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September 2012
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कहानी

बापू

राजीव सागरवाला

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अर्से पहले एक सपना मैंने देखा था।
ऐसा सपना था कि मेरे दिल ओ दिमाग पर असर कर गया। ऐसा कि अब तक मैं नहीं भुला पाया हूँ ।


कितने साल का हुआ हूँगा। उस समय। कह नहीं सकता ठीक से। शादी नहीं हुई थी। सरकारी नौकरी में लगा हुआ था। उसकी तरफ से भी कोई चिंता नहीं थी।
मां-बाप दोनों जिंदा थे। बापू अभी नौकरी में थे। इधर से भी कोई चिंता नहीं थी। सेहत भी ठीक-ठाक थी उनकी


फिर भी मैंने सपना देखा। क्यों देखा?  मेरी समझ से बाहर है।
करीब बीस साल तक वो सपना मेरे साथ रहा। 
सपनों के बारे में कहा जाता है कि ज्यादातर भुला दिये जाते हैं। बाज वक्त तो नींद से बाहर आते ही दिमाग पर जोर डालना पड़ता है कि क्या देखा था। फिर भी याद नहीं आता।
यह वैसा नहीं था।


जब भी मैं उसके बारे में सोचता पूरा दृश्य सामने आ जाता। सिहरन होने लगती। दहशत हो जाती। यह जानते हुए भी कि वह महज़ एक सपना है। फिर भी।
सपना क्या है एक हारर मूवी का ट्रेलर।
हम सागर के उसी घर में रह रहे हैं जिसमें मेरा बचपन बीता था। जहां नौकरी पर शहर से बाहर जाने से पहले करीब सतरह साल बिताए थे।
यह घर मकरोनिया गांव के पास बनी मिलेट्री की पुरानी बैरकों में से एक में था। घर बल्लियों के सहारे बांस की चटाई को मढ़, दीवारें खड़ा कर, छत पर खपड़ैल बिछा कर बना था। बांस की चटाई बल्लियों के दोनों ओर मढ़ी थी। बीच की खाली जगह में अक्सर चूहों के पीछे सांप भागते रहते थे। सरसराहट खौफ पैदा करती थी। सांप ऊपर पहुंच छत की शहतीरों से नीचे टपक पड़ते थे, खाट पर। अक्सर।


जब मैं उस मकान से रू-ब-रू हुआ था, बच्चा था, कोई सात-आठ साल का।
छत से लटकते बल्ब के पीछे नीम अंधेरा रहता था। चारपाई पर लेटते ही अंधेरे में मौजूद आकृतियाँ हनुमान चालीसा दोहराने को मजबूर कर देती थीं। बचपन में।
बरसात में पानी की फुहारें छत की खपड़ैलों से छन कर आती थीं। तेज़ हवाऐं बांस की चटाइयों से बनी दीवारों के रंधों से हू-हा-हू करती आर-पार जाती रहतीं थीं।
घर के सामने खुला मैदान था। दूर एक पतली सी सड़क । करीब सौ मीटर दूर होगी। बारिश के दिनों में मैदान में घास आदमी के कंधों तक उठ आती। घास के बीच से एक पगडंडी घर के बाजू से निकल सामने सड़क तक जाती थी। तेज हवाओं में यह घास समुद्र की लहरों सी एक के पीछे एक आ घर की दहलीज़ पर बरसात के पानी की धार साथ ले सिर पटकतीं।


घर में तीन कमरे थे। एक लाईन में। बीच वाला बापू का । रहने, पढ़ने-लिखने का। दरवाज़ा मैदान की तरफ एक खुले वरांडे में खुलता था। जिसके आगे वो मैदान था। घास भरा।  दो दरवाज़े बचे दो कमरों में खुलते। परले कमरे में कोयला, लकड़ी और बुरादा भरा रहता था अंगीठी चूल्हे में इस्तेमाल के लिये। बापू के कमरे के पल्ली तरफ वाला। इस तरफ वाले दूसरे में हम बच्चे और मां रहते थे। छः प्राणीं।

यह बता देना मुनासिब होगा कि सपना मैंने जवानी में देखा था। शादी नहीं हुई थी।
देखा कि बापू का कमरा है। कमरा किताबों से अटा है जो मौजूद अलमारियों और टेबुलों पर लदी हैं। कमरे में एक लम्बे तार से बल्ब लटका हुआ है । रोशन है। उसके पीछे छत दिखाई नहीं देती। इतनी उंचाई पर थी कि उसकी थाह लेना नामुमकिन था। हो सकता है कि ऊंचाई उतनी न भी हो पर अंधेरे के बावस्ता गहराई नापना मुश्किल लगा। सपने में वैसे भी मापने की सहूलियत या गुंजाइश तो रहती नहीं। बल्ब की रोशनी का दायरा हक़ीकत से सपने में कहीं कम लगा। जहां फर्श पर रोशनी थी उधर वह ही थी। पर उससे हटते ही कमरे की दीवारें, किताबों के ढ़ेर, टेबुल, टंगा केलेंडर सब पर अंधेरे का मुलम्मा चढ़ा हुआ था। यहां तक कि बापू के बिस्तर पर भी उतनी ही रोशनी थी जितने से पता चले कि हां कोई लेटा है।


बापू हमारे कमरे से लगे दरवाज़े के पास तख्त पर लेटे हैं। रजाई ओढ़े हुए। सख्त बीमार हैं। चलने-फिरने के मोहताज़।
तेज हवा चल रही है। रात का कोई भलता ही निशाचर पहर रहा होगा।
मैं तख्त के पास एक लोहे की फोल्डिंग कुर्सी पर बैठा हुआ हूं। ठंडी है। तीमारदारी करने के लिये।


बैठे-बैठे शायद मेरी नींद लग गई थी । ठोड़ी सीने से जा लगी थी। कई रातों की नींद आंखों में थी। कि । मेरी नींद किसी आवाज़ से खुलती है। दूर से आती।
तेज हवा सनसनाती हुई सन्नाटे को चीरती दीवार की चटाई के छेदों से होती हुई सीटी सी मारती चल रही है। इतनी तेज है कमरे में भी कि टेबुल पर रखे कागज़ भी फड़फड़ा रहे हैं। जैसे कि दीवारें नदारद हों। ठंडी इतनी कि हड्डी काट दे। पर इससे मुझे परेशनी न थी । उस आवाज़ों में भी कोई और शोर सुनाई दे रहा था ।  हल्का। कान चौकन्ने कर सुनने की कोशिश की। भीड़ की आवाज़ थी। एक अलग ही। बहशी शोर ।  


दौड़ कर मैं दरवाज़े तक जाता हूं। छेद से देखने की कोशिश करता हूं। दूर  अंधेरा सा। मैदान में लहलहाती घास। हवा के साथ। आंखों पर पूरा जोर डालने पर भी दूर कोई दिखाई नहीं दे रहा।


शोर तेज़ होता हुआ। लगा। भीड़ इसी तरफ आ रही है। क्यों आ रही है। मैं नहीं समझता। फिर रुक कर देखता हूं। शोर बढ़ा। अंधेरे के दूसरे छोर पर। घास के खुले मैदान के परे। चमचमाती आंखों के झुंड। बलवाई थे। हैरान कि कोई मसला तो नहीं था फिज़ा में। फिर?


जल्दी से कुण्डी लगा सिटकनी भी लगा देता हूं ।
शोर और बढ़ता हुआ। अब एक आध नारे उससे ऊपर उभरते हुए। डूबते उतराते।
ठेल कर एक भारी अलमारी दरवाज़े से अड़ा देता हूं । खासी कोशिश करना पड़ रही थी। सब कुछ बहुत धीरे-धीरे हो रहा था । जितनी कोशिश अलमारी सरकाने में लगी और लगा जितनी देर लगी उतनी लगनी नहीं चाहिये थी । हर पल लगता था कि बलवाई उससे कहीं ज्यादा तेजी से पास आ रहे हैं जितनी तेजी से मैं अलमारी खिसका नहीं पा रहा।


बहरहाल किसी तरह अलमारी को अड़ा दिया। तब तक मेरी सांस फूल गई थी। मैं अभी भी चिंता में था। सोच रहा था कि माज़रा क्या है? क्यों हमारी तरफ आ रहे हैं। ये लोग। कौन हैं। क्या चाहते हैं।


मैं अपने बचाव के लिये चारों ओर देखता हूं। क्या करूं? टेबुल की दराज़ें खखोलता हूं। पुराने नकली दांत । पुराने चश्में। अल्पिनें। मोम्बत्ती-लाख-सील । पंच। पुराने टूटे फाऊंटेन पेन। कागज़ फाड़ने का चाकू। वही उलट-पलट कर देखता हूं। कागज़ ही काट देता है। मेहरबानी। केमेल इंक की बोतल दिखाई देती है। कुछ नहीं तो उसे ही हाथ में उठा लेता हूं। एक पार्सल सीने का सूआ दिखाई देता है। उसे भी उठा लेता हूं। कमरे में और कुछ तो दिखाई न दिया। हथियार।


बापू की आवाज़ आयी। रजाई में से। दबी-दबी। टूटती........... ' पानी ' ।
इन्हें भी अभी पानी चाहिये था। मन मन झुंझलाता हूं।
सिराहने तिपाई पर रखी कटोरी उठा चम्मच से पानी ले मुंह में डालने जा रहा था कि चटाई की दीवारों को फाड़, दरवाज़ा तोड़ अड़ी अलमारी को गिराते रेला कमरे में घुस आया। हाथों में डंडे। तलवारें। भाले-त्रिशूल। बगनखे-खंजर। चाकू-कटारें .. .. ..तिरंगा नहीं।
नारे लगाते।


'ईंट का जबाब पत्थर से। इंकलाब....... ज़िंदाबाद। जो हमसे टकरायेगा ...। मारो......मारो......निकलने न पाये........। '
भड़भड़ .. .. चर्र। दरवाज़ा टूटा। ताज्जुब है। पोथियों से भरी इतनी बड़ी अलमारी गिरने से जरा सी भी आवाज़ नहीं हुई। गिरी ऐसे कि चिड़िया का पंख।
हाथ की कटोरी, चम्म्मच-पानी बिस्तर पर।
अलमारी की किताबें बिखरते, अपने ऊपर गिरते देखता हूं। बापू के ऊपर अपने को डाल देता हूं। लपेट कर। उनके डंडे पड़ने लगे। मेरे उपर।
जोर से चीखना चाहता हूं। कि कोई पड़ोसी सुन ले और बचाने आ जाय। कितनी भी कोशिश करूं कमबख्त नहीं निकलती। आवाज़। गले से। मैं दबा हूं। हाथों पर बोझ लिये। जोर-जोर से चिल्ला रहा हूं। दम घुट रहा है। छटपटा रहा हूं।
कराह नीचे से निकलती है।........घुटी हुई.........  'पानी'.....।
पानी चाहिये.....बापू को......।


छटपटा रहा हूं। कैसे दूं? बोलने की कोशिश करता हूं। गिड़गिड़ाता हूं.. .. 'रहम करो .. .. बापू बीमार पड़े हैं.. .. ..बक्श दो.. .. ..।'
उनके जूं नहीं रेंगती।
एक नेज़ा। लपलपाता।
अपनी ओर बढ़ते देखता हूं। चीखता हूं।
मेरी नींद खुल जाती है। कुछ समय लगता है । समझने में । बन्बई में हूं। लाज़ में। बिस्तर पर ओंधा पड़ा हूं। तकिया दबोचे। बतन तरबतर है। पसीने से। सांस धोंकनी की तरह चल रही है। रात का ढाई बजा है।

ओफ । क्या सपना था। सन १९६९ की रात थी।

बापू रिटायर हो चले सन छःहत्तर में । घर बनाया। सारी जमा-पूंजी लगा । अपनी जिंदगी में पहली बार। अब अपने खुद के मकान में थे। बुढ्ढा-बुढ़िया अकेले । बच्चे, हम सब अपनी-अपनी रोजी-रोटी के सिलसिले दूसरे शहरों में। शादी, बच्चे, घर-गृहस्थी। मस्त। बारी-बारी से आते । कुछ दिन रहते। घर की टूट-फूट देखते। सुधारते। चलते वक्त दोनों से साथ चलने का आग्रह करते। फर्जी तौर। दोनों मुस्करा कर टाल जाते। तुम लोग तो निकल जाओगे नौकरियों पर। हम बुढ्ढा-बुढ्ढी क्या करेंगे सारा दिन। अनजान शहर। दो बात करने को तरस जायें। यहीं ठीक हैं। चार आदमी हैं तो जानने वाले। दौड़ के जाओ सामने परचूनी से सामान ले आओ। न  बाबा।
जाने वाले राहत की सांस ले निकल पड़ते।

यह अपना घर मकरोनिया के उस घर से जिसे सपने में मैंने देखा था करीब दो  किलोमीटर ही होगा दूर । बुधवारिया बाज़ार जो कि पेंटागान के पास टेकरी पर लगता था हर बुधवार। उसी टेकरी पर। हाऊसिंग बोर्ड ने बंगले बनाए एच आई जी, एम आई जी। इसी में से एक है। यह घर। एच आई जी-१। घर अब पक्का है। मकरोनियां के उस घर जैसा खपडैल का छाया और चटाई की दीवारों का नहीं। घर में आंगन और चहारदीवारी है। पीछे सिविल लाईन्स वाली सड़क और बगल में कालोनी में आने वाली छोटी। दोनों सड़कें चलती हुईं।


दरसल पेंटागन पांच रास्तों का चौराहा है। पांच इस लिये कि दो तो सागर शहर से आते हैं। एक सिविल लाईंस से दूसरा केंट से। पेंटागन से एक रास्ता जबलपुर जाता है और दूसरा नरसिंगपुर । इन दोनों के बीच से एक रास्ता और निकलता है जो मकरोनियां उन्हीं बैरकों की तरफ निकलता है जिसका जिक्र मेरे भयावह सपने में है।  १९५० में पेंटागान पर गिनती की दो एक दूकानें थीं। एक परचूनी की और एक शायद ढाबा, जबलपुर रोड पर। तेल की ढिबरी में चलती थीं ये दूकानें। रास्तों पर घने पेड़ थे।
बात अब सन् ८४ की है। दूकानें बढ़ गई हैं। बिजली आ गई है। आस-पास आबादी भी बढ़ गई है। गाड़ियों की आवाजाही भी।


इस चौराहे से ट्रकों की आमद भी खासी तादाद में होती रहती है। उस समय भी और आज भी। उस समय कम थी। अब ज्यादा है।
समय बदल गया। कई साल पहले  में बापू को फ़ालिज़ मार गया। चल फिर नहीं सकते। बांयां हाथ बिलकुल बेकार हो लटक गया। घर के सामने की तरफ ड्राईंग रूम के साथ लगे बेडरूम में सामने खिड़की के नीचे बिस्तर लगा है। पड़े रहते हैं। पहले उठा कर कुर्सी पर बैठा देते थे। घर में इधर-उधर ले जाने में सहूलियत होती थी। मन और सा हो जाता था। बस।


इधर एक आध साल से वो भी बंद। लेटे रहते हैं। खाना पीना दाना सब बिस्तर पर। एक तरफ से मुंह कुछ टेढ़ा हो गया है। लार टपकती रहती है। बोलने की कोशिश करते हैं। बोला.. .. .. खुद ही समझते हैं। दिमाग अब भी चाक-चौबस्त है। सब समझते हैं। दिखाई पूरा देता है। बाहर कमरे में कोई आये तो आंखों के इशारे से पूछते हैं। नाराज़गी, नापसंदगी अगर है किसी चीज से तो ज़ाहिर कर देते हैं। चेहरा तमतमा जाता है।


दीवाली का समय। बीत चुकी थी दीवाली। शादी मेरी भी हो गई थी। एक बच्ची थी। दीवाली मनाने घर आये थे। छुट्टी खत्म होने वाली थी।
दिन में ही खबर हो गई थी कि इंदिरा गांधी की हत्या हो गई थी। समाचारों में अटकलों, अफवाहों का जोर था। माहौल में अनिश्चितता थी। रेडियो और दूरदर्शन पर उत्तर भारत के कई शहरों में दंगे लूट-पाट होने की खबरें थीं। अब क्या होगा? शहर से बाहर इस जगह कुछ पता नहीं चलता।


खाना पीना कर जल्दी ही हम सोने चले गये।
नींद में मुझे कुछ शोर सुनाई दिया। ऐसा कि दूर से डूबते उतराते शब्द। मारो.....पकड़ो......निकलने न दो.......। साथ ही लठियां पीटने की आवाज़ें।
मुझे पहले तो लगा कि वही सपना होगा। पीछा नहीं छोड़़ता।
लेटे-लेटे अंधेरे में समय का अंदाज़ लगाते सोच रहा था कि क्या बात है जो हो हल्ला हो रहा है। देखने के लिये उठा ही था कि किसी के अहाते में कूदने, दौड़ने और दरवाज़ा थपथपाने की आवाज़ आयी। कोई फुसफुसाते हुए गुज़ारिश कर रहा था कि जल्दी से दरवज़ा खोलें। पत्नी और मां भी हल्ला सुन कर आ गईं । डाईंगरूम में। मैं मां की ओर देखता हूं जो इशारे से कह रहीं हैं कि हम चुप लगा जायें। पता नहीं कौन हो।


दरवाज़े पर थपथपाहट और बढ़ गई। मैं पता लगाने के लिये कि आखिर माज़रा क्या है। दरवाज़े के पास। कौन है इस वक्त। कोई पड़ोसी तो नहीं। तीन नम्बर में भी सरदार रहते हैं। दांतों वाले। घर आना-जाना है। घरोपा है। बुजुर्ग हैं मियां-बीबी। नेक इंसान। कल शाम ही तो आंटी जी जेवर पोटली में बांध घर के पिछवाड़े गली में से आ सौंप गईं थीं मां को रखने के लिये। कहीं वो तो मुसीबत में नहीं।
देखने के लिये जरा सा दरवाज़ा खोला था कि उसे ठेल कर एक आदमी अंदर घुस आया। लम्बे बाल.. .. .. चेहरे पर बिखरे हुए। कमीज़ फटी हुई। किसी तरह तहमत संभाले हुए। नंगे पैर। माथे और होंठ पर से खून बहता हुआ। कंपकपाता। उम्र यही कोई तीस-बत्तीस। सरदारों के हिसाब से जरा दुबला पतला। हाथ जोड़े हुए। गिरता। पंजाबी हिन्दी बोलता। 'असी मुश्किल में साहब। मेनू पता नीं । जब्बलपुर से से चला सी। जी मुझे बचा लो। भीड़ पड़ी है मेरे पीछे। ट्रक जल गया जी। मेहरबानी होगी। गुरु असीस देवें ।'
थरथर कांप रहा था।
मैं उसको धक्का दे कर बाहर करने की कोशिश कर रहा था।

एक दम सपना ध्यान में आया। हक़ीकत में बदलता।

     भीड़ अभी इधर आ गई और पता चल गया कि वह यहीं छिपा है तो घर जला देंगे। मार-पीट करेंगे सो अलग। बिस्तर पर पड़े बापू का क्या करूंगा। आग लगने पर बाहर निकालना मुश्किल होगा। क्या करूं। मैं उससे से कह रहा था कि पीछे से आंगन की दीवार कूद कर भाग जाओ। यहां नहीं रहने देंगे। पत्नी और मां भी उसे पीछे ठेल रहे थे-   'निकलो यहां से।'
वो था कि कातर स्वर में गुहार कर रहा था कि रहने दें रात भर। हाथ जोड़ रहा था। मां जी के पैर पकड़ रहा था। 
इतने में बापू की घों-घों करती तेज आवाज़ सुनाई देती है। शायद घर में शोर से नींद खुल गई होगी। मां तेजी से अंदर कमरे में गईं।


मैंने सोचा यह आसानी से नहीं जायेगा इसके साथ बहस करने से शोर शराबा होगा और बाहर उसे ढूंढ रहे लोगों का ध्यान मकान की तरफ जायेगा। उसे लगभग खींचते हुए पीछे किताबों के कमरे में ठेल दरवाज़ा बंद कर बाहर से सांकल लगा पत्नी से मशविरा करने लगा। बच्ची भी आंख मलती उनींदी से आ मां से लिपट गई। पत्नी कह रही थी क्यों खतरा मोल ले रहे हो। निकालो इसे। भीड़ को मालूम चल गया तो हम सब की जान जायेगी। वो तो मरेगा ही हम भी मारे जायेंगे।
मां शायद पलंग पर लेटे बापू को समझा रही थी। पता नहीं उन्होंने क्या समझा। क्या न समझा।


हम सब कमरे में पहुंच गये। सड़क पर लगी ट्यूब लाईट की रोशनी खिड़की से होती उन पर पड़ रही थी। बाहर चारों तरफ से आवाज़ें आ रही थीं। एक जीप भी तेजी से घर के पास से बार-बार निकल रही थी। सब ऐसे चुप हो जाते थे कि सांप सूंघ गया हो।


मैं बापू से मुखातिब ह?आ। मैंने फिर से उन्हें बताया कि शायद यहां भी दंगे शुरू हो गये हैं। पेंटागन पर ट्रक जला दिया गया है । किसी तरह बलवाइयों से बच कर ड्राईवर घर में घुस आया है ।


कि हम सब की राय है कि खतरा मोल नहीं लेना चहिये और उसे इसी वक्त घर से बाहर धकेल देना चाहिये। अगर उन लोगों को पता चल गया तो हम सब मारे जायेंगे। पता नहीं कितने दिन तक यह चलेगा। आज रात निकल भी जाय किसी तरह तो फिर कल ....कल दिन में क्या होगा।
बापू के गले से गुर्राने जैसी आवाज़ निकली। चेहरा तमतमा गया। जैसे कि उन्हें मेरी बात अच्छी न लगी।


मां को इशारे में कुछ कहा।
मां ने पूछा उनसे .... 'यहीं रहेगा?'  .... उनके आंखें झपकने से मां ने जो समझा ..........हमसे कहा।
' दिमाग खराब हो गया है इनका ....कह रहे हैं......कहीं नहीं जायगा ' ।
पत्नी भी बड़बड़ाई कुछ.......' हमारी फिकर नहीं....' । बच्ची को गले से लगाये खड़ी थी। चिंताऐं।
मैंने फिर समझाने की कोशिश की कि कितना बड़ा खतरा है। समझदारी इसी में है कि उसे बाहर करें।
बापू का चेहरा फिर लाल हो गया। गुस्से में।
मां की तरफ देखा। कुछ बुदबुदाऐ ....मां झुक कर कर उनके मुंह के पास ले गईं। बोली....... ' कह रहे हैं........ बुलाओ....... उसको' ।
हम सब एक दूसरे का मुंह देख रहे थे। उनका गुस्सा जग जाहिर था। और इस हालात में कहीं उनको कुछ हो गया तो ......अस्पताल ले जाना भी मुश्किल होगा। कोई चारा नहीं था।
कमरे का दरवाज़ा खोला तो फिर वह गिड़गिड़ाने लगा..... ' रहने दो एक रात ...मेहरबानी होगी......मेरे भी बाल बच्चे हैं.......रहम करो.... ' ।
उसने सोचा कि मैं बाहर निकाल रहा हूं.....उसे।
बांह पकड़ उसे बापू के पलंग के पास ला खड़ा किया। हाथ जोड़े खड़ा ...उनको देखता रहा....कुछ देर...बोला कुछ नहीं.. .. ..देखता रहा।
फिर न जाने क्या सोच .......पलटा ....आंखें पोंछते हुए.......दरवाज़े की तरफ जाते ......बोला.... शायद ....अपने से ही....... '  माफी पाजी .......जावां ..'
उसको जाते देख बापू ने पूरी ताकत से गले से आवाज़ निकाली..... बहुत अरसे बाद ही सुनाई दी उनकी आवाज़.....साफ.......इतनी साफ कि हमें भी समझ में आ गयी ............ ' रुको'
वह मुड़ा ... उसे पास बुलाया ...बापू ने.....नीचे झुकने को कहा...हाथ के इशारे से और अपना बांया हाथ .......लकवे वाला ....जिसकी अंगुलियां हथेलियों पर मुड़ चुकी थीं........उठाया ....... उसके धूल भरे सिर पर रक्ख....... अपने सीने पर खींच लिया।
वो जमीन पर बैठ गया पलंग के पास.......घुटनों के बल.........सिर बापू के सीने पर.......हाथ फैला लिपट गया........ फूट-फूट कर रो पड़ा...........बापू खुद भी फफक कर रो उठे........  बेजार।

                        **

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न दैन्यं न पलायनं

चित्रा !आज फ्री हो ?.....तुम्हारी बेटी तुमसे मिलना चाहती है” इरा ने फोन पर  बताया .

“ओह नव्या !वो कब आई” मैनें पूछा तो दूसरी तरफ से पुलकित नव्या का स्वर सुनाई दिया ...मौसी मिलकर बात करेंगे मेरी पसंद का खाना तैयार रखना .

