शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

गोवर्धन यादव का कृष्ण-जन्माष्टमी विशेष आलेख : नंद के घर आनन्द भयो...

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जन्माष्टमी के पावन पर्व पर विशेष

गोवर्धन यादव.

नंद के घर आनन्द भयो..........

भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव, केवल भारत में ही नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व में बड़ी श्रद्धा और धूमधाम के साथ मनाया जाता है.

आज की सुबह हम भारतवासियों के लिए एक नयी प्रेरणा- नयी उमंग- एक नया आयाम- ,एक नयी चेतना,- एक नया अहसास,- एक नयी अनुभूति, और एक नया उत्साह लेकर आयी है. घरों-घर में भगवान के जन्मोत्सव को लेकर विशिष्ट आयोजन आयोजित किए जा रहे हैं. द्वार पर तोरणें-सज रही हैं, पूजाघर विशेष आकर्षण के साथ सजाए गए हैं.. मंदिरों में सुबह से ही भक्तगण इक्ठ्ठा होकर पूरी तनमयता के साथ बैठकर भजन-कीर्तन में तल्लीन हो गए हैं. पुजारी ,भगवान के विग्रह को पूरी भव्यता के साथ सजाने में जुट गए हैं. बाल-आबाल-वृद्ध सभी लोग उस घडी की प्रतीक्षा में हैं कि कब रात के बारह बजते हैं और हमारे श्रीकृष्ण -मुरली बजैया- बांके बिहारी,- चितचोर,- किसन कन्हैया प्रकट होंगे.

ऎसा अद्भुत संयोग केवल इसी दिन देखने को मिलता है?. ऎसा नहीं है. यह केवल एक दिन का उत्सव नहीं है, बल्कि इसे मनाए जाने के लिए तो महीनों पहले से भी भक्तगण जुट जाते हैं. पूरे ब्रज में इस उत्सव को मनाने के लिए कई माह पूर्व से ही तैयारियां शुरु हो जाती है, जन्मोत्सव के बाद भी महीनों तक इस उत्सव का आनन्द उठाया जाता है.

सभी जानते हैं कि भाद्रपद ‍कृष्ण पक्ष की अष्टमी को ,रात के बारह बजे मथुरा के राजा कंस की जेल में, वासुदेव-देवकी के पुत्ररुप में भगवान श्रीकृष्ण ने आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व जन्म लिया था. अपने जन्म के साथ ही उन्होंने अपनी लीलाओं का विस्तार करते हुए वे नंदबाबा के यहाँ जा पहुँचे और उसके बाद उन्होंने अपने बाल्यकाल में ही, रथी-महारथियों सहित कंस को मार गिराया था. कृष्ण यहाँ नहीं रुके. एक जगह ठहर जाने के लिए उन्होंने अवतार नहीं लिया था. वे निरन्तर नयी-नयी लीलाएँ करते रहे और ,धर्म के रास्ते में रुकावट डालने वाले, सभी आतताइयों को धूल में मिलाते हुए मथुरा के अधिपति बने. आगे उन्होंने कौन-कौन सी लीलाएं कीं और किस तरह पांडवों के पक्ष में खडॆ होकर धर्म की स्थापन की, हमने-आपने –सबने पढ़ा है. अतः विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है.

