प्रभुदयाल श्रीवास्तव की लघुकथा - अपने अपने दुख

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अपने अपने दुख
          
मिस्टर एंड मिसेस के लाल मेहमानों का स्वागत बड़ी गर्मजोशी से कर रहे थे,जाने वालों की बिदाई मॆं भी सौहार्द था। चारों तरफ चहल पहल बिजली की चकाचौंध और आधुनिक परिधानों मॆं सजी धजी महिलायें और पुरुष स्वादिष्ट खाने का चटकारे लेकर आनंद ले रहे थे। आखिर शहर के नामी गिरामी लाल परिवार के बेटे के विवाह का रिसेप्शन था। लोग जाते जाते लाल परिवार को प्रसेंट का लिफाफा देते और रिसेप्शन के इंतजाम भोजन की प्रशंसा और वर वधू की जोड़ी "बहुत ही सुंदर है" कहकर बिदाई ले रहे थे


लाल परिवार भी "आपकी दुआ है आपका बच्चों पर आशीर्वाद बना रहे " कहकर सबको बिदा कर रहे थे।मिस्टर लोटेवालॆ ने भी लिफाफा दिया और बिदाई ली।लिफाफा मिसेस लाल के हाथ में था जो ऊपर से खुला हुआ था और एक पचास का नोट बाहर झांक रहा था।उन्होंनें फौरन नोट बाहर निकाला और मिस्टर लाल से बोलीं "ये देखिये लोटेवाले के हाल पूरे पांच लोग थे और ये दे गये पचास रुपये,आपके फास्ट फ्रेंड हुं और उन्होंनें बड़ा बुरा सा मुंह बनाया ,लिफाफा में फिर नोट ठूस दिया। उनका मूड खराब हो रहा था।


इधर हीरालालजी भी पत्नी सहित वर वधु को आशीश देकर घर पहुंच चुके थे ।
"आपने प्रेज़ेंट में क्या दिया' मिसेज़ हीरालाल अपने हज़बेंड से पूंछ रहीं थीं।
"लिफाफा दिया तो था।"
  "हां हां मगर क्या दिया है?"
" एक हज़ार रुपये रख दिये थे"
"  क्या एक हज़ार ?  दिमाग तो सही है,आपको डयबिटीस है और मुझे तो आप जानते ही हैं अल्सर के कारण एक रोटी भी नहीं खा पाती और आप एक हज़ार फेक आये।"


पता नहीं मिसेज़ के लाल और मिसेज़ हीरालाल को रात को नींद आई भी कि नहीं।

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