रविवार, 26 अगस्त 2012

पुस्तक समीक्षा : यूरोप - यात्रा संस्मरण तथा आइए मलेशिया, सिंगापुर, थाइलैंड चलें

 

पुस्‍तक समीक्षा

समीक्षक - दिलीप भाटिया

रावतभाटा - 323307

यूरोप ः यात्रा संस्‍मरण-लेखिका-माला वर्मा, प्रकाशक-पीयूष प्रकाशन-पटना, पृष्‍ठ 176, मूल्‍य रू. 125

आईए मलयेशिया, सिंगापुर, थाइलैंड चलें ः यात्रा संस्‍मरण-लेखिका माला वर्मा, प्रकाशक, माण्‍डवी प्रकाशन, गाजियाबाद, पृष्‍ठ 168, मूल्‍य रू. 250

माला वर्मा की विदेश यात्रा की डायरी उपरोक्‍त दोनों पुस्‍तकों में पर्यटन पे्रमियों के लिए प्‍यार भरा उपहार है। पहली पुस्‍तक में फ्रांस, स्‍विट्‌जरलैंड, इटली, पीसा, रोम, वेटिकन, वेनिस, वेरोना, आस्‍ट्रिया, जर्मनी, हालैन्‍ड, बेलजियम एवं लंदन यात्रा के संस्‍मरण हैं। दूसरी पुस्‍तक का शीर्षक स्‍वतः ही तीनों देशों का उल्‍लेख कर देता है। कविता, कहानी, लघुकथाऐं सृजित करने वाली सुपरिचित साहित्‍यकार लेखिका अपने डॉक्‍टर जीवन साथी के साथ विदेश यात्राओं पर उत्‍साह, ऊर्जा, सैर, मनोरंजन हेतु गईं, पर उनकी साहित्‍यिक अभिरूचि इन दोनों पुस्‍तकों में एक जीवन्‍त चल चित्र के समान पाठक को जानकारी सूचना के साथ आनन्‍द भी देती हैं।

हर स्‍थल पर दर्शनीय स्‍थलों के विस्‍तृत विवरण के साथ उन देशों की संस्‍कृति, अनुशासन, खान पान, अतिथि सत्‍कार, कमियॉ, होटल-परिवहन व्‍यवस्‍था, शापिंग, मौसम सभी कुछ सरल शब्‍दावली में इस प्रकार लिखा गया है कि पाठक तन से चाहे कहीं भी हो, धन से असमर्थ हो, पर मन से इन स्‍थलों की यात्रा कर ही आता है, यही मानसिक यात्रा इन दोनों पुस्‍तकों की विशिष्‍टता है।

दूसरी पुस्‍तक के कवर पर ‘सस्‍ंमरण‘ अशुद्धि अखरती है। दूसरी पुस्तक का मूल्‍य भी कुछ अधिक ही है। लेखिका ने पुस्‍तकें पाठकों की अदालत में रखी हैं, पाठक क्‍या फैसला देंगे, यह तो नहीं पता, परन्‍तु समीक्षक की अदालत के जज का इतना भर ही कहना है कि अगले संस्‍करण में इन दोनों को ‘‘टू इन वन‘‘ कर एक ही पुस्‍तक रूप में प्रकाशित किया जा सकता है।

मानसिक यात्रा हेतु पुस्‍तकें उपयोगी हैं, पर आर्थिक सम्‍पन्‍न व्‍यक्‍ति शरीर से भी यात्राऐं करना चाहे। उनके लिए यह पुस्‍तकें किस प्रकार सुलभ हों, इस पर मंथन करने की आवश्‍यकता है, पर्यटन सम्‍बन्‍धी वेबसाइट्‌स पर इस समीक्षा का अंगे्रजी अनुवाद लोड किया जा सकता है। विदेशों की साइट्‌स पर इन पुस्‍तकों की जानकारी उपलब्‍ध होने से कई यात्रियों का भला होगा। यात्रा सम्‍बन्‍धी पत्रिकाओं में इस समीक्षा के साथ इन पुस्‍तकों के कुछ अंश प्रकाशित होना भी यात्रियों के लिए मार्गदर्शक का कार्य करेगा। यात्रा प्रारम्‍भ से पूर्व भारत में क्‍या-क्‍या पूर्व तैयारी कीं, इसकी संक्षिप्‍त जानकारी अगले संस्‍करण में होनी चाहिए। पूर्ण शाकाहारी यात्री क्‍या सावधानी रखें, यह भी स्‍पष्‍ट होना चाहिए।

तन धन से असमर्थ होते हुए मैं मात्र मन से ही इन पुस्‍तकों के माध्‍यम से विदेशों के 16 धामों की यात्रा कर आया आप भी मेरी श्रेणी में आते हों तो इन दोनो पुस्‍तकों को पढ़ने हेतु समय निकालिएगा। पासपोर्ट, वीजा, विदेशी मुद्रा कुछ नहीं चाहिए। मात्र अल्‍प धन राशि भर से 16 देशों की मानसिक यात्रा का आनन्‍द ले लेंगे। लेखिका को स्‍तुतीय प्रस्‍तुति हेतु बधाई

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