यदि हम श्रीकृष्ण के संपूर्ण जीवन को ध्यान से देखें, तो पाते हैं कि उनका व्यक्तित्व ही अनूठा था .यदि देवताओं और अवतारों की समग्रता में उनको देखा जाए, तो वे अन्यतम व्यक्ति थे, जिन्होंने जीवन को, उसकी समग्रता में देखा-भोगा और जिया. राम जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, भगवान बुद्ध जहाँ करुणा के सागर हैं, लेकिन उन्हें अंशावतार ही कहा जाता है, क्योंकि ये अपनी मर्यादाओं से बंधे थे..फ़िर इनकी गति भी सीमित थी. केवल अकेले श्रीकृष्ण पूर्णावतार कहलाए. क्योंकि उन्होंने मनुष्य जीवन को, पूरे उत्साह के साथ आत्मसात किया और उसे संपूर्णता के साथ जिया. यदि हम उनके जीवन और वचनों की गहराई से पडताल करें, तो पाते हैं कि पांच हजार वर्ष पूर्व के कृष्ण आज भी हमारे लिए प्रासंगिक हैं. वे जीवन को, उसके समस्त यथार्थ को, एक साथ देखते और गुजरते हुए, अपने कटु अनुभवों को हमारे सन्मुख रखते हैं. उन्होंने दूसरों की तरह जीवन का निषेध नहीं किया, और न ही उनसे बचने की बात कभी की. वे तो केवल कर्मयोग का पाठ पढ़ाते रहे. जहाँ एक ओर उनके हाथ में विश्वमोहिनी बासुँरी विराजती है, वहीं सुदर्शन-चक्र से, मानवता के दुश्मनों की गर्दन उतारने में देर नहीं लगाई.. कभी हाथ में गोवर्धन पर्वत को उठाकर, अभय का प्रतिरुप बने. पांडवों के शांतिदूत बनते हैं तो कहीं संघर्ष की प्रेरणा देने वाले कर्मनिष्ठ. संकट की घडियों में वे किस तरह पाण्डवों को धैर्य रखने की सीख सिखाते हैं., वहीं दूसरी ओर, वे अभिमन्यु, घटोत्कच की असामयिक मृत्य पर सहानुभूति और संवेदना का परिचय देते हुए शोकसंतप्त पांडवों के जीवन , नए उत्साह का संचार करते हैं. कितनी ही विकट परिस्थितियाँ रही हों, उन्होंने पलायन नहीं किया, बल्कि डटकर उसका मुकाबला किया. शिशुपाल द्वारा घोर उपेक्षा-तिरस्कार और अपमानित किए जाने के बाद भी, उन्होंने अपनी बुआ को दिए वचनों का पालन किया. उन्होंने अपनी बुआ को वचन दिया था कि शिशुपाल को सौ गलतियों तक माफ़ करते रहेंगे, लेकिन जैसे ही वह अपनी सीमा पार करेगा, एक सेकेण्ड भी जीवित नहीं रह पाएगा. और उन्होंने अपना वचन उस सीमा तक निभाया भी. उद्दण्ड बने शिशुपाल ने सीमा का ख्याल नहीं रखा और जैसे ही उसने सीमा का अतिक्रमण किया, कृष्ण ने तत्काल उसकी गर्दन, अपने चक्र में उतारने में देर नहीं लगाई. स्वयं चक्रवर्ती होते हुए भी उन्होंने अपने सखा एवं बहनोई अर्जुन के रथ का सारथी बनने में हिचक नहीं दिखाई, जबकि उस समय सारथी बनना बहुत गरिमापूर्ण नहीं माना जाता था. युद्ध में शस्त्र न उठाने के अपने वचन को तोडते हुए, उन्हें आखिर शस्त्र उठाने के लिए विवश होना पडा था. जीवन के हर क्षेत्र में, वे किस तरह अधर्म पर धर्मसम्मत विजय प्राप्त करते चलते हैं,- कूतनीतियों को किस तरह बोथरा कर देते हैं -,युद्ध की समाप्ति पर राजसूय यज्ञ में, किस तरह एक कुशल संयोजक की भूमिका का निर्वहन करते हैं, यदि हम इन सब बातों पर गहनता से दृष्टिपात करें, तो हम पाते हैं कि उन्होंने जो जीवन जिया वह हमें एक सीख देने के साथ-साथ, जीवनपथ पर निडरता के साथ आगे बढ़ने में मदद करता है. भगवान श्रीकृष्ण की लीलाऒं और शौर्य के प्रदर्शन के अनेक उदाहरण हमें मिलते हैं. लेकिन उन्हें हमें आज के संदर्भॊं से जोडकर देखना होगा. कथाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि वे सारे दुष्टलोग जो फ़सलों, वनोपजों- पर अपना कब्जा जमाए बैठे-,शोषण करने में लगे थे, जनता त्राहि-त्राहि कह उठी थी, उन सभी को मौत के घाट उतारकर, जनता को मुक्ति दिलाई. कालियामर्दन की घटना से जलशुद्धिकरण की सीख हमको लेना चाहिए. आज भारत की तमाम छोटी-बडी नदियाँ भयावह रुप में प्रदूषित हो गई है, उन्हें किस तरह से ठीक किया जा सकता है, उसे कृष्ण की दृष्टि से देखना होगा. गोवर्धन पर्वत को धारण करने का अभिप्राय तो यही है न ! कि हमें किस तरह वनॊं की रक्षा करना है, अपने पर्यावरण को किस तरह स्वच्छ और प्रदूषण-मुक्त करना है.?. गोवर्धन की पूजा के निहितार्थ को तथा गाय चराने जाने की बात को भी गहराई से समझने की जरुरत है .यह समझना जरुरी है कि गाय समाज के लिए कितनी उपयोगी है.? आज हम नकली दूध, नकली मावा खाने के लिए मजबूर हैं, तो इसके पीछे क्या हमारी धन-लोलुपता काम नहीं कर रही है.? यदि गाय हमने पाली होती, तो उसके गोबर से बेहतरीन खाद बनाकर ,बंजर होती जमीन को बचाया जा सकता था..अच्छा और तरोताजा दूध पीकर हम अपनी और अपने नौनिहालों की खोई सेहत प्राप्त कर सकते थे.