खाना तैयार करते हुए सब कुछ एक फिल्म रील की तरह चल रहा था –

“चित्रा दी !चित्रा दी !जल्दी दरवाजा खोलिए .”

यह रेवा की आवाज थी ,घड़ी की ओर देखा रात के साढ़े दस बजे थे .दरवाजा खोला तो वो कुछ घबराई सी लगी .

“घर चलो और अपनी सहेली के हाल देखो” कहते हुए उसने सामने पड़ा बैग व स्टेथोस्कोप उठा लिया .एक बारगी तो मैं कुछ समझ नहीं पायी लेकिन जल्दी ही इरा का चेहरा सामने घूम गया, “शायद उसके पति ने मार पीट की होगी” यंत्रवत कदम उनके घर की ओर बढ़ गए . घर पर ताई (इरा की माँ )भी बैचैन दिखाई दी अरुण चाचा जो कि हमारे पडोसी हैं इरा के पास बैठे दिलासा देने की कोशिश कर रहे थे .बदहवास सी पड़ी इरा की फटी फटी आँखों से निरंतर आंसू बह रहे थे .

देखते ही समझ आ गया कि शारीरिक आघात सहते रहने की आदी हो चुकी इरा इस बार विशेष मानसिक पीड़ा से जूझ रही है .दवाइयों के साथ नींद का इंजेक्शन दिया था, कुछ ही देर में इरा सो गयी .

बाहर के कमरे में पहुंची तो ताई का स्वर उभरा “कंवर साहब को फोन कर देना चाहिए.”

“उस जल्लाद को !जिसने नन्हीं सी बेटी के साथ इरा दी को मौत के मुँह में धकेल दिया यह तो अरुण चाचा की नज़र पड़ गयी वर्ना तुम खुद अपनी बेटी का चेहरा देखने को तरस जाती” रेवा ने चिढ़कर कहा .

“ तू खुद तो घर बसाने की सोचती नहीं उसे भी सही रास्ते पर मत चलने दे .”ताई का स्वर ऊँचा हो गया था .

मैंने रेवा को चुप रहने का इशारा किया . “मैं चित्रा दी के घर जा रही हूँ .”कहकर रेवा ने बैग उठाया और मेरे साथ चल दी .

मैं जानती हूँ रेवा के जिस आक्रोश को मैंने रोका है वो अब मेरे सामने फूटेगा . ताई की नज़र में रेवा एक बिंदास लड़की है जिसे घर परिवार में रहने का सलीका नहीं आता. लेकिन हमारा नजरिया कुछ और है . भला जो लड़की घर बाहर के काम फुर्ती और सफलता से निपटाती है पढने लिखने में अव्वल हो पास पड़ोस वालों से सहृदयता से पेश आती हो उसे परिवार में रहना नहीं आता ,यह मानने वाली बात नहीं है , हाँ गलत बात को बर्दाश्त करना उसके बस की बात नहीं .घर के काम तो वह इतनी अच्छी तरह निपटाती है कि खुद ताई भी फूली नहीं समाती लेकिन उसके शादी न करने के फैसले से ताई दुखी हैं .

इरा की गृहस्थी को उदाहरण बना कर रखते ही रेवा और ताई के ग्रह एक दूसरे के विपरीत हो जाते हैं .

हमारे घर आते ही रेवा फफक कर रो पड़ी –“जानती हो चित्रा दी आज उन लोगों ने इरा दी को इस ठिठुरती रात में दस बजे घर से बच्ची के साथ बाहर निकाल दिया .”

इरा दी बेसुध सी रेल की पटरियों पर चल रही थी कि अरुण चाचा ने देख लिया और किसी तरह घर ले आये और अब माँ उन लोगों को ही फोन ......कहते कहते रेवा हथेलियों से मुँह ढक कर सिसकने लगी थी

कोफ़ी पी कर कुछ देर हम चुपचाप बैठे रहे .

“हम सुबह इरा से बात करेंगे तुम फिलहाल उसकी सेहत का ध्यान रखो और ताई जी से बहस करने की कोई जरूरत नहीं .”कहकर मैं रेवा को घर छोड़ आई .

बारह बज चुके थे और मेरी आँखों से नींद पूरी तरह से गायब थी .इरा और रेवा में बस सहनशीलता का ही अंतर था वरना दोनों खूबसूरती पढाई और शालीनता की मिसाल थी .रेवा जहाँ हर गलत बात का विरोध दृढ़ता से करती थी वहीँ इरा समझौते की राह में विश्वास करती थी .

विवाह से पूर्व लेक्चरर थी इरा ,पति के शक्की मिजाज के कारण नौकरी छोड़ी और दिनोदिन घरेलू समस्याओं में समझौते की राह पकड झुकती रही .जिन समस्याओं से वह किनारा कर रही थी वही सब उसे इस कायरतापूर्ण मार्ग पर धकेल ले गयीं थी .

इरा के बारे में सोचते सोचते ही नींद आ गई . सुबह इरा का हाल जानने पहुंची तो लगा पहले से कुछ ठीक है लेकिन रात के घटनाक्रम को लेकर शायद शर्म महसूस कर रही थी .टूटे हुए मन को जोड़ने का वक्त अभी नहीं आया था . उधर रेवा और ताई जी रात की सम्बन्धियों को खबर करने की बात को लेकर फिर उलझ गए थे .

चित्रा दी ! आप ही बताइए जब उन्हें इनकी जरूरत ही नहीं तो .........

रेवा ! हम लड़की वाले हैं आखिर हमें ही झुकना ...........

कब तक ताई जी कब तक ....... न चाहते हुए भी मुझे दखल देना पड़ा .”आपकी इसी सोच ने रात को आपकी बेटी को कहाँ पहुंचा दिया था , अब तक आने उसके मन की सुध नहीं ली और फिर वही सब दुहराना चाहती हैं.”

“तुम लड़कियां यह क्यों नहीं समझती कि दुनिया जीने नहीं देगी , यही कहेगी कि लड़की में ही कोई खोट है” ताई ने प्रतिवाद किया .

“ताई जी !जिस राह पर वह रात चल पड़ी थी , उसके बारे में दुनिया क्या यही नहीं कहती ?”

“ इतने कानून बन जाने के बाद भी ये पढ़ी लिखी महिलायें .....” रेवा अब भी आवेश में थी .

“रेवा क़ानून समाज को सुधारने का मार्ग जरूर है पर जब उसे तोड़ मरोड़ कर गलत तरीके से इस्तेमाल किया जाता है तो समाज को सही दिशा मिलने के बजाय उच्छृंखलता ही बढ़ती है देखती नहीं किस तरह अदालतों में केसों के ढेर बढ़ रहे हैं...” इस बार इरा का स्वर सुनाई दिया .

“लेकिन दीदी इस तरह विरोध न करके बार बार सिर झुका कर क्या हासिल होने वाला है ?” रेवा ने प्रश्न किया .

“इस समाज ने नारी को देवी कहकर उसे अपनी संस्कृति और गौरव की रक्षा का भार सौंप रखा है .इस गौरव को वह उतार कर फेंक नहीं सकती और न ही केवल कानून उसे सम्मान दिला सकता है नदी की मंजिल तो सागर ही है .”

“सच कहती हो इरा किन्तु  क्या तुम्हें नहीं लगता कि यदि नदी समुद्र में समाहित हो कर अपना अस्तित्व मिटा देने के लिए लालायित रहती है तो केवल इसलिए कि सागर उसे अपनी विशालता के बल पर बाँधने में समर्थ है .छोटी मोटी तरंगों की बात तो जाने दो चंद्रमा के आकर्षण से उठने वाले ज्वार को भी समुद्र थामे रहता है फिर कोई नदी उससे अलग नहीं हो सकती . रही संस्कृति की बात तो वह कहती है न दैन्यं न पलायनं .... फिर चाहे नदी रूप में जीवन बांटती चलो या समुद्र संग मोती सिरजो .”

न दैन्यं न पलायनं..... दोहराते हुए इरा ने नन्हीं नव्या को सीने से लगाते हुए बाहों में समेट लिया . चेहरे की दृढ़ता ने जता दिया था कि वह अब इस बच्ची के लिए नौकरी भी करेगी और आत्मसम्मान से जियेगी भी .

डोरबेल बज उठी थी .बाहर निकल कर देखा तो नव्या एयरफोर्स ऑफिसर की यूनिफ़ॉर्म में खड़ी थी सेल्यूट मार कर ,मौसी .... कहते हुए मुझसे लिपट गयी . ओह नव्या ...मन प्रफुल्लित हो उठा था उसे देखकर . इरा का दृढ़ विश्वास से देखा गया सपना पूरा हो गया था                  

                         -वंदना      

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"आज फिर तुम इतनी देर से आई गीता? तुम्हारी तो रोज़ की यही आदत हो गयी है, मैं बोल-बोल कर थक गयी ! अब तो मुझे भी टोकने में शर्म आने लगी है पर  तुम्हें कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता..." , सीमा, दर्द की दवा की गोली गटकते हुए.., खीजी हुई गुस्से भरी आवाज़  में बोले जा रही थी ! उसे बुखार सा महसूस हो रहा था, सिर और हाथ-पैरों में बेहद दर्द हो रहा था...! अचानक उसने देखा, रोज़ कोई न कोई बहाना बनाने वाली गीता आज चुपचाप झाड़ू लेकर सामने आ खड़ी हुई और पूछ्ने लगी, "किधर लगाऊं पहले?" उसे जैसे सीमा की बातें सुनाई ही नहीं दी ! सीमा भी कड़े स्वर में बोली, " मेरे कमरे में..."  और पैर पटकती हुई अपने कमरे की तरफ चल दी ! आज सीमा भी बहुत चिड़चिड़ाई हुई, गुस्से में थी ! पीछे पीछे गीता भी आ गयी ! चुपचाप झाड़ू लगाने लगी !

     सीमा एक पढ़े-लिखे, सभ्य, शालीन, उच्च मध्यमवर्गीय छत्तीस (३६) वर्षीया महिला थी ! उसके पति का अपना निजी व्यवसाय था, जिसके सिलसिले में उन्हें अक्सर शहर से बाहर जाना पड़ता था ! उनके एक ही बेटी थी, जो दूसरे शहर में  कॉलेज में पढ़ाई कर रही थी ! सीमा अकेले घर में ऊब जाती थी ! वह संकोची स्वभाव वाली एक संभ्रांत महिला थी ! किटी पार्टियों, गप्पें हांकने और बिन मतलब की खरीदारी में समय बिताना उसे बिल्कुल नहीं भाता था !  इसलिए उसने भी अपने पति के ऑफीस में काम करना शुरू कर दिया था ! इससे उसके पति का भी थोड़ा हाथ बँट जाता था...और सीमा का भी मन लगा रहता था ! गीता उनके यहाँ झाड़ू-पोछा व बर्तन धोने का काम करती थी !

      कुछ देर तो सीमा खुद ही गुस्से में भिनभिनाई सी इधर उधर सामान हटाने के बहाने उठा-पटक करती रही.. !  गीता की चुप्पी देखकर उसको और भी गुस्सा आया ! उसने फिर कुछ बोलने के लिए मुँह खोलना ही चाहा कि तभी उसकी नज़र गीता की कलाई पर पड़ी ! देखा, तो उसपर चोटों के निशान थे ! तब उसे ध्यान आया कि पिछले कुछ दिनों से गीता लंगड़ा कर भी चल रही थी !

              कुछ पल वो गीता को देखती रही...होगी कोई तीस-पैंतीस वर्षीया, साँवली मगर तीखे नैन-नक्श वाली औरत...जो अपने पति और छः (६) बच्चों वाले भरे-पूरे परिवार की ज़िंदगी को बेहतर बनाने की धुन में खुद ही जीना भूली हुई सी लगती थी ! दूसरों के घर और चौका-बर्तन चमकाने की हुज्जत में अपनी उम्र से दस वर्ष बड़ी लगने लगी थी ! दुबली-पतली मरी हुई सी काया, बिखरे हुए बाल, सूखा हुआ चेहरा.....हाँ! माँग में सिंदूर, माथे पर बिंदी, हाथों में चूड़ियाँ और पैरों में बिछुए-पायल ज़रूर चमकते रहते थे ! सीमा अपने ख़यालों से बाहर आई...! गीता अभी भी चुपचाप बेमन से इधर-उधर झाड़ू चला रही थी ! अब सीमा से रहा न गया ! आख़िर उसने पूछ ही लिया,

" ये क्या हुआ? तुम्हारी कलाई पर चोटों के निशान कैसे?"
गीता ने हल्के से सिर उठाया, बोली, "कुछ नहीं दीदी , बस चोट लग गयी !"
सीमा बोली, "ऐसे कैसे चोट लग गयी वो भी इस तरह ? और तुम्हारा गाल भी सूजा हुआ है ! हुआ क्या आख़िर?"
'कुछ नहीं' बोलने के इरादे से सिर हिलाते हिलाते गीता की आँखों में आँसू आ गये ! सीमा को अब मामला कुछ गंभीर लगा !

       उसने अपनी आवाज़ में मुलायमियत लाते हुए फिर से अपना सवाल दोहराया ! गीता भी जैसे अंदर से बुरी तरह भरी हुई थी, दो मीठे बोलों का सहारा पाकर बोल पड़ी... "अब क्या बताऊँ दीदी ! ये तो रोज़ का ही चक्कर है..! दिन भर बाहर काम करो, झाड़ू-पोछा बर्तन करो, घर पहुँचो तो घर के सारे काम मुँह बाए मेरे लिए ही पड़े रहते हैं... ! आदमी और बच्चों के कपड़े धो, बरतन धो, खाना पकाओ, सबको खिलाओ... ! उस सबके बाद इतना.... थक जाती हूँ कि खुद खाना खाने का भी दिल नहीं करता ! बिस्तर पर जब गिरती हूँ तो होश नहीं रहता..." गीता अपनी धुन में बोले जा रही थी.... 

तभी सीमा बीच में बोली,"ये सब तो पता है, मगर ये चोटों के निशान कैसे हैं?"
एक गहरी साँस लेकर गीता बोली , "ये ? ये 'इनाम' समझ लीजिए  दीदी !"
सीमा को कुछ समझ नहीं आया ! वो बोली, "इनाम...? मतलब?" इसपर गीता बोली...
"जाने दीजिए न  दीदी, क्या करेंगी जानकर ? औरतों की क़िस्मत में भगवान ने यही इनाम तो रक्खा है ! ख़ासकर मुझ जैसी औरतों की क़िस्मत में... जिन्हें न पढ़ना नसीब होता है, न ही अपनी इच्छा से जीना ! छुटपन में ही अम्मा-बाबू ने ब्याह कर दिया और छुट्टी पा गये ! इसके बाद मैं जियूँ या मरूँ...किसी की बला से !" कहते कहते वो सुबक सुबक कर रोने लगी !
    सीमा  ने उसे ढाँढस बँधाना चाहा...मगर आज गीता का बाँध जैसे टूट गया था...! वो फिर बोलने लगी.. " अगर मुझे भी माँ बाप ने थोड़ा पढ़ने-लिखने दिया होता...तो आज मैं कोई ढंग का काम कर रही होती ..., इज़्ज़त की जिंदगी जी रही होती.. और किसी ढंग के आदमी से के संग ब्याही गयी होती... जो मेरी कही बात तो समझने की कोशिश करता, मुझे इंसान तो समझता.. न कि ऐसे सराबी (शराबी)-कबाबी के साथ....."

          इसके पहले कभी सीमा ने गीता के मुँह से अपने पति के लिए ऐसी बातें नहीं सुनीं थीं... इसलिए उसे कुछ आश्चर्य हुआ ! एक बार वह  गीता को लेने सीमा के घर भी आया था... सीमा को वह बहुत तमीज़दार आदमी लगा था, जो पहले तो सीमा के सामने आने से ही कतरा रहा था...पर जब सामने आना ही पड़ा...तो नज़रें झुकाए-झुकाए सीमा के एक-आध सवाल का जवाब दिया था ! मगर आज तो... सीमा ने महसूस किया.... गीता की बातों और नज़रों में अपने पति के लिए घोर नफ़रत झलक रही थी...!

     सीमा की आँखों में अभी भी वही एक प्रश्न था...'ये चोटें कैसे?'

गीता फिर बोलने लगी..." दीदी! साहब आपका कितना ख़याल रखते हैं, आपसे कितनी इज़्ज़त से बात करते हैं.. ,आपकी कितनी बात मानते हैं... इसीलिए ना, क्योंकि आप भी उनके जैसे ही पढ़ी-लिखीं हैं, ऑफिस जातीं हैं...!" गीता की रोती हुई आँखों में एक कातर सी लालसा छलकने लगी थी... !

सीमा चुपचाप सुने जा रही थी ! उसको जैसे गीता की ये बात पसंद नहीं आई... उसने गीता की बात बीच में काटकर फिर हल्के से पूछा.... , "मगर इन चोटों का इस सब से क्या लेना-देना?"

गीता को जैसे एक बार फिर अपने दर्द का एहसास हो आया..!

वो बोली, "यही तो बात है दीदी ! सारे दिन काम में मर-खप के, मेरा सरीर (शरीर) भी तो आराम चाहता है....मगर घर में अगर आदमी का कहा न मानो...तो यही 'इनाम' तो मिलता है ! कल रात उसी से झड़प हो गयी ! एक तो देरी से घर आता है, उसको खिला कर ही मैं खाती हूँ.! मगर इत्ते (इतने) पर भी मुए को एक दिन को भी चैन नहीं ! उसे तो बस... " बोलते बोलते फिर गीता की हिचकियाँ बँध गयीं...

" अब मैं कैसे कहूँ आपसे दीदी! मुझे तो बोलते हुए भी सरम (शर्म) आती है.."

         अब सीमा को भी कुछ कुछ उसकी बातों का मर्म समझ आ रहा था!

गीता ने फिर बोलना शुरू किया...  "उसे मुझसे, मेरी थकान, मेरी इच्छा से कोई मतलब नहीं, बस निगोडे मरे को सरीर (शरीर) ही नोचने को चाहिए..... चाहे वो थका हारा मुझ जैसा मुर्दे समान ही क्यों न हो..."

गीता ने लाज-शर्म की सारी दीवारों से बाहर आकर बोलना शुरू कर दिया था...
"कल रात मैनें मना कर दिया तो ज़बरदस्ती करने लगा ! मुझे भी गुस्सा आ गया ! मैनें भी हाथ पैर चलाए कि आज तुम्हारी एक नहीं मानूँगी....इसी में हाथापाई हो गयी, बच्चे भी जाग गये, रोने लगे !  इसपर उसने मुझे और पीटा..."ये देखिए....."
कहते हुए  उसने अपनी पीठ दिखाई, उसपर भी नील पड़े हुए थे !
"तीन चार रोज पहले मुझे इत्ती जोरों का धक्का दिया कि घुटने पर चोट लग गयी ! इसीलिए इतने दिनों से लंगड़ा कर चल रही हूँ ! दर्द के मारे पूरा बदन टूटा जा  रहा है...
क्या करूँ मैं?
औरत हूँ तो क्या, इंसान नहीं हूँ मैं ?
मेरी इच्छा, मेरी मजबूरी, मेरा सरीर (शरीर).....क्या इसपर भी मेरा कोई हक नहीं है....? "

कहकर वो फूट-फूट कर रोने लगी ! गीता की आवाज़ में अब आक्रोश व विद्रोह साफ़ झलक रहा था...!     
             फिर कुछ पलों बाद खुद ही आँसू पोंछकर बोली, "जाने दो दीदी ! आप लोग बड़े, समझदार, पढ़े-लिखे लोग हैं..., मैं भी कहाँ आपको इस गंदे कीचड़ के दलदल में घसीट रही हूँ... ! अब तो मुझे आदत पड़ गयी है...!"

फिर जैसे कुछ बड़बड़ाते हुए बोली..., "मगर मैनें भी ठान लिया है... अब बर्दास्त (बर्दाश्त )  नहीं करूँगी... !" और वो फिर  झाड़ू लगाने लगी !

               सीमा पर तो जैसे सन्नाटा छा गया ! उसका पूरा शरीर ठंडा सुन्न पड़ गया था ! उसका सिर घूमने लगा था....और जलता हुआ बदन... ठंडे पसीने में नहा गया था...! गीता की बातों का उसके पास कोई जवाब नहीं था ! किसी तरह उसने खुद को संभाला !  दर्द की दवाई का पत्ता अभी भी उसके हाथ में था...! उसने एक गोली उसमें से निकाली और गीता की ओर बढ़ाकर बोली.....
  " ये खा लो ! दर्द में कुछ आराम मिलेगा.........."

इसके बाद सीमा ने अपने कुर्ते की बाहें हल्के से ठीक की ! आज उसने भी बंद गले का , पूरी बाँह का कुर्ता पहना हुआ था ! किसी को पता नहीं चला.....'गीता हो या सीमा...कोई  ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता !'


गीता के सवाल....सीमा के जवाब थे..............................

प्रत्‍येक वर्ष विश्‍व में 7.80 लाख लोग दलदली बुखार यानि मलेरिया से मरते हैं। भारत में लगभग 2.5 लाख लोग और झारखंड़ में लगभग 15 हजार लोग हर वर्ष इस बीमारी के शिकार होते हैं। डब्‍लूएचओ ने अप्रैल 2012 के अपने रिपोर्ट में यह माना है कि वर्त्‍तमान विश्‍व में 3.3 अरब लोग मलेरिया से प्रभावित होते हैं जिसमें सबसे ज्‍यादा पांच वर्ष से कम उम्र के बच्‍चे शामिल हैं, दूसरे नंबर पर गर्भवती महिलाएं आती हैं।

मलेरिया मादा एनोफिलिस मच्‍छर के काटने से होने वाली एक खतरनाक बीमारी है। सरकार द्वारा इस बीमारी के रोकथाम के लिए अरबों रूपए खर्च किए जाते हैं फिर भी मलेरिया हर वर्ष और भी विकराल रूप में सामने आ रहा है।

उल्‍लेखनीय है कि मलेरिया नामक बीमारी का इतिहास मानव इतिहास जितना ही प्राचीन है। इस बीमारी का जिक्र चीन के इतिहास में 2700 ई.र्पू. के आसपास मिलता है। इटालियन भाषा का यह शब्‍द ‘मलेरिया' या ‘माला एरिया' का अर्थ ‘बुरी हवा' होता है, इसे दलदली बुखार भी कहा जाता है। 1880 ई. में एक फ्रांसीसी सैन्‍य चिकित्‍सक चाल्‍से लुई अल्‍फोन्‍स लेबेरेन ने सबसे पहले अल्‍जीरिया में यह पता लगाया था कि एक प्रोटोजोआ परजीवी है जो रक्‍त में लाल रक्‍त कोशिका को संक्रमित करता है। 1907 ई. में उक्‍त चिकित्‍सक को मलेरिया कीटाणु व अन्‍य खोजों के लिए चिकित्‍सा का नोबेल पुरूस्‍कार दिया गया था। यद्यपि मलेरिया की पहली कारगर दवा क्‍लोरोक्‍वीन की खोज एक जर्मन वैज्ञानिक हेन्‍स अन्‍डरसेंग ने 1934 ई. में किया था जिसे ब्रिटिश व अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा भी मान्‍यता 1946 ई. में दे दी गयी थी। मच्‍छरों से बचाव के लिए डीडीटी पाउडर की खोज 1939 ई. में एक जर्मन रसायन विज्ञान शोधार्थी आथमर जेइडलर ने किया था जिसका प्रयोग हम आज भी करते हैं।

चिकित्‍सा की होम्‍योपैथी पद्धति से मलेरिया का बहुत गहरा संबंध है। सर्वविदित है कि होम्‍योपैथ के संस्‍थापक सेमुयअल हनीमैन ;1755-1843द्ध थे, वे बहुत ही प्रतिभाशाली व्‍यक्‍ति थे और एलोपैथ के जाने माने चिकित्‍सक थे। जब हनीमैन कालेन लिखित अंग्रेजी के मैटीरिया मेडिका का जर्मन भाषा में अनुवाद कर रहे थे तो एक स्‍थान पर ‘सिनकोना' का जिक्र आया जिसे मलेरिया ज्‍वर के निवारण का कारण बताया गया था। इस औषधि का जब उन्‍होनें प्रयोग किया तो मलेरिया ज्‍वर के लक्षण उत्‍पन्‍न हो गए, बस यही पर हनीमैन ने जो सोचा वही आगे चलकर होम्‍योपैथिक पद्धति का सिद्धांत बना, वह था, ‘‘स्‍वस्‍थ्‍य व्‍यक्‍ति में औषधि जिन लक्षणों को उत्‍पन्‍न करती है, वही औषधि अस्‍वस्‍थ्‍य व्‍यक्‍ति में उन लक्षणों के उत्‍पन्‍न होने पर उन्‍हें दूर कर देती है। इस विचार को लेकर हनीमैन कई परीक्षण करते रहे और इस नतीजे पर अन्‍ततः पहुंचे कि होम्‍योपैथ चिकित्‍सा का यही आधारभूत सिद्धांत है और इसके पश्‍चात हनीमैन एलोपैथ चिकित्‍सा पद्धति छोड़कर होम्‍योपैथ के जन्‍मदाता बने। हनीमैन से प्रभावित होकर जर्मन एलोपैथ चिकित्‍सक बोनिनघाउसन, अमेरिकन चिकित्‍सक कौनस्‍टेनटाइन हेंरिग, केरोल डनहम एवं ब्रिटिश चिकित्‍सक बर्नेट होम्‍योपैथीक चिकित्‍सा पद्धति के शरण में आए और एलोपैथीक चिकित्‍सा पद्धति छोड़कर प्रसिद्ध होम्‍योपैथ हो गए।

