गुरुवार, 30 अगस्त 2012

विनय कुमार सिंह का आलेख - अपवादों में सोशल मीडिया का शोषण

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विनय कुमार सिंह

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अपवादों में सोशल मीडिया का शोषण

अपने नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए सरकार वर्तमान में अपवादों का जरिया सोशल मीडिया को बताकर सोशल मीडिया के शोषण में जुट गई हैं। जिसका उदाहरण असम हिंसा हैं।

पिछले एक महिने से असम में तेजी से बढ़ती जा रही हिंसा को रोकने में जब केन्‍द्र सरकार और राज्‍य सरकार की सभी कोशिशों विफल हो गईं तो अपने गले से इस फांस को टालने के लिए दोनों ही सरकारों ने इस हिंसा का मुख्‍य आरोपी सोशल मीडिया को करार दे दिया और आरोपी सोशल मीडिया को इसके बदले अपने करीब 300 से ज्‍यादा वेबसाइटों और ब्‍लॉगों के साथ-साथ कई अन्‍य सेवाओं का बलिदान देना पड़ा। अब तक तो आपने मानसिक शोषण, शारीरिक शोषण दोनों के बारे में सुना होगा, लेकिन सोशल मीडिया का शोषण ये नाम आपके गले नहीं उतर रहा होगा न? लेकिन सच्‍चाई भी यही है। जनता को जिस मंच से एक मजबूत जनाधार मिलता है। जहां से एक नया जनतंत्र का मंच तैयार होता है। जिस जगह से एक व्‍यक्‍ति की आवाज हजारों की आवाज बनती है। जिसके माध्‍यम से एक दूसरे का आपसी संवाद होता है। जहां से देश बचाने की मुहिम छेड़ी जाती है। जिसके जरिये से भ्रष्‍टाचार के खिलाफ देष एक मंच पर आकर अन्‍ना को समर्थन देता है। वो जरिया जो पल भर में काले करतूतों और अपराधिक प्रवृति के लोगों को बेनकाब करने में सहायक होता है। आज वही सोशल मीडिया अपराधी बनकर केन्‍द्र व असम राज्‍य सरकार के कटघरे में खड़ा है। अपराधी कौन है? किसने किया है अपराध? इस बात का तो अभी तक कोई सुराग नहीं, लेकिन अफवाहों को बढ़ावा देने के जुर्म में सोशल मीडिया को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रश्न यहां पर यह उठता है कि क्‍या सोशल मीडिया के अपराधी घोषित होने और कार्रवाई के बाद बंद की गई साइटों के बाद असम हिंसा में रोक लग गई है? क्‍या लोगों के दिल में जो डर पैदा है उसे निकाला जा चुका है? क्‍या जो लोग हिंसा से बचने के लिए पलायन कर रहे थे उन्‍हें रोकने में सरकार इस फैसले से सफल है? तो जबाब यह है कि न तो अभी तक असम हिंसा पर काबू पाया जा चुका और न ही पलायन करने वाले लोग रूक रहे हैं, बल्‍कि हिंसा का दौर और बढ़ता ही जा रहा है।

बस मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि अपवादों में जनतंत्र का गला घोंटने का काम क्‍यों हो रहा है? असम हिंसा में अफवाहों को बढ़ावा देने के जुर्म में आखिरकार सोशल मीडिया का शोषण क्‍यों किया जा रहा है? सरकार जब असम हिंसा को रोकने में नाकाम है तो वो सोशल मीडिया को मुजरिम करार देकर अपने आप को बचाने की कोशिश क्‍यों कर रही है? बात घूम फिरकर वहीं सरकार की कार्यप्रणाली पर आ जाती है। हिंसा का दौर समाप्‍त कब होगा? इसके बारे में तो कुछ कहा नहीं जा सकता है, लेकिन सरकार को इसके खिलाफ सख्‍ती से ठोस कदम उठाने की जरूरत है, ताकि समय रहते ही हिंसा की चिंगारी को बुझाया जा सके, वरना कुछ दिनों बाद ये आग के शोलों में तब्‍दील हो जाएगी और पुरी दुनिया को जलाने में कामयाब रहेगी ।

vinaymedia.pratap@gmail.com

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