआमलात इस मैसजबाज़ी से बेहतर है। ऐसा करने से हम फिर से अदब से जुड़ जायेंगे , इंतज़ार के लुत्फ़ से फिर से मुखातिब होंगे ,हमारी सूखी हुई क़लम में रोशनाई आ जायेगी और राह भटकी हुई हमारी नई पीढ़ी फिर से तहज़ीब के फ्रेम में अपनी तस्वीर तलाश करने लगेगी।

 
उम्मीद करता हूँ कि आप सब भी शमीम बीकानेरी की तरह ख़त लिखने का सिलसिला फिर से शुरू करेंगे और ये अलख जगायेंगे कि " आओ फिर से चिट्ठियाँ लिखें ...


उदय प्रताप सिंह जी की इन्ही पंक्तियों के साथ विदा लेता हूँ :----


मोबाइलों के दौर की नस्लों को क्या पता
रखते थे ख़त में कैसे कलेजा निकाल के

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विजेंद्र शर्मा
vijendra.vijen@gmail.com
सहायक कमांडेंट
सीमा सुरक्षा बल परिसर
बीकानेर
9414094122

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