हनीमैन ने सिनकोना को सर्वप्रथम शक्‍तिकृत कर जो औषधि होम्‍योपैथिक चिकित्‍सा पद्धति को दिया उसे ‘चायना' के नाम से जाना जाता है, जो कमजोरी दूर करने का बेहतरीन औषधि माना जाता है। एलोपैथिक चिकित्‍सा पद्धति में भी मलेरिया की पहली कारगर दवा क्‍लोरोक्‍वीन है जो कुनैन या सिनकोना से ही बनाया जाता है। गौरतलब है कि क्‍लोरोक्‍वीन की खोज जर्मन वैज्ञानिक हेन्‍स अन्‍डरसेंग ने 1934 ई. में की थी जबकि हनीमैन कुनैन या सिनकोना से मलेरिया की औषधि एक सौ साल पहले ही बना चुके थे तथा आज भी होम्‍योपैथीक चिकित्‍सा पद्धति में मलेरिया के लिए रोगी को लक्षणानुसार कुनीका क्‍यू, सिनकोना क्‍यू आदि दिए जाते हैं।

मलेरिया बीमारी के संबंध में जानकारी हासिल करने के क्रम में मुझे यह जानकर आश्‍चर्य हुआ कि एंटीबायोटिक दवाओं की खोज के पहले यानि 20वीं सदी के प्रारंभ में सिफलिस या उपदंश से पीड़ित रोगियों के उपचार के लिए पहले मलेरिया से संक्रमित किया जाता था इसके बाद कुनैन देने से मलेरिया और सिफलिस दोनों ठीक हो जाते थे परंतु कुछ रोगियों की इस प्रक्रिया से मौत तक हो जाया करती थी। यद्यपि इस प्रक्रिया को इसलिए अपनाया जाता था क्‍योंकि सिफलिस नामक बीमारी से निश्‍चित मौत से वैकल्‍पिक तौर पर मलेरिया संक्रमित कर ठीक होने की संभावना बढ़ जाती थी।

एलोपैथीक व होम्‍योपैथीक चिकित्‍सा पद्धतियों के अतिरिक्‍त आयुर्वेदिक चिकित्‍सा पद्धति में मलेरिया के लिए जूडी ताप नामक आयुर्वेदिक लिक्‍विड एक बेहतरीन औषधि मानी गयी है जिसे एक माह तक नियमित सेवन करने से मलेरिया जड़ से समाप्‍त हो जाता है।

कुछ दिनों पहले जापान की जीकी मेडिकल यूनिर्वसिटिज में हुए शोध के बाद वैज्ञानिकों ने एक ऐसा जेनेटिकली मोडिफाइड मच्‍छर बनाने का दावा किया है जो मलेरिया का वैक्‍सिन फैलाते हुए उड़ेगा और जब इंसानों को काटेगा तो उसके मुंह से वैक्‍सिन इंसानों के रक्‍त में चला जाएगा और मलेरिया से बचाव के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाएगी।

आज भी पेरू के एनडीज पर्वतमाला के तराई में सिनकोना वृक्ष बहुताय में पाया जाता है तथा वहां के निवासी सिनकोना वृक्ष छाल से कुनैन निकाल कर मलेरिया ज्‍वर का उपचार करते हैं।

मलेरिया के वैसे तो लक्षणों में ज्‍वर, कंपकपी, जोड़ो व कमर में दर्द, उल्‍टी, खून की कमी आदि प्रमुख है परंत कभी-कभी उपरोक्‍त कोई भी लक्षण नहीं रहने पर भी सिर्फ सर दर्द या सांस की तकलीफ में भी मलेरिया की बीमारी हो सकती है। मलेरिया की जांच स्‍लाइड, कीट और ओप्‍टीमल पद्धतियों के द्वारा की जाती है। जांच विश्‍वसनीय पैथोलोजिकल लैब में करानी चाहिए। कुकुरमुत्‍ते की तरह फैले हुए जांच घरों से किए गए जांच में सत्‍यता की कमी पायी जाती है। मलेरिया नहीं होने के सूरत में जांच का पॉजिटिव आना कभी-कभी जानलेवा साबित होता है। दूसरी एक और महत्‍वपूर्ण बात लक्षणों के आधार पर बिना चिकित्‍सक से राय लिए और बिना जांच करवाये, मेडिकल स्‍टोर्स के तथाकथित चिकित्‍सक समझने वाले दुकानदारों की राय से मलेरिया की औषधि का सेवन किसी भी चिकित्‍सकीय पद्धति में नहीं करना चाहिए।

मलेरिया के पीडित रोगी को कुछ भी खाने की इच्‍छा नहीं होती है परंतु खान-पान पर खास ध्‍यान रखना अतिआवश्‍यक है अन्‍यथा अत्‍यधिक कमजोरी से दूसरे रोग का हमला शरीर पर होने का खतरा बना रहता है। संतरे का जूस व गुनगुना पानी का सेवन करना चाहिए। तुलसी की पत्‍तियां व काली मिर्च पानी में उबालकर छान लेनी चाहिए इसके पश्‍चात थोड़ा-थोड़ा दिन भर पीना चाहिए। खिचड़ी व दलिया तथा आसानी से पचने वाले खाद्य पदार्थों का प्रयोग करना चाहिए। मुंह का स्‍वाद तीता या खराब होने की सूरत में कागजी नींबू को थोड़ा आग में गर्म कर उसपर काली मिर्च का थोड़ा चूर्ण या सेंधा नमक डाल कर दो-एक बार चूसना चाहिए।

नोटः- कुछ दिनों से मैं मलेरिया से पीडित था, ठीक होने के पश्‍चात पुनः मलेरिया का शिकार हो गया। निरोग होने के प्रयास में मैं मलेरिया को समझने की कोशिश किया जिसका परिणाम यह लेख है।

बिना चिकित्‍सकों की राय के और देखरेख के बिना लेख में प्रयोग किए गए औषधियों का सेवन उचित नहीं होगा।

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कहानी

मां अब....... 


राजीव सागरवाला

 

    उसने एक आफ व्हाईट मटमैले थैले से, जिसका रंग यक़ीनन कभी सफेद रहा होगा एक प्लास्टिक का आयताकार डिब्बा निकाला और उसमें से एक इंकपेड, दो तीन रबर स्टेम्प, बालपेन, लिफाफे में रखे कार्बन पेपर और मोड़ कर रखे गये छपे फार्म एक-एक कर इत्मीनान से निकाल अपने सामने रखे। सारी चीज़ें वह इस समय डाईनिंग टेबुल पर फैलाए, कुर्सी पर बैठा था जिस पर एक मटमैली होती हुई चाकलेट-रंगी काड्राय की गद्दी बिछी थी, जिसे उसकी दिवंगत पत्नी ने सालों पहले अपने हाथों से बनाया था

 
    बदन पर सोते समय पहनी हुई बुशशर्ट और पैजामा था। पास ही लोहे का फोल्डिंग पलंग, जिसकी प्लास्टिक की निवाड़ बदरंग हो चली थी..और जिस पर उसने पिछली रात सोने की असफल कोशिश की थी, एक तकिये के साथ पंखे के नीचे फैला हुआ था। चादर नहीं थी।


    समय..........? भोर हुआ चाहती थी...... कोई पांच एक बजा होगा। अंधेरे की गहराई कुछ कम हो चुकी थी।


    डाईनिंग टेबुल पर, जहां वह इस समय बैठा था वहां........उसके सामने.. .. एक दीवार थी जिसके उस पार इस दीवार से लगी... .. .. साथ के मास्टर बेडरूम की बाकी तीन दीवारें थीं जिनमें से एक में बगीचे की तरफ खुलती खिड़की और दूसरी में दो दरवाज़े थे, एक अटेच्ड बाथरुम का और दूसरा ड्राईंगरूम में आने-जाने के लिये खुलता। तीसरी दीवार सपाट बेनूरी थी जिसमें सिर्फ एक ट्यूबलाईट लगी थी। दीवारों का रंग पेस्टल ग्रीन था। इस तीसरी दीवार के पल्ली तरफ कभी रसोईघर था जिसका इस्तेमाल अब दीगर सामान के भंडार के साथ अलमारी के एक खाने में रखीं भगवान की फोटुओं, मूर्तियों, गीता-रामायण की प्रतियों के चलते मंदिर की तरह होता है। रसोई को मकान बनने के बाद, वास्तुदोषों के निस्तार के लिये घर के सामने के दूसरे बेडरूम में अस्थाई प्लेटफार्म लगा कर रसोई बना दिया था, रोज-रोज की घर में चिक-चिक से बचने के लिये।


    ड्राईंग रूम के उस कोने से जहां डाईनिंग टेबुल थी...और जहां वह इस समय बैठा था..... बेडरूम में जाने का यह दरवाज़ा दिखाई नहीं देता है। इस ड्राईंगरूम के दूसरे सिरे से जहां एक टी वी रखा है और जिसके बगल में घर का मुख्य दरवाज़ा है, इस बेडरूम के दरवाज़े से कमरे में रखा एक पलंग दिखलाई देता है। पलंग कमरे के बीचों बीच है पंखे के ठीक नीचे, और उसके चारों तरफ आने-जाने की जगह है, कोई दो-ढाई फुट की .... दरवाज़े की तरफ शायद कुछ ज्यादा रही होगी। पलंग का बेक-रेस्ट  पांयते से  करीब एक डेढ़ फुट ऊंचा होगा और  जिसके किनारे की उधड़ती प्लाई पर पेकिंग-टेप लगा था जिससे किसी को फांस न लग जाय।


    पलंग पर डकबेक का वाटर-बेड बिछा है। सिराहने की तरफ से बिस्तर को उठाने के लिये अस्पताल से लाया हुआ लोहे का स्प्रिंगदार फ्रेम है जिससे सिराहने की ऊंचाई घटाई-बढाई जा सकती है।


    मां उस पर लेटी हुई है... या यह कहना अब ठीक होगा कि अब से कुछ घंटे पहले तक वह लेटी थी। इस समय उसका शव वहां लेटा हुआ है।


पर ऐसा लिखना भाषा के हिसाब से ठीक नहीं होगा। शव कैसे लेट सकता है? ठीक होगा कि लिखा जाय कि उसका शव उसी पलंग पर रखा है जहां वह लेटी थी या कि जिस पलंग पर वह लेटी थी उसी पर उसका शव रखा हुआ है।

    यह बहस कि क्या लिखना तर्कसंगत होगा अब उसके लिये कोई मायने नहीं रखता। संगत या असंगत, तर्क या कुतर्क वह पीछे छोड़ चुकी है।


    कुछ घंटे पहले वह गुज़र गई।
    कितना आसान है अब हमारा यह कहना.. .. .. गुजर गई। गुज़रने के पहले वो कितने कुछ से गुज़र चुकी थी इसका इल्म उससे इतर शायद ही किसी को होगा। उसका अंदाज़ लगाना हमारे लिये भी, जो उसके बच्चे हैं नामुमकिन है। घर परिवार की खुशहाली के लिये अपनी ज़ाती इच्छाओं और ज़रूरतों को नज़रंदाज़ करते रहना.. .. ताज़िंदगी.. .. वही कर सकती थी। खुद आधे पेट रह कर सुदामा की हांड़ी भरे रखना उसने किया और हमें उस मुक़ाम पर पहुंचा दिया जहां भूख के मायने ही हमारे लिये बदल गये। अपनी चाहतें हमेशा अपनी ज़िंदगी के आलों में सहेज कर रखती गई और उन्हें समेट कर अब चली गई।


    इस घर की चहारदीवारी में उसके अलावा और भी हैं, बड़े भाई और भाभी। भाई साहेब इसी डाईनिंग टेबुल के दूसरी छोर पर उसके सामने कुर्सी पर पसरे हैं ...पीठ उनकी उसी दीवार की तरफ है जिसके उस पार मां का शव रखा है। वो अपनी बांये हाथ की कुहनी टेबुल पर टिकाए हथेली पर ठोड़ी संभाले सामने दीवार में बने कांच के शोकेस की तरफ देख रहे हैं। देख क्या रहे हैं ........बस ......... निगाहें हैं...... खाली।


    भाभी साथ के कमरे में लेटी हैं या सो रहीं है या कि एक झपकी लेने की कोशिश कर रही हैं, कह नहीं सकता।  

  
    सांई बाबा का केलेंडर जो भाई साहेब के पीछे दीवार में लगे स्विचबोर्ड के पास एक कील से लटका था पंखे की हवा से फड़फड़ाता, रात के सन्नाटे को तोड़ता अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है।

 
       उसने एतिहायत के साथ एक राईटिंग-पेड के दस्ते से... जो मोड़ कर रखा हुआ था, कागज़ के दो पन्ने फाड़े और टेबुल पर रख हथेली से उनकी सलवटों को निकालने की कोशिश की.... फिर इत्मीनान से दोनों कागज़ों के बीच कार्बन पेपर लगाया...... उनके कोने से कोने मिलाये, डिब्बी से निकाल कर एक आलपिन उसमें लगायी, और एक बार फिर कागज़ों पर हाथ फेर सलवटें हटाने की कोशिश की।

 
       मां गुजर गई।
       वह मन ही मन हिसाब लगाने लगा कि सुबह होने तक क्या-क्या करना है, उसे किन-किन को खबर देना है, कहां से सामग्री और पंडित का इंतजाम करना है......अस्पताल में खबर देनी है कि नहीं आ सकूंगा........हर्स का इंतजाम करना है.. .. आदि।


     बालपेन हाथ में लिया और एक क्षण नीचे रखे पन्नों की तरफ देखा फिर कुछ सोचते हुए उसी दीवार की ओर देखा जो उसके सामने थी और जिसके परली तरफ मां का शव रखा था, उसी पलंग पर जिस पर उसने अंतिम सांसें ली थीं।
भाई और भाभी को कमरे से बाहर कर मां के शरीर में लगी सारी नलियां निकाल, साफ-सफाई कर उसे दूसरे धुले कपड़े पहना कर उसी पलंग पर रख कर आया था। उस समय वह बहुत भावुक हो गया था और यकायक आंसू आ गये थे। अपने को बहुत अकेला महसूस कर रह था। मां थी तो घर में किसी के होने का आभास लगा रहा करता था। वो भी नहीं रहा अब। घर दूसरी बार फिर सूना हो गया........एक अजीब तरीके का सूना।

    शाम से ही उसे लग गया था कि मां अब चंद घंटों की मेहमान रह गई है, जिस तरह से वह किसी भी दवाई और इंजेक्शन से रिस्पांस नहीं दे रही थी और जिस तरह से उसे सांस लेने में तकलीफ हो रही थी, उसे देखते हुए और गले से थूक फंसे हुए होने की घरघराहट जिस तरह से बढ़ रही थी उसने पहचान लिया था कि ये डेथ थोर्स हैं और अब उसका बचना मुमकिन नहीं है। आये दिन अपने अस्पताल में अपने सामने मरीजों को अंतिम सांसें लेते वह बहुत देख चुका है। हर बार किसी की मौत से उसे एक तरह का विषाद होता है जो थोड़ा बहुत उसे असहज कर देता है। वो सब तो गैर थे पर मां.... उसे लगा कि वह मां की टूटती सांसें देख पायेगा। कहीं भावुकता उस पर हावी न हो जाय इसीलिये शाम को वह बहनोई को छोड़ने के बहाने घर से निकल जाना चाहता था पर भाभी ने शायद भांप लिया और गाड़ी में बैठते-बैठते उसे वापस बुला लिया। गुस्सा तो उसे बहुत आया पर कुछ बोल न सका और मेहमानों को नुक्कड़ से ही बिदा कर दिया कर मां के पास भाई और भाभी के साथ कमरे में बैठ गया था। क्या वास्तव में वह असहज हो चला था?

 
    उसने फिर फार्म की तरफ देखा जो उसके हाथ के नीचे दबा था और जिसके ऊपर अंगुलियों में फंसा पेन चलने के लिये आमदा था।
    फार्म पर तमिल और अंग्रेज़ी में लिखा था ......मॄतक का नाम....जन्मतिथि........मृत्युतिथि....


    उसे मालूम है कि इस सर्टिफिकेट के किस खाने में क्या भरना पड़ता है........आये दिन भरता ही है, ......फिर भी हाथ एक बार रुक गया।


    मॄतक का नाम....उसे मन हुआ कि लिख दे........ ..माँ .. .. जन्मतिथि...... अनंत...........मॄत्यु तिथि..... शाश्वत...उम्र......भला मां की कोई उम्र होती है? 
    फिर अपने डाक्टरी कर्तव्य निभाते भरना शुरू कर दिया।
    मृतक का नाम...गिरिजा ....जन्म तिथि.... एन .ऐ .......उम्र.......तेरांन्वे साल .......बीमारी..... बुढ़ापा........, पति का नाम..... उसके बाद खाने भरते गये अपने आप।
    जिंदगी चाहे कितने ही खानों में जी गई हो सिमट कर इन्हीं चंद खानों में रह जाती है।


    दस्तखत करते वक्त उसका हाथ एक बार फिर हिचका........आंखों के आगे आ गया वह दिन जब मेडिकल में दाखिला लेने घर से जा रहा था.....मां ने टीका किया था ... टीका कर मुंह में मिश्री के दाने रखते-रखते उसने देखा था कि उसकी आंखें भर आयीं थीं ...उसने रुंधे गले से किसी तरह कहा था.. .. .. खूब पढ़ो...बेटा...खूब सेवा करो लोगों की .. .. ..और अपने हल्दी में लिपटे पल्लू से आंखें पोंछते हुए वह मुड़ गई थी।.......खुद वह भी हंसने की नाकाम कोशिश करते हुए, आंखें चुरा कर, नम आंखों से ऑटो की ओर बढ़ गया था उस दिन.................उस दिन उसके ख्याल में भी नहीं था कि इस तरह एक दिन उसे ही मां का डेथ सर्टिफिकेट देना होगा।

*

    मैं इस समय छोटे भाई को डाईनिंग टेबुल के दूसरे छोर पर कागज़ों पर दस्तख़त करते बैठे देख रहा हूं। शायद डेथ सर्टिफिकेट है । भरे हुए फार्म्स पर दस्तखत किये... उसने, काग़जों के बीच से कार्बन निकाला और  उस लिफाफे में रख दिया जहां दूसरे कार्बन रखे थे ।  और फिर रबरस्टेम्प उठाया, इंकपेड का ढक्कन खोला और स्टेम्प को उस पर दो-तीन बार ठोंका और फिर उसका उल्टा-सीधा देख अपने दस्तखतों के नीचे फार्म पर लगा.....एक दो मिनट उसने इंक सूखने दी..... दस्तखत किये कागज़ एक तरफ दबा कर रखने के बाद उसने केरी-बेग से निकाला सारा सामान वापस अंदर रख दिया और उसे अपनी गाड़ी की डिक्की में रख आया, जहां वह समान्यतः रखा करता है।  यह सारा काम इस सहजता से किया जैसे कि रोज़मर्रा का काम है, दातून-ब्रश करने जैसा.......शायद होगा भी।


     कुछ समय पहले, यह कह सकते हैं कि कल शाम से ही, मां की तबियत लग रहा था कि बिगड़ती जा रही है।  हम जल्दी-जल्दी  कुछ खा कर उसके पास कमरे में आ गये थे। छोटा भाई इस समय सोफे की उसी भारी भरकम  कुर्सी पर बैठा था जहां बैठ मां की तीरमारदारी पिछले दो-तीन महीनों से वह करता रहा था।


    पत्नी जो कि खुद भी डाक्टर है, पलंग के सिराहने खड़ी हुई थी। मैं पलंग के दूसरी ओर खाली जगह में बैठे हुआ था, दायां पैर मोड़ कर ऊपर किया हुआ और दूसरा नीचे लटका हुआ। हम परेशान थे मां की तकलीफ देख कर पर नहीं समझ आ रहा था कि क्या करें कि उसे आराम मिले। कभी भाई कोई इंजेक्शन देता, कभी उसके पपड़ाते होठों पर मैं पानी।


    पिछले दो-तीन दिनों से मां को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। हमें लगा कि उसे काफी तकलीफ हो रही होगी हांलाकि उसको देखने से नहीं लगता था कि उसे कोई परेशानी हो रही थी। सिर्फ सांस लेने के साथ ही भारी आवाज़ आ रही थी। गले से निकलती हुई घरघराहट कम होने का नाम नहीं ले रही थी । आंखें अधखुली थीं। जब कभी हम उसे जोर से पुकारते.... अम्मा जीः उसकी पलकें थोड़ा और खुल जातीं पर पुतलियां स्थिर ही रहतीं, दूर सामने देखते। ऐसा मुझे लगा कि उस नीम बेहोशी के हालात में भी वह इतना तो समझ रही थी कि उसके बच्चे पास में हैं। यह भी हो सकता है कि उसका आवाज़ सुन कर पलकें और खोल लेना शरीर की स्वाभाविक प्रतिक्रिया ही हो जिससे हम अनुमान लगा रहे हैं कि शायद वह हमारी आवाज़ सुन रही है और उसे मालूम चल रहा है कि लोग हैं उसके पास। खैर अगर वो सुन भी नहीं रही होगी तब भी कम से कम हमें यह मुगालता हमारे लिये शायद काफी था। हाथ से छूटती हुई डोर का अहसास तो दुखदायी होता है।


         करीब एक महीने पहले अचानक मां की बीमारी की खबर पा कर जब मैं यहां आया और इस कमरे में दाखिल हुआ था, मां उसी पलंग पर लेटी हुईं थी जो कमरे के बीचों-बीच रखा हुआ था पंखे के ठीक नीचे। आंखें मुंदी थीं......बाल अस्त-व्यस्त तकिये पर फैले .. .. .. नाक में पड़ी राईल्स ट्यूब का दूसरा सिरा सिर के पास तकिये पर पड़ा था। पैताने पर नेबुलाईज़र रखा हुआ था और उसके पास ही सक्शन मशीन। पलंग के दूसरी तरफ एक आक्सीजन सिलेंडर स्टेंड में खड़ा हुआ  था।  पेशाब की थैली पलंग के किनारे से लटकी हुई थी जिस पर आने-जाने वालों की निगाहें चाहे-अनचाहे पड़ ही जाती हैं। पलंग के सिराहने एक ड्रेसिंग टेबुल पर दवाईयां, टिशू पेपर, पाऊडर, हेंड सेनेटाईज़र, सर्जिकल ग्लव्स आदि बीमार  आदमी की तीरमदारी के इस्तेमाल की दीग़र चीज़ें बिखरी हुईं .. .. ..रखी हैं।


इस ड्रेसिंग टेबुल से लगी एक पहियेवाली लगी टेबुल और है जिस पर स्टेथो और ब्लड प्रेशर मापने का यंत्र रखा हुआ है। एक टू इन वन भी रखा है कपड़े से ढ़का और पास में एक डब्बे में रामायण, गीता और टी सिरीज़ के भक्ति संगीत के केसेट।


पलंग के पास ड्राईंगरूम से खींच कर लाई, सोफे की एक कुर्सी रखी हुई है ।
    सामने की जालीदार खिड़की के बाहर सड़क पर आवाजाही है, अहाते में नरियल के पेड़ हैं, खुला आस्मां है, पालाघाट (पलक्कड़) की पहाड़ियां हैं, केरला से आती नम हवा है और सूरज की रोशनी है। खिड़की के बाहर भरी-पूरी दुनिया है, रिश्ते-नातीदारी है।
मां इस सब से बेखबर सी लेटी थी।


       उसने शायद चौंक कर आंखें खोलीं जब छोटे भाई ने कमरे में घुसते ही हल्के-फुलके लहजे में, जैसी कि उसकी आदत है, पुकारा..... अम्माजी..... .... राज भाई आ गये। उसने अधखुलीं आंखों से समझने की शायद कोशिश की। आंखें प्रश्न करती हुईं सी थीं।


