गुरुवार, 30 अगस्त 2012

जसबीर चावला की कविताएँ

नई गरीबी रेखा
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वे गरीब नहीं थे
चाहते थे करना
महसूस
गरीबी क्या है

नामी मॉल गए
देखी/परखी
ब्रांडेड ब्लू जींस/ टॉप
छपे थे
फटे थेगले
जिस पर
आगे पीछे
चूना सा पुता था
दूसरी पर
लटक रहे थे
पायंचो के धागे
तीसरी के

खुश हुए
खरीद लिए
सारे कपड़े
जो उन्हें
दिखाते थे गरीब
अपने लिए
बीबी/ बाबा/बेबी/केलिए
अब वे भी थे नीचे
हाई क्लास
गरीबी रेखा के
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बार बार
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यह जानकार भी
रंग बिरंगे/ चमकीले
कागजों से लिपटे 
डब्बे में
सस्ता सा
उपहार होगा
मन आँखें
उत्सुक होते हैं
देखने/ छूने/ खोलने के लिए
यही
जिज्ञासा/ बेचेनी/ अतृप्ति
कदमो को
ले जाती है
फिर फिर
अज्ञात की
तलाश में
ठगाने के लिए

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अथ:राजनीतिज्ञ कथा
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खरबूजों का समाज है
सडान्ध मारते/ गंधाते
यहाँ स्वागत नहीं
किसी अन्य का
रेल के डब्बे
में आये
नए यात्री के समान

अपने है नियम/कायदा/ कानून
यहाँ रंग बदलना है
हर खरबूजे को
गिरगिट के समान
दूसरे खरबूजे
को देख
यहाँ
खींचनी हैं टांग
केकड़े
के समान
दूसरे की
अलग/ अलग
झपटकर
मिल/बांटकर
खाना/ नोचना है
गिद्धों के समान


यह समाज है
राजनीतिज्ञों का
गिद्धों का
खरबूजों का
गिरगिटों का
केकड़ों का
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उपक्रम
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बुना हुआ/ गढ़ा हुआ
सन्नाटा
मौन
तोड़ें
भंग करें
पसरी नीरवता
उदासी

चीख से
चाहे
उसांस से
कनखी से
आहट से
दस्तक से
या
दिल की
एक
धड़कन से

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रास्ता
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ये रास्ता
जाता है
जहाँ
वो
नहीं रहते
वहां

वे रहतें हैं
जहाँ
कोई रास्ता
नहीं जाता
वहां

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खोज
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जो मिले
उन्हें खोजा
न था


जिनकी तलाश थी
वे खोये
न थे

ढूँढ रहे थे
अपने को ही
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