शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

अजय चौधरी का आलेख - राजनीति और शिक्षण संस्थान

दलते हुए राजनीति परिवेश को देखा जाए तो इसका स्पष्ट प्रभाव शिक्षा जगत में फ़ैले अराजकता को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता हैं कि राजनीति आज शिक्षा जगत पर पूर्णरूप से हावी है। आए दिन समाचार पत्रों में देखा जाता है कि अमुख कॉलेज के छात्रों ने अध्यक्ष महोदय को अपमानित किया। एक तरह से देखा जाए तो विद्यार्थी अपने कर्त्तव्य से विमूढ होकर राजनीतिक प्रभावों से प्रभावित होकर ऐसे कुकृत्य को अंजाम देते हैं। राजनीति विषारद विद्यार्थियों को राजनीतिक मोहरें के रुप में प्रयोग कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। राजनेताओं के इस चाल से अंजान है ऐसी बात नहीं वे जानबूझ कर ऐसी परिस्थियों में फ़ँसते हैं और अपना उज्जवल भविष्य अन्धकार को समर्पित करते हैं। इसके प्रति विद्यार्थियों को सजग रहना चाहिए,राजनीति में भाग लेना चाहिए,किन्तु यह भी ध्यान रखना होगा कि राजनीति साफ़-सुथरी हो न कि असामाजिक व्यक्तियों द्वारा संचालित पार्टियों का सदस्य बनकर असामाजिकता का अंग बन जाए। विद्यार्थियों को अपने सद्बुध्दि क प्रयोग करते हुए सही पार्टियों का चयन कर,राष्ट्र के विकसित करने वाले नियम को संचालित करने वाले कार्यों में पूर्ण रूप से सहयोग देना चाहिए।

परिस्थितियाँ मानवीय विचारों का संचालन करती हैं इन्हीं परिस्थितियों से आज की राजनैतिक व्यवस्था भी प्रभावित है। आज एक ऐसी अराजक परिस्थिति तैयार हो चुकी है कि राजनीति भी इसका शिकार बन गया है। विद्यार्थी अपने स्वर्णिम भविष्य की ओर न बढ़ते हुए इन्हीं अराजक शक्तियों के प्रति रुझान बढ़ाकर अपने भविष्य को अंधकार की गलियों में धकेल कर जीवन को नष्ट कर रहा है। किसी भी राष्ट्र के विकास का दारोमदार पूर्णरूप से नवयुवकों पर होता है यदि नवयुवक किसी भी वजह से पथभ्रष्ट होगा तो सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि उस देश कि विकास की क्या दशा और दिशा होगी?इन नवयुवकों को सही मार्ग पर लाने के लिए शिक्षा ही एक सरल व सहज उपाय है। शिक्षा जितनी ही संस्कार-संम्पन्न और उपयोगी होगी नवयुवकों का विकास भी उतना ही सक्षम होगा। किन्तु वर्तमान समय में शिक्षण-संस्थान किस तरह राजनीति के चंगुल में फ़ँस गया है यह बुध्दिजीवियों से छिपा नहीं है। वर्तमान समय में शिक्षण-संस्थान राजनीतिक अखाडे़ के रूप में परिणीत होती चली जा रही हैं, चाहे वह स्कूल हो,कॉलेज हो या विश्वविद्यालय सभी पूर्णतः राजनीति से प्रभावित हैं। जब शिक्षण-संस्थान की ऐसी दशा है तो विद्यार्थी इनसे प्रभावित हुए बिना कैसे रह सकता है। किन्तु आवश्यकता है विद्यार्थियों को सजग रहना, अन्यथा राजनैतिक की शक्तिशाली प्रवाह उन्हें बहाकर पथभ्रष्ट कर सकती है।

शिक्षण-संस्थान की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए की शिक्षा ग्रहण करने वाले को सही दिशा मिलें। किन्तु देखा जाता है कि शिक्षण-संस्थान के कर्मचारी अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनैतिक पार्टियों में अंश ग्रहण कर शिक्षा प्राप्त करने वाले नवयुवकों को भी शामिल करने अनवरत प्रयास जारी रखते हैं। मेरा मानना है की राजनैतिक पार्टियों में शामिल होकर व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करना व्यक्तिगत मामला हो सकता है किन्तु अपने व्यक्तिगत राजनीतिक अनुभव को अगर वे शिक्षण-संस्थान से दूर रखे तो शिक्षा प्राप्त करने वाले ज्यादा लाभान्वित होंगे। शिक्षण-संस्थान को शिक्षण-संस्थान ही रहने दें उसे राजनीतिक का अखाड़ा न बनने दें और उस संस्था में कार्य कर रहे कर्मचारियों का भी पूर्ण दायित्व है कि संस्था के वातावरण को शिक्षा ग्रहण करने के अनुकूल बनाए रखें और ये तभी संभव है जब सभी अपने पूर्ण दायित्व का वहन करेगें अन्यथा देश का भविष्य अंधकारमय हो जायेगा।

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