    मैं भी उसके ऊपर झुका और उसकी आंखों में देखते, जैसा कि अमूमन होता है किसी बीमार से बात करते, जरा जोर से बोला मैं हूं ......राजीव.....हम आ गये.....मंजू भी है ...।  आवाज़ सुन कर उसकी पलकें जरा और खुलीं। मुझे नहीं पता कि उसकी समझ में कुछ आया या नहीं। वो मेरी आंखों में अपनी जमी निगाहों से देखती रहीं .. ..पुतलियों में हलकी सी हरकत हुई। शायद पहचानने की कोशिश कर रही हो...... उसकी भोंहों के ऊपर बल पड़ने लगे। उसकी आंखें मेरे चेहरे पर शायद टिकीं...कुछ खोजती हुईं सी लगीं........ एक  पल लगा कि उसने पहचान लिया है....पर निश्चित कहना मुशकिल था। मैंने फिर दुहराया.....जोर से........ राजीव बोल रहा हूं........। मां के चेहरे पर जो भाव आये उससे लगा कि उसने पहचान लिया है.. .. .. पर निश्चित कहना मुश्किल था। मैंने निश्चित करने के लिये अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए  उससे  कहा...... अपना दांया हाथ बढ़ाओ ... हां .... हां... दो अपना हाथ मेरे हाथ में....। मां के दाहिने हाथ में कुछ जुम्बिशी हरकत हुई, और फिर कंपकंपाते हुए उसने अपना हाथ उठाया और मेरे हाथ में दे दिया। मैंने उसका हाथ, जिससे उसने न जाने कितनी बार मेरे सिर को सहलाया होगा, अपने हाथों में लिया और उसे सहलाया। मैं समझ गया कि पहचान उसकी अभी बाकी है और इस संतोष ने कि उसने मुझे पहचान लिया, मुझे हल्की सी आशा बंधी। आंखें आहिस्ता से उसने बंद कर लीं। उसके चेहरे को देखने से लगा कि उसे अच्छा लगा, राहत सी मिली....... दूसरों का तो पता नहीं, ऐसा मुझे महसूस हुआ........ कम से कम।


    उस दिन के बाद न जाने कितनी बार मैंनें कोशिश की वह अपना हाथ बढ़ाए.....कहने पर.........पर लगता है कि वह तंद्रा में जा चुकी थी। आंखें खुली होते हुए भी ऐसा नहीं लगता था कि कहीं देख रही हैं। उसके बाद से चाहे जैसे उठा-बैठा लो वैसे ही बैठ रहेगी। हां आवाज़ देने पर अधखुलीं पलकें कुछ और खुल जातीं थीं। चम्मच से थोड़ा-थोड़ा पानी मैं देता तो गटक लेती थी। पुतलियां जड़ रहतीं, किसी की तरफ न देखतीं....... जैसे मुंह मोड़ लिया हो सबसे। मोह-माया छोड़ दी या.....अपने को सब से काट लिया हो जैसे.. .. ..
.. .. ..मैं सोचता हूं कि आश्वस्त हो गई थी कि चला-चली का समय अब आ गया है।

    दौड़-दौड़ कर दिन-रात काम करने वाली मां, इस समय वह निरीह सामने लेटी है, मुश्किल से सांस लेती। हाथ-पैर लकड़ी से, नसें उभरी हुईं,  खाल लटकी हुई .....गाल बिना दांतों के अंदर धंसे हुए.... पोपटा मुंह..... ओंठ पपड़ाए हुए.......आंखें खुली हुईं...... चेहरे पर कोई भाव नहीं....पर शांत।

    मां निहायत ही धार्मिक मिजाज की रहीं । उनकी परवरिश एक ऐसे परिवार में हुई थी जो तुलसीदास की कर्मस्थली सोरों में रहता था और जहां का माहौल व्रत, पूजापाठ, कर्मकांड वाला था। नहा धो कर रामायण गीता का नित्य पाठ और पूजा किये बिना अन्न न लेना उसकी जिन्दगी का अहम हिस्सा बन गया था। हिन्दू धर्मशास्त्रों का अध्ययन-मनन कर चुकी थी। नित्य प्रति रामायण-गीता- चालीसे का पाठ, कल्याण पढ़ना और सारे त्योहारों पर व्रत रखना उसके जीवन का हिस्सा बन गया था। गीता का गोरखपुरी गुटका उसके एक अलमारी के खाने में भगवानों के फोटू लगे कामचलाऊ मंदिर में रखा रहता था। गीता, जो उम्र के इस पड़ाव तक आते-आते उसकी तरह ही जर्जर हो चुकी थी...... जिल्द खुल चुकी थी और पन्ने उससे मुक्ति पा चुके थे..... इस समय भी अलमारी के उसी खाने में रखी है जो उसका मंदिर है और जहां वह नहा-धो कर हर दिन पूजा के लिये आती थी ......। यह और बात है कि पिछले कुछ समय से अशक्त होने के कारण नहीं जा पायी थी।


    याद आता है कि मां सालों साल बदस्तूर हम सब का जन्मदिन मनाती थी। घर में चाहे कितनी भी तंगी हो, उसकी अपनी तबियत ठीक हो न हो, उस दिन वह चावल की खीर जरूर बनाती और जिसका जन्मदिन होता उसे टीका कर के उसकी सलामती और तरक्की की दुआ मांग उसे और हम सब को खिलाती। हमारे वालिद के जन्मदिन तो पूरा जश्न का माहौल होता था घर में। हमारे सारे चचाजान मतलब, वालिद के सहपेशा, दोस्तों को दावत का न्योता दिया जाता। सबेरे से सा्नन-ध्यान पूजा-पाठ करने के बाद जो वो जुटती रसोई में तो शाम तक लगी रहती खाना-पकवान बनाने में । सबकी आवभगत और खान पान के बाद वह इतनी थक गई होती थी कि मुश्किल से दो कौर मुंह मे डाल सो रहती।


    हम इतना मशगूल थे.. .. .. अपने में.. .. ..कि बचपन तो छोड़ बडे होने पर भी कभी हमें नहीं लगा कि मां का भी कोई तो जन्मदिन होगा और हमें उसे मनाना चाहिये। अब सोचता हूं तो एक अपराधबोध घर कर जाता है मन में.........सब भूल गये कि मां का भी साल के तीन सौ पेंसठ दिनों में से कोई एक दिन तो होगा जो उसका नितान्त अपना होगा.....जन्मदिन....... उसे हमें मनाना चाहिए था। पर किसी ने उसे खीर बना कर न खिलाई न टीका किया। दरअसल हक़ीक़त यह थी कि किसी को, यहां तक कि उसे खुद भी, पता नहीं था कि किस दिन हुआ था उसका जन्म। मां से जब पूछो तो यही जबाब कि जब शादी हुई तो तुम्हारे पापा से यही कोई चार-पांच साल छोटी हूंगी ङ्घ....बस।


    मां दोनों लोकों के बारे में सजग रही थी और खासकर जीवन के आखिरी पड़ाव में परलोक के बारे में कुछ चिंतित रहती थी। उसकी सबसे बड़ी चिंता या कि कहें समस्या.. .. .. हालांकि उसने कभी स्पष्ट नहीं कहा.. .. .. मैं ही था। होता यह था कि उसकी इतने पूजा-पाठ, दान-दक्षिणा, व्रत आदि रखने के बावजूद भी घर की माली हालत सुधरती मुझे दिखाई नहीं देती और मैं ईश्वर की उपस्थिति को नकारते हुए उससे बहस करता और राम और कृष्ण के किरदारों में, आचरण की उनकी विसंगतियां निकालने लगता था और गिन-गिन कर ब्राह्मण-पंडित, पूजा-पाठ, धर्म-कर्म को कोसते बैठ जाता। वह प्रायः निरुत्तर हो जाती थी और हार कर कहती कि तुम्हें तो तुम्हारे पापा ने बिगाड़ दिया है। न जाने कैसी-कैसी किताबें पढ़ने देते रहते हैं। तुम भी उनके नक्शे क़दम पर चल निकले हो।

    दरअसल पिता जी ने, जिन्हें हम पापा कहा करते थे, वेद, बाईबिल, कुरान, गुरुग्रंथ साहिब आदि सभी धर्मग्रन्थों का विषद अध्ययन किया था पर वो इन ग्रंथों को पुस्तकों के आगे मानने के लिये तैयार नहीं थे। सभी धर्मों के मूल तत्वों में, जो कि एक ही हैं, आस्था तो थी पर ईश्वर को पूर्णतः नकारते हुए पंडितों के ढ़ोंगीपन और सभी तरह के कर्मकांडों से तीव्र वितृष्णा थी। वे खुद ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे और जिन्दगी भर उन्होनें किसी मंदिर में, घर में पूजा अर्चना नहीं की, न किसी धार्मिक अनुष्ठान में भाग लिया। और तो और जीवन के अंतिम लगभग छः वर्ष लकवे से ग्रस्त हो अंत समय तक पूरे होश-ओ-हवास में पड़े रहे.. .. ..पीठ पर जख्म हो गये.. .. .. चींटियां काटती रहतीं.. .. .. पर क्या मजाल कि कभी खुदा से यही दुआ मांगते कि वह जल्दी उठा ले और कष्टों से निज़ात दे।

उनकी इस सोच के चलते हम बच्चों को पूरी छूट थी कि हम आगे चल कर क्या करें और इस सोच का भरपूर फायदा उठाते हुए सब बच्चों में मैं सबसे ज्यादा अधर्मी बन गया था। मां की बातों में जब बहस ज्यादा हो जाती तो वो मुझे ठेल देती थी सिर पर एक चपत मार कर।
बड़े होते-होते मैं ईश्वर और उसके वज़ूद के बारे में पूरा नास्तिक हो गया था।  मां के मन में मुझे ले कर कुछ संशय था। मैं मां के संशय को समझता हूं। वो कभी भी मेरी तरफ से आश्वस्त नही रहीं। हमेशा मुझे मेरी हरकतों के चलते बिगड़ैल समझती थी। धर्म और पोंगापंथी के बारे में मेरे विचारों से वह भली भांति परिचित थी और उसे अच्छी तरह से मालूम था कि मैं किसी धर्म को नहीं मानता। पहले जब कभी वह बीमार पड़ती या यह दुआ मांगती कि बुढ़ापा अच्छी तरह से निकल जाय...कि कहीं दुर्गत न हो आखिरी समय....तो मैं पूरी संज़ीदगी से कहता कि दुर्गत क्या होनी है .....अस्पताल में ले जा कर डाल दूंगा....करेंगी नर्सें देखभाल.....तो उसके चेहरे पर ऐसे भाव होते कि जैसे मेरी बात की सच्चाई को पकड़ने की कोशिश कर रही हो। कभी-कभी सुनाते हुए कहती भी कि पता नहीं उसकी मिट्टी की क्या दुर्गत हो? कौन करेगा ... कौन लगायेगा नैय्या पार?


      उसका यह वाजिब संशय मेरी समझ में आ गया.. .. ..जब मेरे हाथों में उसने अपना हाथ बढ़ाया........  शायद यह भांपने  की कोशिश कर रही हो कि मैं क्या करूंगा। बोल तो नहीं पा रही थी पर आंखों में एक आशा की किरण दिखाई दी जो शायद निराशा में बदलती अपने को नियति पर छोड़ती सी लगी। आंख के कोर पर एक कतरा आ टिका। 


     अबः.. इस समय......जब वह कुछ क्षण की ही मेहमान रह गई है एक यक्ष-प्रश्न मेरे चारों ओर घूम रहा है, तांडव करता.. .. ..मैं क्या करूं...... नहीं समझ में आता। जब मैं यहां आया था तब मैंनें सोचा था कि मैं उससे ही पूछूंगा कि वह क्या सोचती है। पर उसने तो एकदम चुप्पी साध ली।


       समस्या यह है कि मैं ठहरा एक नस्तिक और मां नव्वे साल की पूरी जिन्दगी में...... जब से उसने होश संभाला है, नितांत धार्मिक। क्या उस धर्मपरायण मां का क्रियाकर्म मुझ नास्तिक के हाथों हो? विधि-विधान से? क्या यह ठीक होगा? पापा के इंतकाल पर कोई दुविधा मेरे मन में नहीं आयी थी क्योंकि वो खुद नास्तिक थे और कर्मकांडों के घोर विरोधी। मैंने बिना पूजा-पाठ के उनका संस्कार किया था। पर मां ?......उसके बारे में किससे पूछूं? घर में बड़ा होने के नाते मुझे ही निर्णय लेना है।

 
       सामने लेटी है, मां.... हल्के प्रिंट की नाईटी पहने हुए है। उसकी सूत की साड़ी नहीं है। साड़ी जिसके पल्लू से हम सब बच्चे और खासकर मैं खाना खाने के बाद हमेशा हाथ-मुंह पोंछता था और जिसमें से चूल्हे के सामने बैठने से आये पसीने और मसालों की गंध भरी रहती थी.. .. .. आज वह पहने नहीं है। वह बांह जिससे लटक कर बचपन में उससे अपने मन की बात हां करा लेते थे, इस समय ठंडी है, निःस्तेज है। मांस लटक गया है। मैं उसकी बांह पर हाथ रखता हूं।


       मैं अपने आप से लड़ रहा हूं। उठा कर मां से ही पूछना चाहता हूं कि बता मां..... मैं क्या करूं?.. .. .. किस आस्था से तूने जिंदगी भर जिस धर्म की पोथियां बांची, पूजा-पाठ-वृत किये.. .. .. कि उसकी एक कड़ी तुझे दगा देने के लिये तैयार बैठी है.. .. .. अपना ऋण अदा करने से हिचक रही है।  

 
       मां के गले से निकलती घरघराहट बढ़ रही है। लिटाने बिठाने या किसी और तरह भी वह कम नहीं हो रही है। सक्शन मशीन से गला साफ भी कर दिया है।   
       मां को आवाज़ देता हूं .. .. ..
कल तक आवाज़ देने पर उसकी पलकें थोड़ी सी और खुल जाती थीं पर आंखें यह देखने की कोशिश नहीं करतीं थी कि आवाज़ कौन दे रहा है.........कहां से आ रही है.. ... .. अब वे अनंत में स्थिर थीं.. .. ..आवाज़ देने पर पलकों में कोई हरकत नहीं होती।


       मैं मां के माथे को अंगुलियों से सहलाता हूं। शायद उसे कुछ आराम मिले। नाक पर आक्सीजन मास्क लगा है.......सांस लेने में उसे काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।
       मन ही मन मां के सामने अपनी दुविधा रखता हूं .. .. ..
       .. .. ..तुम्हीं बोलो मां मुझे क्या करना चाहिये। मुझे मालूम है तुम तो कह दोगी.. .. .. हमेशा की तरह, जो ठीक लगे , करो। पर ठीक क्या है?.. .. .. एक नास्तिक का धर्म सम्मत क्रिया-कर्म करना उसके लिये जो पूर्णतः धर्मपरायण है? बिना विश्वास और श्रद्धा से किया कार्य कहां तक उचित है। क्या यह महज़ दिखावा नहीं होगा...एक धोका....?
      बोलो...?


      .. .. .. मां मेरा मन नहीं करता कि  जिस धार्मिक कर्मकांड़ों पूजापाठ, क्रिया-कर्म, यज्ञ-शांति और पंडितों से एक नकारात्मक रिश्ता रखता हूं, उन मान्यताओं को दरकिनार कर तुम्हारा संस्कार धार्मिक विधि-विधान से करूं। यह ठीक है कि तुम चाहती हो कि ऐसा हो पर मैं अपनी मान्यताओं, जो इतने जतन से मैनें अर्जित की है उनको कैसे छोड़ दूं....... तुम्हीं बोलो..... कहा करती थीं न तुम कि जो अंतरात्मा कहे वही करो। क्या तुम चाहोगी कि धर्म से नाता तोड़ चुके आदमी के हाथों से तुम्हारा क्रिया कर्म हो। हो सकता है कि तुम इसके लिये तैयार हो जाओ पर मुझे गवारा नहीं है कि कुछ अनर्थ मुझसे हो जाय।


    उसके माथे को मैं सहलाना जारी रखे था। 
कल तक खुली आंखों के बीच माथे पर सहलाता था तो पलकें बंद कर कर लेती थी।  या कि हो जाती होंगी, कह नहीं सकता पर अब वह भी नहीं कर रही है। मैं आंखों के बीच उंगली से ठकठका चुका हूं। पलकों पर कोई हलचल नहीं होती।
    गले से आती घरघराहट की आवाज़ में थोड़ी कमी आयी। शायद मेरे.. .. .. माथे को सहलाने से आराम मिला होगा...सोचता हूं .. .. ..मैं बोलता भी हूं...... लगता है कि आराम आ रहा है।


    मेरा एक तरफा संवाद और द्वंद्व जारी था.. .. ..
    .. .. ..तुम कहा करती थीं कि समाज़ में रह कर करना पड़ता है.....कई बार नहीं चाहते हुए भी। पर यह कैसी लाचारी है। क्या मैं इससे छूट नहीं सकता?.. .. .. नहीं मां.. .. .. एक बार और मुझे माफ नहीं कर सकतीं, इस जिद्दी बेटे को?
    भाई ने, जो बांये हाथ की नब्ज पकड़े हुए बैठा था, ब्लड प्रेशर नापने के लिये पट्टा मां कि बांयी बाजू पर लपेट दिया और फिर स्टेथो कान पर लगा पारा चढ़ाने लगा।
    मेरी अंगुलियां मां के माथे पर और उसकी भौहों पर आहिस्ता-आहिस्ता घूमती रहीं।
घरघराहट और कम हो गई। आराम आ रहा है .. .. .. सोचा मैंने
.. .. ..सांस के साथ छाती का उतार चढ़ाव भी कम हो गया।


    भाई की नज़र गिरते हुए पारे पर थी। एक बार फिर उसने पारा उपर चढ़ाया।
    पत्नी ने पूछा.. .. ..  कितना है ? ............उसने पारा चढ़ाते हुए सिर्फ इतना ही कहा...... कम है। 
    घरघराहट और कम हो गई।
मैने सोचा कि........मां ने......मेरी बा.. .. ..सुन.. .. ..
    भाई ने.... पारा नीचे आते-आते ......  हवा निकाल.....चुपचाप हाथ से पट्टा खोलना शुरू कर दिया......
    मैं अभी भी उसका माथा सह.. .. ..
.. .. ..पत्नी ने मां की कलाई पकड़ नब्ज देखना शुरू किया...फिर टार्च से पुतलियों में झांका.......
और भाई से पूछा.....  गंगाजल?...... 
    .. .. .. मां अब.. .. .. लेटी नहीं थी।

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सौरभ आज मानवी की तस्वीर लिए ऐसे फफक कर रो रहा जैसे उसने मानवी को अपनी दुनिया से नहीं इस दुनिया से खो दिया हो। सौरभ और मानवी का विवाह परिवार के सहमति से हुआ था. मानवी छोटे कस्बे की लड़की थी, साधारण नैन नक्श गेंहुआ रंग ,काले घुंघराले बाल , पर एक ऐसा आकर्षण व्यक्तित्व पर जो बरबस ही किसी को आकर्षित कर ले। उसे देख कर कोई कहता साक्षात् दुर्गा लगती है, कभी उसके भोले चेहरे को देखकर कहता लक्ष्मी का रूप। मानवी की बारहवीं पढ़ते पढ़ते ही विवाह की बातचीत चलने लगी, और उसका डॉ. बनाने का सपना बस सपना ही रह गया।

उसने अपने कुछ बनने के सपने को मन में ही दफ़न कर लिया। माता पिता से कुछ कह ना पाई, उसके पिता विवाह तय कर आये, सौरभ उन्हें मानवी के लिए उपयुक्त वर लगा , और मानवी का सौरभ के साथ विवाह संपन्न हो गया। अपने गृहस्ती की गाड़ी मानवी कुशलता से सँभालने लगी , वो एक कुशल गृहिणी थी उसने बहुत से कामों में निपुणता हासिल कर ली थी ,कोई भी काम हो वो हर काम मन लगाकर करती थी, सौरभ के कमाए गए रुपयों से बचत कर उसने एक एक कर घर के कई सामान बना डाले, जिनका सौरभ को जब पता चलता वो एक ही बात दुहराता " अच्छा है सामान बन गया " जल्द कोई चीज़ बनती कहाँ है, " पर आया तो मेरे ही रुपयों से ना " और इन बातों को बोलते वक़्त ये भी नहीं सोचता की ये बातें मानवी को कहीं घाव करते होंगे. धीरे धीरे मानवी ने गृहस्ती की जरूरतों से पैसे बचा बचाकर सोने के गहने भी बनवाने लगी।

मानवी की एक अच्छी आदत थी वो फिजूलखर्च नहीं करती थी जैसे उसकी पड़ोसनें और सहेलियां भौतिकता के बनाव श्रृंगार के सामानों पर रूपये लुटाती थी। मानवी का एकमात्र श्रृंगार था आँखों में काजल उसका फिजूल खर्च ना के बराबर , बढ़ते महंगाई को देखकर वह हर वक़्त रुपयों के बचत के उपाय सोंचती रहती थी जिससे उसके ना धोबी ,ना नौकर किसी पर कोई खर्च नहीं बनते थे। बचे दाल से आंटा मल लेना, सब्जियों को भर कर परांठा बना देना , चावल को पीसकर गोले बनाकर पकौड़े बना देना , जिससे सामान भी बच गए और खाने की लज्ज़त भी बढ़ गए। यूँ ही कपड़ों पर कुछ कारीगरी कर सस्ते कपड़ों को भी वो आकर्षक बना देती थी ,इस तरह अपने कुछ सदुपयोग से खर्चों को बचाने की राह निकाल लेती थी।

उधर सौरभ को क्या सूझी उसने नौकरी छोड़ कर व्यवसाय शुरू कर ली, जिसके लिए उसे बैंक से कुछ रूपये भी क़र्ज़ लेने पड़े। व्यवसाय अच्छा चल पड़ा उसके कामों में विस्तार आने लगा जिस कारण उसे कर्मचारियों को भी बढ़ाना पड़ा जिसमें कुछ रिश्तेदार भी शामिल थे। मेहनत के साथ व्यवसाय बढ़ने लगा , समय बदले, पर सौरभ की एक आदत नहीं बदली ,वो आज भी मानवी को रूपये गिनकर देता रहा, यदि मानवी कुछ रूपये घर की जरूरतों पर भी ख़ुद से खर्च कर देती तो वो मानवी पर बरस पड़ता जब जी आया पैसे निकाल लिया " तुम्हें क्या मालूम पैसे कैसे कमाए जाते हैं सारा दिन घर में पड़े रहती हो क्या जानो " और गालियों की अपशब्दों की बौछारें शुरू। ये सब सुनकर मानवी रो पड़ती कि उसने आजतक ख़ुद के कौन से शौक के लिए रूपये खर्च किया है, जो भी रूपये लगे घर के लिए ही , परिवार बच्चे ऐसे पैसों के बिना तो नहीं चलते।

सौरभ में एक और कमी थी जिसे सौरभ जानना नहीं चाहता था , वो सारा दिन व्यस्त रहता अपने कामों में, वह ना ख़ुद ख्याल रख पाता और मानवी कुछ जरुरत का सामान के लिए रूपये खर्च करती तो उसे जलील करता ,जब तक मानवी अकेली थी ये समस्या कुछ कम रही , पर एक बच्चे के आने के बाद ये कलह रोजाना घटने लगे। मानवी दिन महीने गुजारते हुए तीन वर्ष व्यतीत कर दी ,सौरभ की हिम्मत बढती गयी वो थप्पड़ तक जड़ने लगा , मानवी अपने भाग्य का खेल समझ सौरभ के हाथों जलील होती रही, जब मानवी का अहम् घायल होने लगा उसने सौरभ का विरोध करना शुरू किया। उसे उल्टा सुनने को मिलने लगा "देख रहा हूँ तेरे तेवर आजकल बदले हुए हैं " मानवी के घर परिवार में सभी अपने जिंदगियों में व्यस्त थे मानवी जितनी साफ दिल थी उतनी ही आत्म सम्मान वाली उसे अपने पति की गालियाँ, कटु बातें अच्छी नहीं लगती थी।

वो अपनी तुलना पासवाली सौम्या से करने लगती सौम्या के पति भी व्यवसायी हैं। सौम्या ने अपने हर सुख सुविधा का इंतजाम रखा है ,पड़ी सारा दिन डूबी रहती है टेलीविजन में। क्या हो रहा क्या नहीं उससे कुछ मतलब नहीं उसे , बस मुंह हिलाया मिस्टर हितेन सब कुछ हाजिर कर देते हैं। जबकि ,उनकी हैसियत सौरभ से ज्यादा नहीं। सौरभ मानवी को बार बार अपने बातों से आह़त करने लगा , मानवी ने बहुत सोचा आखिर मै क्या करूँ जिससे वो मुझे निठल्ला ना समझें, क्या मैं सारा दिन घर में बैठ कर बिताती हूँ ,इतने बड़े घर की सफाई कपड़े धोना , कपड़े ईस्त्री करना , खाना बनाना , बगीचे की सफाई क्या ये काम नहीं , इन्हें करने में मेहनत नहीं लगते या समय नहीं लगता। क्या कोई घर से बाहर जाकर रूपये कमाए तभी उसकी इज्ज़त होती है , गृहणियों की अपनी कोई इज्ज़त नहीं ? क्यों पति अपने कमाकर लाने का ताने देते हैं क्या वो अकेले घर बाहर की जिम्मेवारी संभाल लेंगे ,ये सोंचते सोंचते मानवी की रात गुजर गयी , मानवी इस वेदना में अन्दर ही अन्दर जलती रही।