भरी सभा में दौपदी के अपमान को होता देखते रहने के बाद भी भीष्म पितामह जैसी हमारी नियति हो गई है. आज महिलाएं सुरक्षित नहीं है. उन्हें इस तथाकथित सभ्य समाज में अपमानित ही होना नहीं पड रहा है, बल्कि उनका शारीरिक शोषण भी हो रहा है. सुरसा की तरह बढ़ती ये घटनाएं, अब मामूली सी बात हो गई है. पुलिस और प्रशासन पितामह की तरह चुप्पी साधे बैठे हैं, क्या कृष्ण जैसे चरित्र से हमें सीख लेने की जरुरत नहीं है आज?

अभी हाल में ही हमने रक्षाबंधन का त्योहार मनाया. बहनों ने भाईयों की कलाई में रक्षासूत्र बांधा. सबल भाइय़ों के रहते, अब तक कितनी बहनें अपनी लाज बचा पायीं? अखबारों में खबरे लिपटी पडी रहीं ,उसने हमको तनिक भी उद्वेलित नहीं किया? इस गंभीर मसले पर हम चुप्पी साधे बैठे रहे. और हमें लाज तक नहीं आयी? किसी विषधर की तरह फ़न उठाए, ये प्रश्न हमारे सामने खड़े हैं और हम बजाय उससे भिड़ने के, भाग खड़े हो रहे हैं.? इस संदर्भ को हमें, कृष्ण की नजरों से देखना होगा. बहन की आर्तनाद सुनते ही उन्होंने सरपट दौड़ लगा दी थी. यदि हम केवल उन्हें पूजते रहे और उनके द्वारा बतलाए मार्ग पर नहीं चल पाए तो फ़िर किस काम की पूजा-किस काम का व्रत-त्योहार. हर व्रत और त्योहार हमें कुछ सीख देते आए हैं, उसे अवश्य ही ग्रहण करना चाहिए, भी तो सार्थकता है- भलाई है.

अपने पुराने मित्र सुदामा को, विपिन्न अवस्था में आया देख कृष्ण दौड पडॆ थे. जाते ही उसको अपने गले से लगा लिया था और अपने सिंहासन पर बिठाकर चरण पखारते रहे थे. हास-परिहास बिखेरते हुए सुदामा के लाए ताम्बुल, मजे ले- लेकर खाते रहे थे. ये वे ही यदुनन्दन हैं जिन्होंने युद्ध-भूमि में खडे होकर गीता का दिव्य ज्ञान दिया और सारी सृष्टि में स्वयं के होने की बात बतलाई थी. क्या आज के विलासिता की जिन्दगी जी रहे लोग, शक्तिसंपन्न लोग, कृष्ण को पूरी तरह अपने भीतर उतार पाए? यदि वे अपनी उदात्तता का तनिक भी परिचय दें, तो पूरे देश से गरीबी मिटने में समय नहीं लगेगा. कृष्ण के इस देश से क्या गरीबी से छुटकारा नहीं दिलाया जा सकता?. दरअसल हमने उन्हें मात्र अवतार मानकर, मंदिर की सीमा के भीतर कैद कर रखा है. जिस दिन हम कृष्ण को अपने में आत्मसात कर लेंगे, उनके अवतार लेने के मकसद को समझ लेंगे, उनकी हर लीला की तह में जाकर उनके संदेश को समझ लेंगे, सच मानिए उस दिन कृष्ण फ़िर हमारे बीच होंगे, उसी तरह हंसते-गाते, मुस्कुराते, बंसी बजाते- रास रचाते और अपने वैभव को लुटाते.

एक और खास बात- हमें अपने भीतर नंदजी को भी उतारना होगा. हमें नंद बनना होगा. बात सीधी और सरल सी है कि नंद के घर ही तो आनन्द उतरेगा. नंद होंगे-तो आनन्द होगा ही. तब हम गर्व से अपने आप कह उठेंगे, नंद के घर आनन्द भयो-जै कन्हैया लाल की.

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गोवर्धन यादव

103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१
07162-246651,9424356400

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  1. शनिवार 11/08/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. आपके सुझावों का स्वागत है . धन्यवाद!

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  2. गोवर्धन यादव9:49 pm

    सम्मानीय यशोदाजी-नमस्कार-जैसा आप उचित समझें.आशा है,सानन्द स्वस्थ हैं,

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  3. कृष्ण-जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर प्रस्तुति
    कृष्ण-जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये!

    उत्तर देंहटाएं
  5. गोवर्धन यादव2:10 pm

    आप सभी को हार्दिक धन्यवाद कि आप को मेरा लेख पंसद आया. जन्मा‍ष्टमी पर पुनः शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं

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