गुरुवार, 16 अगस्त 2012

देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम' की कविताई

 
सही समय पर सही आदमी नहीँ पहुँच पाता सही जगह पर 
लेकिन गल्त आदमी सही जगह पर पहुँच जाता है सही समय पर ; 
सही समय पर सही जगह पर पहुँचा गल्त आदमी सही करार दिया जाता है 
गल्त आदमी काबिज़ हो जाता है सही आदमी की जगह पर
 और गल्त आदमी बैठकर सही जगह पर गल्त होकर भी सही माना जाता है ....... 
 
सही आदमी सही समय पर गल्त जगह पर पहुँचकर सही करार दिया जाता है
 सही आदमी गल्त जगह पा जाता है और करता है सही काम पर गल्त करार दिया जाता है ..... 
सारी झगड़झिल्ल की जड़ है समय ! समय के साथ आदमी का यह गड़बड़झाला 
जो कहीँ ठीक हो पाता तो बेचारा इतिहास नीरस हो जाता 
यह इतिहास भी तो विराट समय का अभिन्न है 
पर समय इन दिनोँ अवसन्न फिरता है सड़क पर 
और गल्त लोगोँ की ज़मात शीर्ष शिखरोँ पर बैठ प्रसन्न है .......
इतिहास ऐसे ही बनता है और वह सही या गल्त से परे होता है 
कवि फिर तू ही क्योँ अरण्य मेँ रोता है. 
 

2 blogger-facebook:

  1. pathak ji pranam! aapki kavitaon me dilchasp mudde hain. sundar.
    manoj pathak

    उत्तर देंहटाएं
  2. Dharmendra Tripathi6:53 pm

    sundar kavita. aranya mein rodan se kya hasil hoga.

    उत्तर देंहटाएं

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