सुबह जल्दी उठ कर पूजा पाठ कर, घर के कार्यों को समाप्त कर वो नजदीक के ही दो, तीन स्कूल में गयी ,अपनी बारहवीं पास के कागजात दिखाकर स्कूल शिक्षिका की नौकरी की बात की.जिसपर कुछ स्कूल के प्राध्यापकों प्राध्यापिकाओं ने तो अच्छे से जवाब दिया, कि आजकल अंग्रेजी माध्यम का समय है , जहाँ शिक्षा का पहला स्तर तो अंग्रेजी माध्यम को वरीयता देते हैं हम और दूसरा कमसे कम बी .एड. की कागजात लेकर आईये तब नौकरी की बात करना। और कहीं पर उसके बारहवीं पास कागजात देखकर कुछ प्राचार्यों ने हंसकर मजाक बनाते हुए ये कहा इसपर किसी घर में झाड़ू फटके का काम अवश्य मिल जायेगा। इस तरह से हर ओर से विष वाणों से आहत मानवी सारा दिन बेचैनी में गुजारी , रात को सारा काम ख़त्म कर वो सौरभ के नाम एक ख़त लिख अपनी तस्वीर से दबा कर रख दी। सुबह जल्द ही उठ कर नितेश को गोद में लेकर निकल गयी बगैर कुछ बताये , मानवी के एक फैसले ने पल में ही एक गृहस्थी के मायने बदल डाले। नितेश को लिए वो उस शहर से दूर आ गयी जहाँ उसे कोई ना पहचाने।

मानवी भले ही ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी पर भगवान ने उसे बहुत सारे गुणों से नवाजा था ,और उसने ये साबित भी कर दिया की मन में हौसला हो और लगन से कोई काम हो तो इन्सान सबकुछ पा सकता है , उसने अपने साथ लाये गहने को बेचकर रूपये जुटा लिए , जिसे उसने ख़ुद के बचत के पैसों से जोड़कर बनाये थे। आधे रूपये से मकान , आधे से टिफिन का व्यवसाय शुरू किया क्योंकि मानवी पाक कला में काफी निपुण थी, उसे घर पर ही रहकर टिफिन तैयार कर लोगों को देना सस्ता और सुविधाजनक काम लगा ,और साथ ही इज्जत भी पाने लगी लोग उसके खाने की तारीफ करने लगे। उधर मानवी के जाने के बाद सुबह सौरभ जल्दी नहीं उठ पाया , उसकी जब आँख खुली वो ऊठ कर मानवी को चिल्ला कर आवाज़ लगाया, मानवी आज उठाया क्यों नहीं देर हो रही जल्दी चाय लाओ।

बार बार बोलने पर भी जब मानवी नहीं आई तो वो सीधा बाथरूम गया , नहा धो कर आया ,उसकी नज़र मानवी की तस्वीर पर पड़ी जो ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी थी, उससे दबे हुए पन्ने को लेकर देखा वो मानवी के लिखे ख़त थे उस पर लिखा था

खाना------------३०००

कामवाली बाई------------1500

धोबी ------------------२१०

माली --------------३००

सब मिलाकर मेरे बाद हर माह का आपका ये खर्च आएगा।

पहले तो सौरभ ने सोचा मानवी नाराज होकर अपने मायके गयी होगी , और जब उसने अपने ससुराल फ़ोन किया जिससे पता चला मानवी तो वहां आई ही नहीं। कुछ दिनों तक सौरभ के खाने पीने की दिक्कत नहीं रही उसकी माँ कभी उसकी भाई की पत्नी ने खिलाने की जिम्मेवारी को निभाया, फिर धीरे धीरे उनके भी रंग बदलने लगे, मानवी ने सौरभ की एक और आदत बिगाड़ दी थी, मानवी के हाथों का स्वादिष्ट खाना खिला कर , जिससे सौरभ को होटल का भी खाना बेस्वाद लगता , सौरभ का जीवन अब बदलने लगा था वो कभी देर से सोता, कभी सारी रात जगता, कभी ऑफिस ही रह जाता, और इस तरह से उसका काम और घर दोनों लावारिश होने लगे।

घर में पड़ी चीजें जिन्हें मानवी ने बड़े जतन से बनाया था खर्चों से रुपये बचा बचा कर वो गायब होने लगे, कहाँ गए वो सौरभ ने ना तो जानने की कोशिश की ना पता ही चल पाया। इस तरह मानवी के घर से जाते ही सौरभ का जीवन और व्यवसाय दोनों अस्त व्यस्त हो गए। मानवी ने तो टिफिन का व्यवसाय अपना कर अपनी और अपने ही जैसे कितनों की ज़िन्दगी बना दी , उसके मेहनत और लगन ने उसके जले हुए दिल में मरहम का काम किया, वो तो संभल गयी सौरभ से दूर होकर ,पर सौरभ अपने ही दंभ में चूर होकर बिखर गया। जिस मानवी को वो सिर्फ खाने और घर में रहने वाली साधारण महिला समझता था ,मानवी के जाने के बाद उसकी बिखरी ज़िन्दगी ने उसे उसका मूल्य बता दिया।

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बच्चों के नाम खंभे चाचा की प्यार भरी पाती
प्यारे बच्चों
आपके खंभे चाचा का आप सब बच्चों को प्यार भरा नमस्कार
बच्चों आपने अनुभव किया होगा कि रात्रि को कभी कभी अचानक बिजली गुल हो जाती है और चारों ओर बिल्कुल अँधेरा हो जाता है। कुछ भी नहीं दिखाई देता है , तब आपको डर लगने लगता है और आप मम्मी मम्मी चिल्लाने लगते हैं। कोई कोई पापा को आवाज़ लगाते हैं। यदि घर में दादा दादी भी साथ रहते हैं तो आप उनको भी आवाज लगाते हैं जोर से चिल्लाते हैं। तब घर के लोग कहते हैं बच्चों डरना मत हम अभी आपके पास आते हैं। फिर कोई टार्च तलाशता है तो कोई माचिस ढ़ूंढता है और‌ कोई मोबाइल की लाइट जलाकर तुम्हारे पास आ जाता है और तुम्हें पलंग ,सोफे अथवा किसी सुरक्षित स्थान पर बिठा देता है। इतने में कोई मोमबत्ती अथवा दीपक जलाकर प्रकाश कर देता है। गांव में तो अभी भी कहीं कहीं लालटेन अथवा लेंप घरों में दिख जाते हैं। यदि मिट्टी का तेल घर में उपलब्ध रहता है तो इन लालटेनों लेंपों को जलाकर घरों में उजाला कर देते हैं। उजाला होने से बच्चों आपको आपके मम्मी ,पापा ,दादा, दादी सब लोग दिखने लगते हैं। मगर भैया इनका उजाला बहुत कम होता है। इसमे तो आप पढ़ भी नहीं सकते। बिजली की तो बात ही और है। टयूब लाईट का मज़ा तो अलग ही होता है।
बच्चों बिना बिजली के हमारा जीवन कितना कठिन हो जाता है। इसके बिना हम थोड़ी देर भी सहज़ नहीं हो पाते। आपको मालूम है कि यह बिजली कहाँ से आती है और कैसे आती है?"
"क्या कहा ,पावर हाउस से आती है"
"किंतु आपको मालूम है पावर हाउस कहां हैं? शायद सबको नहीं मालूम होगा। अच्छा यह बताओ पावर हाउस से कैसे आती है ,ट्रेन से आती है बस से आती है या पैदल आती है। "
"खंभों से आती है। "
"अरे वाह आपको तो मालूम है,मगर अकेले खंभों कैसे आयेगी, खंभों में तार लटके होते हैं और बिजली तारों में से होकर आती है। पावर हाउस तो सैकड़ों मील दूर होते हैं,जहाँ बिजली बनती है फिर खंभों पर लगे तारों के द्वारा हमारे घरों तक पहुँती है। ये खंभें जंगल पहाड़ों में अकेले खड़े हैं । सर्दी गर्मी बरसात सब सहन करते हैं और आपको बिजली पहुँचाते हैं। बच्चों मैं ही खंभा हूं और आज आपको
अपनी आप बीती और अपने हालात बताऊंगा। जब कभी कभी बिजली बंद हो जाती है तो लोग गुस्से के मारे हमें नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं। तोड़ फोड़ करते हैं। बच्चों क्या उचित है? बच्चों मैंने भी एक कविता लिखी है आपको सुनाता हूँ मज़ा आयेगा। हम कितनी कठिनाई में जीते हैं आपको इस कविता से मालूम पड़ जायेगा


बिजली के खंभे बतलाते
मेरे सिर पर तार तने जो,तुम उनसे उजियारा पाते । बिजली के खंभे बतलाते।
जिन को सिर पर ढोते ढोते,  रात दिवस मेरे यूं बीते। ये तार तुम्हें बिजली पहुँचाते।
बिजली के खंभे बतलाते।
सड़क किनारे खड़े हुये हैं,खेत खेत में अड़े हुये हैं। आँधी तूफां डरा न पाते।
बिजली के खंभे बतलाते।
खोदा गड्ढा खड़ा कर दिया,यूं खज़ूर सा बड़ा कर दिया। दिखें आसमां से बतियाते।
बिजली के खंभे बतलाते।
बल्व ,टियूब लाइट हेलोज़न, लगा लगा छेदा मेरा तन। मैं रोता और तुम मुस्कराते।
बिजली के खंभे बतलाते।
मैं सबको उजयारा देता, बदले में कुछ कभी न लेता। फिर भी मुझको लोग सताते।
बिजली के खंभे बतलाते।
मेरे दम पर खेत पल रहे , पानी वाले पंप चल रहे। मेरे कारण अन्न उगाते।
बिजली के खंभे बतलाते।
चलें मशीनें चक्की चलतीं ,सब की सब बिज़ली से चलतीं। फिर भी लोग मुझे गरियाते।
बिजली के खंभे बतलाते।
बंद कभी बिज़ली हो जाती मेरी तो आफत‌ हो जाती मुझको देख लोग गुर्राते।
बिजली के खंभे बतलाते।
दूर दूर जंगल खेतों से आते हैं हम परदेसों से सिर पर ढोकर बिज़ली लाते ।
बिजली के खंभे बतलाते
बिजली कड़के पानी बरसे बरसाती न छाता सिर पे। सर्दी गर्मी सब सह जाते।
बिजली के खंभे बतलाते।
बिजली कभी बंद हो जाये कभी किसी को क्रोध न आये। यही बात सबको समझाते
। बिजली के खंभे बतलाते।
बताना बच्चों मेरी कविता कैसी लगी।
आपका ही प्यारा चाचा एक बिजली का खंभा


प्रभुदयाल श्रीवास्तव छिंदवाड़ा

जकल बाल साहित्य और बाल विकास के चर्चे जोरों पर हैं। वैश्वीकरण के इस दौर मे जहाँ सारे विश्व में पश्चिम का बोलबाल है भारत भी इसकी मार से अछूता नहीं रहा। हमारा देश वैदिक परंपराओं ,पुरातन सनातन ,संस्कारों में रचा बसा सिद्धांतों, नैतिकता और मानवमूल्यों का पोषक देश रहा है । यहां मर्यादा पुरषोत्तम राम के समान पिता के वचनों के पालनार्थ राज पाठ त्याग करने वाले देव पुरुष पैदा हुये हैं तो धर्म की रक्षार्थ कृष्ण के समान लीला पुरुष भी अवतार लेकर आये हैं। जहां नैतिकता, सिद्धांत, धर्म मानव मूल्य, सचाई, करुणा ,दया ,प्रेम, परहित ,कर्तव्य ,इन सभी शब्दों को अक्षरश: पालन करने के लिये बुद्ध, महावीर, परम हंस ,विवेकानंद जैसे महामानवों ने जन्म लिया है,वहीं स्वदेश की रक्षार्थ ,मातृभूमि की सेवा में राणा प्रताप और शिवाजी जैसे देश भक्तों ने अपनी सारी जिंदगी दुखों और महान कष्टों में गुजार दी। विदेशी आतताईयों की अधीनस्था स्वीकार कर वे विलासिता पूर्ण शाही जीवन जी सकते थे। किंतु स्वदेश प्रेम और स्वाभिमान के चलते यह लोग यायावर की जिंदगी जीते हुये भी आतताइयों से युद्ध करते रहे। वीर शिवाजी ने अपने जीते जी मुगलों को चैन से नहीं बैठने दिया। गुरुकुल ही विद्यालय थे और गुरु ही विश्वविद्यालय । गुरु माता पिता ईश्वर के समान ही पूज्य थे। गुरु गोविंद दोनों खड़े काके लागूं पाँव ,यह कहकर संतो ने गुरू के महत्व का बखान किया है।

शिक्षा प्रणाली ऐसी थी कि बच्चे शिक्षा पूर्ण होते तक सच्चे ,सिद्धांतवादी ,कर्त्तव्यनिष्ठ और परिपक्व व्यक्तित्व के धनी ,पूर्ण मानव बनकर ही गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करते थे। बड़ों की आज्ञा का पालन, कमजोरों, अबलाओं और मातृभूमि की रक्षार्थ अपने प्राणों की बाजी लगानॆ में तनिक सी भी देर नहीं करते थे। किंतु आज परिस्थितियां बिल्कुल विपरीत हैं। आज हम मैकालो की सोच को जीने के लिये मजबूर हैं। अंग्रेज भारत से जाते जाते हमारी संस्कृति को इतना विकृत कर गये हैं कि हम खुद को भूलकर पश्चिम के ही होकर रह गये हैं। आज परिवार टूटकर बिखर रहें हैं ,बुजुर्गों का सम्मान हमारी नई पीढ़ी नहीं करना चाहती ,परिवार की परिभाषा बदल गई है। परिवार मतलब हम दो हमारे दो अथवा एक। बूढ़े मां बाप अथवा भाई बहिनों को अब जगह नहीं है। क्या हमें अब कभी याद आती है कि बिगड़ते हुये बच्चों को कैसे पटरी पर लाया जाये या आज की इस स्वछंद संस्कृति को हमनॆ बिना किसी विरोध के स्वीकार कर लिया है। । हालाकि भौतिकवादी सोच के चलते आम आदमी का ध्यान इस तरफ नहीं है किंतु बुद्धिजीवी वर्ग साफ देख रहा है कि यदि देर की गई तो भारत वर्ष पूर्णत: अपने संस्कार खो देगा और हम पश्चिम की तरह नंगे, अधनंगे ,वहिशी पशु होकर रह जायेंगे। न जहां परिवार होगा न शादी विवाहों जैसी परंपरायें बचेंगी। जितने चाहे विवाह करो और जब चाहे तलाक ले लो। माता पिता को वृद्धाश्रम में डालो खूब पैसे कमाओ और ऐश करो। यही जीवन का उद्देश्य हो जायेगा। क्या यह उछृंखलता हमारे देश के लिये उचित होगी यह प्रश्न विचारणीय है।

यहां पर एक बात स्पष्ट करना होगी कि हमारे देश की पुरातन परंपराओं की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इन्हें जड़ से खोद निकालना और समाप्त करना संभव नहीं है। यह बात अलग है कि पूर्ण आधुनिक शैली में ढले लोग अपने संस्कार भूल रहे हैं किंतु देश के अधिकांश लोग अपने मूल को विस्मरण करना चाहते हुये भी नहीं कर पा रहे हैं। हमारी परंपरायें एवं संस्कार ऐसे हैं हैं कि हम अपने मौलिक गुणों का जड़मूल से त्याग कर ही नहीं सकते। जन्म के समय से ही हमारे रीति रिवाज़ हमारे संस्कार हमें ऐसी घुट्टी पिलाते हैं कि हमारा अंतरमन सदा अच्छाई को ग्रहण कर बुराई से दूर रहने को सचेत करता रहता है। यह ग्राह्य क्षमता परिवार दर परिवार अलग अलग होती है। वंशानुगत परंपराओं को अलग से सिखाना नहीं पड़ता बच्चे जो देखते वह अपने आप सीखने लगते करने लगते हैं।

नवजात शिशुओं के मष्तिस्क में भले सोचनॆ की क्षमता न्यूनाधिक हो परंतु आंखों से तो वे सब कुछ देखते ही हैं। कानों से भी उन्हें पूर्णत:तरह से सुनाई पड़ता है। पैदा होते ही थाली बज़ने की आवाज़ ,माँ की लोरियां, बड़े बूढ़ों का दुलार ,दादरे ,ढोलक की आवाज़, बांसुरी ,क्या इन सबसे बच्चा अनजान रह सकता है? भले ही वह बोलकर कुछ भी व्यक्त नहीं कर पाता पर वहा जानता सब है। बच्चा बड़ा होते ही दादा दादी कहनियां सुनाते हैं ,दुलराते हैं, चूमते हैं ,पुचकारते हैं औरयहीं से बच्चा प्रॆमा स्नेह दया करुणाजैसे गुणों को ग्राह्य करने लगता है।

बड़ा होता है तो घर में त्योहारों के समय मां को गुझियां बनाते देखता है संक्रांति पर लड्डू खुरमा बतियां बनाते देखता है तो वह भी मां के साथ ये सब चीजें बनाने कि जिद करता हैं । मां सॆवईयां बनाती है तो बच्चा कहता है कि मैं भी बनाऊंगा। दादी भगवान की आरती करती है तो बच्चे भी बड़ी रुची लेकर आरती करने आ जाते हैं। यह तभी होगा जिस घर में लोग इन रिवाजों का पालन करते हों। जहां पूजा पाठ होता ही नहीं, जहाँ बच्चों को नर्सों के हवाले कर दिया जायेगा ,जहाँ बच्चे बचपन से ही छात्रावासों में भेज दिये जायेंगे ,वहां के बच्चे यह संस्कार कहां सीख पायेंगे। भारतीय घरों में अभी भी सुबह से दरवाजे पर आई गाय को रोटी खिलाने का रिवाज़ है। कई घरों में तो गाय के लिये रोज़ रोटियां बचा कर रखीं जातीं हैं ताकि गाय दरवाजे से भूखी न जाये। महमानों को हमने सदा देवता माना है अथिति देवो भव ,यह हमारे संसार हैं। हमें बचपन में यही सिखाया गया है कि खुद चाहे भूखे रह लो पर अतिथिओं का सदा ध्यान रखो। बच्चे देखते हैं कि कैसे घर में महमानों का स्वागत करते हैं तो बड़े होकर उनमें भी यही भावना निश्चित तौर पर विकसित होगी। कुछ घर ऐसे अभी भी हैं जहाँ से भिखारी खाली हाथ वापिस नहीं जाते ,न जाने किस भेष में बाबा मिल जायें भगवान रे।

ईश्वर हम सबके भीतर बसता है और यह सोच, कि कर भला सो हो भला हमें दूसरों की सहायता करने को उकसाती है। कहने का तात्पर्य यह कि लोकचर्या का बच्चे के विकास पर बहुत प्रभाव पड़ता है। बच्चा जैसे वातावरण मे पलेगा उसके गुण स्वभाव संस्कार वैसे ही हो जायेंगे। आदिवासियों के बच्चे किसी ट्रैनिगं सेंटर में ट्रेनिंग नहीं लेते कितु इतना अच्छा लॊक नृत्य करते हैं कि ट्रेनिंगवाले क्या करेंगे। मादल, ढोल ,एकतारा, टिमकी, झांझ, मजीरा बजाना इन्हें कौन सिखाता है? कोई नहीं, यह इनकी दिन चर्या में है लोकचर्या में शुमार है। बच्चों की दिनचर्या अच्छी होगी लोक चर्या सुव्यवस्थित होगी संस्कारित होगी तो बच्चे के संस्कार निश्चित ही अच्छे होंगे। जिन घरों में माता पिता के चरण स्पर्श किये जाते हैं वहां के ब्च्चे भी ऐसा ही करते हैं । जहां हाय डेड ,हलो मम्मी का रिवाज़ है वहां बच्चे भी हाय हलो से काम चला लेते हैं। जैसा देखते हैं वैसा करते हैं बच्चे, इसलिये वे ऐसे परिवेश में पलें जहां संस्कार हों सलीका हो तहजीब सिखाई जाये और बड़ों का सम्मान और छोटों कॊ स्नेह देने कि परिपाटी हो। आज यह सब इसलिये जरूरी है कि हमारे कदम पश्चिम की मदहोशी में बह रहे हैं\हम संभलेंगे तो बच्चे भी संभल जायेंगे अन्यथा भगवान ही मालिक है। भूतकाल को समेटकर वर्तमान के रास्ते भविष्य की ओर राष्ट्र को ले जाने का काम बच्चों के कंधों पर ही है आज के बदलते हुये समाज को यह बात अच्छी तरह स्मरण रखना होगी।

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कहानी

ऐसा भी होता है

देवी नागरानी

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कहाँ गई होगी वह? यूं तो पहले कभी न हुआ कि वह निर्धारित समय पर न लौटी हो। अगर कभी कोई कारण बन भी जाता तो वह फोन ज़रूर कर देती। मेरी चिंता की उसे चिंता है, बहुत है, लेकिन आज मैं उसकी चिंता की बेचैनी मुझे यूं घेरे हुए है, कि मेरे पाँव न घर के भीतर टिक पा रहे हैं और न घर बाहर के बाहर क़दम रख पाने में सफल हो रहे हैं। कहाँ जाऊँ, किससे पूछूँ ? जब कुछ न सूझा तो फोन किया, पूछने के पहले प्रयास में असफलता मिली क्योंकि उस तरफ़ कोई फोन ही नहीं उठा रहा था, निरंतर घंटियाँ बजती रहीं, ऐसे जैसे घर में बहरों का निवास हो। जी हाँ, मेरी समधन के घर की बात कर रही हूँ।

अब तो कई घंटे हो गए हैं, रात आठ बजे तक लौट आती है, अब दस बज रहे हैं। बस उस मौन-सी घड़ी की ओर देखती हूँ, तकती हूँ, घूरती हूँ, पर उसे भी क्या पता कि जीवन अहसासों का नाम है, उसे क्या पता कि अहसास क्या होता है? छटपटाहट क्या होती है? इंतज़ार क्या होता है?

और अचानक दिल कि धड़कन तेज़ हो गई। फ़ोन ही बज रहा था। हड़बड़ाहट में उठाने की कोशिश में बंद करने का बटन दब गया और बिचारा फोन अपनी समूची आवाज़ समेटकर चुप हो गया। मैंने अपना माथा पीट लिया। आवाज़ तो सुन लेती, पूछ तो लेती कहाँ हो, क्यों अभी तक नहीं लौट पाई हो?

मैंने अपनी सोच को ब्रेक दी, लंबी सांस ली, पानी का एक गिलास पी लिया और फिर एक और पी लिया। शांत होने के प्रयासों में पलंग पर बैठ गई, और फ़ोन को टटोलकर देखा, कोई अनजान नंबर था, उसका नहीं जिसका इंतज़ार था।

बिना सोचे समझे मैंने वही नंबर दबा दिया। घंटी बजी, बजती रही और फिर बंद हो गई। अब मेरा डर मुझे सहम जाने में सहकार दे रहा था, मेरे हाथ-पाँव ठंडे हो रहे थे, एक सिहरन अंदर बिजली की तरह फैली। मैंने फ़ोन फिर दबाया, घंटी बजी, किसी ने उठाया और फिर रख दिया। अब मेरी परेशानी और बढ़ गई। रात का वक़्त, बेसब्री से उसका इंतज़ार और बातचीत का सिलसिला बंद, जैसे हर तरफ करफ़्यू लगा हुआ हो!

आख़िर फ़ोन की घंटी बजी, एक दो तीन बार...! मैंने सँभालकर उसे उठाया, कान के पास लाई ही थी कि कर्कश आवाज़ कानों से टकराई- ‘परेशान मत करो, आज वह घर लौटने वाली नहीं। अभी एक घंटे में उसकी शादी हो रही है, डिस्टर्ब मत करना।“ बेरहमी से कहते हुए फ़ोन काट दिया और मैं बेहोशी की हालत में बड़बड़ाई, कंपकंपाई और वहीं पलंग पर औंधे मुंह गिर पड़ी।

कौन है ये? किसकी आवाज़ है ये? क्या चाहता है वह, क्यों गुमराह कर रहा है, मुझे, मेरी सोच को, और उसके साथ उसको भी, जो मेरी साँसों की धड़कन है? वही तो मेरे जिगर का टुकड़ा है, उसके बिना मेरा जीवन सूना है, अधूरा, अपूर्ण! वह मेरे ज़िंदा होने का सबब है, और उसी सबब के साथ बेसबब यह क्या कुछ हो रहा है, जिसकी कल्पना मात्र से मेरे बदन में डर, ज़हर बन कर फैलता जा रहा है। ऐसा तो होना ही है, ज़रूर होगा, वह मेरा ख़ून है, मेरे वंश की आख़िरी निशानी, जिसे मैंने सीने से लगाकर पाला, बड़ा किया और उसे छत्रछाया देते-देते मैं ख़ुद एक हरा शजर बन गई। पुराने सड़े गले सब पत्ते झड़ गए, जहां प्रकृति के हर झोंके से बचाकर अपने आँचल की छाँव दी, वहीं उर्मिला के रूप में एक नया कोंपल उग आया। बारह महीने से बाईस साल तक का अरसा कोई कम लंबा तो नहीं होता!

