जसबीर चावला की कविताएँ

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किसी का भी नाम लो

- जसबीर चावला

ये पुरुषों का जंगल है

यहाँ

बेकायदा है

कायदा

उन्हीं की हुकूमत/ डंडा

करते हैं शिकार

पड़ता है हांका

मधुमिता

शहला

गीतिका

अनुराधा उर्फ़ फिजा

या

और भी

सब नाम हैं

सबके थे सपने

भरना चाहती थी

उड़ान

मुक्त आसमान में

पर कतरे गए

पिंजरे में कैद हुईं

मरी/ मारी गईं

ये जंगल है

पुरुषों का

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राम की चिंता राम ही जाने

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राम ने कब सोचा था
राम के नाम पर ही 
बोला जायेगा झूट
उसके नाम पर
होगा छल/ कपट 
दंगा/ लूट 
राम ने कब सोचा था
नफरत की आंधी होगी
बंट जायेगा देश खानों  में 
हिन्दुओं में/ मुसलमानों में
घृणा के मठों में/ मकानों में
राम ने कब सोचा था 
मुहं में राम बगल में छुरी
किसी एक के ही नहीं 
लाखों मुहों में राम होगा
बगलो में हथियार होंगे
राम ने कब सोचा था
ऐसा राम ने कब सोचा था?

---.

तस्वीर नहीं बनती

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चिपकी मुस्कान/ भंगिमा 
ओढ़ी उदासी से 
प्रसांगिक
हो सकता है
फोटू
स्म्रतियों में
अंकित स्मित/ याद 
मौन/ उदास/ अवसाद 
से
घिरे मन/ क्षण 
का चित्र 
कौन केमरा लेगा 
किस गति से? 

---.

आवाज दो हम एक हैं

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बाबरी से
बामियान तक 
बजरबट्टूओं से
तालिबान तक
विचार/ आत्मा 
शरीर/ संरचना 
विध्वंस करते/ ढहाते
ठिकाने लगाते
हम सब
सहोदर 
भाई भाई
हम सब
एक हैं 
--

chawla.jasbir@gmail.com

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