अचानक दरबान ख़बर लाया था, बुरी! हाँ, बहुत बुरी ख़बर मेरे अभय और सविता के अंत की, और उनकी आख़री निशानी ‘उर्मिला’ को लाकर गोदी में डाल दिया। ग्यारह महीने की ही तो थी वह रेशम की गुड़िया, जिसके मुलायम छुहाव से मन में ठंडक फैल जाती, जिसके गाल अपने गाल से सहलाने से ख़ून में संचार बढ़ता, एक ताज़गी नसों में बहने लगती, जीवन-जीवन सा लगता, उसकी किलकारी साँसों को महका देती।

मेरी रातें दिनों में बदल गईं। क्या सोना, क्या खाना, क्या हंसना, क्या रोना सब उसके साथ ही होता रहा। हाँ, उर्मि के साथ, वह धूप मैं साया ! वह उठे तो मैं उठूँ, वह जागे तो मैं जागूँ, वह सोये तो मैं सोऊँ... एक चित, एक मन से समर्पित हो गयी मासूम जान पर, और वह मेरे जीने का सबब बन गई।

वह मनहूस, हाँ मनहूस दिन ही तो था दिवाली का, जो कुछ घंटे पहले घर से निकले, उर्मि को गोद में थामे। पाँव छूते हुए अभय और सविता ने कहा था- “माँ दो घंटे में लौट आते हैं, आते ही दिवाली की पूजा साथ करेंगे। मिठाई लेकर कुछ दोस्तों से मिल आते हैं।“

और जाने वाले न लौटने के लिए चले गए। लौट आई मेरे दिल की धड़कन उर्मि के रूप में, शायद इसलिए मैं ज़िंदा हूँ।

घंटी फिर बजी, अतीत से वर्तमान में आते ही मेरी बेबसी मेरे साथ छटपटाने लगी। अब क्या करूँ ? फ़ोन उठाऊँ, न उठाऊँ? न उठाऊँ तो कैसे पता चलेगा कि मेरी बालिग बच्ची कहाँ है और कैसी है? फ़ोन उठाते ही रख दिया जैसे हज़ार बिच्छुओं का डंक एक साथ लगा हो- ‘मैं थोड़ी देर में उसके साथ आपसे आशीर्वाद लेने आ रहा हूँ।“ बस इतना सुन पायी...!!

कौन है ये, किसकी आवाज़ है जिसमें गैरत के साथ-साथ अपनाइयत भी है। पर वह कहाँ है जिसकी आवाज़ सुनने को मेरे कान तरस रहे हैं? जिसे देखने के लिए मेरी आँखें बेचैनियों की सहरा में भटक रही है।

अचानक फ़ोन की घंटी फिर बजी, उठाते ही सभ्यता के दाइरे से बाहर आकर उबल पड़ी—“तुम कौन हो और क्यों बार-बार परेशान कर रहे हो? मेरी बात मेरी पोती से करा दो।“

“अभी तो वह गृह-प्रवेश करके अपने सास-ससुर का आशीर्वाद ले रही है। मैं अभी आपके पास उसके साथ आ रहा हूँ, फिर आप जितनी चाहें उससे बातें कर कर लेना।“

“पर तुम हो कौन ?”

“आपका जमाई, आपकी पोती का पति।”

‘पति ...!’ मैं विस्मित, अति आश्चर्य जनक रूप से ठगी हुई। रिसीवर मेरे हाथों से छूटते-छूटते बचा, पर लाइन कट गई।

उसी समय दरवाज़े पर दस्तक ने मुझे दहला दिया। डरी-सी सहमे-सहमे काँपते हाथों से कुंडी खोली। सामने सजी-धजी, मांग में सिंदूर सजाये, लाल साड़ी में उर्मि खड़ी थी और दुल्हा अपना चहरा सर पर सजे मुकुट की लड़ियों में छुपाने में कामयाब रहा।

मैं सकते में थी, मन ज़ोरों से मंथन का कार्य करता रहा, अब डर के साथ गुस्सा भी मन में घुस आया था। उर्मी बालिग हुई है तो क्या हुआ, मुझे बताए बिना किसी ऐरे-गैरे के साथ व्याह कर लिया और अब आकार सामने खड़ी हो गई है।

मुझे अभी तक यह सब कांड ही लग रहा था, भयंकर कांड, उर्मि भी पथराई सी खड़ी थी मेरे सामने। उसकी मुस्कराहट, जो उसका श्रिंगार है, जाने कहाँ गायब हुई थी। कहना तो नहीं चाहती, सोचना भी नहीं चाहती की ऐसे क्यों लग रहा है जैसे कोई अनचाहा षडयंत्र हुआ है, जिसमें उर्मि जकड़ी हुई है, इसलिए तो मुस्कराहट पर भी करफ़्यू लगा हुआ है। जितना मैं सुलझे हुए विचारों से हर पहलू पर रोशनी डालती, उतनी ही उलझनों में मैं धँसती जाती। कभी भावहीन मूर्ति उर्मि की ओर देखूँ जो अपने पति के साथ ऐसे खड़ी है जैसे मैं उनका स्वागत करने की तैयारी में खड़ी हूँ।

न शोर, न गुल, न बैंड, न बाजा, बस फूल, फूलों की माला, लाल दमकती साड़ी, और लड़के की वेषभूषा से प्रतीत होता कि दोनों नवविवाहित दंपति हैं। बस, और कुछ नहीं था, न शहनाई, न मंडप, न फेरे (जो मैंने नहीं देखे) न मेहमानों की हलचल, न खाना, न पीना, ऐसा कुछ भी नहीं जिससे लगे कि यह शादी हुई है। और मैं उसकी दादी अपरिचित सी खड़ी देख रही हूँ, उन्हें घर कि दहलीज़ के उस पार और मैं सोचों में डूबी इस पार।

‘सदा सुहागन का आशीर्वाद दीजिये दादी’ अचानक सोच के सभी बंधन टूटे। मैंने उर्मि की ओर देखा जो मिली-जुली भावनाओं से मेरी ओर देखे जा रही थी। मैंने सब नज़र अंदाज़ करते हुए बिना मुस्कराये, लगभग गरजती आवाज़ में उस अनजान दूल्हे की ओर मुख़ातिब होते हुए कहा- ‘क्या अपना चेहरा दिखाने के लिए तुम्हें मुंह दिखाई देनी पड़ेगी?’

‘मेरा हक़ तो बनता है...!’ वह फुसफुसाया।

निशब्दता अब भी माहौल पर हावी रही। अब दूल्हे के शरीर में हरकत हुई, वह धीरे-धीरे झुका, पूरी तरह झुका जैसे उसके हाथ पाँवों को स्पर्श कर पाए।

जाने क्या था उस स्पर्श में कि मेरे हाथ ख़ुद-ब-ख़ुद उसके माथे पर चले गए और मुंह से निकला ‘सदा खुश रहो’ और मैं मुग्ध भाव से उस फूलों वाले नक़ाब के पीछे से अपनी उर्मि का दुल्हा देखने की ललक को रोक न पायी। जैसे ही वह पाँव छूकर सर ऊपर उठाने को हुआ, मैंने उसके मुकुट से लटकती फूलों और मोतियों की लड़ियों को हटाया तो एक सलोनी मुस्कराहट से सामना हुआ। सुंदर नयन नक़्श, चमकती आँखें, लुभावनी मुस्कान लिए दोनों हाथ जोड़े खड़ा था सुजान।

मैंने होश में आते हुए दोनों को गले लगाया, आरती, टीका करके उन्हें घर में प्रवेश कराया। अब मन में डर का, सिहरन का कोहरा छंट गया। अपनाइयत की रोशनी में गैरत का अंधेरा गुम हो गया। मन के सारे भ्रम रफ़ूचक्कर हो गए और अब सामना था मनमोहन मुस्कान के मालिक सुजान के साथ, मेरी बहू सविता का छोटा भाई, मेरी उर्मि का पति।

मैं रसोईघर की ओर भागी, जहां से मुंह मीठा कराने के लिए और कुछ न पाकर शक्कर का डिब्बा ले आई। बारी-बारी दोनों को चुटकी भर खिलाई और पानी पिलाया। घर में सादगी से शुभ प्रवेश तो हुआ पर मन में एक अनसुलझी गुत्थी मुझे बेक़रार कर रही थी।

‘दादी आप बैठें, ज़ियादा परेशान न होइए।‘

लेकिन मैंने उनकी एक न सुनी, फ़ोन उठाया और लगाया उर्मि की नानी को.....

’बधाई हो दादीजी’ उधर से पहल हुई।

‘आपको भी नानी जी, पर यूं लुकाछुपी में ये सब......?’

‘क्यों और कैसे, आप सब जानने को आतुर हैं, हमें इसका एहसास है। आपको तो पता ही होगा, जब नातिन अपने मामा से शादी करती है तो चोरी छुपे सिर्फ़ लड़के के परिवार में ही की जाती है, अगर सविता होती तो वह भी शामिल नहीं होती। हम अभी आपके पास आ ही रहे हैं, पाँच सात मिनिट में पहुँच रहे हैं ‘ और फ़ोन कट गया।

उर्मि के नाना-नानी आ रहे हैं, यानि मेरे संबंधी। संबंधी तो वे थे ही, अब रिश्ता और मुकम्मिल हुआ है और मेरी हर चिंता का समाधान सहजता से सजता गया....। उसी वक़्त दरवाजे पर फिर दस्तक हुई। रसोई से बाहर निकलते ही देखा उर्मि ने दरवाज़ा खोलने की पहल की थी और अब अपनी नानी, सुजान की माँ को सास का दर्जा देते हुए पाँव छू रही थी। फ़जाँ में खुशियाँ घुल-मिल गईं। बधाइयाँ अदला-बदली हुई, मुंह मीठा किया और मिलकर चाय-नाश्ते के साथ बातें होतीं रहीं। कुछ कही जा रही थी, कुछ सुनी जा रही थी, पर सब की सब सुखद और खुशनुमां थीं।

बातों के बीच कई अनजानी बातों से पर्दा उठा कि उस रात उर्मि और सुजान ने सम्पूर्ण धार्मिक रीति-रस्मों से मंदिर में अपने माता-पिता के सामने शादी की, और वे दादी को सर्प्राइज़ देना चाहते थे। हक़ीक़त में दादी को यह पता तो था कि आंध्राप्रदेश में कुछ खास परिवारों में यह प्रथा थी कि बहन की लड़की का व्याह रहस्यमय ढंग से मामा के साथ करवा दिया जाता, और तद्पश्चात मां और बेटी समधन बन जातीं। भाई, बहन का जमाई बन जाता है और लड़की की नानी उसकी सास बन जाती है। दादी आज सविता की जगह खड़ी सभी रिश्ते स्वीकार करके बहू की याद में रो रही थी, पर इसमें एक खुशी भी पोशीदा थी, कि उसे उर्मि के लिए उसका मामा, पति के रूप में एक वरदान स्वरूप मिला, एक रक्षक, एक कवच बनकर!!

पर फ़ोन पर वे शब्द ‘परेशान मत करो, एक घंटे में उसकी शादी हो रही है॥‘ अब एक सुखद यादगार बन गई।

‘दादी हम सभी ने तय किया कि यह शादी रहस्यमय ढंग से सम्पूर्ण करके हम आपके पास आशीर्वाद लेने आएँ। हमें पता है कि आप उर्मि को खुद से जुदा करके हमारे घर की बहू बनाने के लिए राज़ी नहीं होंगी।‘ कहते हुए उर्मि की नानी ने उठकर दादी को गले लगाया और उनके आँसू ही पोंछे। सभी का दर्द सांझा था, सभी की खुशियाँ सांझी थीं।

आँखों में एक मंज़र तैर आया, बारह महीने की नन्ही उर्मि और बाईस साल की नौजवान उर्मि अपनी ही नानी की बहू बनी, अपनी मां की इच्छा पूरी की और अब भावभीनी-सी दादी के चरणों की ओर झुकी तो दादी ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया।

कल रात और आज सुबह तक के बीच का वह सिहरता समय अब खुशियों की फुहार में बदल गया। आज दादी ने महसूस किया कि दो पीढ़ियों को पाटने वाला प्यार ऐसा भी होता है।

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नाम: देवी नागरानी

जन्मः ११ मई 1941

जन्म स्थान: कराची ( तब भारत )

शिक्षाः स्नातक, NJ में हासिल गणित की डिप्लोमा,

मातृभाषाः सिंधी, सम्प्रतिः शिक्षिका, न्यू जर्सी.यू.एस.ए.(Now retired) .

प्रकाशित कृतियां : 1. "ग़म में भीगी ख़ुशी" , 2. "आस की शम्अ" सिंधी गज़ल-संग्रह, 3. "उडुर-पखिअरा" सिंधी-भजन, 4. "सिंध जी आँऊ ञाई आह्याँ" सिंधी-काव्य, "चराग़े -दिल" , 6. “ दिल से दिल तक", 7. "लौ दर्दे -दिल की" हिंदी ग़ज़ल-संग्रह, 8. "द जर्नी " अंग्रेजी काव्य-संग्रह. 9. “भजन-महिमा” हिन्दी भजन संग्रह २०१२, 10. “ग़ज़ल” सिन्धी ग़ज़ल संग्रह -२०१२.

प्रसारणः कवि-सम्मेलन, मुशायरों में भाग लेने के सिवा नेट पर भी अभिरुचि. कई कहानियाँ, गज़लें, गीत आदि राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित। समय समय पर आकाशवाणी मुंबई से हिंदी, सिंधी काव्य, ग़ज़ल का पाठ.

सन्मानः न्यू यार्क में अंतराष्ट्रीय हिंदी समिति, विध्या धाम संस्था, शिक्षायतन संस्था की ओर से 'Eminent Poet' , "काव्य रतन", व " काव्य मणि" पुरुस्कार, न्यू जर्सी में मेयर के हाथों “Proclamation Awarad” रायपुर में अंतराष्ट्रीय लघुकथा सम्मेलन में सृजन-श्री सम्मान, मुम्बई में काव्योत्सव, श्रुति संवाद साहित्य कला अकादमी , महाराष्ट्र हिंदी अकादमी, राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद की ओर से वर्ष २००८ में सन्मानित. , जयपुर में ख़ुशदिलान-ए-जोधपुर के रजत जयंती समारोह में, २०१० 'भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम" ओस्लो में सन्मानित. 18 मार्च 2012 भारतीय भाषा संस्कृति संस्थान –गुजरात विध्यापीठ अहमदाबाद, के निर्देशक श्री के॰ के॰ भास्करन, प्रोफेसर निसार अंसारी, एवं डॉ॰ अंजना संधीर के कर कमलों से सुत माला, सुमन, शाल से सन्मानित

संपर्कः dnangrani@gmail.com , URL://charagedil.wordpress.com

कहानी

जैसा पेड़ वैसा फल

रमाकंत बडारया ‘‘बेताब''

प्रस्‍तावना ः प्रस्‍तुत मंचीय, नुक्कड़ नाटक शैली की कहानी 'जैसा पेड़ वैसा फल' लिखने की प्रेरणा मुझे 1975 में जांजगीर जिला-बिलासपुर में पड़े भयंकर अकाल से मिली. तब मैंने बैंक में सर्विस के दौरान गावों में प्रवास के समय देखा, मीलों खेतों में फसलें सूखी पड़ी हैं. खेत सूखे पड़े हैं. पानी के आभाव में खेतों की जमीन में दरारें पड़ी हुयी हैं. लोगों के चेहरों की चमक गायब है, लोगों के पेट और पीठ आपस में मिले हुये हैं. बड़ा ही दर्दनाक माहौल वातावरण देखने मिलता, आखें नम हो जातीं. जहां देखो पलायन करने वाले किसान नजर आते. किसी घर के सामने दरवाजे पर, कटीली झाडियों को देखो तो समझ जायें,परिवार पलायन कर गया है. मैंने 1975 में इन चंद लाइनों में उसका आखों देखा हाल कुछ इस तरह लिखा है

 

ये हकीकत है कि, छतीसगढ जल रहा है.

पापी इन्‍द्र है जो, इसको छल रहा है.

मीलों चले जाइये, खेतों में धान नहीं मिलेगी.

लोगों के चेहरों पर, मधुर मुस्‍कान नहीं मिलेगी.

चौंकों में चले जाइये, चून नहीं मिलेगा.

काटोगे तन को लोगों के, तो खून नहीं मिलेगा.

मैंने प्रण, किया, मुझे जब भी मौका मिलेगा मैं अवश्य ही इस समस्‍या के निदान के लिये कुछ न कुछ जरूर करूंगा और ये मौका मुझे 1996 में मिला . शासकीय योजनांर्तगत मैंने सामूहिक उदवहन सिचाई योजना में 35 लोगों को कर्ज मंजूर कर वितरण किया ,ताकि किसानों को पानीं की कमी का सामना ना करना पड़े .रोजी रोटी की समस्‍या का सामना ना करना पड़े .अकाल की काली छाया किसानों पर ना पड़े .पलायन के दर्दनाक मर्जंर से किसानों को ना गुजरना ना पड़े .परिवार खुशहाल हों .एक तीर से दो शिकार हों. इसी मूल भवना से ओत प्रोत है,मेरी यह कहानी‘‘जैसा पेड़ वैसा फल'' मैं किसानों को रास्‍ता दिखाने में ,मार्ग दर्शन में कहां तक कामयाब रहा. पाठकों पर छोड़ता हूं आज छतीसगढ़ में सिंचाई साधनों में शासन की पहल से बहुत विस्‍तार हुआ है पलायन पर अंकुश लगा है

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अ-वर्षा किसानों के जीवन में बहुत दुःखद संदेश लेकर आती है . इससे उन्‍हें ऐसा लगता है, मानो उन पर दुखों के पहाड़ टूट रहे हैं .ऐसे ही एक वर्ष अ -वर्षा के शिकार एक ग्राम के तीन-चार किसान अपने खेतों की ओर दुख -भरी निगाहों से देख रहे हैं . जहां -जहां तक दूर -दूर उनकी नजर जाती है ,खेतों की फसल चौपट नजर आतीं हैं .मिटटी में दरारें ही दरारें नजर आती हैं .सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि, किसानों के दलों में क्‍या बीत रहा होगा ?'

एक किसान देवचरन अपने साथी पूरन से कहता है ः- ‘‘ यार पूरन ?''

पूरन उत्‍सुकता से पूछता है - ‘‘क्‍या बात है,यार देवचरन बोल ?''

‘‘यार पूरन,फिर दे गये इंद्र देवता हमे एन वक्‍त पर धोखा?- ‘‘बोला देवचरन.''

पूरन भी दुखी मन से कहता है- ‘‘ हां यार देवचरन ,फिर पड़ेंगे हमारे सिर पर भुखमरी के ओले ''

बोला देवचरन - ‘‘ठीक कहते हो पूरन,अब कैसे चलेगी हमारी रोजी -रोटी? सबसे बड़ी समस्‍या आने वाली है. अब हमारे सामने ,कैसे निपटेंगे इससे'' ?

अपना मौन तोड़ते हुये बोला जगदीश - ‘‘कब तक रहेंगे हम बादलों के भरोसे''

देवचरन बोला ः ‘‘भाईयों अब नहीं चला जाता मुझसे चलो चलकर बैठते हैं, नदी किनारे पेड़ों की छांव मैं '' सभी सहमति के साथ चल पड़ते हैं ! सभी नदी किनारे पेड़ों की छांव में जाकर बैठते हैं .पैर पसार कर बड़े आराम से.

कुछ देर पश्‍चात्‌ मौन तोड़ते हुये,आसमान की तरफ देखते हुये जगदीश बोलता हैः-‘‘हे भगवान ! क्‍या लिखा है हमारी किस्‍मत मैं?

जगदीश की बात सुनकर देवचरन बोलाः-‘‘जगदीश क्‍या बात है? क्‍या चल रहा है तेरे दिमाग में, बोल देर कैसी? भाई देवचरन, मैं सोचता हूं क्‍यों न खुदवा लूं खेत में कुआं? हो जायेगी पानी की समस्‍या हल.कैसा रहेगा?

बोला देवचरन - ‘‘ वाह मेरे मिटटी के शेर,बहुत खूब ! भूल गया क्‍या? पहले से ही कितने कुएं पड़े हैं सूखे हमारे खेतों में , बिन पानी सब सून!

क्‍या तुम चाहते हो ,एक और असफल कुआं . चाहते हो करना अपनी कीमती जमीन करना खराब?''

दुखी मन से जगदीश कहता हैः-‘‘नहीं यार ! देवचरन ,कौन करना चाहेगा अपनी कीमती जमीन खराब?''

पर कुछ सूझता भी तो नहीं है ! करें तो करें क्‍या? तुम्‍हीं बोलो .''

गुस्‍से से बोला देवचरन ः-‘‘जगदीश तूं जब भी करेगा बे-सिर पैर की ही बात करेगा .'' गुस्‍से भरी बात सुनकर खमोशी छा जाती है.

तभी मुस्‍कराकर खमोशी तोड़ते हुए पूरन बोला-‘‘मिल गया रास्‍ता ,यारों मिल गया रास्‍ता''.

आश्‍चर्य चकित होते हुए जगदीश बोला -‘‘कैसा रास्‍ता कुछ बोलेगा भी !''

सामने की ओर इशारा करते हुए बोला पूरन -‘‘वो देख जगदीश ,जरा गैर से देख !''

सभी उस ओर उत्‍सुकता बस देखने लगते हैं !!

जगदीश बोला -‘‘ हां-हां देख रहा हूं, कुछ महिलायें अपने सिरों पर चारे की गठरियां लेकर आ रहीं हैं ,तो!

‘‘सारी समस्‍याओं का हल रहता है महिलाओं के पास ,देखना कुछ न कुछ हल जरुर निकालेंगी ये ''!मूछों पर तॉव देकर बोला -पूरन.

देवचरन बोला -‘‘ पूरन क्‍या सच में ?,चलो देखते हैं !''

कुछ देर पश्‍चात्‌ महिलायें पास आ जातीं हैं.चारे की गठरियां उतारती हैं,और बैठती हैं.

कुछ देर की खामोशी को तोड़ते हुए बोली गौरी-‘‘क्‍या बात है मोहन के बाबू?

‘‘नहीं-नहीं कोई खास बात नहीं है.'' बोला जगदीश .

गौरी कहती है-‘‘नहीं-नहीं ! क्‍या नहीं?

कोई बात जरुर है,जिसे आप लोग छुपा रहे हैं ?

कुछ खास बात जरुर है!‘अपनों से शर्म कैसी''

तब जगदीश अपने मन की बात बयां करते हुए कहता है-‘‘हे भाग्‍यवान ! अकाल की चिंता सताने लगी है,

फिर दे गये इंद्र-देवता हमे धोखा.क्‍या नहीं जानती?''

‘‘सच कहा ,मोहन के बाबू,आपकी चिन्‍ता वाजिब है .'' -बोली गौरी

देवचरन बोला -‘‘गौरी भौजी हम मेहनत कर सकते हैं!,पर हमारी मेहनत बेकार कर देते हैं बरसाती बादल. बिन बरसे ही निकल जाते हैं यहां से .शायद इंद्र देवता नाराज हैं हमसे, हमारे गांव से ?''

‘‘यही है हमारी चिंता का विषय गौरी''-बोला जगदीश .

देवचरन बात आगे बढ़ाते हुए बोला-‘‘भौजी हमारे जगदीश भईया कहते हैं, खेत में कुआं खुदवा लेते हैं.

है कहां हमारे गांव की जमीन के नीचे पानी ? जानती हैं न आप.''

सुनकर बोली गौरी -‘‘आपकी बात ठीक है, पर भगवान के भरोसे भी तो नहीं रहा जा सकता भईया देवचरन ''

जगदीश आसमान की ओर देखकर बोला-‘‘हे भगवान लगता है,फिर से पलायन लिखा है हमारे भाग्‍य में''

गौरी चिंतित होकर बोली - ‘‘ ना-ना ,ऐसा अ-शुभ मत बोलो मोहन के बाबू ,भय लगता है पलायन से !

भगवान पर भरोसा रखो. सब ठीक हो जायेगा.''!

सबकी बातें सुनकर चम्‍पा से नहीं रहा गया ,हाथ उठाकर बोली -‘‘भाईयों ,मैं कुछ बोलूं?

सभी एक स्‍वर से बोलते हैं-‘‘हां-हां बोलिये चम्‍पा जी ,क्‍या कहना चाहतीं हैं आप ?

नदी की तरफ इशारा करते हुए चम्‍पा बोलती है -‘‘भाईयों ,आप लोग क्‍या इस नदी को नहीं देखते ?

नहीं देखते !इसके बहते हुए पानी को'

पूरन हंसकर बोला -‘‘नदी है ये तो हम सब जानते हैं,इसमें पानी ही तो बहेगा''.

गोरी बोली -‘‘क्‍यों मजाक करती है चम्‍पा''.

चम्‍पा कहती है -‘‘गौरी ये मजाक नहीं हकीकत है.चलो चलते हैं नदी के पास !''

सभी सहमत होकर नदी की ओर प्रस्‍थान करते हैं.

सभी नदी के किनारे पहुंचकर आपस में बतिया रहे हैं.चम्‍पा उन्‍हें रोक कर कहती है ,भाइयो!- नदी का बहता ये पानी, दिला सकता है हमें अवर्षा से मुक्‍ति !लहलहा सकतीं हैं फसलें, सोना उगल सकती है धरती.

बोला देवचरन -‘‘वो कैसे चम्‍पा जी ?

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए चम्‍पा कहती है-

भाइयों! नदी का पानी हमारे खेतों के बाजू से होकर गुजरता है......

पूरन बोला-‘‘वो तो दिख रहा है''.

भाई पूरन,यही पानी बुझा सकता है धरती की प्‍यास!

क्‍यों न करें नदी के इस पानी का उपयोग खेतों की सिंचाई के लिये?

नदी में भरपूर पानी रहता है,जो जीवन दे सकता है फसलों को,फसलें दे सकतीं हैं हमें नया जीवन! मिल सकती है पलायन से मुक्‍ति .''

देवचरन बोला -‘‘तुम ठीक कहती हो बहन चम्‍पा पर हमारे खेत उपर हैं नदी का पानी नीचे बहता है. ये कैसे पहुंचेगा हमारे खेतों तक .''सुनकर बोली चम्‍पा -

‘‘भाई देवचरन ,बहुत अच्‍छा प्रश्‍न किया आपने ! है हमारे पास एक रास्‍ता.''

गौरी आश्‍चर्य चकित होकर पूछती है-‘‘क्‍या है वो रास्‍ता ? विस्‍तार से बता ,पहेलियां मत बुझा.''

सुन गौरी ‘‘ नदी मैं सिचाई पम्‍प बैठाकर पहुंचा सकते हैं ,इसके पानी को खेतों तक .''

देवचरन कहता है-‘‘बहन चम्‍पा ,कहां है हमारे पास इतना पैसा .खरीद सकें जिससे पम्‍प?''

भाई देवचरन बोली चम्‍पा-‘‘क्‍या हम सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले सकते? नहीं ले सकते पम्‍प लेने किसी बैंक से कर्ज?

‘‘वाह! चम्‍पा बहन वाह!! उछलकर बोला जगदीश -‘‘,क्‍या पते की बात कही है तुमने ? हमारा तो ध्‍यान ही नहीं गया इस ओर .आप तो गजब की नजर रखतीं हैं.हमे आप पर गर्व है.''

गौरी बात को समझकर बोली -‘‘भाइयों ,क्‍यों न सरपंच से बात की जाये,लिया जाये उनसे मार्गदर्शन?''

.चम्‍पा बेाली - ‘‘ भाईयों ,कल सुबह मिलते हैं सरपंच जी के घर . सभी अपनी सहमति देते हैं.

देवचरन उठकर कहता है-‘‘चलो भाईयो,कल मिलते हैं सरपंच जी से ,आप लोग समय में अवश्‍य पहुंच जायें , सभी आपस में बतियाते जा रहे हैं. उनके चेहरों की चमक देखते ही बनती है.चर्चा सुनहरे भविष्‍य के लिये आशा की किरण जो लेकर आई है .पूरन ने कितनी सटीक बात कही थी,महिलायें हर समस्‍या का हल निकालने में माहिर होती हैं.खरी उतरतीं हैं. इनका लोहा तो मानना ही पड़ेगा.

दूसरे दिन सुबह ,जगदीश ,पूरन ,देवचरन,अपने साथियों खिलावन, बुधराम ,मनराखन के साथ सरपंच जी से मिलने के लिये आपस में बतियाते हुए एक गली से दूसरी गली पार करते हुए सरपंच के घर पहुंचते हैं,पीछे-पीछे चम्‍पा, गौरी,रामबती ,राधा भी सरपंच के घर पहुंचते हैं.

देवचरन सरपंच के घर का दरवाजा खटखटाते हुए बोलता है-‘‘सरपंच जी,.....सरपंच जी.''

अंदर से आवाज आती है! ‘‘ कौन है भाई,आता हूं!!,जरा सब्र करो!''. दरवाजा खोलते हुए ,देवचरन को देखकर बोले- ‘‘ओ ! हो!,भाई देवचरन सुबह-सुबह कैसे आना हुआ ? क्‍या बात है.आइये भईयों, बहनों आइये.स-सम्‍मान सभी को अंदर बुलाकर बिठाते हैं.फिर आने का कारण पूछते हैं-‘‘ कहिये देवचरन जी कैसे आना हुआ?

देवचरन अपने आने का कारण बताते हुए कहता है-‘‘सरपंच जी हम लोग आपसे एक खास विषय पर चर्चा करना है.''

सरपंच उत्‍सुकता से पूछते हैं !-‘‘क्‍या है आपकी समस्‍या बतायें ?''

देवचरन अपना पक्ष रखते हुए बोला-‘‘सरपंच कि जैसा कि, आप जानते हैं इस वर्ष कम वर्षा हुइ है,अकाल की स्थिति है.अकाल का साया मडराने लगा है!. बहन चम्‍पा ने हमें एक रास्‍ता सुझाया है.''

सरपंच बोले -‘‘ क्‍या है वह रास्‍ता जरा विस्‍तार से बताइये,''?

जी सरपंच जी बताता हॅूं, कहकर देवचरन बोलना शुरू करता है -‘‘सरपंच जी, अ-वर्षा, पानी की कमी से फसलें चौपट हो जाती हैं.

हमारे ग्राम के पास से शिवनाथ नदी बहती है ,जिसमें भरपूर पानीं रहता है.''

‘‘सो तो है, साफ-साफ कहो क्‍या कहना चाहते हो देवचरन ?'' -बोले सरपंच.

देवचरन- ‘‘जी सरपंच जी, मैं असली मुद्‌दे पर आता हॅूं, आपका ध्‍यान चाहॅूंगा - ‘‘बहन चंपा का कहना हैं, नदी के पानी से खेतों में सिंचाई कर फसलों को बचाया जा सकता है. साथ ही बताया यह कार्य नदी में पंप बिठाकर किया जा सकता है.''

बहन चम्‍पा कहती है कि बैंक से ऋण लेकर पम्‍प बैठाया जा सकता है सरपंच बोले -‘‘सुझाव तो अच्‍छा है.

क्‍या करना होगा मुझे.?

चम्‍पा बोली -‘‘सरपंच जी, आपको हमारे साथ बैंक चलना होगा. हम बैंक मेनेजर को अपनी योजना बताएँगे एवं उनसे ऋण के लिये बात करेंगे.

सरपंच बोले -‘‘बहन चम्‍पा सबसे पहले मैं आपको अच्‍छी योजना बतानें के लिये धन्‍यवाद देना चाहॅूंगा, आपका

बहुत-बहुत धन्‍यवाद.हम सब इसके लिये हमेशा आपके आभारी रहेगें.

आप जैसी महिलाओ की समाज को बड़ी जरुरत है.

चम्‍पा बोली -‘‘मैं आपके आभारी हॅूं सरपंच जी, जो आप सोंचते हैं, यह आपकी महानता है.''

सरपंच -‘‘हाँ तो भाइयों कल सुबह ग्रामीण बैंक में मिलते हैं, आप सभी 11 बजे बैंक पहॅुंच जायें मैं आपको वहीं मिलॅूंगा.''

वादे के साथ चाय-नाश्‍ता कर सरपंच से विदा लेते हुए घर से बाहर निकलते हैं.

अपनें-अपनें घरों की ओर आपस मे बतियाते हूए जा रहे हैं.

सरपंच उन्‍हें आँखों से ओझल होता हुआ देख रहे हैं. फिर अपनें घर में प्रवेश करते हैं.

तीसरा दिन,सुबह सरपंच और किसान देवचरन,पूरन,चम्‍पा,गौरी,खिलावन,जगदीश के साथ ग्रामीण बैंक में प्रवेश करते हैं.बैंक मैनेजर के पास पहूॅचते हैं. ब्रांच-मैनेजर,आगंतुको का स्‍वागत्‌ करते हुए कहते हैं-‘

‘आइए सरपंच जी,बैठिए.भाइयो-बहनों आप भी बैठिये. सभी बैठते हैं.‘कहिये सरपंच जी कैसे आना हुआ़''?

सरपंच अपने आने का कारण बताते हुए कहते हैं-‘‘मैनेजर साहब किसानों की एक समस्‍या है,इन्‍हे आपकी सहायता की आवश्‍यकता है'' खुलकर बताइये सरपंच जी ,मैं किसानों की क्‍या मदद कर सकता हूँ.?

सरपंच बोले-‘‘मैनेजर साहब ,हमारे गाँव के कुछ किसान शिवनाथ नदी में पम्‍प बिठाकर खेतों में सिचाई करना चाहते हैं इसके लिये इन्‍हें कर्ज चाहिये .इसके लिये इन किसानों को क्‍या करना होगा ?''सुनकर मैनेजर बोले-‘‘सरपंच साहब !

ये तो बड़ी खुशी की बात है ,हमारी बैंक सिचाई साधनों के लिये प्रधानता के साथ कर्ज देती है. इनके लिये ,सामूहिक उदवहन सिचाई योजना ठीक रहेगी.''

चम्‍पा उत्‍सुकता से पूछती है-‘‘ मैनेजर साहब ,ये उदवहन सिचाई योजना क्‍या होती है? जरा विस्‍तार से बताइये.

ब्राँच मेनेजर बोले -‘‘हाँ-हाँ जरा गौर से सुनों बताता हॅूं, इस योजना में विद्युत पंप और इसकी सहायक सामाग्रियाँ खेतों में नाली बनाने के लिये, सम्‍पवेल बनाने के लिये, पंप घर बनाने के लिये विद्युत कनेक्‍शन व्‍यय के लिये राशि मंजूर की जाती है. इस योजना के अंतर्गत्‌ जितना भी कर्ज मंजूर किया जाता है उसका 50प्रतिशत सरकार अनुदान के रूप में देती है. यह राशि वापस नहीं करना पड़ता. बचत 50 प्रतिशत सात आसान वार्षिक किश्‍तों मे सालाना ब्‍याज दर से फसल आने पर वापस करना होता है. हुई न आम के आम गुठलियों के दाम वाली बात!''

सुनकर चम्‍पा बोली -‘‘सच कहा आपने मेनेजर साहब है आम के आम और गुठलियों के दाम वाली बात. सरकारी योजना वाकई मे लाजवाब है. मेनेजर साहब प्रकरण बनाने की क्‍या प्रक्रिया होगी बताने की कृपा करें.''

अच्‍छा प्रश्‍न किया चम्‍पा जी आपने, सर्वप्रथम जो किसान इस योजना मे शामिल होना चाहते हैं उनके पास कृषि योग्‍य भूमि होना चाहिये. पानी का श्रोत नदी, नाला पास ही हो जिसमे बारहों माह पर्याप्‍त पानीं होना चाहिये एवं विद्युत लाईन खेतों के पास से गुजरती हो ये प्रमुख शर्तें हैं. साथ ही साथ सबसे पहले इन किसानों का एक स्‍वसहासता समूह बनाना पड़ता है सभी सदस्‍य मिलकर अध्‍यक्ष एवं सचिव, कोषाध्‍यक्ष का चुनाव करते हैं. प्रत्‍येक सदस्‍य को मासिक रूप से निर्धारित राशि जो भी तय करें जमा करना होता है. प्राप्‍त राशि से बैंक में समूह के नाम पर खाता खोला जाता है खाते के संचालन हेतु यथा राशि निकालने अथवा जमा करने किन्‍हीं दो पदाधिकारीयों को प्रस्‍ताव पास कर अधिकृत किया जाता है जिनमें एक अध्‍यक्ष अनिवार्य होता है. बैंक खाते का संचालन संयुक्‍त हस्‍ताक्षर से ही होना चाहिये.

खाते का संचालन 6 माह तक नियमित होने पर शासन की तरफ से 25000 रु सहयोग राशि के रुप मैं शासन द्वारा समूह को दी जाती हैै . इस राशि पर समूह को कोइ ब्‍याज नहीं देना होता.

इस राशि को समूह अपने सदस्‍यों को आजीवन कर्ज के रुप में जरुरतें पूरा करने देकर तय सुदा ब्‍याज के साथ वसूल कर, अपने फण्‍ड में व्‍ृाधि करेगा. समय -समय में बैक और सरकारी अधिकारी रिकार्ड्र की जांच करेंगे .जब यह सुनिश्‍चित हो जायेगा कि समूह ने लेन-देन सही- सही किया है तो समूह के नाम से सिचाई योजना का कम से कम 10लाख का प्ररकरण बनाया जा सकता है. प्रकरण फिर ग्राम सभा मैं मंजूरी के लिये रखा जाता है. ग्राम सभा में पास होने के बाद प्ररकरण मंजूरी के लिये जनपद पंचायत भेजा जाता है. जांच पड़ताल पश्‍चात जनपद चंपायत के माध्‍यम से प्ररकरण को बैंक स्‍वीकृति लिये बैंक भेजा जाता है ,बैंक योजना का स्‍थल निरिकक्षण ,जांच पड़ताल कर कर्ज मंजूर कर राशि का उपकरणों की सपलाई कतवाती है जहां से समूह क्रय करना चाहे .भाईयो समझ गये न आप लोग ?

हाँ-हॉ समझ गये हम लोग सभी मिलकर बोलते हैं......!!

चम्‍पा बोली -‘‘ मैनेजर साहब हमे अब यह बताईये प्रकरण बनाने में किन -किन कागजातों की आवश्‍यकता होती है?

कौन व - सहायता समूह बनाता है कौन? प्ररकरण बनायेगा कौन? बताइये ? आपकी बड़ी मेहरबानी होगी.

बैंक मैनेजर प्रसन्‍न होकर बोले - स्‍व-सहायता समूह,प्रकरण बनाने की मार्ग-दर्शन देकर योजना पूर्ण करवाने की जिम्‍मेवारी जिला पंचायत विभाग के अधिकारी कर्मचारियों की है.इसके लिये दस्‍तावेज चाहिये, पांचसाला खसरा ,नकल बी-1 नक्‍शा पम्‍प कोटेशन, लाइन के लिये बिजली विभाग का एन. ओ. सी. डिमांड नोट,प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट किसानों का नो-डयूज,पत्र भाईयों आप लोग चिंता न करें ,ये सब कार्यवाही जनपद पंचायत के अधिकारी मिलकर करवा देंगे.

इसमें आप लोगों को ,कोई परेशानी नहीं आने वाली .सरपंच जी ऐसा करते हैं,हम लोग जनपद पंचायत कार्यालय चलते हैं. इस सम्‍बंध में मुख्‍य कार्य पालन अधिकारी से सम्‍पर्क कर कार्यूवाही करवाते हैं. सरपंच खुशी व्‍यक्‍त करते हुए सरपंच बोले -‘‘इससे अच्‍छी बात और क्‍या हो सकती है मेनेजर साहब चलो चलते हैं ?''. सभी उठकर चलना प्रारंभ करते हैं! बैंक से बाहर निकसते हुए!

कुछ देर पश्‍चात सभी जनपद पंचायत कार्लालय पहुंचते हैं,पहुंचकर मुख्‍य कार्यपालन अधिकारी महोदय से जाकर मिलते हैं.वे उन्‍हें ससम्‍मान बैठाते हैं. सरपंच उन्‍हें वस्‍तु-स्‍थिती से अवगत कराते हैं. ब्राच मैनेजर बोले़‘-‘सी.ई.ओ.महोदय, योजना के सम्‍बंध में मैंने सभी जानकारियां दे दीं हैं.बोले सी.ई.ओ.-‘ये तो मैंनेजर साहब बड़ी अच्‍छी बात है. इनका समूह और प्रकरण बनवाने की कल से शुरुवात करवा देते हैं ताकि ग्राम सभा एवं जिला पंचायत से अनमति लेने में बिलम्‍ब न हो। कल ग्राम पंचायत भवन में मीटिंग रखते हैं,इसमें सभी विभागों जैसे ,राजस्‍व, बिजली ,एग्रीकलचर को आमंत्रित करते हैं.हम और आप तो रहेंगे ही .सभी सहमति के साथ बिजली विभाग कार्यालय प्रस्‍थन करते हैं.

बिजली विभाग पहुंचकर,अधिकारी के पास पहु्ंचते हैं.अधिकारी सभी आगंतुकों का अभिवादन करते हुए बोले -

‘‘कहिये श्रीमान आप लोगों का कैसे आगमन हुआ ,आश्‍चर्य आप लोग एक साथ? मुख्‍य कार्य पालन अधिकारी बोले -

श्रीमान ये किसान उदवहन सिचाइ योजनांर्तगत बैंक से कर्ज लेना चाहते हैं,इसके लिये इन्‍हें आपके विभाग से लाइन के लिये एन,ओ,सी, की आवश्‍यकता होगी ?कल ग्राम पंचायत भवन मैं मीटिंग रखी गई है ,पकरण बनवाया जाना है.

कलेक्‍टर महोदय का निर्देश है .आप आकर जांच पड़ताल कर लें . प्रमाण पत्र पदान करने, स्‍टीमेट सम्‍बंधी कार्यवाही प्रदान करने का अनुरोध है. से विद्युत लाइन पास से ही गुजरती है.ामस्‍या नहीं होगी,व्‍यय भी ज्‍यादा नहीं आयेगा.

साहब अनुरोध कैसा? ये तो अपनी डयूटी है कल मिलते हैं काम हो जायेगा.सभी मुस्‍कराकर धन्‍यवाद देते हैं.हाथ जोड़कर अभिवादन करके विदा लेते हैं .सबके चेहरों पर विजेता के भाव स्‍पष्‍ठ देखे जा सकते हैं. ऐसा लगता है मानो उन्‍हें कोई गड़ा हुआ खजाना मिल गया हो?

चौथे दिन , ग्राम पंचायत भवन किसानों से खचा-खच भरा हुआ है. बैंक ,राजस्‍व, बिजली, एग्रीकलचर एवं जनपद पंचायत विभाग के अधिकारियों का आगमन हो चुका है. तभी सरपंच माइक पर घोषण करते हैं ,भइयो !

बैंक, जनपद, एग्रीकल्‍चर ,सरपंच ,पंचों की उपस्‍थिति में एक स्‍व-सहायता समूह का गठन किया गया है. इन्‍हें आज प्रशिक्षण भी दिया गया है, ताकि ये समूह का संचालन बेहतर तरीके से कर सकें .अब मैं सी.ई.ओ साहब से निवेदन करुंगा वे आकर समूह के पदाधिकारियों के नामों की घोषण करें,आइये श्रीमान.

भइयो आपके ग्राम के कुछ प्रगतिशील किसानों ने का गठन किया है.आज का दिन बड़े ही सौभाग्‍य का दिन है,स्‍व-सहायता समूह के सदस्‍यों की घोषणा आज माननीय सी.ई.ओ. करेंगे मैं उन्‍हें आमंत्रित करता हूं . आइये श्रीमान......! मुख्‍य कार्यपालन अधिकारी आकर घोषणा करते हैं.

भाइयों स्‍व-सहायता समूह के निम्‍मलिखित पदाधिकारियों का चयन सर्व-सम्‍मति से किया गया है,इनके नाम इस प्रकार हैं-

1. अध्‍यक्ष -.श्रीमति चंम्‍पा 2.सचिव-श्री देवचरन 3. कोषाध्‍यक्ष-श्री जगदीश . तालियाँ गूजती हैं ! ! ! ! .

अपनी बात को आगे बढ़ाते हूए बोले ‘‘मैं पदाधिकारियों से अनुरोध करुंगा वे समूह का संचालन ईमानदारी से करेंगे

एक खास बात और समूह के लिये 10 लाख रु का सिंचाई योजना का प्रकरण भी बनाया गया है.सही -सही उपयोग करेंगे इसमें 5 लाख रु अनुदान ,5 लाख ऋण है. ऋण को 7 आसान वार्षिक किस्‍तों में फसल आने पर मय ब्‍याज अदा करना है अपनी जमीन के अनुपात में जो बाद में मैनेजर साहब बता देंगे.कर्ज अदा मिलकर करना सामूहिक जिम्‍मेवारी होगी. आपका भविष्‍य आपके हाथों में है . ग्रामीण बैंक ने कर्ज मंजूर करने का आश्‍वासन दिया है.

तालियां गूंजतीं हैं.! ! !

मेरी शुभ-कांमनायें आपके साथ हैं. धन्‍यवाद जै-हिन्‍द ! सरपंच खड़े होकर बोले-‘‘मैं मेनेजर साहब से निवेदन करुंगा आकर दो शब्‍द कहे. आइये श्रीमान.मेनेजर किसानों को सम्‍बोधित करते हुए बोले -‘‘भाईयो मैंने- इस प्रकरण का अवलोकन कर लिया है,समूह का संचालन नियमित होगा.ग्राम सभा से अनुमोदन होकर,प्रकरण बैंक आने पर वितरण होगा वादा है.एक माह बाद बैंक आकर 25000रु सहयोग राशि बाबत जानकारी कर लेवें धन्‍यवाद !''

ब्राच मैनेजर चम्‍पा के पास जाकर उसे समूह की पास बुक सौपते हुए बोले-‘आप समूह के हर माह सदस्‍यों से नियमित रुप से निर्धारित राशि लेकर खाते में जमा कर दें हर माह मीटिंग लेकर आपसी लेन-देन पर चर्चा करें.

चम्‍पा आकर बोली-‘‘आदरणीय,अधिकारीगण मैं आप सभी के प्रति समूह की तरफ से आभार व्‍यक्‍त करती हूं . हम लोग आज बेहद खुश हैं,क्‍योंकि आज हमारी मनो-कामना पूर्ण हुई है.इसमें आप सभी का ,अहंम्‌ योगदान है.. धन्‍यवाद

जै-हिन्‍द !

सरपंच माइक पर आकर घोषण करते हैं-‘‘माननीय अधिकारी गण, किसान बंधुओं, माताओं बहनों, आपने अपना अमूल्‍य समय निकालकर कार्यक्रम को सफल बनाया मैं पंचायत की ओर से आप सभी के प्रति आभर व्‍यक्‍त करता हूं. मीटिंग समापन की घोषण करता हू। आप सभी से अनुरोध है चाय-नाश्‍ता लेकर जायें . धन्‍यवाद जै-हिन्‍द !चाय नाश्‍ता पश्‍चात लोग आपस मैं चर्चाकर हॅसी मजाक करते अपने घरों को जा रहे हैं. अधिकारियों का काफिला भी जाता हुआ आंखों से ओझल होता दिखाई दे रहा है. समूह का संचालन करते हूए 6 माह हो चुके हैं.जांच पड़ताल में कोई अनियमिता नहीं पाई गई स्‍दस्‍यों द्वारा 25000रु का उपयोग अपनी घरेलू जरुरतों को पूरा करने में सफलता पूर्वक किया . कर्ज में ली गई रकम समय में लौटाई. .फल स्‍वरुप जिला पंचायत से ग्राम सभा की सूचना प्राप्‍त हुई है. सरपंच ने सदस्‍यों को पंचायत भवन बुलवाकर इसकी सूचना दी.सरपंच ने बताया कि दो दिन बाद ग्राम सभा का आयोजन किया गया है जिसमें समूह का प्रकरण अनुमोदन के लिये रखा जायेगा. आप सभी को आना है,तैयारी भी करना है,सभी एक साथ बोले-‘‘सरपंच जी ये भी कोई कहने की बात है ?

सभी के चेहरे खुशी के मारे चमक उठते हैं .खशी की लहर दौड़ जाती है.सभी गले मिलते हैं. शाम का समय है ग्राम कोटवार गाँव में ग्राम-सभा की मुनादी करते हुए एक गली दूसरी गली घूम रहा है. लोग दरवाजों पर सुनने आकर खड़े हो जाते हैं. कोटवार आवाज लगता है - ‘‘सुनो-सुनो!! गाँव वालो सुनो !!!!!

राह चलत एक ग्रामीण कहता है-‘‘अरे बनवारी सुनो-सुनो क्‍या सुनो कुछ बोलेगा भी ?

कोटवार फिर आवाज लगाता है-‘‘सुनो-सुनो..कल हमारे गाँव में ग्रामसभा का आयोजन है.

इसमें स्‍व-सहायता समूह का प्रकरण मंजूरी के लिए रखा गया जायगा. किसी को अपत्‍ति हो तो आकर दर्ज कराएँ. सभी लोगों से निवेदन है अवश्‍य ही पधारें. ढम-!!!!!-ढम!!!!! !!

कोटवार की मुनादी का सिलसिला लगातार पूरे गाँव में एक छोर तक चलता है.

लोग कल की होनेवाली ग्राम-सभा के सम्‍बंध में आपस में चर्चा करते हुए जगह-जगह दिखाई दे रहे है.

गाँव का महौल बहुत खुशनुमा लग रहा है.ऐसा प्रतीत हो रहा है. मानो. ग्रामवासियों को कोई छुपा खजाना मिल गया हो. ?

ग्राम पंचायत भवन में ग्राम-सभा की तैयारियां बहुत जोर-छोर से चल रहीं .हैं. कोई कमी ना रहे इस पर विचार विमर्श करने में सरपंच,पंच,समूह के सदस्‍य लगे हुए हैं. चर्चा पश्‍चात सरपंच बोले-‘‘भाईयों बहुत रात हो गयी अब चलें कल मिलते हैं. एक दुसरे का अभिवादन करते हुए लोग अपने अपने घरों को लौट रहे हैं. आज सुबह से ही ग्राम का माहोल खुश-नुमा है,ग्राम पंचायत भवन अच्‍छी तरह सजाया गया है. पंडाल-तोरण द्वार लगाये गये है. लोगो को बैठनें के लिए कुर्सिया, दरियां बिछाई गई हैं, लाउड-स्‍पीकर में राष्‍ट्र भक्‍ति का का गीत बज रहा है. ग्राम पंचायत भवन की ओर लोगों ने अपना रूखकर लिया है .

शने-शने कुर्सियां भरने लगी है. पुरूष कुर्सियों पर,महिलायें बच्‍चे दरियों पर बैठ रहे हैं. इसी बीच सरपंच, मंच में घोषणा करते हैं-‘‘सभी बहनों, बच्‍चों से निवेदन है कुछ देर में ग्राम सभा की कार्यवाही शुरू की जा रही है. मुख्‍य - कार्य पालन अधिकारी,बैंक मैनेजर मंच पर आ चुके है. अब में आशा-स्‍व-सहायता समूह के सदस्‍यों से निवेदन करता हूँ वो मंच पर अपना स्‍थान ग्रहण करें.''

स्‍व-सहायता समूह के सदस्‍य एक-एक कर विराजमान हो रहे है. इसके पश्‍चात अधिकारियों का ,समूह के सदस्‍य गण पुष्‍पा-हार से स्‍वागत करते हैं. मुख्‍य-कार्य पालन अधिकारी ग्रामीणों को शासकीय योजनाओं के विषय में जानकारी देरहे हैं. विशेष कर सामूहिक उद्वहन सिंचाई योजना पर प्रकाश डालते हैं.. स्‍वा-सहायता समूह की महत्‍ता पर प्रकाश डालते हैं. अधिक से अधिक,ग्रामीण इसका लाभ लें. शासन, प्रशासन, इसके लिए हमेशा तत्‍पर है. जिसका परिणाम आपके सामने है, आपके ग्राम के कुछ प्रगतीशील किसानों ने.,स्‍वा-सहायता समूह बनाया, सफलता पूर्वक इसका संचालन किया. अकाल से, पलायन से मुक्‍ति पाने के लिए ये चिन्‍तित दिखे. इन्‍होंने सरपंच को अपनी समस्‍या बताई. सरपंच ने बैंक में सम्‍पर्क किया. सबने मिलकर मुझसे सम्‍पर्क किया। परीणाम स्‍वरुप ,10लाख का प्रकरण सिंचाई योजना के लिए बनकर तैयार हुआ. आज ग्राम सभा की मंजूरी के लिए

आपके सामने प्रस्‍तुत करते हुए.मुझे खुशी हो रही है. स्‍वा-सहायता समूह की प्रगति,अकाल से मुक्‍ति का द्वार खोलने प्रकरण में मंजूरी के लिऐ विचार करें.

विचार करने के लिये आपको सिर्फ दस मिनट का समय है. आपत्ति हो तो - बे-खौफ दर्ज कराएँ - धन्‍यवाद!

सरपंच खड़े होकर बोलते हैं -‘‘सज्‍जनों, दस मिनट का समय समाप्‍त हो गया है,कोई आपत्‍ति नहीं आयीं. क्‍या? प्रकरण को मंजूर मान लिया जाय, ?

जोर से हाँ की आवाज गूंजती है, ध्‍वनिमत से प्रकरण मंजूर हो जाता है.

स्‍व-सहायता समूह की अध्‍यक्ष चम्‍पा खड़े हो कर बोली -‘‘सज्‍जनों, माताओं-बहनों आपने हमारी योजना को मंजूरी देकर , हम पर बड़ा उपकार किया है,

हम लोग आपको इसके लिए तहेदिल से धन्‍यवाद देते हैं .हमे ऐसे ही आपका सहयोग मिलता रहेगा. जय हिन्‍द, जय किसान

सरपंच माइक पर आकर सभा समाप्‍त की घोषणा करते हैं. सभी का आभार व्‍यक्‍त करते हैं. सभी से स्‍वल्‍पाहार लेने का अनुरोध करते हैं.

सभी उपस्‍थित नागरिक हँसी-खुशी स्‍वल्‍पाहार ले रहे है. जो ले चुके हैं वो अपने घरों को प्रस्‍थान कर रहे हैं.

लोगों के चेहरों पर चमक देखते ही बनती है. भगवान करे, ऐसी चमक हमेशा बनी रहे.

गाना बज रहा है '' हम होंगे कामयाब एक दिन''.............!!..........!!

मेहमानों का काफिला धीरे-धीरे जाता हुआ आंखों से ओझल होता हुआ दिखाई दे रहा है.

गाने के बोल अब भी कानों में गज रहे हैं........हम होंगे का......म.......या......ब..........! ! !

स्‍व-सहायता समूह के अध्‍यक्ष के नाम ग्रामीण बैंक से पत्र आया है, जिसे पढ़कर चंपा सबको सुनाते हुए बोली-‘‘भगवान ने हमारी सुन ली.

खुशियों की सौगात लेकर आया है यह पत्र.! बोला जगदीश-‘‘हाँ चंपा जी, बड़े ही हर्ष का विषय है.

फिर बोली चम्‍पा-मेरे प्रिय साथियों बैंक ने हमारा प्रकरण मंजूर कर लिया है, लेटर के साथ स्‍वीकृति पत्र भी है, इसमें ऋण की शर्तों का विवरण दिया गया है. सभी पढ़कर अपने हस्‍ताक्षर कर दे, आज ही बैंक बुलवाया गया है. कुछ कागजातों में हस्‍ताक्षर करना है,

जिसके बाद ही योजना में काम शुरू होगा. ‘‘चंपा जी, भगवान ने हमारी प्रार्थना सुन ली, अब नहीं रहना पड़ेगा हे बादलों के भरोसे''-बोला जगदीश.

बोली गैरी-‘‘नहीं सतायेगा हमें अब पलायन का भय और भूत!''

चम्‍पा बोली-‘‘सही कहा, सही कहा भाईयों आप लोगों ने. होगीं भरपूर फसलें.!

नहीं रहेगी रोजी- रोटी की चिंता.जल्‍दी हस्‍ताक्षर करें.''. सभी हस्‍ताक्षर करते हैं .

‘‘चलो चलते हैं बैंक'' बोला -देवचरन.सभी उठकर खड़े होते हैं ,बोलते हैं-‘‘ चलो ! चलो! चलते हैं बैंक''

बैंक प्रस्‍थान करते हुए सभी आपस में बतियाते जा रहे हैं.बड़े प्रसन्‍नचित्त दिखाई दे रहे हैं..

राह चलते हुए कई जगह लोग प्रश्‍न करते हैं,अरे भाई सुबह-सुबह कहां ? लोगों के प्रश्‍नों का उत्‍तर देते हुए सरपंच के साथ बैंक पहुंचते हैं.

बैंक पहुंचकर मैनेजर से मिलते हैं.मैनेजर सबको स-सम्‍मान.बिठाते हुए बाले -‘‘ भईयो ! मैं आप लोगों का ही इंतजार कर रहा था.

कुछ कागजात सामने रखते हुए बोले-‘‘चम्‍पा जी ये समूह और बैंक के बीच. ऋण करार पत्रक हैं.अपने हस्‍ताक्षर कर दें.

बैंक की तरफ से मैंने सील के साथ हस्‍ताक्षर किये हैं,बाजू में अध्‍यक्ष की जगह चम्‍पा जी,और कोषाध्‍यक्ष की जगह जगदीश का हस्‍ताक्षर करें.

बगल वाले पेज में सभी सदस्‍य हस्‍ताक्ष्‍र करेंगे. हस्‍ताक्ष्‍र की प्रक्रिया पूर्ण करते हैं,

मैनेजर बोले -‘‘भाईयों इसके बाद जो भी कर्ज निकलेगा सामान खरीदने जो आर्ड्रर दिया जायेगा समूह के प्रस्‍ताव के आधार पर अध्‍यक्ष

और सचिव के हस्‍ताक्षर लगेंगे.'' समझ गयै आप लोग ? सभी एक स्‍वर में बोलते हैं हां! हां! ! समझ गये ! हमे मंजूर है.

तीन-चार माह की कड़ी मेहनत ,बैंक,सरपंच,जनपद पंचायत,राजस्‍व , एग्रीकल्‍चर विभागों की सतत्‌ निगरानी म,ें सिचाई योजना का कार्य पूर्ण होतं है. जिला पंचायत ़द्वारा कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र लारी किया गया है.

पंचायत भवन में बैंक मैनेजर, मुख्‍य कार्यपालन अधिकारी,समूह सदस्‍य उदघाटन बावत्‌ चर्चा कर रहे हैं. मुख्‍य कार्य पालन अधिकारी कहते हैं-‘‘ भाईयो सिचाई योजना का शुभारंभ कृषि मंत्री के कर कमलों ,द्वारा होगा. कलेक्‍टर महोदय ने2 अक्‍टूबर की तिथि तय की है.हे तैयारी में जुट जाना है.

चम्‍पा बोली -‘‘ये तो बड़ी खुशी की बत है.

सब व्‍यवस्‍था ,सब विभाग मिलकर कर लेंगे. आप चिंता न करें.चंपा बोली -‘‘ धन्‍यवाद सरपंच जी .''

सरपंच बोले -‘‘ भईयो अब चलते हैं .आगे की तैयारियों में जुट जायें.

वादे के साथ सभी अभिवादन कर विदा लेते हैं.

उदघटन का तैयारियां बड़े जोर -शोरों से चल रही है.शाम चार बजे, कार्यक्रम रखा गया है. ग्राम कोटवार ग्राम में मुनादी कर सरपंच को सूचना देता है.

सरपंच उसे व्‍यवस्‍था में लगने निर्देश देते हुए बोले -‘‘बनवारी दरवारी देखो, पंडाल में कुर्सियां जमवाना शुरू करो, करवाओ.

‘‘जी सरंपच जी '' कहता हुआ प्रस्‍थान करता है.

पंडाल लग चुका है. द्वार सज गया हैं.कुर्सियां लग चुकीं हैं, मंच सज चुका है.माइक लग चुका है.

सरपंच आकर माइक पर बोलते हैं-‘‘हलो-हलो, माई टेस्‍टींग !!!!!!! माई,टेस्‍टिंग !!!!!!.....!!!!!! .

व्‍यवस्‍था होते ही, लोगों का आना शुरू हो चुका है. महिलांए आगे की लाइन में और पुरूष पीछे निर्धारित स्‍थान की कुर्सियों पर बैठ रहे हैं.

चारों तरफ जहॉ-जहॉ भी नजर जाती है, भारी भीड़ दिखाई देती है. मंच से घोषणा होती है-‘‘.कृपया शांत रहे‘‘अतिथिगण आ हैं चुके है.,

मंच पर विराजमान होते दिख रहे हैं. मंच के एक ओर स्‍व-सहायता समूह के सदस्‍य आकर बैठते हैं.

भाइयो, अब में मंत्री महोदय का कलेक्‍टर महोदय का समूह के सदस्‍यों से परिचय कराता हूं. मंत्री सदस्‍यों के पास पहुंचकर उनसे परिचय लेते हैं

कलेक्‍टर महोदय भी,समूह के सदस्‍यों से परिचय प्राप्‍त सरते हैं.

सरपंच बोले-‘‘अब मैं स्‍व-सहायता समूह अध्‍यक्ष चम्‍पा जी से निवेदन करुंगा वे समूह की तरफ से अतिथियों का पुष्प‍हार से स्‍वागत करें.

आईये चम्‍पा जी! चम्‍पा एक- एक कर अतिथियों का पुष्‍प गुच्‍छ से स्‍वागत करतीं है. जोरदार तालियां गूंजतीे है.! ! ! !

तालियों की आवाज से सारा वातावरण गुंजायमान होउठता है. लोगों का उत्‍साह देखते ही बनता है.

सरपंच माईक पर घोषण करते हैं-‘‘ मैं अब माननीय ग्रामीण बैंक अध्‍यक्ष जी से निवेदन करता हूं ,

वे आकर मार्ग-दर्शन के दो शब्‍द्र कहिये श्रीमान.

ग्रामीण बैंक अध्‍यक्ष बोले -‘‘आदरणीय, मंच पर विराजमान सम्‍मानीय अतिथिगण, किसान भाईयों ,माताओ -बहनों ,मुझे बड़ी प्रसन्‍नता है कि,

आप जैसे प्रगतिशील किसानों के बीच आने मौका मिला .हमारी बैंक को फसलों को जीवन देने वाली ,किसानों के जीवन में सुख -समृद्धि लाने वाली ,

योजना में कर्ज उपलब्‍ध कराने का शुभ-अवसर प्राप्त हुआ है.आपसे मेरा विनम्र आग्रह है,योजना को सुचारु रुप से , ईमानदारी के साथ चलायेंगे.

भरपूर आय अजित करेंगे.जीवन स्‍तर में सुधार हो ऐसी कामना करता हूं

आप लोगों के लिये एक खुश खबरी और है. आपके समूह के लिये 2 लाख रु किसान क्रेडिटकार्ड्र में बैंक ने स्‍वीकृत किये हैं.

किसान क्रेडिट कार्ड के माध्‍यम के समूह खाद, बीज, दवाई, खरीद सकते हैं. बिजली बिल अदा कर सकते हैं.

इतना ही नहीं खेती की तैयारी करते समय किसानों के पास आय का कोई साधन नहीं रहता.

फलस्‍वरुप किसान मजबूरी बस साहूकार के पास जाकर घर खर्च चलाने बड़ी ब्‍याज दर पर उधार लेता है. अब जरुरत नहीं, पड़ेगी.क्‍योंकि किसान क्रेडिट कार्ड में कुल पात्रता राशि का 20 प्रतिशत घर खर्च चलाने के लिये ही होता है. आम के आम और गुठलियों के दाम का नाम है ‘ये किसान क्रेडिट ''

भाइयों आपसे आग्रह है, फसल आने पर सिंचाई योजना की किश्‍त एवं किसान क्रेडिट से जो रकम उधार ली थी ,मय ब्‍याज अदा करेंगे. किसान क्रेडिट कार्ड का 3 साल में एक बार नवीवीकरण भी करवा लेंगे साल भर इसमें लेन-देन कर सकते हैं.आप लोग इसका उपयोग बचत खाते की तरह किया जा सकता है.धन्‍यवाद जै-हिन्‍द !

अब मैं माननीय कलेक्‍टर महोदय से अनुरोध करुंगा वे आकर मार्ग दर्शन के दो शब्‍द कहें. हमें अनुग्रहीत करेंगे.आईये! श्रीमान, आईये !

कलेक्‍टर खड़े होकर संबोधन शुरु करते हैं-‘‘माननीय मंत्री जी,किसान भाईयों,मैं,आज आपके बीच पाकर गर्व महसूस कर रहा हूं. आप लोगों ने अपने भविष्‍य को बेहतर बनाने के लिये जो पहल की है वह सराहनीय है.आप लोगों ने जिले नाम रोशन किया ,जिनके सहयोग से आपने कार्य पूर्ण किया मैं आप सभी को हार्दिक बधाई देता हॅूं,सफलता की कामना करता हूँ.बैंक अध्‍यक्ष द्वारा दी गई सलाह पर ध्‍यान देंगे,सफलता निश्‍चित है. धन्‍यवाद जै-हिन्‍द ! तालियां गूंजती हैं!!!

अब मैं माननीय मंत्री जी से आग्रह करुंगा आशीष वचन कहें. आईये सर जी आईये ! यहां उपस्‍थित जन-सैलाब तालियों की गड़गड़ाहट से मंत्री जी का जोरदार स्‍वागत करता है मंत्री महोदय हाथ हिलाकर जनसमूह का अभिवादन कर बोले-‘‘भाईयों आपका.उत्‍साह देखकर ,उपस्‍थिति देखकर लगता है हर अच्‍छे कार्य को लोगों का साथ मिलता है.आपको

धन्‍यवाद देने के लिये मेरे पास शब्‍द क पड़ रहे हैं, क्षमा करेंगे !

शासन की योजना का लाभ किसानों त पहुँचा,जिनकी सहायता से पहुँचा.जिनके मार्ग-दर्शन से पहुँचा मैं शासन ओर से उन्‍हें धन्‍यवाद देता हूं.क्‍योंकि उन्‍होंने निष्‍ठा और लगन के साथ सराहनीय काम किया है. मुझे बताया गया, इस योजना की कल्‍पना करने वाली आदर्श महिला श्रीमती चम्‍पा देवी हैं जिन्‍होंने अकाल और पलायन से मुक्ति दिलाने के लिये शिवनाथ नदी की ओर अपने साथियों का ध्‍यान आकर्षित किया .उन्‍होंने बताया कैसे नदी के बहते पानी से फसलों को बचाया जा सकता है.कैसे नदी के पानी को खेतों तक पहुँचाया जा सकता है.

चम्‍पा जी ने लोगों को शासकीय योजनाओं की जानकारी दी. योजना को साकार करने हेतु सरपंच, बैंक, जनपद पंचायत कार्यालय, बिजली विभाग से सम्पर्क का सिलसिला चलाकर तारीफे-काबिल काम किया है.परिणाम आपके सामने है.चम्‍पा की वजह से ही सामूहिक सिंचाई योजना का जन्‍म हुआ है. मैं ऐसी महान विभूति को नमन्‌ करता हूँ.।

भाईयों, मुझे यह बताते हुए प्रसन्‍नता हो रही है, शासन द्वारा चंपा जी को उनके इस सराहनीय कार्य के लिये ‘‘आयरन-लेडी'' की उपाधी से एवं 25000रु नगद राशि देकर सम्मानित किया जा रहा है. सम्‍मान पत्र एवं राशि सौंपते हैं! सारा माहौल तालियों की ध्‍वनि से गूंज उठता है..! ! चम्‍पा जी एक खुश-खबरी और भी है शासन ने योजना के रख-रखाव के लिये 50000रु की सहयोग राशि भी स्‍वीकृत की है. चम्‍पा को सौंपते हुए बोले-‘‘इस राशि का उपयोग समय-समय सिर्फ मेंटेनैंस में ही खर्च किया जाना है,ताकि कार्य रुके नहीं. हमेशा रिजर्व रखें. खुश रहें खुशहाल रहें. धन्‍यवाद जै-हिन्‍द! तालियां माहौल में जोश और उमंग भर देता है. सरपंच माईक पर आकर बोले-‘‘अब मैं अतिथि गणों से निवेदन करता हॅूं, वे शिलालेख का अनावरण करें एवं बटन दबाकर, सिंचाई योजना की शुरूआत करें, अतिथियों को सदस्‍यगण शिलालेख के पास ले जाते हैं, मंत्री महोदय नारियल फोड़ते हैं पर्दा हटाकर अनावरण करते हैं.जोरदार तालियां गूंजती हैं ! इसका बाद बटन दबाकर सिचाई योजना का शुभारंभ करते हैं.पानी की तेज धार बह निकलती है.लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वातावरण हर-हर महादेव के नारों से गूंज उठता है.ह...र..ह..र .म..हा...दे....व.! !

जैसे-जैसे पानी खेतों में फैल रहा है,लोगों के चेहरो की चमक बढ़ती जा रही है.सदस्‍य आपस में एक दूसरे के गले मिल रहे हैं. उछल कूद रहे हैं.उन्‍हें देखकर अतिथि मंद-मंद मुस्‍करा रहे हैं.

मंत्री महोदय कहते हैं-‘‘भाईयों जैसा पेड़ वैसा फल''

पीछे से आवाज आती है- ‘‘जैसा कर्म वैसा फल,देखने मिलेगा सुनहरा कल''

सुनकर सभी एक साथ बोलते हैं-वाह ! वाह ! वाह! ! क्‍या बात है? जोरदार ठहाका लगता है.

सभी मंच पर आकर बैठते हैं.कुछ देर विचार विमर्श होता है,फिर सरपंच कार्यक्रम समापन की धोषणा करते हुए बोले-‘‘ अतिथि गण ,किसान भाईयो आपने अपना अमूल्‍य समय देकर इस कार्यक्रम को सफल बनाया हम आपके अत्‍यंत आभारी हैं.अब कार्यक्रम पूर्ण होता है. आप सभी से विनम्र आग्रह है स्‍वलपाहार लेकर जायें.धन्‍यवाद जै‘हिन्‍द!

गाना बज रहा है‘-‘‘ साथी हाथ बढ़ाना ,एक अकेला थक जाये तो.............! !

कार्यक्रम समापन पश्‍चात्‌ स्‍वलपाहार लेकर ग्रामीण अपने अपने घरों का लौट रहे हैं.पीछे -पीछे अधिकारियों का काफिला भी निकल रहा है.आसमान में सूर्य अस्‍त होने के पश्‍चात्‌ छटा देखते ही बनती है . लोग आसमान को निहारते हुए आपस में हॅसी मजाक करते आंखों से ओझल हो रहे हैं.

गाने का स्‍वर अब भी सुनाई दे रहा है,...सा..थी....हा....थ.....बढ़ाना ...! ! ! .

एक माह पश्‍चात-स्‍वसहायता समूह के सदस्‍य अपना सारा ध्‍यान खेत जोतने,सुधार में लगाते हैं. ,खरीफ फसल का सय नजदीक है.तैयारियां जोरों से चल रही हैं.किसान क्रेडिट कार्ड के माध्‍यम से खाद-बीज का व्‍यवस्‍था पहले से कर ली गई है ,ताकि एन वक्‍त पर कमी का सामना न करना पड़े. अब घर खर्च के लिये साहूकार को कर्ज नहीं लेना पड़ा.

बीज बोने के समय बीज बोते हैं .निदाई-गुड़ाई सब समय पर होता है.वर्षा हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता. बैंक ,कृषि विभाग ,के अधिकारी र्कचारी समय -समय पर आकर मार्ग दर्शन देते हैं. उनकी सलाह अनावश्‍यक खर्चों में कमी लाती है.

स्‍व सहायता समूह के सदस्‍य पम्‍प घर के पास ,नदी किनारे बैठकर कभी नदी के पानी को तो कभी खेतों की लहलहाती हुई फसलों को देखते हैं.उनके चेहरों की चमक उनकी सफलता की कहानी कहती है. गौरी कहती है-‘‘बहन चम्‍पा शिवनाथ नदी का ये पानी सिर्फ पानी नहीं है.! ये तो अमृत है अमृत है पूरन कहां चुप रहने वाला था बोला -‘‘गौरी ये जो फसलें हैं ये सिर्फ फसलें नहीं हैं इनमें मोती भरे हैं मोती भरे हैं''!

सभी आसमान की ओर देखते हैं ,मानो भगवान को धन्‍यवाद दे रहे हों!.

कुछ समय पश्‍चात्‌ ,फसलें पकतीं हैं,कटाई, मिजाई पश्‍चात्‌ बैंक में शासन द्वारा घोषित मूल्‍य पर धान बेचते हैं. उचित मूल्‍य के साथ शासन द्वारा धोषित बोनस भी मिलता है.वादा मुताबिक समूह सदस्‍य प्राप्‍त आय से सबसे पहले बैंक पहुंचकर देय किश्‍त और किसान क्रेडिट के माध्‍यम से ली गई रकम अदा करते हैं.फिर जमीन के अनुपात में रकम का बटवारा करते हैं.

जगदीश गुनगुनाता है-‘‘दुख भरे दिन बीते रे भईया सुख भरे दिन आयो रे ! आयो रे ! !.

रंग जीवन में नया लायो रे ! .....लायो रे बोला पूरन-‘‘ क्‍यों भाईयों मैने क्‍या कहा था ? ''

बीच में बोली गौरी -‘‘ जहाँ महिलायें बैठतीं हैं,वहाँ समस्‍या का हल निकल ही आता है!''

देवचरन बोला -‘‘ सच कहा गौरी ,बिलकुल सच कहा ‘‘आयरन लेडी ''जिंदाबाद ,जिंदाबाद !

जगदीश बोला -!‘‘ जैसा पेड़ वैसा फल''

चम्‍पा बोली-‘‘ भगवान उन्‍हीं की मदद करते हैं.जो निष्‍ठा और लगन से काम करते हैं''

अब इंद्र देवता भी नाराज नहीं है गांव में हर साल झमा-झम बरसात होती है...............!

रमाकंत बडारया ‘‘बेताब''

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